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17 Jun 2010
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मुक्तक 39

यदि हम सच्चे मन से देखें तो बहू और बेटी में कोईअंतर नहीं है.जो बेटी है वह दूसरे घर की बहू है और जो बहू है वह अपनी माँ की बेटी भी है. यदि हम इससत्य को जान लें तो बहू-बेटी के बीच का अंतर ही मिटजाएगा.जो बहू-बेटी में अंतर नहीं करते हैं और बहू को बेटी समझते
 
डा.मीना अग्रवाल
टैग: बेटी
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मुक्तक 38

संबंधों की खुशबू अपनेपन से ही आती है.नर-नारी के संबंध विश्वास पर ही टिके हुए हैं.विश्वास होगा तो एक-दूसरे की रक्षा-सुरक्षा भी कर पाएँगे.प्रेम मेंशिकवे-शिकायत तो होती ही रहती है.आज ज़्ररूरत है एक-दूसरे को समझने की--विचारों का गगन,नयनों की आशा क्यों नहीं
 
डा.मीना अग्रवाल
Jun 07 2010 07:16 PM
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मुक्तक 37

घर में बिटिया का जन्म एक उत्सव बन जाता है.जब माँ अपने बच्चे को पहली बार अपनी गोद में उठाती है तो उसे लगता है कि मानो सारा संसार ही उसकी बाँहों में सिमटकर आ गया हो.देखिए माँ की इसी भावना को----अभी चहका ही था आँचल में मेरे इक नया जीवन बहारों का जो मौसम जा
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 2

उल्लास को आधार न दे तो कहनाबदले में पुरस्कार न दे तो कहनातुम धूप से पौधे को बचाओ, सींचोतब फूल यह महकार न दे तो कहना संकल्प की नाव को वापस नहीं मोड़ा करतेकाम कोई हो, अधूरा नहीं छोड़ा करतेदूर हो लक्ष्य तो करते नहीं मन को छोटारास्ते में कभी हिम्मत नहीं तोड़ा
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 4

बच्चे के बिना जैसे हो आँगन सूनाआए न घटा फिरके तो सावन सूनाउम्मीद के पंछी से है मन में रौनकआशा जो नहीं हो तो है जीवन सूनाचुक जाएगी इक रोज़ यह दौलत तेरीरह जाएगी बाक़ी न ये ताक़त तेरीभगवान से लेनी है तो हिम्मत ले लेकुछ साथ अगर होगी तो हिम्मत तेरीदरियाओं में
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 8

पहेली हूँ मुझे सुलझा के देखोनजदीक से अब आ के देखोसमर्पण में मुझे सीता के पाओ मुझे हर रूप में दुर्गा के देखो मुझे इसका गिला कब तक रहेगा कोई किस दिन मुझे चिट्ठी लिखेगा जो सुख था प्यार की उन चिट्ठियों में मज़ा वो दूर-भाषी सुख न देगा चिराग़ों की चमक खोने लगी
 
डा.मीना अग्रवाल
Mar 16 2010 05:24 PM
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मुक्तक 9

वो इक धान की पौध थी नन्ही मुन्नीजिसे बेटी कहकर पुकारा था मैंनेउसे और ही खेत में रोप आईजिसे अंकुरित कर दुलारा था मैंनेविदाई भी राहत-सी लगने लगी हैसमय की ज़रूरत-सी लगने लगी हैयुवा होते-होते यह बाँहों की बच्चीकिसी की अमानत-सी लगने लगी हैख़ज़ाने खनकते हुए
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 10

बहन हो कि बेटी, बहू हो कि माताये रिश्ते हमीं से जनम ले रहे हैंजो बन्धन निरर्थक-से लगने लगे हैंहम उनकी अभी तक क़सम ले रहे हैंन पूछो कि नारी को क्या-क्या न आयाविरह में समय का बिताना न आयाअभी सिर्फ़ पहला पहर रात का हैबढ़ी माँ की चिंता कि बेटा न आयामैं नारी
 
डा.मीना अग्रवाल
Mar 12 2010 04:46 PM
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मुक्तक 36

