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21 May 2010
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एलियंस समाज की तरफ से प्राप्त एक ई-मेल

मुझे एक ई-मेल मिला है। यह ई-मेल एलियंस समाज की तरफ से है। लगता है काफी मन से उन्होंने इस ई-मेल को लिखा है। बहुत मामूली से संशोधनों के बाद इस ई-मेल को मैं आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।प्रिय बंधुहमें धरती पर रह रहे मनुष्यों की हर पल की खोज-खबर रहती
 
अंशुमाली रस्तोगी
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टि्वट से दूरी ही भली

मुझे इस बात का खासा अफसोस है कि मैंने अभी तक टि्वट नहीं किया। जबकि आजकल क्या नेता, क्या अभिनेता हर कोई टि्वट करने में संलग्न है। ऐसे-वैसे नहीं बहुत जोर-शोर से संलग्न है। न न ऐसा कतई नहीं है कि मुझे टि्वट करना नहीं आता। आता है सौफिसद आता है। पर डरता हूं।
 
अंशुमाली रस्तोगी
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गर्मी, बत्ती और आईपीएल का खेल

गर्मी, बत्ती और आईपीएल। इन दिनों हर कहीं, हर जगह बस इन्हीं पर चर्चा है। महंगाई को लोगों ने भूला दिया है। वैसे उन मुद्दों को भूला देना ही श्रेस्कर रहता है, जिनसे जनता उद्वेलित और राजनेता परेशान होते हैं। हमें दोनों की ही भलाई के बारे में सोचा चाहिए।
 
अंशुमाली रस्तोगी
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कमबख्त गर्मी

लोग गर्मी को गरिया रहे हैं कि गर्मी कमबख्त है। गर्मी कहर बरपा रही है। गर्मी ने जीना दूभर कर दिया है। यह एक ऐसी आग बन चुकी है कि कथित ठंडा मतलब कोको-कोला से भी नहीं मिट रही। अरे भाई अब गर्मी है तो है। इसमें कोई क्या कर सकता है? वैसे भी गर्मी में गर्मी ही
 
अंशुमाली रस्तोगी
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जब मियां-बीवी राजी तो...

हर समाज में होते हैं कुछ लोग जिन्हें कोई काम नहीं होता। वे अपने नाकाम होने के बहाने अपने 'काम की सार्थकता' यहां-वहां खोजते फिरते रहते हैं। कभी कोई मुद्दा पकड़ लेते हैं तो कभी कोई। मुफ्त में हाथ आए मुद्दे को आसानी से नहीं छोड़ते। ठीक हमारे नेताओं की तरह।
 
अंशुमाली रस्तोगी
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बहिनजी की माला

बहिनजी की माला चर्चा में है। माला पर विपक्ष लामबंध है। मीडिया माला का सच जनता को दिखाने-बताने में लगा हुआ है। बुद्धिजीवि अपने हिसाब से माला पर चिंतन-मनन में व्यस्त हैं। हर कहीं बस माला का ही जिक्र है। ऐसा सुनने में आया है कि वो माला नोटों की थी। उसमें
 
अंशुमाली रस्तोगी
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चिंता की चिंता में चिंतत चिंतन

हम इंसान बात-बात पर चिंता जताने के अतिरिक्त कुछ और भी करते हैं! जब दिल करता है और जहां सुविधा महसूस होती है, बस चिंता जताने चल देते हैं। गजब यह है कि चिंता को कभी चिंता नहीं रहने देते। चिंता को इस भाव के साथ प्रकट करते हैं कि चिंता स्वयं चिंतन में डूब
 
अंशुमाली रस्तोगी
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महज खुशफहमी भर है महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण

क्या 33 फीसद आरक्षण पाकर महिलाएं सशक्त हो जाएंगी? क्या समाज में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो जाएगी? क्या उन पर होने वाले अत्याचार बंद हो जाएंगे? क्या पुरुष सत्ता के खिलाफ 33 फीसद आरक्षण महिलाओं की ढाल बन सकेगा? क्या इस आधार पर महिलाएं अपने अधिकारों को पाने
 
अंशुमाली रस्तोगी
Feb 26 2010 10:37 AM
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टाइगर वुड्स, तुम धन्य हो

