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आत्मदर्पण

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03 Jun 2010
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हो कहीं भी शौचालय लेकिन शौचालय बनना चाहिए

वैसे ये कला मैंने रवीश जी से सीखी है कि जहाँ भी जाओ, वहां की कुछ चीजें कैमरे में कैद कर लाओ और यादगार बनाओ | इस तरह की अपनी पहली पोस्ट में दुष्यंत साहेब की ग़ज़ल का पोस्टमार्टम आपके सामने रख रहा हूँ | दुष्यंत साहेब ने सोचा भी नहीं होगा की उनकी ग़ज़ल का
 
गुड्डा गुडिया
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बालिका वधू : टूटते सरकारी वायदे

इस साल की अक्षय तृतीया भी बाल विवाहों से अछूती ना रह सकी। शिवपुरी में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में हुआ बालविवाह, इस बात की पुष्टि करता है कि प्रदेश में बालविवाह बदस्तूर जारी है। मध्यप्रदेश बालविवाह के संदर्भ में 57.3 प्रतिशत के साथ चौथे स्थान पर है।
 
गुड्डा गुडिया
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नर्मदा क्रिकेट ग्राउण्ड बनती जा रही है : मेधा पाटकर

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विगत, दो दशकों में विकास को नये सिरे से परिभाषित करने का एक मार्ग प्रशस्त किया है। उसने इस बात को प्रतिपादित किया कि विकास केवल विकास शब्द के साथ ही नहीं देखा जाना चाहिये बल्कि विकास को विनाश के साथ भी जोड़कर देखना होगा। वतर्मान
 
प्रशांत दुबे
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कहां है सुरक्षित मातृत्व .......?

11 अप्रैल - सुरक्षित मातृत्व दिवस पर विशेष मध्‍यप्रदेश की 56 प्रतिशत महिलायें खून की कमी का शिकार हैं और उनमें से भी 74 प्रतिशत आदिवासी महिलायें हैं। विगत पांच सालों में हमने 30,000 से अधिक महिलाओं को खोया है। प्रदेश में 60 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं।महिला
 
प्रशांत दुबे
Apr 11 2010 12:01 PM
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आम आदमी का स्वास्थ्य : एक अधूरा ख्वाब

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष यह रोशनी हकीकत में एक छल लोगों जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों प्रदेश ने विगत् पांच वर्षों में 6 लाखशिशुओं और 30000 गर्भवती महिलाओं की मौत की गवाही दी है। प्रदेश शिशु मृत्यु दर के मामले में पूरे देश में अव्वल है। प्रदेश सबसे
 
प्रशांत दुबे
Apr 07 2010 12:00 PM
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अब और मूर्ख तो नहीं बनायेगी ना सरकार.....?

‘’मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का कानून’’ लागू होने पर विशेष सर, इस कानून में नया क्या होगा ! स्वतंत्र भारत में संविधान बनाते समय तो प्रत्येक बच्चे को वचन दिया गया था कि दस वर्ष के भीतर सारे बच्चे शिक्षित होंगे। लेकिन आजाद हुये भी 6 दशक बीत गये ! सर्व
 
प्रशांत दुबे
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थारी भली होवे मीडिया ................ !

सचिन तेंदुलकर ने पुरुषों के एकदिवसीय क्रिकेट मैं २०० रन बनाने का कीर्तिमान अपने नाम सुरक्षित कर लिया | निश्चित रूप से यह भारत देश और क्रिकेट के लिए एक महानतम उपलब्धि है | किसी ने सचिन को अवतार बताया और किसी ने कुछ और | मेरे पास भी एसएम्एस का भण्डार लग
 
प्रशांत दुबे
Feb 27 2010 06:23 PM
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बाजार से ज्यादा पत्रकारों ने किया पत्रकारिता को फेल

बाजार से ज्यादा पत्रकारों ने किया पत्रकारिता को फेल यह बात विकास संवाद, भोपाल द्वारा ''मीडिया के मानक और समाज'' विषय पर स्थानीय स्वराज भवन में एक आयोजित एक परिचर्चा के दौरान एन डी टी व्ही के रवीश कुमार ने कही | श्री कुमार ने कहा कि महान होने का मिथ
 
प्रशांत दुबे
Feb 26 2010 05:30 PM
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वैसे आजकल मैं भी तो अपना एक ब्लॉग चलाता हूँ |

मैं एक ब्लॉग चलाता हूँ ,आप इसके मायने नहीं जानते !आप मुझे केवल बुद्धिजीवी मान बैठे हैं,पर मेरे पासकिसी पर भी कीचड उछालने का अब एक नया औजार है !!!!यहाँ कोई रोक- टोक नहींकुछ भी लिख दूँ किसी के भी बारे मैं, बात करूँ या ना करूँ उससे |मैं ही रिपोर्टर, मैं ही
 
