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16 Jun 2010
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वाह रे वाह

ग़ज़ल वहशी को इंसान पे तरजीह, वाह रे वाह आन को दें  ईमान पे तरजीह, वाह रे वाहमात्रा मोड़ के, कायदे तोड़ के, बोले गुरजीदीजो बहर को ज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाहख़ुद तो ‘सुबहू’, ‘ईमां’, ‘सामां’ लिखके खिसके-‘नादां’ को ’नादान’ पे तरजीह, वाह रे वाहचार छूट जब
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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शास्त्रीय गाल-वादन की बुनियादी समझ का हंगामा

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?--2 जैसा कि वादा था कि दूसरे लेख के साथ इस क़िस्से को ख़त्म करेंगे। अगर ‘हंस’ में अलंकारिक भाषा में कोई प्रतिक्रिया आती भी है तो उसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की जाएगी।(जेंडर जिहाद, हंस, जून 2010)शास्त्रीय
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
Jun 15 2010 03:32 PM
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....तो आएगी किस दिन क़यामत पता हो

ग़ज़ल क्यूं करते हैं मेहनत ये नीयत पता हो बीमारों की असली तबीयत पता होतुम्हे गर मेरे सच की जुर्रत पता होतो आएगी किस दिन क़यामत पता होपिता सर पे, पलकों पे माँ को रखेंगेबशत्र्ते कि उनकी वसीयत पता होक्या तोड़ोगे आईना, कुचलोगे चेहरा?करोगे भी क्या गर हक़ीकत पता
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?

हंस के मई अंक में मेरा एक लेख है। यह अंक नेट पर आज, लगभग एक महीना देर से अवतरित हुआ है। वजह तकनीकी रहीं होंगीं। यह लेख हंस के कालम की कुछ बातों पर प्रतिवाद-स्वरुप है। अभी एक मित्र ने फोन पर कहा कि इसे ब्लाग पर लगाकर किसकी चर्चा चाहते हो-कालम की या अपनी
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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मोहरा, अफवाहें फैला कर....

ग़ज़लें1.मोहरा, अफवाहें फैला कर बात करे क्या आँख मिला करऔरत को माँ-बहिन कहेगालेकिन, थोड़ा आँख दबाकरपर्वत को राई कर देगाअपने तिल का ताड़ बना करवक्त है उसका, यारी कर लेयार मेरे कुछ तो समझा करख़ुदको ही कुछ समझ न आयाजब बाहर निकला समझा कर(‘सण्डे पोस्ट साहित्य
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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चालू

लघुकथाचालूउन्होंने जाल फेंका।शिकार किसी तरह बच निकला।यूं समझिए कि ख़ाकसार किसी तरह बच निकला।भन्ना गए। सर पर दोहत्थड़ मारकर बोले, ‘‘तुम तो कहते थे भोला है। देखो तो सही साला कितना चालू आदमी है।’’ -संजय ग्रोवर
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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पुरूष की मुट्ठी में बंद है नारी-मुक्ति की उक्ति-2

शब्दों को छोड़कर आइए अब ज़रा विज्ञापन की दुनिया का जायज़ा लें । नारी शरीरों की निर्वस्त्रता पर नारी संगठन और संस्कृतिदार पुरूष अपना विरोध कई तरह से प्रकट करते आए हैं व कर रहे हैं । मगर, कई बैंको और फाइनेंस कंपनियों के दर्जनों ऐसे विज्ञापन पत्र-पत्रिकाओं,
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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पुरूष की मुट्ठी में बंद है नारी-मुक्ति की उक्ति-1

प्रशंसा सुनकर गद-गद होना या झूठी तारीफ सुनकर दूसरों का काम तुरत-फुरत कर देना-एक ऐसी कमजोरी है, जो ज्यादातर लोगों में पाई जाती है । मगर जिस वर्ग को इस विधि से सर्वाधिक छला गया है, वो है-स्त्री वर्ग । सुंदर और मोटे-मोटे शब्दों का जाल बिछाकर स्त्री को
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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बिना जुगाड़ के छपना

कस्बे में यह खबर अफवाह की तरह फैल गई कि एक नवोदित लेखक एक राष्ट्रीय अखबार में बिना किसी जुगाड़ के छप गया। सभी हैरान थे कि आखिर यह हुआ कैसे। तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं। कोई कहता कि यह चमत्कारों का युग है, इसमें कुछ भी हो सकता है, तो किसी का मानना था
 
sanjaygrover
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फिर तुझे क्या पड़ी थी बेवकूफ !?

