जोशी कविराय  - Joshi Kavirai's Image

जोशी कविराय - Joshi Kavirai

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31 Mar 2010
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योअर नेम इज नोट खान

1.(राहुल गांधी बिना पूर्व सूचना के मुम्बई की लोकल ट्रेन में घूमे- ५-२-२०१०)आप घूमते ट्रेन में मुम्बई में बिंदास ।मगर पंडितों को नहीं घर जाने की आस ।घर जाने की आस, खायँ दिल्ली में धक्के ।जन्म भूमि के ख्वाब देखते हक्के-बक्के ।कह जोशी कविराय - 'देश सबका' तब
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स्वामी और हम

दिल्ली और कर्नाटक में स्वामियों के कर्म उजागर- ५-३-२०१०1. स्वामी और हमस्वर्ण-महल रावण रहें, बन-बन भटकें राम ।छः दशकों के राज का हासिल यह परिणाम ।हासिल यह परिणाम , सेक्स में डूबे स्वामी ।झूठ-मूठ ही हम गाते- 'मूरख, खल, कामी' ।कह जोशी कविराय समेटें अपना
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सीमा-सुरक्षा

1. सीमा-सुरक्षा(पिछले दो दशकों में चीन ने भारत की बहुत सी ज़मीन हथियाई- एक रिपोर्ट, ११-१-२०१०)पंद्रह फुट का शेड है, छः फुट की दूकान ।तिस पर सड़कों पर रखा लाला का सामान ।लाला का सामान, जहाँ पर भी ये जाएँ ।धड़ से चार गुनी अपनी टाँगें फैलाएँ ।जोशी चीनी सीमा
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बातें सभी पुरानी हैं

बातें सभी पुरानी हैं ।राजा है या रानी है ।ऊपर से जो ठहरी दीखे झील वही तूफ़ानी है ।अपनी कहकर जिसको गायातेरी राम कहानी है ।कैसे देखें तेरा चेहराआँखें पानी-पानी हैं ।उजली दाढ़ी , लंबे चोगेकरतूतें शैतानी हैं ।२६-११-२००९पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक
Feb 25 2010 10:36 AM
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दिन बीता और शाम हो गई

दिन बीता और शाम हो गई ।आफ़त एक तमाम हो गई ।मै'अ कुछ यूँ दी उसने हमकोपीनी हमें हराम हो गई ।जो ख़ुद से भी नहीं कही थीवे सब बातें आम हो गई ।घोड़ा जितना ज़्यादा दौड़ाउतनी सख्त लगाम हो गई ।'मुक्त' हुआ व्यापार इस कदरसारी सोच गुलाम हो गई ।जो भी दुःख-दंडकवन
Feb 24 2010 10:32 AM
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गर आप हमारे हो जाते

'गर आप हमारे हो जाते ।तो लाख सहारे हो जाते ।अँधियारे में रहने वालेजगमग घर-द्वारे हो जाते ।उत्तर तुम दे देते तोहम एक किनारे हो जाते ।खींचातानी मिट जातीसब वारे-न्यारे हो जाते ।अनदेखे रहने वाले हमआँखों के तारे हो जाते ।८-१२-२००९पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए
Feb 23 2010 10:20 AM
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प्याज सुमिरन - कुण्डलियाँ

छः दशकों की उपलब्धिछः दशकों में हो गया सारा राज सुराज ।घुसी तेल में ड्राप्सी, दुर्लभ आलू-प्याज ।दुर्लभ आलू-प्याज, दूध पानी से सस्ता ।पतली होती कभी तो कभी हालत खस्ता ।कह जोशीकविराय देखना नई सदी में ।मछली बचे न एक ग्राह ही ग्राह नदी में ।भले ही अणुबम
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कुछ मत पूछो - कुण्डलियाँ

