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राही मासूम रज़ा का साहित्य

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20 Apr 2010
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मैं एक फेरीवाला के सन्दर्भ में

- डॉ० आदित्य प्रचण्डियाकविता सम्पूर्ण चेतना की अखण्ड अभिव्यक्ति है, वह खण्डित व्यक्तित्व की बौ(कि शब्द लीला मात्र नहीं है। असम्बद्ध शब्द जाल और व्यक्ति वैचित्रयवाद की कारीगरी से पाठक को उलझाने और वास्तविक कवि कर्म में बृहद्न्तर हैं। कविधर्म कोरे फ़ैशन से
Apr 20 2010 04:58 PM
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Muslim Minority

Halim Muslim PG College, Kanpur(A Muslim Minority Institution)Entrance test for B. Ed (Minority quota)Forms will be available from 22nd March, 2010 to 24th April, 2010 in the college office.Expected date of Test: 16th May, 2010Coct of admission fee: Rs.
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एम.एल.ए. साहब

राही मासूम रजा एम.एल.ए. साहब के बारे में जानने की सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह एम.एल.ए. नहीं थे। जो वह एम.एल.ए. रहे होते तो उनकी तरफ़ मेरा ध्यान ही न गया होता क्योंकि आज एम.एल.ए. होने में क्या बड़ाई है। हर सातवां-आठवां आदमी या तो एम.एल.ए. ह
Dec 29 2009 11:40 AM
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राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर

प्रताप दीक्षित राही मासूम रजा के निधन के १६ वर्षों बाद उनकी याद और उनके साहित्य का पुनर्मूल्यांकन इसलिए और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि आजादी के ६० साल बाद भी वे दारूण स्थितियां, जिनके विरुद्ध राही ने कलम उठाई थी ज्यों की त्यों मौजूद हैं। आजादी का वास्
Dec 29 2009 11:40 AM
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क्रांति कथा

क्रांति कथा सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की कान खोलकर सुना कथा है क्रांति के पहले सावन की सबने चलाया, धीरे-धीरे फौज पे अपना जादू आजादी की नई कली चटकी तो फैली खुशबू हिन्दी फौज में नफरत की एक आँधी आई हरसू (चारों ओर) जिसको पानी समझ रहे थे वह
Dec 29 2009 11:40 AM
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GAZAL

इस मजमें में एक तरफ से ख्वाजा हसन भी आये अपने खेमे में बैठे चारों पर्दे सरकाये रात गये तक लोग आते थे अपने पैर दबाये आजादी के दीवानों ने अपने पैर जमाये ऐ दोरी! क्या याद नहीं आती अब तुझको उस सन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुना सत्तावन की
Dec 29 2009 11:40 AM
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सुनो भाइयो, सुनो भाइयो

जासूसों ने ढूंढा और इक दस्तावेज निकाली जिसके हर हर लफ्ज से छलकी खून की गहरी लाली खून की सुर्खी देख के काँपी रात भयानक काली आजादी को सींच रहे थे अपने खून से माली वह कागज था एक कहानी कितने दिलों के धड़कन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Dec 29 2009 11:40 AM
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आजादी

जासूसों के गोल चले ले लेकर उजले दामन राम की चीख सुनी तो फौरन धोखा खा गये लछमन दिल के द्वार से निकली बाहर-सीता देखकर बाह्मन आजादी की सीता को झटपट हर ले गया रावन राम की हालत क्या कहिए क्या कहिए हालत लछमन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
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दिल ही दिल

पटना के अत्राफ (पटना की दिशा में) में फैला छुट पुट यों जो उजाला दिल ही दिल में घबराया तब अंग्रेजों का अंधेरा अंग्रेजों ने सर जोड़े और जोड़ के सर यह सोचा जासूसों को चार तरफ जल्दी जल्दी दौड़ाया यह है धरती राम की लेकिन कौन कमी है रावन की सुनो भाइयो, सुनो भ
Dec 29 2009 11:40 AM
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GAZAL

इक्का वालों में से इक ने उनको दिया रुपैया और कहा यह इनसे दिल्ली से आयेगा पहिया उन दोनों का हश्र हुआ क्या यह न किसी ने जाना उसके बाद न फिर उन दोनों को दुनिया ने देखा जाने कब तक राह तका की राह उन्हें मतवालन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन क
Dec 29 2009 11:40 AM
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इक्कावान