आप लोगों ने चाहे न किया हो मगर मैंने श्रीमान टाइगर वुड्स को माफ कर दिया है। मेरे पास उन्हें माफ करने के अतिरिक्त कोई और चारा भी नहीं था। उस दिन टेलीविजन पर उनका माफीनामा सुनते हुए उनके साथ-साथ मेरी भी आंखें भर आईं थीं। वे जिस गंभीरता के साथ माफी मांग रहे
 
अंशुमाली रस्तोगी
Feb 23 2010 10:03 AM
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सैमसंग पुरस्कार : बंद करो विरोध की यह नौटंकी

जो सज्जन हर वक्त इस खुशफहमी में रहते हैं कि हिंदी का लेखक बेबसी और बेचारगी में ही जीता या रहता है, उनसे मेरी विनम्र गुजारिश है कि वे अपनी खुशफहमी के इंद्रजाल से जरा बाहर निकलें और इस हकीकत को स्वीकार करें कि हिंदी का लेखक बेहद मजे और चैन से अपनी जिंदगी
 
अंशुमाली रस्तोगी
टैग: विवाद
Feb 15 2010 09:54 AM
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मार्क्स, धर्म और ईश्वर के बीच

मार्क्स ने कहा था धर्म अफीम है। लेनिन ने कहा था धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है। आज हमारे बीच न मार्क्स हैं न लेनिन। मगर धर्म है। मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत पुराने पड़ चुके हैं, मगर धर्म पुराना होकर भी खत्म नहीं हुआ। यह निरंतर फैल रहा है। या कहें हम
 
अंशुमाली रस्तोगी
Feb 10 2010 11:43 AM
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महंगाई के दोषी

खमांखां ही मैं इस उस मंत्री-नेता को महंगाई के लिए दोषी मानता व ठहराता रहा। यह मेरी नासमझी थी। इस मुद्दे पर मैं अपना 'विरोध' वापस लेता हूं। यह बात मेरे भेजे में जरा देर से घुसी कि महंगाई के लिए कोई नेता या मंत्री नहीं सिर्फ मैं ही दोषी हूं। मेरा दोष यह है
 
अंशुमाली रस्तोगी
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यकीन मानिए, वे ज्योतिषी नहीं हैं

कोई हो या न हो मगर मैं उनसे सौफीसद सहमत हूं कि वे ज्योतिषी नहीं हैं। अगर ज्योतिषी होते तो 'सड़क किनारे' बैठकर लोगों का 'भविष्य वांच' रहे होते नाकि कृषिमंत्री बनकर देश की 'कृषि के हित' में लगे होते। अब जनता और मीडिया है कि उनके पीछे ही पड़ गई है। बार-बार
 
अंशुमाली रस्तोगी
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मेरी मांग : साहित्य के लिए नया राज्य

मुझे भी एक अलग राज्य चाहिए। न न राजनीति के लिए नहीं साहित्य के लिए। जी हां मुझे साहित्य के लिए नए राज्य की दरकार है। साहित्य के नए राज्य में मैं आपने हिसाब से चीजें बनाना व करना चाहता हूं। इस राज्य में सिर्फ और सिर्फ मेरी ही चलेगी। राज्य का राजा मैं ही
 
अंशुमाली रस्तोगी
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राजनीति में मूर्तियां जरूरी हैं

राजनीति मंदिर है। मंदिर में मूर्तियां जरूरी हैं। मूर्तियां रहती हैं तो आस्था और विश्वास बना रहता है। मूर्तियां व्यक्ति के न होने के बावजूद उसके अहसास और प्रेरणा को जिंदा रखती हैं। भारतीय राजनीति में मूर्तियों का होना अहम है। उस नेता का कोई मोल नहीं ज
 
अंशुमाली रस्तोगी
Dec 29 2009 11:41 AM
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प्रश्नकाल के मुकाबिल विकास दर

बस जरूरत जरा-सा दिमाग लगाने की है, चीजें खुद-ब-खुद साफ हो जाती हैं। दरअसल, दिमाग का इस्तेमाल जहां हमें करना चाहिए वहां करते नहीं, बेमतलब की बातों में हर समय उलझे रहते हैं। बात बस इतनी-सी है कि प्रश्नकाल के दौर हमारे सांसद संसद में मौजूद नहीं रहते हैं
 