प्रशांत दुबे
Feb 14 2010 01:18 PM
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आजकल मैं भी तो अपना एक ब्लॉग चलाता हूँ

मैं एक ब्लॉग चलाता हूँ ,आप इसके मायने नहीं जानते ! आप मुझे केवल बुद्धिजीवी मान बैठे हैं,पर मेरे पास किसी पर भी कीचड उछालने का अब एक नया औजार है !!!!यहाँ कोई रोक- टोक नहींकुछ भी लिख दूँ किसी के भी बारे मैं, बात करूँ या ना करूँ उससे |मैं ही रिपोर्टर, मैं
 
प्रशांत दुबे
Feb 14 2010 12:47 PM
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ये मिली "भगत" है |

ये मिली "भगत"है |इडियट शब्द का नितान्त हिंदी अनुवाद है मूर्ख, लोकल में चूतिया भी कह सकते हैं | हालाँकि चूतिया शब्द ना तो बोलचाल में आता है और ना ही सम्मानजनक है | लेकिन देश में अभी जो स्थिति चल रही है या चलाई जा रही हैं वैसी स्थति में तो यही सबसे उपयुक्त
 
प्रशांत दुबे
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हर बार नए साल का सूरज करता है हमसे वायदा

हर बार नए साल का सूरज करता है हमसे वायदाकिइस साल खत्म कर दूंगाकुपोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, अनाचारइस नए साल मैं मिलेगी सभी को सूचनामिलेगा सभी को काम और काम का पूरा दामलेकिन नहीं निभाता है यह वायदा अपना !!!!!हम भी तो करने देते हैं सूरज को
 
प्रशांत दुबे
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बच्चों को रुलाता बजट

यूपीए सरकार की दूसरी पारी का पहला बजट बच्चों की समस्याओं और पोषण को लेकर कमोवेश यथास्थितिवादी है। ऐसा देश जिसकी 50 प्रतिशत से अधिक आबादी युवाओं/बच्चों की हो वहां उनके पोषण के प्रति आंख मूंद लेना 'हाराकरी' से ज्यादा कुछ नहीं है। बजट की वास्तविकता का व
 
प्रशांत दुबे
Dec 29 2009 11:50 AM
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आत्मदर्पण

प्रिय मित्रों आज सुबह मेल खोला तो उत्कर्ष भाई की एक कविता मिली | उत्कर्ष भाई लखनऊ मैं रहते हैं और सी सी एस आर और इन्साफ के साथ जुड़े हैं | पढ़ा तो लगा कि औरों तक भी पहुचाऊं | आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ | आपकी टिप्पणियों का स्वागत है| पुराने सामान क
 
प्रशांत दुबे
Dec 29 2009 11:50 AM
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गांधी के सपने को साकार करता ''हिवरे बाजार''

एक गांव जहां पर लोग अपने उपनाम के रूप में लगाते हैं अपने गांव का नाम। एक गांव जहां पर व्यापक मंदी के इस दौर में मंदी का कोई असर नहीं हैं। एक गांव जहां से अब कोई पलायन पर नहीं जाता है। एक गांव जहां पर कोई भी व्यक्ति शराब नहीं पीता हैं । एक गांव जहां प
 
प्रशांत दुबे
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कर्ज के फंदे में किसान

होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी ब्लाक के कुर्सीढ़ाना के किसान अमान सिंह ने अप्रैल माह में करीना इंडोसल्फान (एक जहरीली दवा) पीकर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली। अमान सिंह पर बैंक और साहूकार मिलाकर कुल १.50 लाख रूपये का कर्ज था। अमान के परिवारजन बताते हैं कि उसके यह
 
प्रशांत दुबे
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आत्मदर्पण

साथियों ! नीचे लिखी कविता तथा यह आदर्श वाक्य मेरे आदरणीय मामाजी डॉ. एम. एल. तिवारी द्वारा लिखे गये हैं। वे भापाल में रहते हैं, शासकीय सेवा में है। कल उनसे मिला तो लेकर आया ब्लॉग के लिये । आपके लिये पेष कर रहा हूं। आग लगाना मत सीखो लगा सको तो बाग लगाओ
 
प्रशांत दुबे
Dec 29 2009 11:50 AM
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कौन हुआ नीलाम ?