कुछ मत पूछोआटा अम्बर में गया, दालें गई पताल ।अपनी मानुस जूण का कुछ मत पूछो हाल ।कुछ मत पूछो हाल, दिहाड़ी सारी खर्चे ।फिर भी पूरा पेट नहीं भर पाते बच्चे ।कह जोशीकविरय खाल सारी खिंच जाए ।पर चूहे के चाम नगाड़ा ना बन पाये । ५-१२-२००९नंगी का स्नानहोटल में
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Dec 31 2009 09:43 AM
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आपके बाप का है वतन, सेठजी

आपके बाप का है वतन, सेठजी । लूटो जितना तुम्हारा हो मन, सेठजी । लोग भूखे रहें, कोई मुद्दा नहीं कर ही लेंगे ये सब कुछ सहन, सेठजी । कोई मूरत लगे या बने मकबरा खर्च हम को ही करना वहन, सेठजी । घास हमको न डाले कोई पंच भी आपके साथ सारा सदन, सेठजी । हमको दो ग
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चट्टानों से छन कर निकले

चट्टानों से छन कर निकले । तो जल गंगा बनकर निकले । जो थोड़ा सर ख़म कर निकले वे दो अंगुल बढ़कर निकले । तलवारें तिरसूल गलें तो फिर कोई हल ढलकर निकले । कर्मों पर विश्वास नहीं था सो ज्यादा बन-ठन कर निकले । जो जितने ज्यादा ओछे थे वे उतना ही तनकर के निकले । व
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दस्ताने

जब दस्तानों से ही हाथ मिलाना है । तो फिर क्यों चलकर उनके घर जाना है ॥ अपनी आँखे बिछी रहेंगी रस्ते पर वे अपनी जानें- आना, ना आना है ॥ कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥ हमको सबका नशा अधूरा लगता है सबने, सबको अलग-अलग प
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मुल्क फँसा है मझधारों में

गद्दी पर असवार* हो गए । जनता से सरकार हो गए ॥
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मरते हैं जी जाने में

पैसे चार कमाने में । मरते हैं जी जाने में ॥ कितना ऊँचा काम कर गए । इस चालाक ज़माने में ॥ हमने सारी उमर बिता दी उनका दिल बहलाने में ॥ फिर भी जगह मिली चौखट पर उनके दौलतखाने में ॥ बैठक में मीठी लफ़्फ़ाजी सत्य कहीं तहखाने में ॥ भीड़-भाड़ में क्या बतलाएँ कभ
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चार फूल औ शूल हज़ार

ऊँचे लोगों से व्यवहार । किन ख़्वाबों में हो तुम यार ॥ ये रस्ते आसान नहीं हैं चार फूल औ शूल हज़ार ॥ गर्दन, आँखे, कमर झुक गए जो भी हो आया दरबार ॥ बाट अलग लेने -देने के तुमसे कैसे हो व्यापार ॥ अब जाओ, कल बात करेंगे तुम पर कोई और सवार ॥ ११ सितम्बर २००५ पो
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तन्हा नेक इरादे तुम

कितने सीधे-सादे तुम । बचपन के से वादे तुम ॥ लफ़्फ़ाजों की महफ़िल में तन्हा नेक इरादे तुम ॥ मेरी छोटी सी आमद है करते रोज़ तकादे तुम ॥ ठिठक गए बासंती झोंके पहने हुए लबादे तुम ॥ तृप्त भला कैसे हो लोगे प्यासा मुझे उठाके तुम ॥ मंजिल पर कैसे पहुँचोगे भारी गठर
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जिसमें तेरी लिखी कहानी

जिसमें तेरी लिखी कहानी । वही ग़ज़ल ना हुई पुरानी ॥ जितना इस दुनिया को जाना उससे ज्यादा रही अजानी ॥ जीवन में दो ही चीजें थीं बड़ी प्यास, थोड़ा सा पानी ॥ जितना तेरे साथ रहा मैं बस उतना ही था बामानी * ॥ पहले सबके मन को समझो फिर चाहे करना मनमानी ॥ २० अगस्त २
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उसकी बात