1. फिर तुझे क्या पड़ी थी सालेतू किसी में गुट में हैजलेस में, प्रलेस मेंहै किसी में ?तेरा कोई जानने वाला है मिनिस्ट्री में ?किसी नेता से है तेरा दूर का भी कोई रिश्ता ?पुलिस के महकमे में ही होता चलो कोई साहित्य तक में नहीं तुझपरकिसी सिंह, किसी यादव,किसी
 
sanjaygrover
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परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है.

फ़ेस बुक पर एक दोस्ताना बहसSanjay Grover : परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है।Sat at 12:10pm Friends of Friends • Comment •LikeUnlikeBabykumari Kumari, Vijay Krishna Mishra, Ajay Kumar and 2 others like this.Arkjesh Kumar कोई उदाहरण ? Sat at
 
sanjaygrover
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दोबारा में : 8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

Saturday, March 7, 2009 8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक व्यंग्य**मर्दों वाली बात** वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियो की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं
 
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परंपराओं वाले बबुआ

कई बार अपने या दूसरों के ब्लागस् पर अपनी या दूसरों की कुछ टिप्पणियां ऐसी लगती हैं कि मन होता है इन्हें ज़्यादा महत्व देकर ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए। ‘छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां’ ऐसी ही टिप्पणियों का मंच बन रहा है। इस बार संवादघर की एक पोस्ट ‘मर्दों
 
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पुरस्कार का बहिष्कार और अखिल-भारतीय अरण्य-रोदन

गधा ऐसे सम्मेलन में कोई पहली बार नहीं आया था। जब भी वह मानवता, ईमानदारी प्रेम वगैरह जैसी दकियानूसी, पुरातनपन्थी, आउट आॅफ डेट, आउट आॅफ फैशन हो चुकीं बातों का बोझा ढोते-ढोते थक जाता है, ऐसे ही किसी सम्मेलन की किसी कुर्सी पर बैठ कर थोड़ी देर सुस्ता लेता
 
