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काहे को ब्याहे बिदेस....

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11 Jun 2010
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यह कैसा स्पंदन है... यह कैसी अनुभूति है... यह कैसा भय है...

वो बचती फिरती थी सौरभ से... जैसे राहगीर बचते है रास्ते में आ जाने वाली बिल्ली से... दो कमरों के सरकारी क्वाटर में रोज आने वाले मेहमान से कितना बचा जा सकता है.. पिछले दो बरस से शाम को उसका घर आना उसी तरह निश्चित था, जैसे शाम को सूरज का छिपना, सुबह को सभी
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फोन कुछ पलों के लिए गुंगा हो गया.....

हज़ारों मील दूर जिस ज़मीन के टुकड़े का विस्तार और मिट्टी का रंग भी याद नहीं उस पर सोने की बालियाँ उगी नज़र आती हैं... जिस बाग़ के पेड़ों के फल का स्वाद जुबान से घीसे पत्थर की तरह उतर चुका है उसकी रखवाली के लिए हर साल बागवान बदला जाता है शायद
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लिली सुख गई है और केक्टस......

वो जो परिंदों के हाथ भेजते थे रोज एक नयी उड़ान, छत पर जाकर उन परिंदों को दाना डालो, वो भूखे मर रहे हैं और मेरे पंख झड़ गए हैं... अपने हाथ बगल में रखो, मेरे पेट की तितलियाँ ना जगाओ, जंगल में भवरों से फूल मांग, सुई धागा ढूंढ, बालों के लिए गजरा गुथो...... वो
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उसकी नीलिमा पर बादलों ने लिखा था..

अक्सर उसकी आँख बर्तनों के खड़कने की आवाज़ से खुलती है या फेरीवालों और भिखारियों की पुकार से, नहीं तो अखबार वाले या फिर दूधवाले की घंटी से... लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ ...पानी की कल-कल से नींद खुली... बाहर आकर देखा तो कटे पाइप से पानी बह रहा है ऐसा लगा जैसे
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"आई कैन एशियौर यू .. आई शेल नेवर नीड देम..."

पिछले तीन महीने से रीटा रात को यह सोच कर सोने जाती है सुबह को वह कभी ना उठे तो बेहतर होगा.. थोमस के आ जाने से भी सुबह को कभी ना उठने की ख्वाइश कम नहीं हुई है.. उसके जिगर का टुकड़ा उसकी ख़ुशी नहीं सिर्फ व्यस्त रहने का माध्यम बन कर रह गया है... नन्ही सी
Feb 26 2010 04:12 PM
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बाबुल का घर हज़ारों मील नहीं उससे कुछ कोस दूर है...

अगस्त का महिना है, आकाश बिल्कुल साफ है ... इस मौसम में आकाश पर बाद्लों का अधिपत्य होता है फिर भी वो अक्सर जगह दे देते हें सुरज को धरती छुने की और किरणों को जीवों से लिपटने की ...धुली पत्तिया नहा कर सुरज पहने हैं और ख़ुशी - खुशी हवा के साथ् मन्द- मन्द झूल
Feb 11 2010 02:20 AM
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जिस रिश्ते को तुमने उस रात वन नाईट स्टेंड होने से बचा लिया...

"पहचाना तुमने?..." वो अचानक प्लेट थामे भीड़ में रास्ता बनाते हुए उसके सामने आकर खड़ा हो गया.."नहीं तो..." वो उसकी तरफ चेहरा उठा आँखें गोल करती हुई बोली.. "अरे! मैं तुम्हारा जूनियर रोहन ... जिसके प्रेम पत्र को तुमने बिना पढ़े चीथड़े - चीथड़े कर वापस थमा
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पचास गुलाब की खुशबू उसे काँटों सहित याद आएगी ...