दो गद्दार जमादारों के साथ चले कुछ फौजी बोध गया की राह में इक इक्के की पायल खनकी इक्कावान ने उनके पास पहुँचकर रोकी घोड़ी इक्का पर दो मियाँ जी बैठे रक्खी थी इक थैली इन फौजों गद्दारों ने कुछ हँू हाँ की कुछ कदगन (अस्वीकृति) की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा
Dec 29 2009 11:40 AM
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देश के दुश्मन

देश के दुश्मन के मुख्बिर पर इस धरती की लानत अपने देश की नर्म हवा पानी मिट्टी को लानत इस मिट्टी से बनने वाले नर-नारी की लानत लानत उस पर भाई-बहन की लानत रक्षाबन्धन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Dec 29 2009 11:40 AM
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मुल्ला काम में अपने मगन थे, पंडित अपनी धुन में धीरे-धीरे आजादी का रस आया जामून में तलवारों की धारें-सी चमकीं एक-एक नाखून में रुत बदली तो ऐसी बदली जेठ लगा फागुन में तपते जेठ ने बात सुनाई आकर भीगे सावन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Dec 29 2009 11:40 AM
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राही मासूम रजा और आधा गाँव

प्रो० जोहरा अफ़जल राही मासूम रजा एक ऐसे आधुनिक रचनाकार थे जिनकी रचनाओं का मुख्य विषय राजनीति है। चाहे वह उनका उपन्यास हो, कहानी हो, कविता हो अथवा निबन्ध। उनकी सभी रचनाओं में समय की अनुगूँज सुनाई देती है। राही के उपन्यासों में आधा गाँव टोपी शुक्ला, हिम
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हिन्दी के मुस्लिम कथाकार

पुस्तक उपलब्ध मूल्य 150 (25प्रतिशत छूट के साथ) भूमिका डॉ० मेराज अहमद:सम्पूर्ण समाज की अभिव्यक्ति मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ कहानियाँ हसन जमाल : चलते हैं तो कोर्ट चलिए मुशर्रफ आलम जौक़ी : सब साजिन्दे एखलाक अहमद जई : इब्लीस की प्रार्थना सभा
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खुश्की का टुकड़ा

राही मासूम रजा आदमी अपने घर में अकेला हो और पड़ोस की रोशनियां और आवाजें घर में झांक रही हों तो यह साबित करने के लिए कि वह बिल्कुल अकेले नहीं है, वह इसके सिवा और क्या कर सकता है कि उन बेदर्द रोशनियों और आवाजों को उल्लू बनाने के लिए अपनी बहुत पुरानी याद
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सिकहर पर दही निकाह भया सही

राही मासूम रजा मीर जामिन अली बड़े ठाठ के जमींदार थे। जमींदारी बहुत बड़ी नहीं थी। परन्तु रोब बहुत था। क्योंकि दख्ल और बेदख्ली का जादू चलाने में उन का जवाब नहीं था। मीर साहब ने उस्ताद लायक अली से गाने के सबक लिये थे और ईमान की बात यह है कि खूब गाते थे। स
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एक जंग हुई थी कर्बला में

राही मासूम रजा जैनब की आँखों में रास्ते की धूल थी, उसने अंगुलियों से आँखें मलीं ... हां, सामने मदीना ही था। नाना मुहम्मद का मदीना। जैनब की आँखें भर आयीं, लेकिन रोना किसलिए ? बग़ल वाले महमिल का पर्दा उठाये कुलसूम का मर्सिया झांक रहा था : ऐ नाना के मदीन
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लोगों के बीच में राही मासूम रजा आज भी जिन्दा हैं