ये खेत हमने दिए, क्यारियाँ हमीं ने दींज़मीं की गोद को फुलवारियाँ हमीं ने दींउदास-उदास-सी चुप से भरा हुआ था घरतुम्हारे सुनने को किलकारियाँ हमीं ने दीं !विरह का तीर तुम्हारी कमान छोड़ गई बिलखती-चीख़ती विरहन की जान छोड़ गईज़रा-सा ध्यान जो भटका तो मौलकर
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 35

समय के हाथ में जीवन का आसरा हम हैंकला की जान हैं, कविता की आत्मा हम हैंइक एक रूप के पीछे हमारे रूप अनेकपरी हैं, देवी हैं, नारी हैं, अप्सरा हम हैं !किसी को हाल जो भीतर का है पता न चलेकिसी को दर्द के एहसास की हवा न लगेदुखों को सहने का ढब जानती हैं
 
डा.मीना अग्रवाल
Mar 03 2010 02:57 PM
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मुक्तक ३४

दया पे जीना किसी की मुझे गवारा नहींमैं अपने आपमें पर्वत हूँ, जल की धारा नहींअकेली होके भी दुर्बल नहीं रही हूँ मैंतुम्हारा साथ मुझे चाहिए, सहारा नहीं !अलकों से अगर छाए अँधेरे तो क्यानयनों से जो फूटे सवेरे तो क्यासंसार को कुछ प्रेम का रंग भी तो दे देंचुनरी
 
डा.मीना अग्रवाल
Feb 26 2010 09:59 PM
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मुक्तक 33

वह अपनी आँखों में उमड़ी घटाएँ भेजती हैवह अपने प्यार की ठंडी हवाएँ भेजती हैकभी तो ध्यान के हाथों,कभी पवन के साथवह माँ है, बेटे को शुभकामनाएँ भेजती है ।वे भोली-भाली-सी शक्लें भी साथ रहती हैंसुनी सुनाई-सी बातें भी साथ रहती हैंअकेले आए थे परदेस में, मगर यह
 
डा.मीना अग्रवाल
Feb 12 2010 02:46 PM
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मुक्तक 18

शांत होती हुई-सी प्यास मिली रुत बहारों की आस-पास मिली मिट गया ज़िंदगी का कड़वापन उसकी बातों में वह मिठास मिली ज़िंदगी से मुझे मुहब्बत है चाहे जाने में मुझको राहत है तुम ज़रूरत को प्यार कहते हो प्यार लेकिन मेरी ज़रूरत है रीत भी है, चलन भी है इसमें शुद्ध मन
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 17

यों तो गिनती में मेरे बेटे को मुझसे बिछुड़े ये तीसरा दिन है मैं जो माँ हूँ तो ऐसा लगता है जैसे हर दिन पहाड़-सा दिन है सर से आँचल ढलक गया है मेरा माँ अगर देखती तो क्या कहती खा के मुझसे न बोलने की क़सम रूठ जाती, बुरा-भला कहती भाइयों ने भुला दिया है मुझे ?
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 16

बिन काम किए हाथ न अपना पोंछें बेकार न रूमाल से चेहरा पोंछें है बीच में विराम महापाप हमें हम काम से निपटें तो पसीना पोंछें जग को सँवारने की शपथ ले रही हैं हम नौका तुम्हारी ज्वार में भी खे रही हैं हम एहसान क्या चुकाओगे, हम नारियों का तुम सेना को वीर, र
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 15

पारा मुहब्बतों का उतरने नहीं दिया यादों के कारवाँ को गुज़रने नहीं दिया घर-घर के बीच बुनती रहीं चाहतों के जाल नारी ने यह समाज बिखरने नहीं दिया जीने के रंग-ढंग बताता नहीं कोई बाहर से चेतना को जगाता नहीं कोई वे खुद ही सीख लेती हैं पढ़ना निगाह का यह ज्ञान
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 14

अगर धड़कन हो दिल में दिल कभी पत्थर नहीं होता हमारे दम से घर-आँगन कभी बंजर नहीं होता हमें बचपन सिखाता है घरौंदे कैसे बनते हैं अगर नारी नहीं होती तो बहनो , घर नहीं होता सिर अपना धुन रहे थे , पता ही नहीं चला कुछ स्वप्न बुन रहे थे , पता ही नहीं चला एकांत
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 13

