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प्रकाश बादल की गजलें

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31 Dec 2009
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ग़ज़ल

भाव कुंद कर दे वो पैमाना न दरमियान रख। मेरे ख्यालों की बस ऊंची उड़ान रख। दिल से दिल का कोई फासला न हो, कुछ इस सलीके से गीता और कुरान रख। बहुत हुई महलों की फिक्र, छोड़ दे, बेघरों के हिस्से में भी कोई मकान रख। बस्तियां रौंद लेगी ये नदी रोकी हुई, ज़रूरत से
Dec 29 2009 11:48 AM
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शैलेश भारतवासी को जानते हैं ?

हिन्दी की ई-संस्था है शैलेश अगर आप इंटरनैट पर हिन्दी टाईप करने में किसी दिक्कत का सामना कर रहे हों या फिर आप इंटरनैट पर आप हिन्दी लिखने पढने में रुचि रखते हैं तो ये लेख आपके लिए ही है। ------------------------------------- भाई शैलेश भारतवासी हिन्दी औ
Dec 29 2009 11:48 AM
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ग़ज़ल

ऐसा नहीं के ज़िंदा जंगल नहीं है। गांव के नसीब बस पीपल नहीं है। ये आंदोलन नेताओं के पास हैं गिरवी, दाल रोटी के मसलों का इनमें हल नहीं है। चील, गिद्ध, कव्वे भी अब गीत गाते हैं, मैं भी हूं शोक में, अकेली कोयल नहीं है। ज़रूरी नहीं के मकसद हो उसका हरियाली,
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ग़ज़ल

ऐसा नहीं के ज़िंदा जंगल नहीं है। गांव के नसीब बस पीपल नहीं है। ये आंदोलन नेताओं के पास हैं गिरवी, दाल रोटी के मसलों का इनमें हल नहीं है। चील, गिद्ध, कव्वे भी अब गीत गाते हैं, मैं भी हूं शोक में, अकेली कोयल नहीं है। ज़रूरी नहीं के मकसद हो उसका हरियाली,
Dec 29 2009 11:48 AM
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ग़ज़ल

मुम्बई में हुए आतंकी हमले से आहत हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आतंक फैलाने वाले लोगों को खुदा राह दिखाए) मत पूछो क्या है हाल शहर में। ज़िन्दगी हुई है बवाल शहर में। कुछ लोग तो हैं बिल्कुल लुटे हुए, कुछ हैं माला-माल शहर में। झुलसी लाशों की बू हर
Dec 29 2009 11:48 AM
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ग़ज़ल

आदमी जैसे ही कुछ अजगरों के बीच। चंदन सी ज़िंदगी है विषधरों के बीच। ये,वो,,मैं, तू हैं सब तमाशबीन, लहूलुहान सिसकियां हैं खंजरों के बीच। शहर के मज़हब से नवाकिफ़ अंजान वो, बातें प्यार की करे कुछ सरफिरों के बीच। भरी सभा में द्रौपदी सा चीख़े मेरा देश, कब
Dec 29 2009 11:48 AM
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ग़ज़ल

भोर का वहम पाले उनको ज़माना हुआ। कब सुनहरी धूप का गुफाओं में जाना हुआ। रख उम्मीद कोई दिया तो जलेगा कभी, भूख के साथ पैदा हमेशा ही दाना हुआ। मर्यादा में था तो सुरों में न ढल सका, शब्दों को नंगा किया तो ये गाना हुआ। तरकश उनका तीरों से हो गया ख़ाली मगर, मे
Dec 29 2009 11:48 AM
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गज़ल 14/11/2008

जब-जब मैं सच कहता हूं। सब को लगता कड़वा हूं। वो मेरी टांग की ताक में है, कि कब मैं ऊपर उठता हूं। जो भी नोक पर आते हैं, बस उनको ही चुभता हूं। उम्र में जमा सा बढ़ता हूं, जीवन से नफी सा घटता हूं। तू जो मुझ पर मरती है, इसीलिये तो जीता हूं। वो नाखून दिखाने
Dec 29 2009 11:48 AM
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गज़ल्