अंशुमाली रस्तोगी
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राजनीति में मुद्दे

नेताओं का व्यस्त रहना बेहद जरूरी है। केवल व्यस्त नेता ही देश और समाज की चिंता कर सकता है। वैसे नेता राजनीति में आते ही व्यस्त रहने के लिए हैं। यहां प्रत्येक नेता अपने-अपने हिसाब से व्यस्त रहने-दिखने का प्रयास करता है। मुद्दे नेताओं की व्यस्तता को साध
 
अंशुमाली रस्तोगी
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भ्रष्टाचार की सभ्यता-संस्कृति के बहाने

एक विनम्र निवेदन - जिनकी निगाह में भ्रष्टाचार बुराई और भ्रष्टाचारी पापी हैं कृपया वे इस लेख को न पढ़ें। हम बात-बेबात भारतीय सभ्यता-संस्कृति पर गर्व करने का कोई मौका नहीं चूकते मगर बात जब भ्रष्टाचार की सभ्यता-संस्कृति पर गर्व करने की आती है हममें से क
 
अंशुमाली रस्तोगी
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भ्रष्ट परंपरा के वाहक श्रीमान मधु कोड़ा

क्या हमें श्रीमान मधु कोड़ा (पूर्व मुख्यमंत्री, झारखंड) को तहेदिल से धन्यवाद नहीं देना चाहिए कि वह जनसेवा की व्यस्तताओं के बीच भी 'भ्रष्टाचार की परंपरा' को कायम रखने में सफल साबित हुए! हां, इस बात पर अवश्य ही अफसोस जताया जा सकता है कि भ्रष्टाचार की प
 
अंशुमाली रस्तोगी
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मेरे मन का भूत

मेरा मेरे मन के भूत के साथ बेहद सहज रिश्ता कायम हो गया है। मेरे मन का भूत अक्सर बाहर आकर मुझसे दुनिया-जहान की बातें किया करता है। अपने भूत से संवाद स्थापित करने में मुझे काफी आनंद आता है। भूत मेरे लिए महज भूत नहीं, मेरे अपनों से भी अपना है। भूत का सा
 
अंशुमाली रस्तोगी
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आएं, सेंसेक्स की सक्सेस के दीए जलाएं

सेंसेक्स ने दीवाली पर निवेशकों को सलाम बोला है। सरपट दौड़ लगाते सेंसेक्स ने मंदी को पीछे छोड़ दिया है। सेंसेक्स के खुशनुमा मिजाज के कारण ही बाजार गुलजार हो रहे हैं। नौकरियां दस्तक देने को दरवाजे पर खड़ी हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती की राह पर है। स
 
अंशुमाली रस्तोगी
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ऐ चांद! इंसानों से जरा बचकर रहना

अब सब को चांद चाहिए। चांद पर ठिकाना चाहिए। सब चांद पर जमीन की तलाश में हैं। चांद पर उन्हें भी जमीन चाहिए जिनकी धरती पर अपनी कोई जमीन नहीं है। चांद पर पानी क्या मिला हर कोई चांद का पानी पीने को बेताव है। धरती का पानी उन्हें रास नहीं आ रहा। कह रहे हैं
 
अंशुमाली रस्तोगी
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तो क्या चादं भी इंसानी रंग में रंग जाएगा!

चांद के प्रति मेरी फिक्र थोड़ी बढ़ गई है। दरअसल इंसानी दखल जहां दाखिल हो जाता है, वहां दिक्कतें पैदा होती हैं। हालांकि यह सच है कि हर खोज इंसानी अक्ल और संघर्ष का परिणाम है। पर अक्सर इन परिणामों ने दुश्वारियां ज्यादा पैदा की हैं। इंसान ने चांद पर पान
 
अंशुमाली रस्तोगी
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कौन कहता है बाजार हिंदी को बिगाड़ रहा है!

