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09 Jun 2010
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नेहरू विहार

कहा जाता है कि दिल्ली मे वह एक बसाई हुई जगह थीउस बसाई हुई जगह में कुछ बूढे बचे थेजिनके पास विभाजन की स्मृतियाँ थींबहुत भाग - दौड़ कर जिन्दगी बसर कर लेने के लायकसवा कट्ठे की ज़मीन हासिल करने की यादें थींवहाँ कुछ भयाक्रांत कर देने वाले विवरण थेजीवन के लिये
 
sandhyagupta
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चुप नहीं रह सकता आदमी

चुप नहीं रह सकता आदमीजब तक हैं शब्दआदमी बोलेंगेऔर आदमी भले ही छोड़ दे लेकिनशब्द आदमी का साथ कभी छोड़ेंगे नहींअब यह आदमी पर है कि वहबोले ...चीखे या फुसफुसायेफुसफुसाना एक बड़ी तादाद के लोगों कीफितरत है!बहुत कम लोग बोलते हैं यहाँ और...चीखता तो कोई नहीं के
 
sandhyagupta
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र राष्ट्रीय एकता सम्मान

मित्रो, पिछले लगभग दो माह से मन माँ के ही ईर्द-गिर्द घूमता रहा। चाहूं भी तो कहीं और नहीं जुड़ पाता । अभी इस सदमे से उबर नहीं पाई थी कि संवाद मिला प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला भारतेन्दु हरिश्चन्द्र राष्ट्रीय
 
sandhyagupta
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प्रार्थना समय

अपार दुःख के साथ सूचित कर रही हूँ कि दि0 - 02 फरवरी 2010 को मेरी माँ (श्रीमती प्रेमा देवी ) का आकस्मिक निधन हो गया। वह सन् 1942 की क्रांति में गिरफ्तार होने वाली एवं स्वतंत्रता संग्राम की आंदोलनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करने वाली संताल परगना
 
sandhyagupta
Feb 21 2010 09:04 PM
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अधूरा मकान: दो

कोई मकान अधूरा क्यों रह जाता है !! सलीब की तरह टँगा है यह सवाल मेरे मन में अधूरे मकान को देख कर मुझे पिता की याद आती है उनकी अधूरी इच्छायें और कलाकृतियाँ याद आती हैं देख कर कोई अधूरा मकान उम्र के आखिरी पड़ाव में एक स्त्री के आँचल में एक बेबस आदमी का बच्चे
 
sandhyagupta
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दोराहे पर लड़कियाँ

दोराहे पर खड़ी लड़कियाँ गिन -गिन कर कदम रखती हैं कभी आगे-पीछे कभी पीछे-आगे कभी ये पुल से गुजरती हैं कभी नदी में उतरने की हिमाकत करती हैं ये अत्यन्त फुर्तीली और चौकन्नी होती हैं किन्तु इन्हें दृष्टि-दोष रहता है इन्हें अक्सर दूर और पास की चीजें नहीं दिखा
 
sandhyagupta
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गोश्त बस

वह काला चील्ह...!! क्या तुमने देखा नहीं उसे... जाना नहीं...?? है बस काला... सर से पाँव तक... फैलाये अपने बीभत्स पंख काले शून्य में मंडराता रहता है इधर-उधर गोश्त की आस में आँखों को मटमटाता अवसर की ताक में.... चाहिये उसे गोश्त बस ....लबालब खून से भरा न
 
sandhyagupta
Dec 29 2009 11:52 AM
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कुछ भी नहीं बदला

सन्दूक से पुराने ख़त निकालती हूँ कुछ भी नहीं बदला... छुअन एहसास संवेदना! पच्चीस वर्षों के पुराने अतीत में सिर्फ़ उन उँगलियों का साथ छूट गया है... .................................................................................
 
sandhyagupta
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राज ठाकरे के लिये

कुम्हार ने मिट्टी के ढेलों को पहले तोड़ा फिर उन्हें बारीक किया और पानी डाल कर भिगोया मिट्टी को पैरों से खूब रौंदने के बाद उसे हाथों से कमाया मिट्टी घुल मिल कर एक हो गयी बिलकुल गूँथे हुए आटे की तरह कमाई हुई मिट्टी को कुम्हार ने चाक पर रखा एक डंडे के सह
 
sandhyagupta
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वह संसार नहीं मिलेगा

और एक रोज़ कोई भी सामान अपनी जगह पर नहीं मिलेगा एक रोज़ जब लौटोगे घर और....वह संसार नही मिलेगा वह मिटटी का चूल्हा और लीपा हुआ आंगन नहीं होगा लौटोगे .....और गौशाले में एक दुकान खुलने को तैयार मिलेगी घर की सबसे बूढ़ी स्त्री के लिये पिछवाड़े का सीलन और अंधे
 
sandhyagupta
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एक गैर दुनियादार शख्स की मृत्यु पर एक संक्षिप्त विवरण़......