जब हों जेबें खाली साहब। फिर क्या ईद दीवाली साहब। तिनका - तिनका जिसने जोड़ा, वो चिडिया डाली-डाली साहब। सब करतब मजबूरी निकलेँगे, जो बंदर से आंख मिला ली साहब। कंक्रीटी भाषा बेशक सबकी हो, पर अपनी तो हरियाली साहब। मौसम ने सब रंग धो दिये, सारी भेडें काली सा
Dec 29 2009 11:48 AM
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गज़ल्

जब से तेरे प्यार में पागल रहा हूं मैं। शहर भर की तबसे हलचल रहा हूं मैं। मेरी भाषा अब ये समंदर क्या जाने, कि नदी में बहती हुई कल-कल रहा हूं मैं, बर्फ हूं मेरे नाम से ठिठुरते हैं सभी, पहाडों पर लेकिन बिछा कंबल रहा हूं मैं। आग आरियां,तूफान, बारिश, साजिश
Dec 29 2009 11:48 AM
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ग़ज़ल्

सच ढूंढ्ता रहा शहादत देखिये। झूठ की हो भी गई ज़मानत देखिये। अब मौत के आसार हैं ज़्यादा क्योंकि कड़ी कर दी गई है हिफ़ाज़त देखिए। भ्रष्टाचार का जंगल तैयार क्यों न हो, वृक्षारोपण कर रही है सिसायत देखिये। घरों को बौना रखने के आदेश जो दे गये है‍, आसमान चूमती उ
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ग़ज़ल

इरादे जिस दिन से उड़ान पर हैं। हजारों तीर देखिये कमान पर हैं। लोग दे रहे हैं कानों में उँगलियाँ, ये कैसे शब्द आपकी जुबां पर है। मेरा सीना अब करेगा खंजरों से बगावत, कुछ भरोसा सा इसके बयान पर हैं। मजदूरों के तालू पर कल फिर दनदनाएगा, सूरज जो आज शाम की ढल
Dec 29 2009 11:48 AM
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ग़ज़ल/18/12/2008

सच के लिबास में दिखाई देना। और पेशा है झूठी सफाई देना। यूं चीखने से बात नहीं बनती, मायने रखता है सुनाई देना। लाद गया वो किताबों के भारी बस्ते, मैने कहा था बच्चों को पढ़ाई देना। जो दर्द दिए तूने उसका हिसाब कर, फिर मुझे नए साल की बधाई देना। कितना अच्छा
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प्रकाश बादल की गजलें

बिलासपुर में नन्हें फूल बिखेर रहे कविता की ख़ुशबू बच्चों को कविता लेखन के प्रोत्साहन हेतु एक कार्यशाला का आयोजन 50 बच्चे ले रहे भाग और बेटियों की प्रतिभागिता अधिक इन दिनों हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में ज़िला भाषाधिकारी डॉ0 अनिता के आग्रह पर मुझे एक वर्
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बिलासपुर हिमाचल प्रदेश में हिन्दी और इंटरनैट पर संगोष्ठी आज

भाषा विभाग की ज़िला भाषाधिकारी के द्वारा हिमाचल में हिन्दी के इंटरनैट पर प्रचलन के लिए यह पहला सराहनीय प्रयास।अनेक साहित्यकार,पत्रकार और सरकारी कर्मचारी उठाएंगे इस संगोष्ठी का लाभ अवसर पर कवि ग़ोष्ठी का भी आयोजन।हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में 22 सितम्बर
Sep 22 2009 12:34 AM
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कवि,लेखक और चिंतक प्रेम भारद्वाज के निधन पर.............

अब नहीं बहेगा "प्रेम" का झरना ! पहाड़ी ग़ज़ल के दुःष्यंत कुमार, प्रेम भारद्वाज का निधन। प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के निधन से अभी साहित्यिक जगत में शोक की लहर अभी थमी नहीं थी कि हिमाचल प्रदेश बे 13 मई 2009 को एक और लेखक, ग़ज़लकार और चिंतक प्र
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कवि,लेखक, चिंतक प्रेम भारद्वाज के निधन पर.....