जो हिंदी भाषा के विकास पर शंका और क्षोभ जताते हैं, उनके ज्ञान के दयारे सीमित हैं। वे बंद आंखों से दुनिया और भाषा का आंकलन करते हैं। दुनिया में जितने और जहां-जहां भी परिवर्तन हो रहे हैं, उनके लिए वे सभी बेमानी हैं। वे दुनिया को बदलते इसलिए देखना नहीं
 
अंशुमाली रस्तोगी
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अफसोस! मिस यूनिवर्स का ताज अपना न हुआ

समझ नहीं आता आखिर भारतीय सुंदरियां सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेने विदेश जाती क्यों हैं? जबकि इस सच से वे भी अच्छी तरह वाकिफ होती हैं कि प्रतियोगिता वे जीत नहीं पाएंगी। चाहे कुछ भी कर लें। मगर तब भी। अब इस मिस यूनिवर्स सौंदर्य प्रतियोगिता में एकता
 
अंशुमाली रस्तोगी
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हम आजाद हैं; क्या वाकई हैं!

21वीं सदी तक आते-आते हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस के मायने बहुत कुछ बदल गए हैं। एक तरफ 'इंडिया' के भीतर 'नया अमेरिका' तेजी से विकसित हो रहा है, तो दूसरी तरफ असली भारत आज भी बदहाल और भूखा है। हमारे लिए स्वतंत्रता के मायने बस इतने ही हैं कि हम आजाद हैं। इस एक
 
अंशुमाली रस्तोगी
Aug 14 2009 01:55 PM
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हमें भ्रष्टाचार से नहीं, ईमानदार से ज्यादा खतरा है

भ्रष्टाचार हमारी परंपरा है। हमारी संस्कृति है। हमारी आदत है। हमारा व्यवहार है। हमारे रहने व जीने का ढंग है। बेशक हम भ्रष्टाचार में अकंठ डूबे हुए हैं, पर जिंदा हैं। भ्रष्टाचार हमें सहज बनाता है। हम हर कहीं भ्रष्टाचार में संलिप्त रहते हैं, पर हमारे चेहरे
 
अंशुमाली रस्तोगी
Aug 06 2009 12:58 PM
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बस आनंद लें बड़े और महान साहित्यकारों के लड़ाई-झगड़े का

मुझे साहित्य की गंभीरता से कहीं ज्यादा साहित्यकारों के झगड़े-टंटे में दिलचस्पी है। बड़े और महान साहित्यकार जब आपस में लड़ते-झगड़ते हैं, तो दिल और दिमाग को अजीब-सा सुख मिलता है। सारी थकान मिट जाती है। सिर का दर्द पलभर में गायब हो जाता है। सच कहूं तो
 
अंशुमाली रस्तोगी
Jul 27 2009 01:23 PM
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यह 21वीं सदी का सच है!

पहले सच कड़वा होता था, अब डराने लगा है। डराने वाला सच कड़वे सच से कहीं अधिक खतरनाक होता है। कड़वे सच में हमारा चरित्र ही पतित होता है, लेकिन डरावने सच में तो हमारा जीवन ही संकट में पड़ जाता है। कड़वे सच में अब तक यह संभावना बनी हुई थी कि 'कुछ सच' होता
 
अंशुमाली रस्तोगी
Jul 23 2009 11:17 AM
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समलैंगिकता के दायरे में नहीं आते सभ्यता-संस्कृति के बंधन

समलैंगिकता पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। बहस विवाद का रूप लेती जा रही है। बहस और विवाद की सार्थकता तभी है, जब उसका कोई ठोस परिणाम हमें देखने व जानने को मिले। समलैंगिकता के मामले में ऐसा होना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि यथास्थितिवादी जमातें भारतीय संस्कृ
 
अंशुमाली रस्तोगी
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लोकतंत्र की दुहाई के बहाने

सीधी-सी बात है। दुहाई देने में न पैसे खर्च होते हैं न दिमाग। आप अपनी सुविधानुसार कहीं भी, किसी भी बात या संदर्भ में कुछ भी दुहाई दे सकते हैं। दुहाई सबके लिए मुफीद है। दुहाई देने से बात का वजन बढ़ता है। बुद्धिजीवियों के बीच आपकी अलग-सी छवि बनती है। वि
 
अंशुमाली रस्तोगी
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आम आदमी और महंगाई दर

कैसी विडंबना है। महंगाई दर बढ़े तो मुश्किल। घटे तो मुश्किल। सब परेशान हैं। सबसे ज्यादा परेशान है, आम आदमी जिसे महंगाई दर का क ख ग तक नहीं मालूम। लेकिन परेशान है। अखबार हाथ में थामे महंगाई दर पर खबर पढ़ता रहता है। जैसा अखबार लिख देता है, उसी हिसाब से
 
अंशुमाली रस्तोगी
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सुकरात महान याकि नेताजी!