आओ उसकी बात करें । दिन सी उजली रात करें ॥ हमसे तुमसे ही दुनिया हमीं सुने औ' हमीं कहें ॥ जो सब की आँखों का हो ऐसा कोई ख्वाब बुनें ॥ एक आशियाना ऐसा हो जिसमें सारा जग रह ले ॥ थोड़ी सी तो उमर बची जल्दी से कहलें, सुनलें ॥ ९ जुलाई २००५ पोस्ट पसंद आई तो मित्
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मुश्किल

बिना बुलाए जाना मुश्किल । बिना गए रह पाना मुश्किल ॥ दुनिया को बहलाना आसाँ पर ख़ुद को समझाना मुश्किल ॥ बिन बोले सब बात समझते उनसे कोई बहाना मुश्किल ॥ उनको दर्द बताना मुश्किल औ' चुप भी रह पाना मुश्किल ॥ सबसे आँख चुरालें लेकिन ख़ुद से आँख मिलाना मुश्किल
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रूहानी जलसे

तुम जिस को भी याद रहे । और किसे वह याद करे ॥ जिसको याद नहीं हो तुम कौन उसे फिर याद करे ॥ माइक, मंच, मंत्रियों बिन सूने रूहानी जलसे ॥ गूंगे, बहरों की महफ़िल कौन सुने औ' कौन कहे ॥ साठ बरस से देख रहे फिर भी पूछ रहे हमसे ॥ दो बीते, बाक़ी दो दिन जैसे वो, ये
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हलचल है भूचालों में

जब से तेरे ख्यालों में । घेरें लोग सवालों में ॥ तिनके चार क्या रखे हमने हलचल है भूचालों में ॥ अंधियारे में घबराता वो सहमे तेज उजालों में ॥ एक झोंपडी पर कब्जे को झगड़ा महलों वालों में ॥ सहमा-सहमा घर का मालिक जब से है रखवालों में ॥ दिल में दुनियादारी रख
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सरमाया

वो मेरे घर आया है । बहुत बड़ा सरमाया है ॥ मैनें कोई बात न पूछी वो फिर क्यों शरमाया है ॥ मौसम बीत गया तो क्या, वो अपना मौसम लाया है ॥ सूखा फूल किताबों से उठ आँखों में मुस्काया है ॥ कल को सच हो जायेगा आज जो सपना आया है ॥ २ अप्रेल २००५ पोस्ट पसंद आई तो म
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अन्दर-बाहर

जैसे दिखते बाहर-बाहर । क्या तुम वैसे ही हो अन्दर ॥ सर ढँक लें तो पैर उघड़ते छोटी पड़ी सदा ही चादर ॥ उनका घर उस पार क्षितिज के और बहुत छोटे अपने पर ॥ बहुत दूर आ गए नीड़ से अब तो बस अम्बर ही अम्बर ॥ उनकी किस छवि को सच मानें मुख में राम बगल में खंज़र ॥ सार
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चदरिया

हम उनको समझाने निकले । मतलब धोखा खाने निकले ॥ नाम बताएँ हम किस-किस का । सब जाने पहचाने निकले ॥ जिन्हें हकीक़त समझा हमने । वो केवल अफ़साने निकले ॥ जिनमें खोये रहे उमर भर । वो सब ख़्वाब पुराने निकले ॥ सब बच निकले पतली गलियों । एक हमीं टकराने निकले ॥ चार
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मेरा डर

उनका प्यार तसव्वुर निकला । कितना सच मेरा डर निकला ॥ किया जहाँ भी रैन बसेरा । बटमारों का ही घर निकला ॥ सबको साया देने वाला । आँचल आँसू से तर निकला ॥ सभी संगसारों की ज़द में केवल मेरा ही सर निकला ॥ उनका ख़त बिन पढ़ा रह गया सारा तंत्र निरक्षर निकला ॥ जीव
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जोशी कविराय - Joshi Kavirai