घर वालों के साथ, गत्ते के तीन फीट ऊँचे डिब्बे में बंद, पचास लाल गुलाब भी बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहे थे.. घर में घुसते ही वह गाड़ी कि चाबी और पर्स टेबल पर फेंक डिब्बा खोलने बैठ गई ...उसने उन्हे डिब्बे से  बाहर निकाला, पानी से भरी
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तड़ाक की आवाज़ सारे गावं पर बिजली की तरह गिरी....

गोरा चिट्टा रंग, लंबी काठी, गुलाब की पंखुड़ी जैसे होंठ, दिए की लौ जैसी आँखें, कमर से नीचे तक लम्बे बाल.... कोई उसका नाम जाने बगैर बता सकता था परमजीत कौर यूपी के ज़मींदार परिवार से नहीं बल्कि, अमृतसर के गुरुनानक ट्रांसपोर्ट कम्पनी के मालिक की बेटी है.
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कहीं तुम उन्हे मसीहा और दोस्त ना समझ लो....

कैसी हो? जब कोई अचानक बस इतना सा पूछ बैठे तो कई बार ऐसा क्यों होता हैं ऐसे सरल प्रश्न का उत्तर "ठीक हूँ" कहने के बाद भी वो जान लेते हैं कुछ भी ठीक नहीं है वो  सब कुछ जो तुमने नहीं कहा, उन्होंने सुन लिया .... उन्हें तुम्हारे आस-पास उड़त
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नीले आसमान से स्लेटी बादल घुमड़- घुमड़ कर उसकी ओर आ रहे थे....

धूली धुप की तरह पीली, शीशे की तरह पारदर्शी, बरसात के टपकते पानी की तरह साफ़, अभी- अभी गिरी बरफ की तरह सफ़ेद, बिना बादलों के आकाश की तरह नीला, बिजली की रौशनी पहले और गड़गडाहट बाद, होटों से कही हाँ और ना, पन्नो पर पुते तथ्यों का आगाज़ ... वो जिंदगी को ऐस
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एक शाम की भूख और पचास हजार की रोटी..

पता नहीं क्यों उसे लगने लगा है परिवार में उसका अस्तित्व ऐसा ही है जैसे शेल्फ पर रखी किताब का है, दीवार पर लगी घड़ी का है, मेज पर रखी चाबी का है, धुप में काले चश्में का है, बरसात में छाते का है, जाड़े में गर्म कोट का है ...वो सभी अमूर्त और अद्रश्य रहते
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उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी....

समुद्र कि लहरें उनके पाँव को चारों तरफ से चूमती हैं..उनकी घुटनों तक मुडी जींस को छू कर लौट जाती हैं उन्हें दोबारा भिगोने के लिए ... समुद्र ने सूरज को अपने भीतर छुपाने से पहले हाथों में ऊपर उठा रखा है ताकि सब उसे गौर से देख लें...आज की तारीख का सूरज देखने
Sep 18 2009 12:19 PM
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धरती का मोह...आकाश की चाह...

वो बोला "मैं तुम्हारा रनवे हूँ तुम यहाँ से आकाश में उड़ान ले सकती हो".. वो बोली "मेरे पास पंख नहीं हैं" .. "यह लो बादलों के पंख यह तितली के पंखों की तरह रंग बिरंगे नहीं है पर तुम उड़ान ऊँची ले सकोगी".. वो बोली "मेरे पास उड़ने के लिए आत्म विश्वास नहीं
Sep 18 2009 12:18 PM
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"आई हेड ए वेरी लांग डे!....."

उसकी आँख खुली और घड़ी की और मुड़ गई... कमरे के भीतर अँधेरा वैसा ही बिखरा पड़ा था जैसे सोने से पहले था... इस मौसम में सूरज का अलार्म बजने से कोई लेना-देना नहीं है और ना ही सूरज ने रौशनी देने की गारंटी दी है की वह स्कूल और आफिस बंद होने तक रौशनी देता
Sep 07 2009 02:40 PM
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गंगा को एक न एक दिन तो थेम्स नदी बनना ही था.....