राही मासूम रजा की १७वीं पुण्यतिथि के अवसर पर वाङ्मय पत्रिका, लिबर्टी होम्स में संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ० प्रेमकुमार ने की। इस संगोष्ठी में राही मासूम रजा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला गया। मुख्य वक्ता डॉ० प्रेमकुम
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भारत वाले देख रहे थे महायुद्ध के सपने जो नहीं समझे वह भी समझे जो समझे वह समझे ऐसी हवा थी युद्ध का खेल ही खेल रहे थे बच्चे उन्तीस मार्च को बैरकपूर में लड़ गये मंगल पांडे अब तक याद है फाँसी के फन्दे में ऐंठन गर्दन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्
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यह सब देख के अंग्रेजों के पाँव की धरती सरकी सोन किनारे ऐसे ही में झूमके आई दोरी (यह मेला अब भी लगता है) मेंढे गायें बरघों की जोड़ी (बैलों की जोड़ी) और घोड़ा हाथी बच्चे कच्चे बूढ़े वाले मर्द के साथ लुगाई (पति-पत्नी) धूम धड़क्का भीड़ भड़क्का गीत पे ढोलक भी ठन
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इक्कावान

दो गद्दार जमादारों के साथ चले कुछ फौजी बोध गया की राह में इक इक्के की पायल खनकी इक्कावान ने उनके पास पहुँचकर रोकी घोड़ी इक्का पर दो मियाँ जी बैठे रक्खी थी इक थैली इन फौजों गद्दारों ने कुछ हँू हाँ की कुछ कदगन (अस्वीकृति) की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा
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मोतीधर ने गद्दारी की और अंग्रेज ने जाना ऐसे गद्दारों का भैया कहो कहां हैं ठिकाना देश बेचकर पाया होगा चन्द टकों का बयाना गद्दारी करने से तो अच्छा ही था मर जाना मर जाता तो धूल दवा बन जाती उसके दामन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सत्तावन की
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पटना के बाजार पे हैं तारीख की अब भी निगाहें दिल्ली के दरबार की जानिब (दिल्ली दरबार की ओर से) से वाटें तनख्वाहों दिल्ली की जानिब फैली थीं दानापुर की बांहें चाँदी की झाड़ से झाड़ें आजादी की राहें देश की दुश्मन नहीं बनी थी तब तक गाँठ महाजन की सुनो भाइयो,
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पटना के सब मुल्ला यूं तो कहने को थे वहाबी लेकिन सर से पांवों तलक थे सारे मुल्ला हिन्दी उन सबने जब चार तरफ यह घोर निराशा देखी तब कुरान के जुजदानों (बस्ता) में एक कटार-सी चमकी उन सबने तब पाल बनाई पैगम्बर के दामन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्त
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क्रान्ति कथा

एक दिन चुपके से मुख्बिर (गुप्तचर) ने उनकी खबर पहुँचाई अंग्रेजी शैतानों की यह सुनते ही बन आई मुल्ला जी बेचारे ने तब शायद फांसी पाई गोरे तो समझे थे मुल्ला जी को सिर्फ एक राई लेकिन कोह हिमाला निकली ऊँचाई उस गर्दन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्त
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क्रांति कथा

छावनी में पटना की आते थे अक्सर एक मुल्ला उजली दाढ़ी, उजला कुरता और उजला पाएजामा मुद्दत तक गोरे नहीं समझे क्या मक़सद था उनका रखके किताबों में लाए थे शहर से वह संदेसा आजादी के दीवाने को फिक्र नहीं थी तन मन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
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उत्तर भारत में पूरब से पश्छिम तक तय्यारी डग,डग,डग,डग बजी डुगडुगी क्या कहता है मदारी नट आए तो कूद-फाँद में इनकी मारामारी कठपुतली का नाच देखने आयेंगे नरनारी कठपुतली के नाच की गत पर क्रान्ति की गरम हवा सनकी सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
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हर गाँव में हर शहर में एलान हुआ है यह काम कुछ इस तरह भी आसान हुआ है तनख्वाहों के बटने का भी सामान हुआ है दरबार से दिल्ली के यह फरमान हुआ है जीते तो बड़ा नाम भी, दौलत भी मिलेगी काम आए, तो इस राह में जन्नत भी मिलेगी
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भिखमंगा हो, धोबी हो, वह भंगी हो कि नाई साधू हो कि जोगी हो, वह बाबा हो कि माई वह गाँव का मुखिया हो, कि बीवी का हो भाई जो आया सिपाही के लिए यह खबर आई या राह में, या गाँव में उसने यह सुना है हर गाँव,हर एक शहर बगावत पे तुला है
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फ़ौजों की हर सफ़ में इसी बात का चरचा जिस आँख में देखो, वहीं भड़का है यह शोला खुद उनके मसाइल (समस्याएँ) की हवा का भी है झोंका एहसासे बग़ावत इन्हें देता है दिलासा हम लड़ने पै आयेंगे तो फिर डट के लड़ेंगे तोपों से भी अड़ जायेंगे, पीछे न हटेंगे
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जब बात वतन की है तो क्या भाई भतीजा अंग्रेजों के जो साथ हैं उनसे नहीं रिश्ता मजहब को भी है बात नहीं कोई तमाशा अंग्रेजों की फौजों से निकल आये तो अच्छा रोके से न मानेगी जो एक बार चलेगी हम रन की तरफ जाते हैं तलवार चलेगी
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तूफान से पहले

