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मत-मतांतर

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30 Mar 2010
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मध्यवगीर्य है दलित की अवधारणा

मैंने पाया है कि गांव में भिन्न जाति के लोगों के लिए बोली"बाजी के मुहावरे और ाब्दावलियां अलग"अलग हैं। अगर हलवाहे मुसहर जाति से होते और उनको बैल दिक परेाान करते तो सहज ही कहते ॑चमरे हीं दे अएबउ॔ अथार्त` चमार को दे आएंगे। यहां यह भाव होता कि सामाजिक
 
राजू रंजन
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ऐसी खुशफहमी भी ठीक नहीं है, जोशी जी...!

जनसत्ता (6 दिसंबर, 2009) में प्रकाशित मेरे लेख ‘कला-आलोचना की भाषा’ (http://matmatantar.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html) पर दो बिल्कुल ही भिन्न तरह की प्रतिक्रिया दो भिन्न रूपों में आईं। पहली अलिखित, लेकिन दूसरी लिखित।मैं अपना छपा लेख देख-पढ़ भी न
 
राजू रंजन
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थोड़ी "आस्था" मार्क्सवाद में भी तो हो...!

केरल के पूर्व सीपीएम सांसद कुरिसिंकल एस मनोज को व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक आस्था प्रकट/अभिव्यक्त करने के लिए पार्टी की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। पश्चिम बंगाल से निकलने वाले अखबार "दि टेलीग्राफ" (11जनवरी 2010) ने लिखा, ‘मार्क्सिस्ट पुट्स गॉड एवव पार्टी।’
 
राजू रंजन
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यह कौन-सी नई पॉलिटिकल इकोनॉमी है कॉमरेड...?

विश्वस्त कहे और समझे जा सकने वाले सूत्रों से पता चला कि कुमार मुकुल जसम यानी जन संस्कृति मंच ज्वायन कर चुके हैं। पुष्टि के लिए कुमार मुकुल को फोन लगाया। उन्होंने हामी भरी। इस पर मेरी अत्यंत सहज-स्वाभाविक (जिसे बिना सोचे बोलना कहा जा सकता है) प्रतिक्रिया
 
राजू रंजन
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संपादक का अक्षर ज्ञान...!

अशोक कुमार ने प्रभात खबर, पटना (11।10।2009) को ‘ आपकी कलम‘ में प्रकाशनार्थ एक पत्र लिखा जिसे 16।10।2009 को प्रकाशित किया गया। लेकिन ‘संपादन-कौशल’ या कि अज्ञान ने उल्टी गंगा बहा दी। आपके समक्ष मूल पत्र एवं प्रकाशित पत्र हू-ब-हू रखे जा रहे हैं, ताकि अखबार
 
राजू रंजन
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कहां है चित्रकला आलोचना की भाषा...?

इन दिनों कला आलोचना की भाषा मेरी चिंता में शामिल रही है। कई बार तो ऐसा लगता है, और जो शायद बिल्कुल सही भी है कि इतने सारे कला आन्दोलनों के बाद भी भारत के चित्रकला समीक्षकों ने आलोचना का अपना कोई निश्चित प्रतिमान नहीं गढ़ा है। यह कला आंदोलनों के इकहरेपन का
 
राजू रंजन
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एक गधा जब नेहरू से मिला...

(नेहरु और गधे की ऐतिहासिक बातचीत)मैंने लोगों से सुन रखा था कि पंडितजी से मुलाकात का समय सुबह साढ़े सात-आठ बजे से पहले का है। उसके बाद जो मुलाकातियों का तांता शुरू होता है तो फिर किसी समय भी एक-आध मिनट के लिए बात करना असंभव होता है। यही सोच कर मैं उस दिन
 
राजू रंजन
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धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 4

धर्म प्रगतिशील हो ही नहीं सकता... भारत में मार्क्सवादियों को गुमान रहा है कि धर्मनिरपेक्षता की ध्वजा के असली वाहक वे ही हैं। इनके यहां धर्मनिरपेक्षता की "सर्वधर्म समभाव" की अवधारणा के विपरीत अवधारणा है, जिसमें "धर्म जनता के लिए अफीम है।" धर्म को "अछू
 
राजू रंजन
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Dec 29 2009 11:56 AM
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धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 3

हिंदुत्व, शंबूक और पिघला हुआ शीशा... परंपरा के नाम पर गंदगी जमा करने वाले लोग यह समझते है कि उनके अलावे और किसी के पास ऐसी स्वस्थ परंपरा हो ही नहीं सकती। हिंदुओं का खयाल है कि उनकी परंपरा प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष ही रही है। बात अगर वेद के जमाने से श
 