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हमारी क़िताबों में हमारी औरतें

 ~~~~कविता~~~~औरतें खुश हो जाएंआखिर हमने ढूंढ ही निकालापवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने केउतनेंवें श्लोक में लिखा हैऔरतों को दिए जाने चाहिए अधिकार और न्यायमगर ज़रा ठहरोयह तो हमने देखा ही नहीं किऔरतों को अपनी मनपसंद चीज़ें मिलने परखुश होने के
 
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धत्त तसलीमा !

तसलीमा जो हैं सो बचपन से ही अत्यंत षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति की रहीं। उन्होंने ख़ुद ही अपने चाचा-मामा को उकसाया कि वे उनसे दुराचार करें या इसकी कोशिश करें ताकि बड़ी होकर वे इस पर लिख कर पैसा कमा सकें।वे इतनी बेवकूफ़ रहीं कि क्रांति और बदलाव की कुसंगत में पड़
 
sanjaygrover
Mar 03 2010 09:42 AM
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वैलेंटाइन डे पर : इसी काया में मोक्ष

इसी काया में मोक्ष बहुत दिनों से मैंकिसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँजिसे देखते ही लगेइसी से तो मिलना थापिछले कई जन्मों सेएक ऐसा आदमी जिसे पाकरयह देह रोज़ ही जन्मे, रोज़ ही मरेझरे हरसिंगार की तरहजिसे पाकर मन फूलकर कुप्पा हो जाएबहुत दिनों से मैंकिसी ऐसे आदमी
 
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Feb 14 2010 05:53 AM
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हैंइ

देवियो और सज्जनो, मैं भगवान बच्चन इस ब्लाॅग पर भी आपका स्वागत करता हूं। आप तो जानते ही हैं मैं अत्यंत सभ्य और भद्र एक्टर हूं। इंसान भी हूं।‘कौन बनेगा ख्रोरपाती’ भी मैं ऐसे पेश करता था जैसे क्लास ले रहा होंऊ । हांलांकि मैं सबको सर-सर कहता था पर प्रतिभागी
 
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व्यंग्य-कक्ष में *****राष्ट्रप्रेम*****

कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है, मगर हम आजकल के राष्ट्रप्रेमियों को देखें, तो लगता है कि राष्ट्रप्रेम कहीं ज्यादा अंधा होता है, और कथित राष्ट्रप्रेमियों को प्रेम करने वाले कितने अंधे हो सकते है, इसका अंदाजा तो कोई अंधा भी नहीं लगा सकता। अगर आपने देश की
 
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उनके लिए कुछ लिख डाला...

हिचक, झिझक में, बंद घरों मेंलोगों के, दुनिया के डरों मेंबेमतलब यूं उम्र गुज़ारीचलो आज फिर अपनी बारी....सोचता था कि क्या लिखूं तुमकोकि अक्षरों में सही, मैं भला दिखूं तुमकोलिखूं वो बात नयी जो तुम्हे हिला डालेजो सो गया तुममें, उसको फ़िर जगा डालेवो ग़लतियां वो
 
sanjaygrover
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देश-भक्ति क्या है ?

कुछ देशों को गालियां बकना। 2। कुछ कौमों/सम्प्रदायों को गालियां बकना। 3। गीत गाना। 4। झण्डा फहराना। 5। पूजा-पाठ करना। 6. अपने देश के लोगों से ऊंच-नीच करना। 7। अपना काम ईमानदारी से करना।
 
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उदारता क्या है ?

लगभग सभी धर्मों के मानने वाले यह दावा करते हैं कि धर्म इंसान को उदार, सहिष्णु और मानवीय बनाता है। मेरे मन में अकसर कुछ सवाल उठते हैं। चूंकि मैंने इन सवालों को आज तक किसी दूसरी जगह नहीं पढ़ा, इसलिए मन हुआ कि इन्हें आपके सामने रखूं। यह मेरी एकतरफा सोच ह
 
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कुछ खुरदुरी-सी दो ग़ज़लें/लगभग बुरी-सी दो ग़ज़लें

ग़ज़ल जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं है उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नहीं है वो ज
 
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ऐ आगंतुक ख़लल न डाल

ईमानदारी एक रणनीति है होने से ज़्यादा ज़रूरी है दिखना दोस्ती एक मजबूरी है जीने के लिए कोई न कोई शगल ज़रूरी है स्वाभिमान एक लहंगा है हालांकि पड़ता बड़ा मंहगा है और हालात की हवा भी है बहुत तेज़ विनम्रता एक चालाकी है ज़्यादा कसके पकड़ो तो हाथ से छूट जाती है ब
 
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गालियों और लात-घूंसों के साथ जूठन भी प्राकृतिक स्वभाव !?

मटुकजूली के ब्लाग से चली यह बहस रा. सहारा   और गीताश्री के ब्लाग से होती हुई यह बहस मुझ तक आ पहुंची है क्यांकि एक टिप्पणी मटुक जूली के ब्लाग पर मैंने की थी। जिसपर उन्होंने अपने विचार रखे और उनपर मैं अपने रख रहा हूं। (तकनीकी कारणों से यह मटुकजूली
 
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मोहे अगला जनम ना दीजो-2

पिछला पन्ना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) भला किसी को ग़ज़लें भी फ़ुल वॉल्यूम पर सुनते देखा है कभी ! सरल सुनता है कि पूरे मोहल्ले को सुनाता है !? ‘‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वे काग़ज़
 
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दमित-विमर्श

सुना है कि वक्त बदल गया है।पुरुष भी अब आज़ाद हो रहे हैं। मगर मैं कहता हूं कि फ़िर कहां है वो लड़की जो मेरा हाथ पकड़कर जबरन मुझे घर से बाहर खींच ले जाए। झिड़के कि कहां रसोई में घुसे रहते हो दिन-भर, देखो अब मर्द भी बाहर घूम रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, व्यापा
 
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मोहे अगला जनम ना दीजो ।

क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे लड़कों की तरह मर्दाने, खुरदुरे, सख्त या गंठीले ना हो जाएं। तनहाई के छोटे से छोटे वक्फ़े में भी ये हीन भा
 