चाहत बहन को कैसी यह भाई के साथ है कैसा लगाव सारी हवेली के साथ है बेटी नहीं है घर में तो रौनक कहाँ से हो आँगन की जो बहार है बेटी के साथ है चौखट पे जो दिया है, वो नारी की देन है जो फूल खिल रहा है, वो नारी की देन है नारी ने बचपने में घरौंदे बनाए हैं घर
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 12

नीदों में आके नित नए सपने दिखाएगा इस रात वो न आएगा, सपना तो आएगा पहले की तरह अब नहीं आती हैं हिचकियाँ वो मुझको याद करके समय क्यों गँवाएगा गुज़री थी बचपने में जहाँ खेलते हुए वर्षों रही है मन में उसी रास्ते की याद अब मैं हूँ और साथ ही दो कश्तियों में पा
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 11

गहनता को कब मेरी पाया है किसने मेरे सच को दरपन दिखाया है किसने मैं ' माँ ' हूँ मुझे कोई इतना बताए मेरे दूध का ऋण चुकाया है किसने ये आशाएँ मुझसे हैं, अरमान मुझसे जगत में है जीवन का वरदान मुझसे न होती तो उसको भी उपमा न मिलती गगन पर है चंदा की पहचान मुझ
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 32

तपन बढ़ी है तो तन-मन जला है अब के बरस शरद की रुत में भी सूरज तपा है अब के बरस चला गया है जो अश्कों को पोंछने वाला हमारी आँखों में सूखा पड़ा है अब के बरस वह अब तो शाम को घर लौटकर नहीं आता उसे मिली भी जो मंज़िल तो इतनी दूर मिली सुना है पार समुंदर, पराए दे
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 31

अजीब बात है पहले पहल की चाहत में तुम्हारे झूठ भी सच की तरह-से लगते थे मैं अब अकेले में यह सोच-सोच हँसती हूँ तुम्हारे पास लुभाने को कितने सपने थे मेरे ध्यान के एलबम में चित्र हैं तेरे बुझी नहीं है तेरी दीपिका जलाई हुई नयन से दूर है, मन के करीब लगती है
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 30

हमको दुनिया का अंदाज़ भाया नहीं पथ बदलना कभी हमको आया नहीं जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं कहते-सुनते ही नीरस कहानी हुई धुँधली-धुँधली-सी हर इक निशानी हुई लाख सोचा सुहागिन ने, समझी नहीं साल में क्यों ये संगत पुरानी हुई डॉ. म
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 29

अपनी पीड़ा कहें, यह चलन भी नहीं तुमसे मिलने का कोई जतन भी नहीं कैसी अलसाई बैठी हूँ अँगनाई में, तुम नहीं तो सँवरने का मन भी नहीं! हमने सपनों की दुनिया सजाए रखी शम्अ आँधी में हमने जलाए रखी सबके सिर से दुपट्टे सरकते रहे लाज आँचल की हमने बचाए रखी ! डॉ. मी
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 28

मैं कि हूँ उसके भीतर से परिचित बहुत जानती हूँ तो कहती हूँ विश्वास से उसकी आँखों में होगा कोई और भी जब वह जाएगा उठकर मेरे पास से ! क्या ये पहलू समर्पण न कहलाएगा क्या कोई इसका मतलब समझ पाएगा हम बनाएँगी औ' सोचती जाएँगी क्या यह पकवान उनको पसंद आएगा ! डॉ.
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 27

हमको अपने बराबर न तोला कभी यह पुराना तरीक़ा न बदला कभी दिल की धड़कन से गीतों की धुन फूटती पति शासक नहीं, मित्र बनता कभी अपने भेदों की गुत्थी न खोलेगे तुम बस अँधेरे में रस्ता टटोलोगे तुम घर में फिर लौटकर देर से आओगे जानती हूँ कि फिर झूठ बोलोगे तुम डॉ. म
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 26

हमको अपने बराबर न तोला कभी यह पुराना तरीक़ा न बदला कभी दिल की धड़कन से गीतों की धुन फूटती पति शासक नहीं, मित्र बनता कभी अपने भेदों की गुत्थी न खोलोगे तुम बस अँधेरे में रस्ता टटोलोगे तुम घर में फिर लौटकर देर से आओगे जानती हूँ कि फिर झूठ बोलेगे तुम डॉ. म
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 25