कहीं अब्रू पे हैं महराबे इबादत के शिकन कहीं मिम्बर (इमाम) की जुबाँ पर है बगावत के सुखन (क्रांति की बातें) कहीं आवाजें अजाँ में हैं वह पैगामे दुहुल (संवाद देने वाले ढोल) सुनके जिनको सफेदा (नमाजी) में पड़ी है हलचल कहीं मीनारों पे दुश्मन के लिए दारे हैं
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गर जख्म लगाना है तो फिर जख्म हो कारी कल उनकी थी बारी तो है आज हमारी सुनते हैं कि जाने को है साहब की सवारी है शोर कि अंग्रेज पे है साल यह भारी आफत में यह काटेंगे मुसीबत से कटेगा इनका यह सीवाँ साल कयामत से कटेगा
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बदले हैं तो यूँ बदले हैं बिगड़े हुए हालात शहरों में है वह भीड़ न वह शोर न वह बात है सुबह का संगीत न गीतों से भरी रात देखो कि यह है अहद-ए-फिरंगी की करामात जलती हुई करघे का धुआँ आने लगा है मलमल भी बिलायत से यहाँ आने लगा है
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इक टीस है जो साँस है इक दर्द बदन है हर गाँव के सीने में जईफी की चुभन है हर खोशा-ए-गन्दुम (गेहू की बाल) की निगाहों में थकन है हर खेत की गर्दन में मुँडेरों की रसन (रस्सी) है हर सागर-ए-गुल (फूलों का जाम) दीदा-ए-हैराँ (हैरान आँखें) की तरह है हर सुबह-ए-वत
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रो देते हैं जब हाथ बनाते हैं निवाले हर सिम्त (दिशा) हैं सरगोशियाँ ताने हुए भाले ख्वाबों में भी चलते हैं फिरंगी के रिसाले केंचुल से निकलने को तड़प उठते हैं काले बिखरे हैं इधर और उधर ढँूढ रहे हैं हम शाम-ए-गुलामी की सहर ढँूढ रहे हैं
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बर्दाश्त की हद से बहुत आगे है मुसीबत हर लम्हा कोई बात है हर रोज इक आफत फाकों के करीब आ गये गोरों की बदौलत लानी ही पड़ेगी हमें अब कोई कयामत मैदान में जाँ बेच के आना ही पड़ेगा अँग्रेज को इस मुल्क से जाना ही पड़ेगा
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कब ले आखिर रख्खल रही लोहे का गहनवा हो - हो किसनवा हो गज भर का करि यज तिह पर चढ़ती जवनियाँ भला नाहीं तन्नल बाड़िन हमनि का गरदनियाँ दप-दप जैसे तेगा चमके चमकत बाड़न अपने गटनवा हो - हो किसनवा हो कबले आखिर रख्खल रही लोहे का गहनवा हो - हो किसनवा हो तब ले ले ल
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गीतों की लय तेज हुई और कदमों की रफ्तार बढ़ी आँखों की दुनिया भी बदली, होठों की तलवार बढ़ी हाथ बढ़े काछों की जानिब टोक दिया चौपालों ने खेतों से जब आँख मिलाई खेतों के रखवालों ने पिछले राजा जैसे भी थे अच्छे थे अंग्रेजों से आँख निकल आई खेतों की सख्त लगान के