पता नहीं क्यों उसे लगता था अपने खून के कतरे से वो उसी तरह वाकिफ है जैसे अपने आँखों के रंग से, ठोडी के नीचे पड़े निशाँ से, हाथों पर उभरती नसों से, कलाई पर घडी के नीचे गोलाई में पड़े घेरे से, बालों में उम्र दर्ज करती स्लेटी चमक से, दीमाग में रोज के लिए लिखी
Aug 21 2009 08:34 PM
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कन्वेयर बेल्ट पर उगता अपनी माटी का सोना...

फ्लाईट आये घंटे से ऊपर हो चला था पर उन दोनों का कहीं अता-पता न था... उनके आने की ख़ुशी में उसे ढाई सो मील के सफ़र का पता न चला, पर अब मंजिल पर पहुँच कर एक- एक मिनट घंटो से कम नहीं... वो उसके घर पहली बार आ रहे थे... पिता को तो एतराज़ ना था किन्तु उनकी
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उसका बेलेंस हमेशा के लिए माइनस में....

वो दोनों केफे में बैठे हैं बहस कर रहे हैं बहस क्या सिर्फ वही बोल रही है वह चुप है या बीच -बीच में मुस्कुरा देता है आसपास के लोग आँखे बचा उसका लाल और हताश चेहरा पढ़ रहे हैं यह काफी का तीसरा कप है और केफीन उसके भीतर की उथल - पुथल को संतुलित करने के बजाय
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खोई चाबी कि तरह खुशियाँ ज़मीन पर पड़ी....

इन्बोक्स में मुट्ठी भर कोतुहूल छुपा दो, दरवाज़े पर धागे से गुलाब कि पंखुडियों कि पुड़िया बांधों जैसे ही वो दरवाजा खोले, उसका चेहरा एक क्लिक में क़ैद कर लो, गर्मी में अपने हिस्से कि छाया और सर्दी में धुप उसके नाम कर दो, आम कि गुठली खुद के लिए और फांकें उ
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छन-छन की धुन पर हवा में उड़ती..

पिता उस जमाने में बी ए पास थे, जिस समय गावं में चिठ्ठी पढ़वाने के लिए लोग इक्के दुक्के का सहारा ढूँढ़ते थे. वो दिल्ली में अखबार के सम्पादक थे. केंसर को पहले उनके दायें हाथ से प्यार हुआ, वो हाथ उसे सौपने के बाद उन्होंने बाएँ हाथ से लिखना सीख लिया था क
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वसंत के बाद पतझड़...

सुनो! पुरानी टहनी जोर से ना हिलाओ उसकी सारी पत्तियां ना गिराओ सिर्फ धरकनो को सही प्रकृति को ना आंसू पिलाओ कदमो के नीचे की जमींन मांग आँखों को ना धूल दिखाओ देखो! वो तने से लिपटी लता ऊपर बयाँ का घोंसला शाखा पर अटकी पतंग छाया में खिली हमारी सुगंध ना दो
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बर्फ में बने लोगों के कदमो पर कदम...

वो चाय बना रही है, उसने दूध के लिए फ्रीज खोला, दूध के गेलन में सिर्फ एक कप चाय लायक ही दूध बचा है ... उसने पड़ोसन के लिए चाय बनाई, अपने लिए जूस का ग्लास भर लिया, पड़ोसन अक्सर बच्चों को स्कूल छोड़ते हुए उसका पास आ जाती है .. पड़ोसन के जाने के बाद, दूध के
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कोई तीसरा भी है जो उनके राज़ जानता है...