राजू रंजन
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धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 2

राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता दोनों जुड़वा भाई हैं... इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में धर्म और राजनीति के अंतर्संबंध को लेकर काफी कुछ लिखा गया है। परंपरावादी चिंतन यह है कि गांधीजी ने धर्म को राजनीति से जोड़ कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक महत्त्वप
 
राजू रंजन
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दूज का चाँद था

आसमान को तका और बर्फ-सी चमचम सफेद दरांती की तरह उतर आया पूरे जिस्म में जाना दूज का चाँद था।
 
राजू रंजन
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साहस

सागर का तट छोटा पड़ जाता है जब फैलाता हूं बाहें लेकिन आ नहीं पाता बांह की परिधि में अंदर का साहस।
 
राजू रंजन
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धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 1

राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता का मुखौटा है... सांप्रदायिकता आज हमारे देश की सबसे गंभीर समस्या बन चुकी है। उसके विशाल और विकृत रूप के सामने धर्मनिरपेक्ष ताकतें शर्म महसूस करती हैं। औपनिवेशिक शासन के बुरे दिनों में हम सांप्रदायिकता का मतलब समझते थे कि यह वि
 
राजू रंजन
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Dec 29 2009 11:56 AM
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विचार जड़ता के खिलाफ ज़ंग है- 3

विचार से हीन सूचना हमें भ्रष्ट बनाती है... आतंकवाद कोई नया शब्द नहीं है। आज जिसे हम स्वाधीनता आंदोलन के योद्धा के रूप में याद करते हैं, अंग्रेजी सरकार उन्हें आतंकवादी कहती थी। आजादी से पहले के किसान आंदोलनों को अंग्रेज अफसरों की भाषा में डकैती की संज
 
राजू रंजन
Dec 29 2009 11:56 AM
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विचार जड़ता के खिलाफ जंग है- 2

विचार जितने छिपे हों, लेखक के लिए उतना अच्छा... इन्हीं दिनों एंगेल्स की पंक्ति- "विचार जितने छिपे हों, लेखक के लिए उतना ही अच्छा है"- ने मेरे विवेक को जागृत कर दिया। आज मैं कह सकने की स्थिति में हूं कि विचारधारा और सामाजिक यथार्थ का बेहतर समन्वय ही क
 
राजू रंजन
Dec 29 2009 11:56 AM
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विचार जड़ता के खिलाफ़ ज़ंग है- 1

मेरे वैचारिक गुरू... लेखन निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का परिणाम है। लेखन की शुरुआत कब और कैसे की, का उत्तर देने के लिए बचपन के उन दिनों की याद को ताजा करना होगा, जब एक लेखक मन का जन्म हो रहा था। मोटे तौर पर मैं तेज विद्यार्थी नहीं था, लेकिन मेरे चाचा
 
राजू रंजन
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कौन कहेगा ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं...’

राजू रंजन प्रसाद कुछ साल पहले अस्पताल से लेकर कॉलेज तक की दीवारों पर लिखा होता था, ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं।’ जनवादी और प्रजातांत्रिक मूल्यों के खिलाफ सांप्रदायिकता को बल प्रदान करने वाले एक से बढ़ कर एक लेखों के ढेर लगाए जा रहे थे। विकृत मानसिकता को
 
राजू रंजन
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शिक्षक नशेड़ी, गंजेड़ी हैं तो क्या पत्रकार संत हैं?

नवनियोजित शिक्षकों के आन्दोलन की खबरें बिहार के अखबारों में ‘प्रभात खबर’ ने सबसे शानदार तरीके से छापीं लेकिन ‘सुशासनी।’ डांट से अब ये ‘उल्टी गंगा बहाने’ लगे हैं। अनुराग कश्यप, दर्शक (लेखक हैं तो बुर्के में क्यों हैं?) और सुरेन्द्र किशोर इन शिक्षकों को
 
राजू रंजन
Aug 06 2009 08:03 PM
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यादों में बसे लोग- 5

यथार्थ तो परछाई की तरह है... कवि ‘अव्यावहारिक’ जीव होता है... व्यथित जी जब कभी पटना आते और हमलोग मिल बैठते तो आलोक धन्वा की चर्चा अवश्य होती। आलोक जी की कविताओं से वे बेहद प्रभावित थे। वे जब बात करने लगते तो निर्दोष बच्चों-सी ललक दिख पड़ती उनमें। मैं
 