जहर पी लेने की धमकी देना कई बच्चों का खेल नहीं। इसके लिए साहस चाहिए। उन नेताजी में यह साहस था इसलिए वे ऐसा कह सके। इस धमकी में उनका दर्द भी निहित था। जमीनी नेता वही जो खतरनाक धमकी देना जानता हो। जिस दिन से उनकी धमकी की धमक को सुना है, मैं परेशान-सा र
 
अंशुमाली रस्तोगी
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हाय! मैं बुद्धिजीवि न हुआ

ऐसा नहीं है कि मैंने कभी बुद्धिजीवि होने या बनने का प्रयास नहीं किया। कई बार किया। हर स्तर से किया। यहां तक कि मैंने मार्क्स से लेकर राजेंद्र यादव तक को पढ़ डाला। अपनी धार्मिक प्रवृतियों को छोड़ नास्तिक भी हुआ। घर के मंदिर में भगवान राम की जगह मार्क्
 
अंशुमाली रस्तोगी
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हारे हुए वामपंथ के वामपंथी

वाम दल हार चुके हैं। जनता के बीच भी और अपने बीच भी। यह हार बहुत तीखी और गहरी है। हार ने वाम दलों का दिन और रात का चैन छीन लिया है। वाम नेताओं के चेहरों पर से खुशी गायब है। माथे पर दुख की लकीरें हैं। गहरी। बहुत गहरी। जुबान खामोश है। टीवी और अखबारों मे
 
अंशुमाली रस्तोगी
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मैं अप्रगतिशील ही भला

मैं प्रगतिशील नहीं हूं। इसका मुझे बेहद गर्व है। गर्व हो भी क्यों न! क्योंकि अप्रगतिशील बने रहकर चीजों को देखने और समझने का जो लुत्फ है, वो प्रगतिशील बने रहने में नहीं। वो कहते हैं न जो जितना बेवकूफ होगा, वो उतना ही सुखी होगा। मेरा ऐसा मानना है कि प्र
 
अंशुमाली रस्तोगी
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अमीर होते नेता, दोष नेताओं नहीं

सीधी-सी बात है। नेताओं के अमीर होने में भला नेताओं का क्या दोष है! वे अगर कुछ लाख या करोड़ के मालिक हैं भी, तो यह उनके मेहनत की कमाई है। लोकतंत्र और जनता की दिन-रात सेवा कर उन्होंने इस मिलकियत को हासिल किया है। क्या यह बात सुखद नहीं है कि इस भीषण मंद
 
अंशुमाली रस्तोगी
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आखिर नाम बेचने में हर्ज ही क्या है?

नाम बेचने में कुछ भी गलत नहीं। नाम आपका है; चाहें बेचें या फेंके। किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! जमीन-जायदाद की तरह नाम भी व्यक्ति की बपौती है। मेरे विचार में हरभजन सिंह 'भज्जी' ने अपना नाम बेचकर ठीक ही किया। अगर नाम बेचकर कुछ 'आर्थिक लाभ' होता है,
 
अंशुमाली रस्तोगी
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नई जूता-क्रांति

इधर, जूतों ने कहर ढाहाया हुआ है। जूता 'असहमति के विरोध' का हथियार बनता जा रहा है। जिसे कुछ नहीं सूझ रहा, वो जूते की चोट पर दूसरे को समझाना चाह रहा है। जूता अब हमारी 'राष्ट्रीय चिंता' का विषय बनता जा रहा है। स्थिति कुछ बदल-सी गई है। कल तक आतंकवाद की म
 
अंशुमाली रस्तोगी
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क्या कभी किसी नेता को अपने देश में मौजूद काले धन पर चिंतित होते देखा है?

कुछ मामलों में हम बड़े ही ईमानदार और सभ्य बने रहना चाहते हैं। दुनिया को दिखाने की कोशिश करते हैं कि देखो! हम इस बात से किस कदर आहत हैं। हम इसे कतई सहन नहीं करेंगे। ताजा मामला विदेशी स्विस बैंक में जमा हमारे काले धन से जुड़ा है। सुना है, यह काला धन तक
 
अंशुमाली रस्तोगी