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चलते-चलते

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31 Dec 2009
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खामोश!!ब्रेकिंग न्यूज जारी है..

आज भारतीय इलेक्ट्रौनिक मीडिया अपनी बेबाकी के लिए खुद को कठघरे में खड़ी पा रही है। मुम्बई के हादसे ने एक बार पुनः मीडिया के स्वतंत्र चरित्र पर सवाल खड़ा कर दिया है कि स्वतंत्रता एवं उच्छ्र्खलता में वहॉ विभेद है या नहीं? क्या इलेक्ट्रौनिक मीडिया का बाजार
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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नो फाइट बैक

मुम्बई में होने वाले आतंकवादी घटना के बाद चारों तरफ यह चर्चा चल रही है कि इस घटना की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? हमारे राजनेता क्या समस्या के प्रति गंभीर नहीं हैं तथा ऐसी घटना घटित होने के बाद उस पर पुन: सोचते नहीं कि इसका समाधान क्या हो सकता है? दूसरी
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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एम्स की एक रात

दो दिन पहले aiims(all इंडिया institute ऑफ़ मेडिकल science) जाना हुआ था क्योंकि मेरे एक अंकल को वहॉ पेसमेकर लगना था।जाते वक्त ऐसा नहीं सोचा था कि वहॉ रात को रूकना होगा फिर भी हाफ स्वेटर के साथ -साथ जैकेट भी डाल ही ली। वहॉ पहुंचने पर पता चला कि अंकल जी
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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मस्तमौला (कविता)

वो तो हमेशा से वैसे ही रहे हैं बेफिक्र,मस्तमौला, समय के बदलते पल ने उन्हें कभी नहीं बदला चाहे वसंत हो,सर्दी हो या गर्मी मानो वही समय के बदलते हरेक पल को मुँह चिढ़ा रहे हों कि देखो तुम्हारे बदलने से, हम जैसों की दुनिया नहीं बदलती जो अर्धनग्न,बिना किसी
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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बढ़्ते फासले...(कविता)

ऐसा ही तो कहा था कि बस अभी-अभी आता हूं मम्मी-पापा से लेकिन न जाने 'अभी-अभी' ने कितना फासला बना दिया कि वो जो सफर शुरू किया था खत्म होने का नाम ही नहीं लेता बार-बार पीछे की ओर लौटना चाहता हूं, और सोचता हूं कि खिलौने में भरी चाबी की तरह यह फासला भी खत्
 
राहुल सि‍द्धार्थ
टैग: यादें
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अंजामें गुलिस्तां क्या होगा?

आतंक ,आतंकी से जूझता हमारा देश ना जाने आज अपने किस निक्रिष्टतम रूप में जा रहा है जो हमने शायद कभी सोचा भी न हो। देश में चारों तरफ आतंक की घटनाऍ हो रही हैं और हरेक बार शक की सुई अपने पडोसी देश पर जाती तो कभी मुस्लिम आतंकवादी पर। एक संवेदनशील नागरिक हो
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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एक पेंच

उसकी मम्मी कहती थी अक्सर कि उसका बेटा किसी खिलौने से नहीं खेलता है ज्यादा समय बस उसके लिए क्षणिक आकर्षण भर होता है वह खिलौना फिर ना जाने क्यूं उस खिलौने के पुर्जे-पुर्जे अलग करने में उसका मन ज्यादा लगता है और मैं कहता हूं कि शायद उसका बेटा ना जाने क्
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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आ(रा)मदेव बाबा और हमारे शरीर की बनावट्

मेरा लगभग 21 माह का बेटा 'र' नहीं बोल पाता इसलिए कहता है---- आमदेव बाबा, सो मैं भी वही लिख रहा हूं। यूं रामदेव बाबा को 'आमदेव' कहने के अपने खतरे हैं। रामदेव बाबा व्यायाम द्वारा देश को स्वास्थ्य लाभ कराते हैं जबकि 'आमदेव बाबा' बनकर न जाने हम कितने गरि
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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इतिहास करवट ले रहा ..........