राजू रंजन
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यादों में बसे लोग- 4

छत की लड़की’ से परिचय… एक दिन अखबार से मालूम हुआ कि ‘छत की लड़की’ उनके आंगन में दाखिल हो चुकी है, यानी उनकी शादी कर ली है। हम लोगों के लिए यह खबर बहुत रोमांचक थी। मैं तब अशोक जी के साथ सुनील जी के मकान में रहा करता था। मैं, अशोक जी और सैदपुर छात्रावा
 
राजू रंजन
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यादों में बसे लोग- 3

जो जात-पांत की बात करे, उस पर थूक दीजिए..." 1991 में मैं एमए (इतिहास) में दाखिला ले चुका था। विजय कुमार ठाकुर के संरक्षण में अशोक जी ने "इतिहास विचार मंच" की स्थापना की, जिसका मुझे संयोजक बनाया गया। इस संस्था का प्रमुख काम अकादमिक महत्त्व के विषयों म
 
राजू रंजन
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यादों में बसे लोग- 2

कुल्हाड़ी फेंक के नहीं, थाम के मारो कॉमरेड... 1984 में मैट्रिक की परीक्षा पास कर मैं पटना के सैदपुर छात्रावास में अपने बड़े भाई से साथ रहने लगा। कथाकार हंसकुमार पांडेय भी साथ रहा करते थे। पांडेय जी कहानियों में ही नहीं, सामान्य बातचीत में भी कथा बुनत
 
राजू रंजन
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यादों में बसे लोग- 1

व्यवस्था बहुत कम शब्दों को जानती है... बीएन कॉलेज में इतिहास ऑनर्स का छात्र था जब पहली बार आकाशवाणी, पटना में सुलभ जी से मिला। रेडियो पर लेख पढ़ना चाहता था- भक्ति आंदोलन का सामंत विरोधी स्वर। सुलभ जी ने उसे उलट-पलट कर देखा और कहा- 'राजू जी, व्यवस्था
 
राजू रंजन
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भारतीय संस्कृति और दिनकर की आर्य दृष्टि

आर्यत्व" अगर कुछ है... बीसवीं शती पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी प्रति-औपनिवेशिक चेतना अथवा प्रत्याख्यान रचने और विकसित करने की सदी रही है। इस सदी में भारत दो तरह के महायुद्ध में शामिल था। एक का स्वरूप सांस्कृतिक था तो दूसरे का राजनीतिक। दोनों एक
 
राजू रंजन
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मुझे मेरे समानधर्मा की तलाश है...

बीसवीं शती पूरी दुनिया के इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शती रही है। शायद इसलिए कि इसने मानव-जीवन में कुछ महान कही जा सकने वाली तब्दीलियां पैदा की। लोगों ने भविष्य की घोषणा को इतिहास बनते देखा है। मार्क्स ने समाजवाद का जो सपना (इसमे और भी लोग शामिल थ
 
राजू रंजन
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संस्कृति और इतिहास-बोध- 3

परंपरा को ताबीज़ बना कर रखने की जरूरत नहीं... किसी देश या जाति के इतिहास में क्या ग्राह्य है और क्या अग्राह्य- इसका सम्यक फैसला हमारी इतिहास-दृष्टि करती है। संस्कृति के अंदर सब कुछ बचा लेने लायक नहीं होता। बहुत कुछ समय की मार खाकर बेजान हो जाता है, इ
 
राजू रंजन
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संस्कृति और इतिहास-बोध- 2

संस्कृति प्रवहमान होती है... संस्कृत के क्षेत्र में इस तरह के अलगाव की प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब विकास की एक खास यात्रा हम तय कर चुके होते हैं। उससे पहले शायद ऐसा करना संभव भी नहीं होता। हम इतिहास के अनुभवों के आधार पर देखें तो साफ होगा कि जिस आर
 
राजू रंजन
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संस्कृति और इतिहास-बोध- 1

संस्कृत यानी वर्चस्व की संस्कृति संस्कृति पर विमर्श प्रकारांतर से मानव जाति पर विमर्श है, क्योंकि इसके केंद्र में वही है। अपने व्यापकतम अर्थ में संस्कृति वह सब है, जिसका निर्माण मानव जाति ने किया है और कर रही है- श्रम के औजारों से लेकर घर-गृहस्थी की
 
राजू रंजन