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07 Jun 2010
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शुक्रगुज़ार हूँ आप सभी का ...

आज ब्लॉग की तीसरी सालगिरह है और सुबह से इसी उहापोह में हूँ के क्या कहूँ और क्या लिखूं, खैर कुछ समझ तो अभी तक नहीं आया इसलिए बस ये केक आप सभी के हवाले किये जा रहा हूँ ! और इस वादे के साथ के बहुत जल्द ही एक खुबसूरत ग़ज़ल के साथ हाज़िर होने वाला हूँ ! तीसरा
 
"अर्श"
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विरह के रंग (सीमा गुप्ता )

८ मई को जब सीमा जी के विरह के रंग कव्य संग्रह का विमोचन सीहोर में डा. बशीर बद्र , बेकल उत्साही ,राहत इन्दौरी , और नुसरत मेहंदी साहिबा के हाथों हुआ तो इस ऐतिहासिक और स्वर्णिम पल का गवाह मैं खुद हूँ, किस तरह से इस विरह के रंग की सराहना की गयी थी ! ऐसा लगता
 
"अर्श"
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साहित्य सुबीर सीहोर ...

गुरु जी के साथ सच कहूँ तो आजकल ठीक से नींद नहीं आती , पता नहीं किस ख़ाब को हक़ीकत होते देख लिया है मैंने ! हाँ सच ही तो है और ये बात है उस जगह की जहां साहित्य की सरिता बहती है, जिसे मैं सीहोर कहता हूँ ! ८ तारीख मेरे जीवन का सबसे हसीन या स्वर्णिम क्षण कह
 
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विरह के रंग की सीमा ...

गुफ्तगू उनसे रोज होती हैमुद्दतों सामना नहीं होता.... बशीर बद्र का यह शे'र वाकई यहाँ फिट बैठता है , ऐसा लगता है के ये कल ही की तो बात है जब सीमा जी ने ब्लॉग पर अपनी कविताओं से लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया था ... और ये एक आज का दिन जब उनकी पहली पुस्तक
 
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जामुनी लडकियां नहीं आतीं ...

फागुन का महिना खत्म , सच में इस महीने में हवाओं में भी नशा छा जाता है, जिसका सबूत खुद गुरू देव के ब्लॉगपे तरही है ... अब बात करते हैं कुछ हक़ीकत की और इसी पेशकश में लाया हूँ एक ग़ज़ल बहुत दिनों बाद ... मेरा ये कहना होता है के, जब तुम नहीं होते हो , ग़ज़ल
 
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चबूतरा सिसक रहा था ...

अभी हालिया के यात्रा से जो तज़रबा हुआ आप सभी के सामने है ... गलियाँ तंग हो गयींकुछ ने करवटें बदल लीकुछ थक सी गई हैंकहती हैंगाँवघना हो गया,दालान पर ताले लटक गएदादा जीनहीं रहे जब सेगोशाले का कोना ढह गया हैमगरनीम का पेड़ अब भी है बाट में ,पगडंडियाँ दूर तक
 
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न जाने नया साल क्या गुल खिलाए...

मुहब्बत के लिए कोई मौसम , कोई दिन निश्चित कर दी जाए पूरी तरह से गलत बात होगी ... बसंत आगया और मुआ वो एक खास दिन भी जिसके लिए जाने कितने लोग इंतज़ार करते हैं मगर क्या सिर्फ एक दिन ही वो खास है ? फाग का महीना खुद अपने आप में मदहोशी से परेशान करने पर आमादा
 
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मैं साँसे शाईराना चाहता हूँ ...

सर्दी अपने शबाब पर है , मगर तरही कि सरगर्मी भी खूब जोर पर है ... ये दोनों ही अपने अपने जगह मुकम्मल हैं॥ इन दो कुदरती हसीन और जहीन चीजों के बीच ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ ... आप सबी के प्यार के लिए गूरू जी के आशीर्वाद के बाद ... ग़ज़ल का तीसरा शे'र गूरू जी ने
 
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आधी जली बीड़ी ...

खुद में ठिठुरती सर्दी फ़िर से आ धमकी है फेंफडे जैसे जम जाए साँसे दुबकती नज़र आती हैं नसों का उबाल सिकुड़ने पर आमादा है आधी जली बीड़ीफ़िर सुलगाता है धुएं कि गर्मीहै रात कि तपिश खातिर दीमक लगी दिवार पर पीठ टिकातेदांत कटकटाते यही सोंचता है क्या आज कि रात उसे
 
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नव आगमन शुभ आगमन

नव वर्ष कि ढेरो बधाईयाँ और शुभकामनाएं आप सभी कोनव वर्ष सबके जीवन में खुशियाँ लेकर आये ॥ उधर गूरू कुल में तरही प्रारंभ हो चुकी है अब पुरे महीने ग़ज़ल उत्सव का माहौल रहेगा ॥ और एक नया ब्लॉग भी बना है ग़ज़ल का सफ़र के नाम से जिसमे ग़ज़ल कि तकनिकी ज्ञान दी
 
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नथ का मोती इस कदर चमका हुआ ...