बराक ओबामा आखिर जीत गये और जीत भी ऐसी की दुनिया देखती रह गयी। भाई इतिहास को सुधारने का वर्तमान ने मौका दे दिया है। आज मार्टिन लूथर किंग कि याद आ रही है जब उन्होंने सिविल राइट्स आन्दोलन के माध्यम से श्वेत के सामने अश्वेत के अधिकारों की मांग की थी। ऐसा
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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तुम लाजवाब हो

अनिल कुम्बले ने संन्यास ले लिया।तो भाई एक क्रिकेटर के एक युग का अंत हुआ। भला एक जख्मी खूंखार के लिये इससे बेहतर मौका भी और क्या हो सकता था?जब तक कुम्बले मैदान पर रहे अपना दबदबा कायम रखा तथा अकेले एक तरफ से वर्षों तक स्पिन बौलिग को धारदार बनाए रहा.इन
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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बस यादें रह जाती हैं

पिछ्ले दिनों मेरी नानी का स्वर्गवास हो गया और उसके लगभग तीन महीने के बाद नाना जी भी चल बसे।न जाने कितनी यादें अपनी आखों में समेटे नानी गॉव चल पडा (मैं अक्सर "नानी गॉव" ही कहता हूं).याद आते हैं आज भी नाना जी के साथ बिताये गये क्षण जिसमे वे किस्से सुना
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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दरख्वास्त

दोस्तों पिछ्ले कुछ दिनों से गैर हाजिर था । पत्नी भाईदूज के अवसर पर जनकपुर अर्थात मायके गईं थी। सो मै भी उनके साथ हो लिया. तो कुछ भी खत-खुतूत न कर सका. अब आ गया तो फिर से हाजिर हूं एक और पोस्ट क़ॆ साथ .
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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जाने भी दो यारों

आईये चलते=चलते देखे आज कल क्या हो रहा है------- तो सबसे पहले हमने भी लगा ली है छ्लांग चांद के उपर -बधाई हो भाई। दूसरी तरफ हम जमीन के नीचे भी धसे जा रहे हैं तो आप कहेंगे कैसे तो आप देख ही रहे होंगे कि मुम्बै में पिछ्ले दिनों क्या हुआ और फिर बिहार में।
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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ये मेरी पहली ट्रायल पोस्‍ट है

धन्‍यवाद
 
राहुल सि‍द्धार्थ
Dec 29 2009 11:56 AM
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नाटककार सुरेन्द्र वर्मा और स्त्री के नये तेवर

सुरेन्द्र वर्मा नाट्य साहित्य के क्षेत्र में स्थापित एक ऐसे नाटककार व रंगकर्मी हैं जिन्होंने सांस्क़ृतिक परम्परा से शक्ति ग्रहण कर वर्तमान की समस्याओं को अभिनय की संभावनाओं में पिरोकर प्रस्तुत किया है।''काम'' वर्णन को हीन मानने वाली मानसिकता के विरोध में
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

आज यह कैसा संयोग है कि एक साथ तीन पवित्र त्योहार मनाये जा रहे हैं-- पहला, गणेश चतुर्थी का त्योहार, दूसरा, पवित्र रोजे की शुरूआत , तीसरा, नवरात्र के लिये भूमिपूजन...आज जब समाचारों में चारों तरफ हताशा भरी खबर दिखाई देती है तो न जाने ऐसा लगता है कि त्योहार
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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हबीब और चरन दास

हबीब तनवीर के नाटक "चरनदास चोर" पर छ्तीसगढ सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया है.अभी कुछ ही दिन तो हुए थे तनवीर को इस दुनिया को अलविदा कहे हुए कि स्रजन कर्म को कठघ्ररे में लाकर उन्हीं की कर्मभूमि में खड़ा कर दिया गया.हरेक युग की सत्ता अपने समय के अनुरूप
 
राहुल सि‍द्धार्थ
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Aug 16 2009 07:36 PM
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सॉसें जैसे रूक-रूक कर आ रही थी

आज 'अथर्व' का प्ले-स्कूल का चौथा दिन पहले,दूसरे और तीसरे दिन तो वह हमारे साथ गया सो ना-नुकूर करते चला ही गया, चौथे दिन उसे वैन में जाना था हम दोनों सहमें हुए थे आखिर वह समय आ गया वैन के पास हम दोनों खड़े 'अथर्व' अपनी मिमी-मॉ की गोदी में मैंने कहा बेटा जाओ
 
राहुल सि‍द्धार्थ