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मा पलायनम !

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15 May 2010
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भुतही कहानियों के बीच छिपा एक इतिहास (एपार जौनपुर -ओपार जौनपुर )

बचपन से ,जौनपुर जाते -आते एक वीरान इमारत को देखता-समझने की कोशिश करता लेकिन बात भूतों -प्रेतों पर आकर टिक जाती. सन १३६१ इस्वी के बाद जौनपुर में शर्की वंश के राज काल में बनी इमारतों में "बारादुअरिया " भी है लेकिन इतिहास के पन्नो में वास्तुकला के इस धरोहर
 
डॉ. मनोज मिश्र
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मित्र मिलन की अजब कहानी..........

पुरानी फ़िल्मी कहानियों में मिलन के लिए अक्सर कुम्भ मेले का सदुपयोग होता था लेकिन अब ब्लॉग-जगत के महाकुम्भ नें मुझे मेरे मित्र से मिला दिया.मैं बात कर रहा हूँ अपनें सहपाठी मित्र अभय तिवारी की,जो कि मेरे साथइलाहाबाद विश्वविद्यालय के डायमंड जुबिली हास्टल
 
डॉ. मनोज मिश्र
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क्या परशुराम क्षत्रिय विरोधी थे ???

बताया जाता है कि हमारे जौनपुर से परशुराम जी का नाता रहा है ,इन्ही के पिता जी ऋषि यमदग्नि के नाम पर ही जौनपुर कभी यमदाग्निपुरम से होते हुए जौनपुर हो गया. आज भी इनकी माता जी का मंदिर यहाँ विराजमान है.जौनपुर के स्थानीय निवासी और सम्पूर्णानन्द संस्कृत
 
डॉ. मनोज मिश्र
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कुमारी का टोटा ....(एक माइक्रो पोस्ट)

धर्म से ओत-प्रोत हमारे इस महान देश की अजब परम्पराएँ और चलन हैं.साल भर हर मुद्दे पर जिनका निरादरकरो -उसी का एक दिन विधिवत पूजन-अर्चन और नमन. आज का दिन हम लोंगो की तरफ कुमारी कन्याओं कादिन होता है.श्री राम नवमी के दिन सुबह-सबेरे हमारी तरफ ही नहीं, मैं
 
डॉ. मनोज मिश्र
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गौरैया आयी है .......

शहरों में,समाचार पत्रों में और ब्लागजगत में भी आज गौरैया चिंतन छाया रहा .घरों में फुदकने वाली गौरैया का आज दिन जो था .दिन-भर विश्वविद्यालय से लेकर शहर तक कि पर्यावरण विदों से मुलाकात हुई,इसी विषय पर बात हुई और अंततः कमोबेश बात इसी बात पर खत्म हुई कि
 
डॉ. मनोज मिश्र
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राजा श्री राम चन्द्र जी और उनके पांच हजार सैनिक ....

पिछले दिनों मैं अयोध्या में था और अपने प्रवास की बात कर रहा था .श्री राम जन्मभूमि परिसर में सुरक्षा के लिए लगभग पांच हजार जवान लगे हैं.श्री राम लला के दर्शन के दौरान मैंने अपनें साथ गये एक पत्रकार मित्र से कहा कि वाह ,क्या चाक-चौबंद व्यवस्था है,वाकई यहाँ
 
डॉ. मनोज मिश्र
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तमसा तट से............

इधर कई दिनों से मैं फैजाबाद एवं राजा श्री राम चन्द्र जी की नगरी अयोध्या में रहा .यह क्षेत्र तो वैसे हमारे प्रिय श्री अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी का है पर उनके इलाके की खबर मुझे देनी पड़ रही है . व्यस्तता इतनी थी कि ब्लाग जगत से न चाहते हुए भी दूर रहना पड़ा
 
डॉ. मनोज मिश्र
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चैत मास की अमराई में चैता-चहका और चौताल.....

प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने और सुरुचिपूर्ण संगीत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हमारे घर पीढी दर पीढी से प्रतिवर्ष होली के आठवें दिन आयोजित किये जाने वाले लोक-संगीत समारोह "आठो -चैती " में इस चैत मास की अमराइयों में रविवार की देर रात तक लोक
 
डॉ. मनोज मिश्र
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फाग-५ -फागुन का चरम और चैत का आरम्भ ....