आखिरकार गांधी जी के स्मृति चिन्ह भारत लाये गये। जीवन भर मदिरा का विरोध करने वाले और उसके खिलाफ उपदेश देने वाले महात्मा गांधी की वस्तुओं को शराब किंग विजय माल्या ने खरीदा. सरकार ने कहा कि हमने बहुत प्रयास किये, आधिकारिक प्रतिनिधि अंबिका सोनी ने कहा कि
 
प्रशांत दुबे
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अब सपने बिकने लगे हैं

साथियों कुछ दिनों से कोई भी पोस्ट नहीं डाल पाया आज अचानक एक पुरानी कविता मिली , उसमें थोड़ा सा बदलाव कर के प्रस्तुत कर रहा हूँ अब सपने बिकने लगे हैं वे सपने जो रोज सोते हुए आपके और मेरी नीदों मैं आते हैं , वे दरअसल मेरे और आपके सपने नहीं हैं सपने अब प
 
प्रशांत दुबे
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खामोश पानी .............!!!!!

साथियों, कल 5 दिसंबर को भोपाल में हम युवा संवाद के साथियों ने पीपुल्स रिसर्च सोसाईटी के साथ मिलकर पाकिस्तानी निर्देशक सबीना सुमर की फिल्म ''खामोश पानी'' का प्रदर्शन किया। फिल्म देखकर जो भाव मन में आये वो लिख रहा हूं। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
 
प्रशांत दुबे
Dec 29 2009 11:50 AM
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काश वो कुहरा ही होता .......................... (गैस त्रासदी की बरसी पर विशेष)

वो भ्रम ही तो था उस धुंध को चंद तो कुहरा ही समझ बैठे थे पर वह कुहरा नहीं था वह तो जिन्दगी और मौत के बीच की धुंध थी काश वो कुहरा ही होता ..............!! आज तक बहता है आंखों से पानी मोमबत्ती की रोशनी भी नहीं पी पाती हैं, ये आंखें शोपीस से पैदा होते है
 
प्रशांत दुबे
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आतंकवाद के बहाने

विगत दिनों मुंबई में तीन दिन तक आतंकवाद का खुला खेल चला। 184 निर्दोषों की मौत हुई। कुछ जवान शहीद हुये। शहीदों की शहादत को सलाम। निहत्थे जनसामान्य की शहादत को सलाम। बड़ा सलाम उसे जो अब भी दहषत के साये में जी रहा है, या फिर जीने की कोषिष कर रहा है। इस घ
 
प्रशांत दुबे
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रोटी तेरे रुप

रोटी गोल है , कि अनमोल है , कि बेमोल है ! यह सवाल बेतुका जरुर है , पर है खतरनाक और इसे सिध्द करना और भी ज्यादा मुश्किल रोटी गोल है यहां आकार मायने नहीं रखता है कि रोटी गोल है चंदा मामा की तरह कि थोड़ी वक्राकार या फिर त्रिभुजाकार कुछ नौसिखिये नहीं बना
 
प्रशांत दुबे
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दलितों पर अत्याचार : सिलसिला जारी है

तमाम कानूनों और समझाइश के बावजूद दलित समाज पर अत्याचारों का बदस्तूर जारी रहना भारतीय सामाजिक व्यवस्था की अंतहीन त्रासदी बन चुकी है। एक ओर सरकारें दलित समुदाय के ' उध्दार ' के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाते नहीं थकतीं वहीं दूसरी ओर प्रशासन तंत्र दलितों प
 
प्रशांत दुबे
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काश वो कुहरा ही होता ..............!!

साथियों यह कविता मैंने विगत वर्ष लिखी थी लेकिन आज गैस काण्ड की २५ वी बरसी पर आपके बीच मैं रख रहा हूँ | वो भ्रम ही तो था उस धुंध को चंद तो कुहरा ही समझ बैठे थे पर वह कुहरा नहीं था वह तो जिन्दगी और मौत के बीच की धुंध थी काश वो कुहरा ही होता ...........
 
प्रशांत दुबे
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पैसिंजर ट्रेन - बहिष्कार का नया प्रपंच

यात्री गाडी (पैसिंजर) पर छ:-सात वर्ष बाद सवार हुआ। लगभग फांके के दिनो में इससे आया-जाया करता था। लेकिन एक बात तो दावे से कह सकता हूं कि निश्चित रूप से यदि किसी को सही रूप में भारत का दर्शन करना है तो उसे यात्री गाड़ी (पैसिंजर से) में सफर जरूर करना ही
 
प्रशांत दुबे
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करतार के श्रंगार का उपहार पचमढ़ी

साथियों मेरे पिताजी श्री पी डी दुबे ने बहुत पहले पचमढ़ी की खूबसूरती पर एक कविता लिखी थी | अभी एक दिन उन्होंने पढवाई तो आप सबके सामने लाया | मेरे पिताजी नौकरशाह रहे हैं लेकिन लिखते भी रहे हैं | मेरे पिताजी की नजर से आप देखें पचमढ़ी | आजकल शोभापुर मेरे
 
प्रशांत दुबे
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आओ जलाएं एक प्रेम दीप