फ़िर एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूँ आप सभी के पास ... कुछ खास भूमिका बनाये बगैर आप सब के बिच ग़ज़ल को छोड़ रहा हूँ पुचकारिये और अगर प्यार और आर्शीवाद के काबिल है तो प्यार और आर्शीवाद जरुर दें खूब बिलेलान होकर .... मतले का मिसरा सानी में सहायक भूमिका में बहन क
 
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नथ का मोती इस कदर चमका हुआ ...

एक बार फ़िर आप सभी के पास हाज़िर हूँ ... कुछ खास भूमिका बनाये बगैर आप सब के बिच ग़ज़ल को छोड़ रहा हूँ पुचकारिये दुलारिये और अगर प्यार और आर्शीवाद के काबिल है तो प्यार और आर्शीवाद भी जरुर दें खूब बिलेलान होकर .... मतले का मिसरा सानी में सहायक भूमिका में
 
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रिश्ते का मजमून

मुझे नहीं पता इस रचना ने कैसे जन्म लेली मेरे अंदर ,... और फ़िर मैंने इसे कागज पर उकेर दिया ,... आप सब के सामने हाजिर है दुआ करें और प्यार दें ... सर्दी की रात चाँदनी छत पर पसरी हुई हम दोनों बालकनी से उसे छूटे हुए शब्द शुन्य थे समय की संकीर्णता हलकी सी
 
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उंगलियाँ इसलिए खुबसूरत हुई ...

सबसे पहले तो आप सभी को दिवाली की समस्त शुभकामनाएं ॥ गूरू जी के महफ़िल में तरही मुशायरा का आयोजन पुरे शीर्ष पर चल रहा है और खूब सारे लोगों ने जम के गज़लें कही हैं ... तरही का मिसरा है ॥ दीप जलते रहें झिलमिलाते रहें ॥ इस तरही में मैंने भी कुछ कहने की जुर
 
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प्रणाम गुरुवर आपके जन्मदिन पर आपको

सुबह जैसे ही उनीदीं सी आँख खुली उल्लास और हर्ष जैसे मेरे कमरे में पसरे हुए थे , खामोशी और बोरियत पता नही कहाँ दुबक गए थे , सोचा तो था के रात में ही कॉल कर के जन्म दिन की बधाई दूँ फ़िर कहा ये सही नही होगा । सुबह कॉल किया तो बीजी मिला कॉल इतने में कल खर
 
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तन्हाई तो होती है तन्हाई में ...

सितम्बर का महिना उफ्फ्फ भयावह ... काफी दिनों से गूरू जी के आने का इंतज़ार कर रहा था बेशब्री से मगर ऊपर वाले ने मिलना नही लिख रखा था , अजीबो गरीब हादसे एक पे एक मन को झकझोर के रख दिया था ... खैर ज़िंदगी है और ये सब तो वाजिब ही है ...उधर गूरू भाई गौतम क
 
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कुछ नहीं है सिवाए यादों के ...

एक तो गर्म मौसम और ऊपर से ये बेवजह की मसरूफियत,बहोत दिनों तक आप सभी से दूर रक्खा ॥ इस देरी के लिए आप सभी से मुआफी चाहता हूँ ...पर एक बात है गूरू जी के छड़ी में बहोत आनंद है ... गूरू जी के आर्शीवाद से ये ग़ज़ल आप सभी के सामने पेश करने लायक बन पड़ी ... तो
 
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दिल अगर फूल सा नहीं होता...

कुछ दिन पहले जनाब सतपाल जी के बज्म में एक तरही का आयोजन किया गया था ... उसमे इस अदने ने भी कुछ एक शे'र कहने की कोशिश की थी चूँकि मैं अभी सिखने की प्रक्रिया में हूँ तो गलतियाँ मुआफ करने की गुजारिश आप सभी से करूँगा ... मिसरा-ए-तरह था दिल अगर फूल सा नहीं
 
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तेरे शिकवे बहुत नाजुक हैं..

बजाय इसके मैं कुछ कहूँ...हद ये है के कुछ कह नहीं सकता ...एक छोटी सी रचना है मन में बहुत उधेड़बुन के खिलाफत के बाद आप सभी के पास रख रहा हूँ जो शायद पसंद ना भी आए ... मगर इससे पहले एक शे'र कहूँगा जो श्रधेय मुफलिस जी के लिए बरबस ही जबान पे आगया था .... और
 
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मां के हाथों की रोटियों की महक ...