होली के हुडदंग के साथ आज फगुआ भी अपनें चरम पर पहुंच गया .आज से ही चैत मॉस का आरम्भ हो गया।गांव में फाग गायकों की टोली अभी आठ दिन तक धमाल मचाती रहेगी,जिसे आठो चैता के नाम से जाना जाताहै। आठो चैता के समापन के साथ ही फागुन के यह दिन चार बीत जायेंगे,फिर से
 
डॉ. मनोज मिश्र
Mar 01 2010 09:59 PM
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फाग गीत -४-चौताल --खोजे सजनवाँ होली में ........

फागुनी रंग में सरोबार अपनी पिछली पोस्ट बालम मोर गदेलवा, मोहे नीको न लागे नैहरवा और उलारा-न देबयकजरवा तोहके और के क्रम में आज फाग राग की एक और विधा चौताल का गायन प्रस्तुत है.फगुआ गायनमें विशेष कर चौताल ( अर्द्ध तीनताल,दादरा,कहरवाऔर फिर अर्द्ध तीनताल ) का
 
डॉ. मनोज मिश्र
Feb 27 2010 05:58 PM
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फाग गीत-३,उलारा -न देबय कजरवा तोहके.......

फागुनी रंग में सरोबार अपनी पिछली पोस्ट बालम मोर गदेलवा और मोहे नीको न लागे नैहरवा के क्रम में आज फाग राग की एक और विधा उलारा प्रस्तुत है.फगुआ गायन में विशेष कर चौताल ( अर्द्ध तीनताल,दादरा,कहरवाऔर फिरअर्द्ध तीनताल ) के बाद चरमोत्कर्ष पर गए जानें वाले पद
 
डॉ. मनोज मिश्र
Feb 26 2010 07:26 AM
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फाग गीत -- मोहे नीको न लागे नैहरवा.....

अब फागुन पूरे उफान पर है .हम लोंगों का क्षेत्र,या यूँ कहिये पूरा पूर्वांचल इस मामले में बहुत समृद्ध था.पूरे फागुन माह भर- गांव-गांव ,घर-घर ,ढोल की थाप सुनाई पडती रहती थी . फागुन भर फगुआ लोंगों की जुबान पर रहताथा,ऐसा लगता था कि लोग-बाग़ पगला गये
 
डॉ. मनोज मिश्र
Feb 24 2010 08:01 PM
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बालम मोर गदेलवा....

फागुनी रंग को और गाढ़ा करनें के लिए आज आपके सामनें एक बहुत पुराना फाग गीत प्रस्तुत कर रहाहूँ,प्रश्न-उत्तर के रूप में वर्णित पूरी रचना शुद्ध अवधी में है ,जिसमें तत्कालीन पर्यावरण का भी कितना सुंदर चित्रण दीखता है..गांव की मिट्टी की महक लिए ऐसे गीत और उसके
 
डॉ. मनोज मिश्र
Feb 23 2010 01:15 PM
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मन होनें लगा महुआ -महुआ...........

हमारी तरफ तो फागुन का धमाल शुरू है ,क्या बच्चे -क्या बूढ़े.ब्लॉग जगत भी फागुन-फागुन हो रहा है .ऐसे मेंमन कसमसा रहा था,आपको कुछ फागुनी सवैये सुनाने को.यह फागुनी रचना मैनें बचपन में हमारे यहाँ पूर्वांचल के विख्यात कवि पंडित रूपनारायण त्रिपाठी जी (अब
 
डॉ. मनोज मिश्र
Feb 20 2010 06:43 PM
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जौ भरि जाई कुठिला अंगनवा ना ??

खेती -किसानी से जुड़े लोग ,मौसम का हर दिन बदलता हाल देख हैरान हैं .उनके सपने -उनकी आशा सब कुछ फसल ही तो है.अच्छी फसल मतलब साल भर सुकून का जीवन नहीं तो फिर---कहाँ जायेंगे किससे मांगेंगे.माई की दवाई ,बच्चो की पढाई,बिटिया का विवाह,साल भर का रिश्तेदारी और
 
डॉ. मनोज मिश्र
Feb 16 2010 07:42 AM
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बस इतना मुझको पयाम दे.......