लूट-मार, चोरी-डाका कुछ हुआ नहीं । फिर भी मेरे घर में कुछ भी बचा नहीं ॥ अपने दुःख की चीख-पुकारें करते सब किंतु पराया दर्द किसीने सुना नहीं ॥ फलवाली शाखाएं झुक-झुक जाती हैं बिन फलवाला पेड़ ज़रा भी झुका नहीं ॥ उन आमों में मीठा रस कैसे होगा कभी जिन्होंने
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लोकतंत्र का सर्कस - जय हो

डेमोक्रेसी वाले नीले आसमानों के तले नेता और लाला जी बस दो ही तो फले । जय हो । सावन में बाढ़ आए या पड़े सूखा हर हालत जनसेवक तो कमाई करे । जय हो । फूट डालें जात, धर्म, प्रान्त के लिए राष्ट्रीय एकता की बातें पर करें । जय हो । हमला हो, बाढ़, सूखा, बेकारी
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लोकतंत्र का सर्कस - भोजन का अधिकार

१) मुहब्बत जिंदाबाद (मटुकनाथ ने 'भारतीय मुहब्बत पार्टी' बनायी) अगर मुहब्बत पार्टी सत्ता में आ जाय । प्रेमी जन को कोई भी सके न आँख दिखाय ॥ सके न आँख दिखाय, प्रेम में टाँग अड़ाए । पुलिस पकड़ ले जाय, जेल की रोटी खाए ॥ जोशी संसद में न समय बर्बाद करेंगें ।
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नैनो कार - घर की शोभा

रोटी, पानी, नौकरी ना कुछ भी दरकार । लो बाज़ार में आ गई सबसे सस्ती कार ॥ सबसे सस्ती कर, नाम है इसका 'नैनो' । तुरत कराओ बुकिंग भाइयो, प्यारी बहनो ॥ कह जोशी कविराय सड़क पर जगह न मिलती । खड़ी रहे घर पर तो भी शोभा बढ़ती ॥ २४ मार्च २००९ पोस्ट पसंद आई तो मित्र
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लोकतंत्र का सर्कस - पेट सभी का पापी

१) पापी पेट होंगें कहीं विदेश में आइ.पी.एल के मैच । वे मारे छक्के वहाँ, यहाँ करें हम कैच ॥ यहाँ करें हम कैच, मची है आपाधापी । बन्दर और मदारी पेट सभी का पापी ॥ जोशी कहते लोग-क्रिकेट की साख डुबो दी । 'पहले धंधा, देश बाद में ' कहते मोदी ॥ (२) धर्म रक्षा
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लोकतंत्र का सर्कस - लोकतंत्र की हो रही सोलह दूनी आठ

१) एक नूर से इक दूजे की उलटते सभी यहाँ पर खाट । लोकतंत्र की हो रही सोलह दूनी आठ ॥ सोलह दूनी आठ, न अल्ला, राघव, माधव । ब्रह्मण, बनिया, जात, दलित, मुस्लिम या यादव ॥ कह जोशी कविराय बने सब एक नूर से । ऐसी बातें केवल मुँह से, दूर-दूर से ॥ (२) इलाहबाद में
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लोकतंत्र का सर्कस - ३ सोता आधे पेट पर गंगू तेली रोज

परसादी लाल मीणा ने पोते के मुंडन पर २०-२५ हज़ार लोगों को भोज में बुलाया) राजनीति में चल रहे तरह-तरह के भोज । सोता आधे पेट पर गंगू तेली रोज ॥ गंगू तेली रोज, अगर आटा मिल जाए । तो है महँगी दाल कहाँ से जुगत भिड़ाए ॥ कह जोशी कविराय इ कैसी उलझन लादी । देना
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जोशी कविराय - Joshi Kavirai