लंबे समय के बाद एक छोटी बह'र की ग़ज़ल कहने की कोशिश की है जिसे आर्शीवाद परम आदरणीय गूरू देव ने दिया है ... आप सभी के सामने इसे रख रहा हूँ प्यार और आर्शीवाद के लिए... बह'र .... २१२२ १२१२ ११२मुस्कुराकर वो जब बुलाए मुझे ,हादसे पास नज़र आए मुझे ॥ मेरा ईमान
 
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गूरू देव के आश्रम में तरही ...रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ...

तरही चल रही है गूरू देव के आश्रम में , खूब आनंद से तरही अपनी ऊंचाईओं पे है गूरू जी का आर्शीवाद हम सभी गूरू भाईयों और बहनों को प्राप्त हो रहा है ... साथ में आप सभी का प्यार भी हमें बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करता रहता है ... वेसे मैं तरही में भेजी ग़ज
 
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इश्क मोहब्बत आवारापन...

इस महीने इतने हादसे हुए कवि जगत पे जिससे मन आहत है मेरे और मेरे परम आदरणीय गूरू जी के तरफ़ से इस अपुरनिया क्षति को तथा उन सभी वरिष्ठ और सम्मानीय दिवंगत कविओं को नम आंखों से श्रधांजलि ॥ आज मेरे इस ब्लॉग का भी एक वर्ष पूरा हो गया है ये मुमकिन सिर्फ़ आप
 
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यूँ हस्ती मिटा कर ....

गूरू जी के आर्शीवाद से छोटी बह'र की एक और ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ... आप सभी का प्यार और आर्शीवाद चाहूंगा... बह'र - १२२ १२२ मैं खुश हूँ उड़ा कर । यूँ हस्ती मिटा कर ॥ ये कैसे कहूँ मैं , हूँ जिंदा भुला कर ॥ वो आया नहीं क्यों , बता दो पता कर ॥ सूना फैसला अब
 
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थके - थके से कदम ...

कुछ दिनों के लिए इन्टरनेट से दूर रहूंगा इस लिए आप सभी से ओझल भी ये एक कविता नजर कर रहा हूँ आप सभी का स्नेह और आर्शीवाद चाहूँगा... हाँ जब भी मैं अपने थके - थके से कदम , घुटती साँसे , और टूटती धड़कनों , की तरफ़ बोझिल आंखों से , देखता हूँ , तो ये चमकती
 
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ये मनाने का हुनर हो शायद ...

गूरू देव ने इसे छू लिया और ये कहने लायक बन पडी है आप सभी का आर्शीवाद भी चाहूँगा ... बहरे रमल मुसद्दस मखबून मुसक्कन ( २१२२ ११२२ २२ ) मेरा भी दिल-ओ- ज़िगर हो शायद । उसको भी इसकी ख़बर हो शायद ॥ रास्ते दे रहे आवाज़ मुझे । मेरी किस्मत में सफर हो शायद ॥ दूर
 
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वो कातिल अदा उफ़ ...

लगातार बड़ी बहर पे लिखने के बाद एक छोटी बहर की ग़ज़ल आप सभी के सामने लेकर आया हूँ आर्शीवाद गूरू देव का है, आप सभी का भी स्नेह और आर्शीवाद चाहूँगा .... बहर .... १२२ १२२ फ़ऊलून फ़ऊलून वो कातिल अदा उफ़ वो हुस्न-ऐ शबा उफ़ ॥ है दीवाने हम पर हां तेरी वफ़ा उफ़
 
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मां सबसे है पहले मिरी लिल्लाह खुदाओं में...

माँ की दिली पुकार ने इस ग़ज़ल को जन्म दिया और इसे कहने लायक परम आदरणीय गूरू देव ने बनाया ... आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहता हूँ .... बहर - २२१ १२२१ १२२१ २१२ मफऊलु मुफाईलु मुफाईलु फाएलुन इतना तो असर है मेरी माँ की दुआओं में । टूटा हुआ पत्ता भी ब
 
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मेरे सिरहाने उड़नतस्तरी ...

हर सुबह की तरह आज की सुबह नही थी अगर ऐसा कहूँ तो कोई आश्चर्य की बात ना होगी.हालाकि सुबह तो आज भी हुई थी हर रोज अपने माता पिता को नमन कर बिस्तर त्यागता था मगर आज बिस्तर त्याग ही नही पाया कारण ये था के जैसे ही मेरी आँख खुली मेरे सिरहाने एक कुरियर था ,उ
 
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कमाई के लिए बच्चा जो माँ से दूर हो जाए ...

परम श्रधेय गूरू देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल कुछ कहने लायक बनी है आप सभी का भी प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा... बहरे - हजज मुसमन सालिम ( १२२२ * ४ ) हमारे नाम से वो इस तरह मशहूर हो जाए । के रिश्ता जो भी जाए घर वो ना-मंजूर हो जाए ॥
 
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मेरा घर खुश्‍बुओं का घर होगा ...