तूँ न आये कोई गिला नहीमगर अपना हसीन ख्याल देमेरी शाम धुंध में कट गयीमेरी रात को तो संवार दे|मेरे गम जो हैं ,वो रहेंगे भीमेरी उम्र कम हो दुआ करोअभी हूँ मै कल कभी ना रहूँमुझे लमहे भर का करार दे|नही शिकवा है इस बात कातेरा साथ मुझको न मिल सकामेरा ख्याल तेरे
 
डॉ. मनोज मिश्र
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अभी तक आदमी बनकर तुम्हे जीना नहीं आया..........

खुशी हद से बढ़ी तो आ गए मुस्कान को आंसूकहीं कोई लुटा तो आ गये ईमान को आंसूचढ़ाकर लूट की संपत्ति तुमनें जीत माँगी तोपुजारी मुस्कराया आ गये भगवान को आंसू । पराई पीर का प्याला तुम्हे पीना नहीं आयामनुजता का फटा आंचल तुम्हे सीना नहीं आयाभले ही तुम फरिश्तों की
 
डॉ. मनोज मिश्र
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क्या अध्ययन समाप्ति के बाद, उपाधि देते समय दिया जाने वाला उपदेश महज़ परिपाटी या औपचारिकता बन कर रह गया हैं???

कल यानि २० जनवरी ,वसंत-पंचमी को हमारे विश्वविद्यालय का १३ वां दीक्षांत समारोह था .वैसे भी वसंत-पंचमीको हमारे विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस भी है, उस पर दीक्षांत ,एक विशाल उत्सव का दिन ,विश्वविद्यालय सेजुड़े सभी -छात्र-शिक्षक -कर्मचारी सबके लिए .आपको बताते
 
डॉ. मनोज मिश्र
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पहले चलना तो सीखो बहन की तरह......

तुम की रंगीनियों में नहाई हुईकल्पना की परी रेशमी चीर मेंजादुई रूप-रेखा तुम्हारी की यहजान आई अजन्ता की तस्वीर में.तुम की जैसे अभी मुस्करा कर खिलानींद की झील में वासना का कमलतुम की जैसे सुरा को मिली जिन्दगी तुम की सांचे में जैसे ढली हो गजल । आँख जैसे रुबाई
 
डॉ. मनोज मिश्र
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डी.एन . ए. के पन्नो पर खिचड़ी : लाई-चूड़ा -कंद-तिलवा और नौपेडवा का पेड़ा.

लखनऊ से प्रकाशित सम्मानित हिन्दी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के पन्नो पर "ब्लॉग गुरु "कालम में मेरी जल्द की प्रकाशित पोस्ट खिचड़ी : लाई-चूड़ा -कंद-तिलवा और नौपेडवा का पेड़ा..पर आज चर्चा हुई है .मेरे साथ ही सीमा सचदेव जी के ब्लॉग "नन्हा मन " ,डॉ टी एस
 
डॉ. मनोज मिश्र
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खिचड़ी : लाई-चूड़ा -कंद-तिलवा और नौपेडवा का पेड़ा.

खिचड़ी (मकर-संक्रांति ) की पूर्व संध्या पर आज अभी शाम को विश्वविद्यालय से घर आते समय रास्ते की बाजारोंमें भरी भीड़ को देख कर मुझे बचपन की याद आ गयी.आज-कल जैसे बच्चे क्रिसमस के दिन सान्ताक्लाज़ की यादगिफ्ट के लिए करते है ,बचपन में हम लोगखिचड़ी
 
डॉ. मनोज मिश्र
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कांवर रथी :एक धार्मिक लोक परम्परा जो कि अब अवसान पर है .......

बचपन से ,जब से जानने-पहचानने की शक्ति विकसित हुई है,तब से देखता आ रहा हूँ की हर वर्ष जाड़े(माघ ) के महीनें में गंगोत्री (उत्तराखंड) से गंगा जल , छोटी-छोटी मनोहारी शीशियों में भर कर , कांवर में रख कर एक पंडित जी आते रहें है.वे इस परम्परा को आज भी ८१ वर्ष
 
डॉ. मनोज मिश्र
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सावधान! क्या ब्लागिंग से खतरे भी हैं?????....