प्रेम" का झरना सूख गया! *पहाड़ी ग़ज़ल के दुःष्यंत कुमार,प्रेम भारद्वाज का निधन। प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के निधन से अभी साहित्यिक जगत में शोक की लहर अभी थमी नहीं थी कि हिमाचल प्रदेश बे 13 मई 2009 को एक और लेखक, ग़ज़लकार और चिंतक प्रेम भारद्
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शिमला पहुँची उड़नतश्तरी

सर्रर्रर्रर्रर्रर करती आई उड़नतश्तरी और दिल में उतर गई। समीर भाई के काव्य संग्रह "बिखरे मोती" ने मेरे दिल की कई तहों को खंगाला, कुरेदा, और मेरी स्मृतियाँ बरसों पुरानी दास्तानें कहने लगीं! : -प्रकाश बादल " हैलो सर मैं कुरियर सर्विस से बोल रहा हूँ ! आप
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छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी......

आप सबके स्नेह का आभार! पिछले दिनों मेरे साथ क्या हुआ आप सब जानते हैं। लेकिन बहुत से दोस्तों और मित्रों ने मेरे न लिखने के निर्णय को न मानने का आग्रह किया उनमें सर्वप्रथम मैं भाई श्री अनूप शुक्ल जी का आभार व्यक्त करता हूँ जिनकी टिप्पणी को मैंने कई बार
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प्रकाश बादल की गजलें

डिप्रैशन में हूँ,परेशान हूँ लज्जित भी। मैंबे जिस भाषा को अपनी कल्पना से भी दूर रखा, उसी भाषा का इसतेमाल करने का आरोप मुझ पर लगाया जाए तो भला एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए इससे बड़ी शर्मिंदगी की बात क्या हो सकती है। एक लेखक को लिखने की इतनी बड़ी सज़ा मिलती
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क्या ये मीटर में हैं!

देखिये रदीफ और काफिया! ये ज़रूर बताएं कि ये मीटर में हैं या नहीं। ये संभव और वैभव है मेरे जुड़वाँ बेटे।
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...बहरे आवाज़ों के बीच।

स्कूल डायरी से एक और ग़ज़ल आपकी नज़र कर रहा हूँ: कई रोज़ हो बेशक ठहरे आवाज़ों के बीच। क्या माने रखते हैं बहरे आवाज़ों के बीच॥ चुपके से वो सन्नाटों में ज़हर घोल कर चले गये, आप दे रहे हैं पहरे आवाज़ों के बीच। अपनी शरारतों पर हम सूरज को कोस रहे, बेमौसम क्यों जल
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....चोंच में घर.....

आज अचानक एक डायरी हाथ लगी, जो उस समय की थी जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उस डायरी में कई रचनाएं मिली जिनमेंसे अधिकतर खारिज कर दी लेकिन कुछ मुझे अच्छी लगीं उनमें से एक रचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी: (प्रकाश बादल) कट
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अब इस कदर भी उजाले न हो---

अब इस कदर भी उजाले न हो। घर आग के निवाले न हो। प्यासी हलक से गुज़रे न जब तलक, नदी समन्दर के हवाले न हो। बोल प्यार के हो ग़ज़ल की राह में, न हो मस्जिद और शिवाले न हो। सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे, कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हो। खुशियों की मकड़ियों का वहा
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ग़ज़ल

बोलता नहीं लेकिन बड़बड़ाता तो है। सच होंठ पर लेकिन आता तो है। अर्श शौक से अब ओले उड़ेल दे, मूंडे गए सरों के पास छाता तो है। तेरी मंज़िल मिले न मिले क्या पता, है तय ये रस्ता कहीं जाता तो है। फिज़ाओं में यूँ ही नहीं है हलचल, तीर चुपके से कोई चलाता तो ह
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चिकने चेहरे इतने भी........

चिकने चेहरे इतने भी सरल नहीं होते। ये वो मसले हैं जो आसानी से हल नहीं होते। कुछ ही पलों की चमक और खुशबू इनकी, ये फूल किसी का कभी संबल नहीं होते। भूखों में बाँट दीजिए जो बचा रखा है, जीवन के हिस्से में कभी कल नहीं होते। शायर वो क्या, क्या उनकी शायरी, ज