१) वे जो करें बिहार में झारखण्ड में आप । राजनीति में भोगते सभी यही संताप ॥ सभी यही संताप, राज के खेल निराले । यहाँ नहीं होते कोई भी भोले-भाले ॥ कह जोशीकविराय उन्हें बस कुर्सी दीखे । वो हैं लोमड़-बाघ, और हम भेड़ सरीखे ॥ (२) कांग्रेस में मची है अद्भुत
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लोकतंत्र का सर्कस - १

१) अपना मानेंगें किसे, किसका हो विश्वास । छोड़ सोनिया को भगे, लालू, रामविलास ॥ लालू रामविलास, जिधर जब घास दिखेगी । मौसेरे भाइयों की जोड़ी वहीं मिलेगी ॥ कह जोशी कविराय लोग, दल आते-जाते । नहीं किसी का कोई सब मतलब के नाते ॥ (२) वरुण फँस गए झाड़कर भड़काऊ स
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सुख-सागर

सुखराम जी को सज़ा सुनादी गई है । उनके घोटाला उद्घाटन-काल की कुछ कुण्डलियाँ पुनरावलोकन के लिए प्रस्तुत हैं । सुखराम के घर सी.बी.आई. के छापे; तीन करोड़ नक़द मिले, एक समाचार-१६-८-९६ लन्दन में सुखराम जी करवा रहे इलाज़ । घर में घुस कर खोलती सी.बी.आई. राज़
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लाला का डी.ए.

छः प्रतिशत डी.ए. की घोषणा) छः प्रतिशत डी.ए.बढ़ा, धन्यवाद श्रीमान । दस प्रतिशत दुर्लभ हुई, राशन की दूकान । राशन की दूकान, वस्तुएं आगे-आगे । पीछे-पीछे हम औ' डी.ए.भागे-भागे । जोशी हमें बनाना उल्लू छोड़ दीजिये । डी.ए. लाला के खाते में जोड़ दीजिये । २७-२-२
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मुँह पर पट्टी

राजस्थान विधान सभा में भाजपा सदस्यों ने मुँह पर पट्टी बाँध कर विरोध प्रदर्शन किया २६-२-२००९) हम तो बांधें पेट पर, मुँह पर पट्टी आप । जनता नेता भोगते, अपने-अपने पाप । अपने-अपने पाप, आपने हमें धुन दिया । औ' हम इतने मूर्ख कि, आपको पुनः चुन लिया । कह जोश
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पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें) (c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi ----- (c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी |
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सांभर वाली झील

एड़ी नीचे कील, फील गुड । दे पतंग को ढील, फील गुड ॥ तेरे खातिर रात पूष की बड़ा ले गयी चील, फील गुड । राणाजी के ट्रस्ट खुल गए धक्के खाएँ भील, फील गुड । दिखने में ज़्यादा दिखती पर तौलें हलकी खील, फील गुड । राजनीति में कहाँ मधुरता सांभर वाली झील, फील गुड ।
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जनता तो रस्ते का बूँटा

राम नाम की लूट, फील गुड । लूट सके तो लूट, फील गुड ॥ हमें रिटायर करें साठ पर नेतागिरी अटूट, फीलगुड । मुसलमान, अँगरेज़ थक गए अपने डालें फूट, फील गुड । क्या पढ़ना ऎसी चिट्ठी को फटी हुई है कूंट, फील गुड । जनता तो रस्ते का बूँटा जितना चाहे चूँट, फील गुड ।
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मचलता पारा हुआ है आदमी

वक्त का मारा हुआ है आदमी । तंत्र से हारा हुआ है आदमी । बस चुनावों के समय उनके लिए काम का नारा हुआ है आदमी । वोट दें, ना दें, चुने जायेंगे वो क्यूँ यूँ बेचारा हुआ है आदमी । कब से घर सर पर उठाये फिर रहा एक बंजारा हुआ है आदमी । क़ैद मुट्ठी में नहीं कर पा