परम आदरणीय और मेरे गुरु जी श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीवाद के लिए प्रतीक्षारत .... हाय वो वक्‍त किस कदर होगा मेरा मेहबूब मेरे घर होगा दिल हमारा है प्रेम का मंदिर हम पे नफरत का ना असर होगा घर बनाते हैं पत्‍थर
 
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तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ...

परम आदरणीय श्री प्राण शर्मा जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के प्यार और आशीर्वाद के लिए.... तेरा चेहरा मुझे अच्छा लगे है । तू कातिल है मगर मुझ सा लगे है ॥ मेरी किस्मत कहाँ मुझको मिले तू तुझे पा लू मुझे किस्सा लगे है ॥ तुम्हारी बात में ऐसा असर
 
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साहित्य ज्ञानपीठ और गुरु देव....

कुछ बात है के हस्ती मिटती नही हमारी । सदियों रहा है दुश्मन दौरें जहाँ हमारा ॥ शनिवार की सुबह ऐसे तो 11 बजे से पहले मेरी आँख नही खुलती कभी मगर आज का ये दिवस जैसे मेरे पुरे जीवन के लिए नही भूल सकने और मिटने वाली है । हमेशा से ही ये सोचता था के हर दिन ऐ
 
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शाम को डूबते हुए सूरज...

होली के पवन पर्व पे आप सभी को ढेरो बधाई ... बस एक दिली - खईश थी के आप सभी के सामने एक नज़्म पेश करू ... आप सभी का प्यार और आशीर्वाद चाहूँगा ... शाम को डूबते हुए सूरज की नर्म और मुलायम किरणे जब धीरे से छूती है तो लगता है तुम्हारी रेशमी जुल्फें अभी - अभ
 
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आंखें दो काली ऐसे थीं मशहूर शहर में ...

परम श्रधेय गुरु देव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल , आप सबके सामने प्रस्तुत है , आप सभी का प्यार और आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ .... आप सभी को होली की अनंत -असीम शुभकामनाएं सहित .... बहर ... २२१ २१२१ १२२१ २१२ भरती रही वो सिसकियां देखा
 
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अदब से मौत का भी सामना करे कोई ...

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ये ग़ज़ल आप सभी के सामने है ... आप सभी के प्यार और आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ .... ये मुख्‍़तसर सी जि़ंदगी है क्‍या करे कोई । है सांस आखिरी बची दुआ करे कोई ॥ घुटन है जिन्‍दगी ये फिर भी जी रहा हूं मैं । क्‍युं
 
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नहीं के हमको निभाना नही आता ...

गुरु जी के आशीर्वाद के इंतज़ार में...... नहीं के हमको निभाना नहीं आता ॥ वक्त पे उनको भी आना नहीं आता ॥ जरा सी बात पे देखो वो रूठ जाते है , क्या कहूँ उनको सताना नही आता ॥ रस्म तो रस्म है क्यूँ घबरा रहे हो तुम , क्या तुम्हे रस्म निभाना नही आता .? अभी तो
 
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तुम्हे रात-दिन क्यूँ मैं सोचा करूँ ...

आप सबके सामने एक गीत नज़्र कर रहा हूँ ,जो मूलतः पहली गीत है इस ब्लॉग पे मेरी ।गलती के लिए मुआफी चाहूँगा .... तुम्हे रात-दिन क्यूँ मैं सोचा करूँ। तेरे ख्वाब ही अक्सर देखा करूँ॥ नहीं के हमें दिल लगना नही था तेरे हुस्न के गली में जाना नही था बना के खुदा
 
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कवि योगेंद्र मौदगिल: पगला हुआ.....

कवि योगेंद्र मौदगिल: पगला हुआ.....
 
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ख़ुद को पत्थर बना लिया यारों ...

बहरे खफीफ ..............................................आशीर्वाद २१२२-१२१२-२२....................................गुरु देव पंकज सुबीर जी मैंने भी दिल लगा लिया यारों। जख्म पे जख्म पा लिया यारों ॥ मौज फ़िर ज़िन्दगी नही देती । जख्म गहरा जो ना लिया यारों ॥
 
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रे मर जाएगा क्यूँ सोंचे है ...

कल क्या होगा क्यूँ सोंचे है । रे मर जाएगा क्यूँ सोंचे है ॥ होके नीलाम फ़िर गिरवी की अब क्या रखेगा क्यूँ सोंचे है ॥ अपना घर कितना अपना है लो कौन बसेगा क्यूँ सोंचे है ॥ शे'र नही ये लफ्ज़ है अपने वो क्या समझेगा क्यूँ सोंचे है ॥ जाना था तो चला गया वो वो फ़
 
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