एक विडम्बना ही है और इसे गैर दुनियादारी ही कहा जाना चाहिये जब शहर में हत्याओं का दौर था.....उसके चेहरे पर शिकन नहीं थी रातें हिंसक हो गयी थीं और वह चैन से सोता देखा गया यह वह समय था जब किसी भी दुकान का शटर उठाया जा रहा था आधी रात को और हाथ असहाय मालू
 
sandhyagupta
Dec 29 2009 11:52 AM
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उस स्त्री के बारे में

करवट बदल कर सो गई उस स्त्री के बारे में तुम्हे कुछ नहीं कहना! जिसके बारे में तुमने कहा था उसकी त्वचा का रंग सूर्य की पहली किरण से मिलता है उसके खू़न में पूर्वजों के बनाये सबसे पुराने कुएँ का जल है और जिसके भीतर इस धरती के सबसे बड़े जंगल की निर्जनता है
 
sandhyagupta
Dec 29 2009 11:52 AM
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छूट कर जाते हुए...

अंतहीन समय की रेल पर सवार धड़धड़ा कर गुजरते हुए किसी मकाम पर उतर कर देखना चाहती हूं उसे छूट कर जाते हुए ..... . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
 
sandhyagupta
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धुंध-सी जिन्दगी

सशंकित आकाश है मद्धिम ...मद्धिम सांस तीक्ष्ण तारों की टिम-टिम आंख कंपकंपाते अंधेरों की थर्राहटों के बीच... जीवन जमीं पर उतरता आंखें शून्य में पुतरतीं सांसें धुंएं में खो जातीं कल/आज/कल पल...पल... जीने को विवश हम अधकचरी अनगढ़ एक धुंध-सी जिन्दगी! ------
 
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बाज़ार

यह तुम्हारे लिये है पर तुम्हारा नहीं है ! ...........................
 
sandhyagupta
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लैम्प पोस्ट

ये सुनसान फैली सड़क है लैम्प पोस्ट की रौशनी में चमचमाते भवन हैं एक के बाद एक सब में मरे पड़े हैं आदमी ये पूरा इलाका एक मुर्दा-घर है इस मुर्दा-घर में मैं अकेली खड़ी सन्नाटे के बीच तलाश रही हूं कब से एक अदद आदमी! हां , मुझे नींद में चलने की आदत है! ......
 
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गाँधी

कितनी बरसातों के बाद भी रेत पर उसके पाँवों के निशान हैं!! ....................................................... चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार .....................................................
 
sandhyagupta
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उस कच्चे रास्ते पर ...

एक शून्य सा फैला है कुछ मटमैला.... कुछ धूसर....टील्हे खाई पत्थर अटके पानी और कटरंगनी की झाड़ियों के बीच देसी दारु की गंध में लिपटा उस कच्चे रास्ते पर ... उस पार बस्ती है मगर वह एक द्वीप है कच्चे रास्तों से घिरा पहाड़ टूटते हैं और हाईवे पर बिछते हैं कच्चे
 
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मैथिलीशरण गुप्त सम्मान

प्रिय मित्रो , आपने शिकायत की है कि मैंने आपको मैथिलीशरण गुप्त सम्मान के बारे में जानकारी नहीं दी। इसके लिये मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। दरअसल मैंने सोचा कि समाचार पत्रों के माध्यम से तो इसकी जानकारी आप सबों को हो ही जायेगी। खैर विलम्ब के लिये क्षमा याचना
 
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तय तो यह था...

तय तो यह था कि आदमी काम पर जाता और लौट आता सकुशल तय तो यह था कि पिछवाड़े में इसी साल फलने लगता अमरूद तय था कि इसी महीने आती छोटी बहन की चिट्ठी गाँव से और इसी बरसात के पहले बन कर तैयार हो जाता गाँव की नदी पर पुल अलीगढ़ के डॉक्टर बचा ही लेते गाँव के किसु
 
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sandhya gupta

सूर्य का गोला आसमान पे उजले रंग से लिखता है - सुबह और चमक उठती हैं इस धरती पर जल की तरंगें जीवन के रंगों से भर कर तरोताजा हो उठती है हवा किरणों से नहा - धोकर हल - बैल लिये किसान उतर पड़ते हैं खेतों में नई उमंग के साथ नई फसल बोने को निकल पड़ती हैं चींटि
 
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वे फक्कड थे ! .... कबीर थे ! ....