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कुंठा तू न गयी किसी मन से.......

कार्टून ठीक से न दिखता हो तो उसपर चूहे की चोंच से चिकोटी काटें-
 
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अंधेरों का कोरस यानि कि एक लीचड़ पैरोडी यानिकि डों‘ट टेक सीरियसली......

यारों सब धुंआं करो मिलकर धुआं करो बचे-ख़ुचे पर्यावरण को धकेलो, दफ़ा करो यारों सब धुंआं करो...... लोगों को दमा करो चाहे अस्थमा करो कानों को फ़ाड़ो बम से अमन प दावा करो यारों सब धुंआं करो.... पार्क को तबाह करो तिसपे वाह-वाह करो रोशनी को आग़ में डालो नाचो,
 
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मौलिकता ससुरी होती ही है अनगढ़

मौलिकता तो वो है मेरे दोस्त जिसे जानकर तुम्हारे छक्के छूट जाएं हवा ख़राब हो जाए सारी दुनिया से तुम्हारा विश्वास उठ जाए अपनी सारी ज़िन्दगी पर दोबारा सोचने को मजबूर हो जाओ तुम जिसे सुनते ही पहले-पहल यही कहो तुम कुतर्क करता है साला अनगढ़ है इसका सारा सृजन
 
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छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां

कई बार अपने या दूसरों के ब्लागस् पर अपनी या दूसरों की कुछ टिप्पणियां ऐसी लगती हैं कि मन होता है इन्हें ज़्यादा महत्व देकर ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए। ‘छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां’ ऐसी ही टिप्पणियों का मंच बन रहा है। शुरुआत पूजा प्रसाद के ब्लाग ‘जो जारी
 
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ग़ज़ल जो अब तक छपी नहीं, पढ़ो कहीं तो पढ़ो यहीं

ग़ज़लहिन्दुस्तान में हिन्दी जैसी उसकी हालत अपने घर मेंजैसे शीशा देख रहा हो अपनी सूरत इक पत्थर मेंअपने-अपने समय को देखो अपनी-अपनी घड़ी चलाओयारो धोखा खा जाओगे देखोगे गर घंटाघर मेंअपने पुरखे नहीं रहे अब ऐसा कहना ठीक न होगाहमने अकसर देखा उनको घुड़की देते उस बंदर
 
sanjaygrover
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Sep 14 2009 11:05 AM
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ग़ज़ल जो ढंग से नहीं छपी ! यहां छपी क्या खू़ब छपी !

ग़ज़लबह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिलाफ़िर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिलाखो के पाना पा के खोना खेल जैसा हो गयालुत्फ़ जीने की सज़ाओं में कोई ऐसा मिलाखो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापिस मिलेएक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिलाहमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी
 
sanjaygrover
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क्या हमें ‘सच का सामना’ नहीं ‘सच का परदा’ चाहिए !?

नैतिकता पर बहस शायद आज की सबसे मुश्किल बहस है। क्योंकि ज़्यादातर लोग ‘चली आ रही नैतिकता’ पर अड़े रहते हैं, भले व्यवहार में इसका उल्टा करते हों। थोड़े-से लोग नैतिकता के नियमों को बदलने की कोशिश करते हैं। उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें पुराने नियम अमानवीय
 
sanjaygrover
Aug 15 2009 05:23 PM
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‘व्यंग्य-कक्ष’ में पढ़िए **साहित्य में आतंकवाद** श्रृंखला का चौथा व्यंग्य

***** बिना जुगाड़ के छपना*****+++++++++++++++++++++++++++++++कस्बे में यह खबर अफवाह की तरह फैल गई कि एक नवोदित लेखक एक राष्ट्रीय अखबार में बिना किसी जुगाड़ के छप गया। सभी हैरान थे कि आखिर यह हुआ कैसे। तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं। कोई कहता कि यह
 
sanjaygrover
Aug 11 2009 12:27 PM
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‘व्यंग्य-कक्ष’ में पढ़िए #~~~साहित्य में आतंकवाद~~~# श्रृंखला का दूसरा व्यंग्य *****एक कॉलम व्यंग्य*****

*****एक कॉलम व्यंग्य*****@@@@@@@@@@@@@$$$$$$$@@@@@@@@@@@@@कृपया निम्न लेख को पढ़ते समय ध्यान रखें कि यह एक व्यंग्य है।श्रीमती जी को कद्दू पसंद है और मुझे टिण्डा। बोलीं कि कई दिन से टिण्डा खा रहे हैं आज कद्दू बना लेती हूं। मैं हंसा, गंवार कहीं की। रूंआसी
 
sanjaygrover
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व्यंग्य-कक्ष में *****अगर तुम न होते*****

व्यंग्य का शौक उन्हें बचपन से था। हर आदमी को अपना कार्य क्षेत्र व प्रतिबद्धताएं तय करनी पड़ती हैं। जब वे तीन वर्ष के थे तभी उन्होंने निश्चय कर लिया था कि लोग अगर मानसिक विकृतियों व सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य लिखते हैं तो मैं लोगों की शारीरिक
 
sanjaygrover
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अंततः एक गॉडफादर !?

TUMHARI KHOJ ME said...बीमारी खोजन की खातिर तो हम यहां पहुंचल बा बबुआ। इ जो खिसियाए रहो हो, इ कि दरकार न बा। हम तुहार दुसमन न बा। और कीडा कव्‍वा हम तोहके न बोले रहिन इ तो मुहावरे हैं, अगर ठेस पहुंची हो तो बाइज्‍जत हम शर्मिंदा बा। पर बबुआ अब ऐंठ छोड दो और
 
sanjaygrover
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उदयप्रकाश प्रकरण: कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना !?

उदयप्रकाश प्रकरण पर लगातार कुछ न कुछ छप रहा है। मैंने इस संदर्भ में ‘मोहल्ला’ पर एक पोस्ट लगाई थी। उसमें कुछ सवाल रखे थे जो लगातार मेरे मन में उठते रहे हैं। जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ रही है सवाल भी गहरा रहे हैं, कुछ नए प्रश्न भी जुड़ रहे हैं। पहले मैं पिछले
 
sanjaygrover
Jul 27 2009 12:30 PM