गत दिनों विश्वविद्यालय में दूरस्थ प्रदेश के एक प्रोफेसर साहब परीक्षा लेने आये थे.मेरी मुलाकात होने पर कुशल क्षेम के बाद बात शुरू हुई ,उसी समय उनका मोबाइल बजने लगा और फिर वे बात करने लगे.मुझे लगा कि वे कुछ परेशान से हैं .मैंने कहा कि तबियत ठीक है?उन्होंने
 
डॉ. मनोज मिश्र
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निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा -

अज़ब संयोग है | आज लम्बे अन्तराल के बाद अचानक पोस्ट लिखने को मन हो आया और वह भी श्री गणेशचतुर्थी को| हमारे पूर्वांचल में , हर घर -महिलाएं दिन भर से निरा जल व्रत हैं ,पुत्र के लम्बे और यशस्वी जीवन केलिए , आज निरा जल ,चाँद देखने की ललक है|बिना चाँद देखे न
 
डॉ. मनोज मिश्र
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आत्मा घर बदल रही होगी.

दीप की लौ मचल रही होगीरूह करवट बदल रही होगी |रात होगी तुम्हारी आंखों मेंनींद बाहर टहल रही होगी ||चैन सन्यास ले लिए होगापीर टाले न टल रही होगी |तुम चिता देख कर न घबराओआत्मा घर बदल रही होगी||जगमगाती है उनकी आँखे तोरोशनी दिल में पल रही होगी |यह जो खुशबू है
 
डॉ. मनोज मिश्र
Jul 30 2009 06:44 AM
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हविष ही उपजायेंगे ||

बन हविष जल भी गये तो धूम हम बन जायेंगे धूम से फ़िर मेघ बन कर , हविष ही उपजायेंगे || गोल है दुनिया की माफिक परिधि जीवन मृत्यु की हैं चले जिस बिन्दु से हम , फ़िर वहीं आ जायेंगे || " शून्य " ही कह लीजिये , हमको कोई शिकवा नहीं " अंक " में जुड़ते गये तो " ला
 
डॉ. मनोज मिश्र
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करनी हमारी -स्तुतिगान इन्द्र देव का .

चित्र -साभार - गूगल ) आज - कल इन्द्रदेव का स्तुतिगान जगह - जगह पर हो रहा है , क्या हिन्दू - मुस्लिम , सिख - इसाई सब के सब इस मुद्दे पर एक हैं . इस मुद्दे पर न तो भाषाई विवाद है और न ही क्षेत्रीय . लेकिन असली बात मुझे समझ में यह नहीं आ रही है वह यह कि
 
डॉ. मनोज मिश्र
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एक अनुरोध .....

यह सितारों भरी रात फ़िर हो न हो आज है जो वही बात फ़िर हो न हो एक पल और ठहरो तुम्हे देख लूँ कौन जाने मुलाकात फ़िर हो न हो । हो गया जो अकस्मात फ़िर हो न हो हाथ में फूल सा हाथ फ़िर हो न हो तुम रुको इन क्षणों की खुशी चूम लूँ क्या पता इस तरह साथ फ़िर हो न हो ।
 
डॉ. मनोज मिश्र
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एक पसंदीदा गजल ...

खूबसूरत से इरादों की बात करता है वो पतझडों में गुलाबों की बात करता है एक ऐसे दौर में जब नींद बहुत मुश्किल है अजीब शख्स है ख्वाबों की बात करता है उछाल करके कुछ मासूम से सवालों को वो पत्थरों से जबाबों की बात करता है वो चाहता है अंगूठे बचे रहें सबके वो
 
डॉ. मनोज मिश्र
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एक पल ही जियो ...

एक पल ही जियो , फूल बन कर जियो , शूल बन कर ठहरना नहीं जिन्दगी || अर्चना की सजोये हुए अंजली , तुम किसी देवता से मिलो तो सही | जिन्दगी की यहाँ अनगिनत डालियाँ , तुम किसी पर सुमन बन खिलो तो सही || एक पल ही जियो , तुम सुरभि बन जियो , धूल बन कर उमड़ना नहीं
 
डॉ. मनोज मिश्र
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एटम बम और सई नदी की पीड़ा .