वे नहीं रहे तब हमने उनके बारे में जाना वे सूर्य को दिये जाने वाले अर्ध्य का पवित्र जल थे बरगद की छाँह थे मंदिर की सीढ़ियाँ थे खेत में लगातार जुते हुए बैल थे संघर्ष के बीच जिजीविषा को बचाने की इच्छाओं की प्रतिमूर्ति थे वे राष्ट्र के निर्माण की कथा थे व
 
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केटोली

त्रिकुटि पहाड़ की तराई में बसे उस गाँव को प्रकृति ने अपने ढंग से सँवारा था और लोगों ने कुछ अपने ही ढंग से वहाँ खेत नदी झरने तालाब और वृक्षों के अलावे लोगों की बसाई कुछ बस्तियाँ भी थीं जहाँ कुछ मिली -जुली किस्मों के लोगों के अलावे केवट कहलाये जाने वाले
 
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क़ब्रगाह

कितने लोग दफ़न हुए इस ज़मीन में कितने घर और कितने मुल्क.... तबसे ...जबसे यह ज़मीन बनी है! ....उनकी कब्रगाह पर ही तो बसी हुई हैं सारी बस्तियाँ हमारे घर....शहर.... दुकान...मकान... उसी कब्रगाह पर खड़े हैं हम एक और कब्रगाह बसाये हुए!! .......................
 
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इस सभ्यता के पास अनुकूल तर्क है!

यह बहुत चालाक सभ्यता है यहाँ चिड़ियों को दाने डाले जाते हैं और चिड़ियों को मारने के लिये बंदूकें भी बनती हैं यहाँ बलत्कृत स्त्री अदालत में पुनः एक बार कपड़े उतारती है इस सभ्यता के पास स्त्री को कोख में ही मार देने की पूरी गारंटी है यहाँ पहली बरसात में व
 
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जंगल में होना चाहती हूँ!

जानती हूँ मैं जंगल में होने के ख़तरों के बारे में बीहड़ों और हिंस्र पशुओं के बीच से गुजरने की कल्पना मात्र भी किस क़दर ख़ौफ़नाक़ है !! और जंगल की धधकती आग ! किसे नहीं जलाकर राख कर देती वो तो !! जंगल में होने का मतलब है हर पल जान हथेली पर रखना ! ..... मैं
 
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चित्र

मैं चित्र बनाती हूँ जल की सतह पर देखो - कितने सुन्दर हैं!! जितनी यह काली और चपटी नाक वाली कुबड़ी लड़की जितने कुम्हार के ये टूटे हुए बर्तन जितनी समन्दर की दहकती हुई आग भूकम्प के बीच डोलती धरती और उलटी हुई नाव देखो...! ...................................
 
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अधूरा मकान

उस रास्ते से गुज़रते हुए अक्सर दिखाई दे जाता था वर्षों से अधूरा बना पड़ा वह मकान वह अधूरा था और बिरादरी से अलग कर दिये आदमी की तरह दिखता था उस पर छत नहीं डाली गयी थी कई बरसातों के ज़ख़्म उस पर दिखते थे वह हारे हुए जुआड़ी की तरह खड़ा था उसमें एक टूटे हुए आद
 
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प्रार्थना

मेघ से मेरी प्रार्थना है कि अबकी बारिश के बाद बरसे आग गीली लकड़ियाँ सुलगे और मैं सेंकूँ अपने चूल्हे पर गर्मागर्म फूली हुई गोल-गोल रोटियाँ! आग से मेरी प्रार्थना है कि जले काई सीलन और बदबूदार वस्तुएँ उपजे ढेर सारी किसिम-किसिम की सब्ज़ियाँ... गेहूँ...और..
 
sandhyagupta
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About That Woman

You have nothing to sayAbout that womanWho just turned overAnd fell asleep?Who you saidWore a skinThe colour of the first raysOf the sun In her bloodThe waters ofThe first everAncestral well And insideShe carriedThe desolation of the greatestForest on
 
sandhyagupta