ऐसा बहूत कम होता है वो कहीं से गुजरे और लोग उसको पीछे मुड़ कर ना देखें... शॉप फ्लोर पर तो सभी उसे ऐसे देखते जैसे पहली बार किसी औरत को देखा हो... वो एजेन्सी से आई है और अस्थाई कर्मचारी है... पोलैंड से आये हुए उसे कुछ महीने हुए हैं और उसके हाथ में रोज़
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"साब आप करते क्या हैं..... "

घंटाघर पर उतर, पलटन बाज़ार से गुजरते हुए, चार- पांच टेढ़ी - मेढ़ी गलियों से होकर, कूड़े के ढेरों को फांदते हुए, आवाज़ लगाते ठेले वालों के बीच से जगह बना, ट्रेफिक में अटके स्कूटर के शोर -गुल; ग्राहकों, पैदल चलने वालों, आवारा कुतों और गायों कि भीड़ में, सब
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आंखों की चमक और होंठों की मुस्कान पर पसरा जादू...

यादों के सिवाए उनके बीच कुछ भी साझा नहीं था, समय की रफ़्तार ने ना सिर्फ उनके रास्ते और दुनिया अलग की, अब तो जीवन के मूल्य और मान्यताएं भी अलग- अलग पटरी पर विपरीत दिशा में चलने लगे थे ... फिर भी वो यादों से जुड़े हुए हैं जैसे पूरब सूर्य उदय से जुड़ा है ज
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धरती का मोह...आकाश की चाह...रनवे से उड़ान...

वो बोला "मैं तुम्हारा रनवे हूँ तुम यहाँ से आकाश में उड़ान ले सकती हो". वो बोली "मेरे पास पंख नहीं हैं" .. "यह लो बादलों के पंख यह तितली के पंखों की तरह रंग बिरंगे नहीं है पर तुम उड़ान ऊँची ले सकोगी".. वो बोली "मेरे पास उड़ने के लिए आत्म विश्वास नहीं है
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क्या मैं आज यहाँ बैठी होती?

डाइवोर्स को पांच साल हो चले थे, वो महसूस कर रही थी पति से अलग हो जाने के बाद और लोग भी उससे बचने लगे हैं जैसे कई दोस्त अब उसे फंक्शन पर नहीं बुलाती, तभी घर बुलाती जब उनके पति कहीं बाहर गए हुए होते, या फिर उससे घर से बाहर मिलती। जो लोग उससे बचते नहीं
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जब वो एक साथ भागते पैबन्द लगाने....

वो दोनों पैबन्द सिल रहे थे, बिखरे आकाश पर,परों तले खिसक गई ज़मी पर, किताब के फटे पन्नो पर, आखों से गुम हुए सपनो पर, चौखट पर सिमट आई पगडण्डी पर,जागी हुई इंसानियत पर और मासूम चाहत पर... वह इसलिए पैबन्द लगाता है क्योंकि उसे दुःख है उसे दुःख पहुंचाने का
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उसके चहरे का संतोष लोगों को खलता है....

बात उन दिनों की है जब दिल्ली में जमुना नदी पर एक ही पुल था. उसे पढ़ाने के लिए पिता ने क़र्ज़ लिया था. वह रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर, दिल्ली में सड़कों की ख़ाक छान रहा था। एक कमरा तीमार पुर में किराए पर लिया था किन्तु एडवांस देने के बाद
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चौखट पर उसकी आहट .......

बस तली पर रह गया है बाकी सारा चुक गया है वो ऐसा मानता है किन्तु वह मानने को तैयार नहीं है उसे वह अभी भी ऊपर तक लबालब भरा नज़र आता है, वह उसकी गहराई और संताप का विश्वास दिलाने में लगी है एक दुसरे पर लुटाये खजाने का हिसाब जोड़ जिंदा पलों को दोनों हाथों
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खूबसूरत, रंगीन, स्वपनिल... जिगसा के पीस...

वो पहली बार केलिफोर्निया जा रही थी अपने भाई के पास, वो डाक्टरी पास करके वहां चला गया था, तब वो हाई स्कूल में थी और अब वह तेरह और नौ वर्ष के बच्चों की माँ है, वैसे सरकारी आदमी के लिए अमेरिका जाना कोई आसान काम नहीं, वह तो उनका सरकारी काम है और इनका साथ
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आइना कभी झूठ नही बोलता...