अरे चौकिये नहीं ,मैं किसी आण्विक अस्त्र के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ .हमारे जिला मुख्यालय से ५० किलोमीटर दूर एक बाज़ार है नाम है सुजानगंज .वहां की एक मिठाई बहुत प्रसिद्द है उसका नाम है एटम-बम .जो इस मिठाई के बारे में नही जानता वह बाज़ार में इस मिठाई
 
डॉ. मनोज मिश्र
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अनोखा है राउर बाबा क मेला .

हमारा देश भी कितनी विचित्रताओं , लीलाओं और परम्पराओं के साथ जी रहा है . प्रगतिवादी विचार धारा के लोंगों को बकवास भले ही लगे लेकिन इस महान देश में बहुत ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल श्रद्धा और विश्वास के अलावा और कुछ सोचनें के लिए नहीं है . आपको यह विचित्र
 
डॉ. मनोज मिश्र
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जमैथा का खरबूजा .

गर्मी का मौसम हो ,मौसमी फलों की बात हो और खरबूजे की चर्चा न हो तो बात बेमानी सी लगती है .हमारे यहाँ जब बात खरबूजे की हो और जमैथा की न हो ,यह हो ही नहीं सकता .यानि की जमैथा और खरबूजा एक दूजे से इस तरह सदियों से जुडें हैं कि इनको अलग करना नामुमकिम सा ह
 
डॉ. मनोज मिश्र
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मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना

कचहरी भी क्या खूब है ,न जाने कितनों को रुलाती व हसांती है .जीवन संघर्ष में कभी -कदा हर किसी का पाला कभी ना कभी इस कचहरी से जरूर ही पड़ता है .मेरा भी पिछले १० सालों से एक मुकदमें के चक्कर में कचहरी आना -जाना लगा हुआ है .इस आने -जाने नें मुझमें एक नया
 
डॉ. मनोज मिश्र
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भारतीय शिक्षा व्यवस्था :अतीत से वर्तमान का सफ़र...3

गतांक से आगे .... आजादी के बाद राधा कृष्ण आयोग(१९४८-४९),विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (१९५३),कोठारी शिक्षा आयोग (१९६४),शिक्षा की राष्ट्रीय नीति (१९६८)एवं नवीन शिक्षा नीति (१९८६)आदि के द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था को समय -समय पर सही दिशा देनें की गंभीर क
 
डॉ. मनोज मिश्र
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भारतीय शिक्षा व्यवस्था :अतीत से वर्तमान का सफ़र

गतांक से आगे .... गुप्तकालीन भारत तक शिक्षा की प्रगति अबाध गति तक चलती रही .लौकिक साहित्य की सर्जना के लिए गुप्त काल स्मरणीय माना जाता है .शूद्रक का मृच्छ कटिक,कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम ,अमर सिंह का अमरकोश इस काल की वे सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ थी ,जो की
 
डॉ. मनोज मिश्र
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क्या इतना जहरीला होता है यह विषखोपड़ा.......?

मानीटर लीजार्ड यानि कि विषखोपड़ा या हम लोंगों की तरफ स्थानीय भाषा में बीतनुआ, क्या इतना जहरीला होता है कि इसके काटनें पर आदमी तुंरत मर जाये ? या ऊपर के चित्र में यह कोई इससे इतर कोई अन्य जहरीला जीव है , यह सवाल मैं अपने ज्ञानी ब्लॉग जगत के मित्रों से
 
डॉ. मनोज मिश्र
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भारतीय शिक्षा ब्यवस्था :अतीत से वर्तमान का सफ़र

प्राचीन भारतीय मनीषियों नें शिक्षा को सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हुए इसे आध्यात्मिक तथा भौतिक उत्थान हेतु एक महत्त्वपूर्ण कारक माना है .प्राचीन शिक्षा ब्यवस्था के शैशव कलेवर से ही यह ध्वनित है की बगैर विद्या और ज्ञान से सम्पन्न हुआ ब्यक्ति ऋषि ऋण से
 
डॉ. मनोज मिश्र