आज कार्तिक अमावस है तो चाँद तो नहीं निकलेगा ! लेकिन हम सब प्रेम, उल्लास, उत्साह और सहयोग के दीप जलाकर इस अँधेरे को हर सकते हैं | जरुरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकते हैं | तो आओ जलाएं एक प्रेम दीप | शुभ और सुरक्षित दीपावली |
 
प्रशांत दुबे
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मीडिया का गरबा रास

साथियों विगत दिनों नवरात्र में एक मित्र का फ़ोन आया यार पास है क्या ? इससे पहले की में उससे ये पूछता की किस बात का उसने दूसरा सवाल दागा कि किसी का भी दिला दे यार ! बच्चे पीछे पड़े हैं सब तो ले-लेकर बैठे हैं अब माजरा मेरे समझ में आने लगा था, लेकिन आप स
 
प्रशांत दुबे
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गांवों में पसरती संवाद शून्‍यता और मोबाईल फोन का बढ्ता जाल

विगत दिनों अपने गांव गया। गांव म-प्र। के होशंगाबाद जिले में शोभापुर नाम का है। दोपहर में खाना खाने के बाद गिमडे गया । ढ़ोर चर रहे थे। श्याम ढ़ोर नहीं चरा रहा था, बल्कि पेड़ के नीचे बैठा था। ढ़ोर अपने मन से चरे जा रहे थे । बड़े खुश लग रहे थे। श्याम भी बड़ा खुश
 
प्रशांत दुबे
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छात्र कब तक गैर - राजनीतिक रहेंगे ?

साथियों युवा संवाद के हमारे जुझारू साथी प्रदीप सिंह ने एक आलेख लिखा है , उसे यहाँ पर प्रकाशित कर रहा हूँ उनसे ९४०६५४३८०८ पर संपर्क किया जा सकता है आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है घर से सीधे स्कूल-कॉलेज जाओ, वहां से सीधे घर आओ। अपने कैरियर पर ध्यानदो।
 
प्रशांत दुबे
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क्या-क्या ना बंटा यहाँ .....................

साथियों 30 जनवरी 2007 को एक कविता लिखी थी , आज दराज साफ करते समय डायरी में मिली। आप तक पहुचा रहा हूं। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। क्या ना बंटा यहाँ। क्या क्या ना लुटा यहाँ॥ सब कुछ तो बंटा यहाँ। सब कुछ तो लुटा यहाँ॥ अबके दीवार पर धूप भी बैठकर चली
 
प्रशांत दुबे
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टुन-टुन

साथियों याद करिए अपने अपने गाँव मैं फरबुरी का महिना, जब आता था टुन-टुन बजाते कुल्फी वाला फरवरी माह के आते-आते पत्ते झड़ने शुरू हो जाते थे पेड़ों से ऐसे में दोपहर में आता था टुन-टुन घंटी बजाते कुल्फी वाला ये होती थी सेक्रीन वाली कुल्फी सब कहते थे कि नमक
 
प्रशांत दुबे
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देखो देखो देखो देखो, उजड़ चले गाँव रे ।पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे॥

साथियों विगत दिनों मेधा बहन के यहाँ घाटी मैं जाने का मौका मिला घटी की स्तिथि पर कुछ लिखने की कोशिश की है आपकी टिप्पणियों का स्वागत है देखो देखो देखो देखो, उजड़ चले गाँव रे । पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे॥ हम माझी बन खेते रहे, समय की धार को । जाने
 
प्रशांत दुबे
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पानी का मुद्दा हाथ से निकला नहीं है

जल प्रबंधन विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह से बातचीत लोग उन्हें ‘पानी वाले बाबा ’ के नाम से जानते हैं. राजस्थान के जो इलाके सरकारी फाइलों में डार्क जोन घोषित थे, वहां 80 के दशक में पानी को लेकर राजेंद्र सिंह ने काम करना शुरु किया- अकेले. फिर गांव के लोग जुड़न
 
प्रशांत दुबे
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आ अब लौट चलें

आ अब लौट चलें आंध्रप्रदेश के शरनापल्ली के 12 साल के राजू पद्मशाला को इसके अलावा कोई रास्ता नहीं सुझा. आखिर कोई कब तक हर रोज मार खाता रहे. मां ने किसी और के साथ घर बसा लिया था और पिता के लिए दारु पीना दुनिया का सबसे बड़ा सुख था. पिता दारु पी कर आते और
 
प्रशांत दुबे
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''मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा''

यह कविता मैंने वर्ष 2001 में मध्यप्रदेश सरकार के लिये किये जा रहे ''गरीबी का आकलन'' के दौरान हुये अनुभवों के आधार पर लिखी थी। मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा मैंने गरीबी को कभी महसूस भी नहीं किया मैं गरीबी की परिभाषा से भी अनजान हूँ पर देखा है कुछ न
 
प्रशांत दुबे