वो रेगिस्तान में पानी से निकल, पानी की तलाश में निकली थी। उसने सड़क पर आ पैरों से रेत झाड़ा और चप्पल पहन ली... छाया में बैठे आदमी से पूछने पर, उसने समुद्र पर टीके उलटी बोट के आकार के होटल की तरफ इशारा करते हुए कहा वहां से दाये मुड़ जाना दूसरी या तीसरी
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वो ऐसी नही है ....

वो करीब दो महीने से नही मिले थे। वह रोज उसको फ़ोन करता, एस एम् एस करता, वोयेस मेल पर मेसिज छोड़ता और बाद में मन-मार कर अकेले पीने लगता। दो महीनो से यही सिलसिला जारी था। वह उससे शोपिंग माल में टकराती है उसके कुछ बोलने से पहले ही कहती है "हमे बात करनी
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चार बूंद प्यार....

गंगा जल नहीं, प्यार की आखरी बूंदें सहेज ली हैं धरकनो में लोक - परलोक तर जाने के लिए... तुम और प्यार मत करना बह जायेगा छलक कर आंखों से ... चार बूंद काफ़ी हैं मुक्ति के लिए.... दो जिंदगी भर हर पल तुम पर मिटने के लिए दो अन्तिम साँस में हलक और अधर पर लगा
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लव इन द टाइम आफ कोलरा...

सालों से एक दूसरे को जानते हुए उन दोनों को नही मालूम था उनका क्या रिश्ता है उन्होंने कभी जानने की ज़रूरत भी महसूस नही की। उन्हें सिर्फ़ यह मालूम था ख़ुशी, दुख, महंगाई, कोई नई मुसीबत, नौकरी की जदोज़हद, किताबों की लिस्ट, कोई अच्छा सा फॉरवर्ड जब कभी अवसर
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वांटेड ऐ सीरियल किलर...‏

आजकल वह खुश नहीं। नौकरी, घर, दफ्तर, कार, टी वी, मेल बॉक्स, मोबाइल फ़ोन, मोगरा, चाँद, बारिश, प्यार किसी से भी खुश नही और सबसे अधिक नाखुश अपने आप से। ऐसे नाखुशी के दौर उसके जीवन में आते-जाते रहे हैं लेकिन अब से पहले उसने उन्हें अपनी जिंदगी नही बनाया था
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मुझे मुक्त कर दो...

भीतर की औरत ने पत्नी से पूछा तुझे क्या मिला? पति का प्यार, ड्राइंग रूम की दीवार पर सजा फेमली फोटोग्राफ, ग्रीन बेल्ट को छूता ड्रीम हाउस , सड़क नापने को कार, परिचितों, अपरिचितों का इर्ष्या भाव, जब तुम तुम थी आसमा, सागर पलकों में बसते, आइना तुम्हे दिन- र
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माई बाय फ्रेंड इज नो मोर.....

वो वार्ड राउंड पर जाने को तैयार थी और कंसल्टेंट का इंतज़ार करते हुए नर्स से केस नोट मांग रही थी। तभी उसकी नज़र चोदह नंबर बेड पर गई वो आंसुओ से रो रहा था। वो पास जाकर बोली क्या हुआ आप क्यों रो रहे हैं? उसने धीरे - धीरे बताना शुरू किया... देखो पत्नी के म
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वो चली गई तो क्या मैं हूं ना!

वो हैदराबाद में पोस्टिंग पर था और उससे मिलने हर सप्ताह अंत में दिल्ली आता। एयर फोर्स में नौकरी की शुरुआत थी और उन दिनों डोमेस्टिक फ्लाईट भी इतनी सस्ती नही थी, उसकी सारी तनखा किराए में निकल जाती। वह दोनों सप्ताह अंत का बेसब्री से इन्जार करते। वह इंडिय