जाने नदिया यह सपनों की जम क्यों गई जाने मुसकान होठों पे थम क्यों गई जन्म बेटी का होना अशुभ क्यों हुआ किससे पूछूँ कि माता सहम क्यों गई ! ध्यान में है वो नादान लड़की अभी झूठे वादे जो मन से लगाए रही लौटकर फिर कभी जिसको आना न था उसके स्वागत में पलकें बिछा
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 24

सोच को दायरा कुछ नया और दे इस अँधेरे को मन का दिया और दे धन के लोभी से यह बात पूछे कोई दान दी जिसने बेटी वो क्या और दे ! बालिका धन पराया ही समझी गई जग मॆं सदियों से यह रीत देखी गई आँसुओं से उमंगें गले मिल गईं छोड़ बाबुल का घर जब भी बेटी गई डॉ. मीना अग
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 23

हम डगर अपनी छोडें, यह संभव नहीं आत्मा अपनी बदलें, यह संभव नहीं फ़ैशनों की नुमाइश में रहते हुए मूल से अपने बिछुड़ें यह संभव नहीं मेरे सपनों का आदर्श मानव है सोच यह मेरी बदले असंभव है मेरी पहचान दुनिया में सबसे अलग मैं हूँ भारत की नारी , मुझे गर्व है ताज़
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 22

जो चमक है सो है धन के अंबार की किसको चिंता है अब अपने उद्धार की लड़कियाँ किसलिए बोझ बनने लगीं क्यों ये दूल्हे हुए वस्तु बाज़ार की तुमसे कोमल यह रेशम की चादर नहीं तुमसे बढ़कर तो गहरा समंदर नहीं यों तो पत्नी भी, बेटी भी, बहनें भी हैं माँ से बढ़कर कोई रूप स
 
डा.मीना अग्रवाल
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पहचान

अंदर-अंदर टूटन अंतर में घुटन और मुख पर मुस्कान खुशियाँ लुटाना आदत-सी बन गई है उसकी इसी आशा में इसी प्रत्याशा में कि शायद वो एक दिन आएगा ज़रूर आएगा जो नारी को उसके अस्तित्व की पहचान कराएगा आदर दिलाएगा उसके अंतर की पीड़ा से तिलमिलाएगा समाज और तथाकथित समा
 
डा.मीना अग्रवाल
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मैं और तुम

मैं, मैं हूँ और तुम, तुम हो तुम्हारा मन बँधा है तुमसे और मेरा मन तो बँधा है सबसे तुम गुनगुनाते हो तो सुनती हूँ केवल मैं पर मेरी आवाज़ के घुँघरू जब बज उठते हैं अनायास उनकी रुनझुन सुनाई देती है दूर,बहुत दूर अंतर में मन पाता है सहारा और तन को मिलता है वि
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 21

सामने यों तो सारी दुनिया है जानती हूँ मैं कि कौन अपना है यों तो सब कुछ है मेरे पास मगर तुमसे माँगूँ तो सुख-सा मिलता है सोचती हूँ शरद के ये पंछी रुत गुज़रते ही लौट जाएँगे लाख आकर सजाएँगे झीलें देस अपने भुला न पाएँगे छत के ऊपर विमान गुज़रा है कल्पनाएँ नि
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 20

आस के गुल खिलाए रखते हैं चित्र मन में सजाए रखते हैं अपनी बस्ती से दूर जाकर भी लोग रिश्ते बनाए रखते हैं गाँव मेरे बिना बसा ही नहीं प्यार मुझसे अलग हुआ ही नहीं मुझको कहते हैं घर की लक्ष्मी बिन मेरे घर की कल्पना ही नहीं तेज कितना छिपा है यौवन में दीप-से
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुक्तक 19

सबकी सीमाएँ अपनी-अपनी हैं फूल की जड़ में शूल होता है प्रेम भी तो बगैर धर्म नहीं जंग का भी उसूल होता है मैं हूँ नारी तो देखिए मुझको ओस छिड़के हुए गुलाब मिले चाहे मुस्कान हो कि आँसू हों जब मिले मुझको बेहिसाब मिले दूर पश्चिम में तुम जहाँ भी हो दिल की धड़कन
 
डा.मीना अग्रवाल
Dec 29 2009 11:51 AM
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नववर्ष मंगलमय हो

नववर्ष की अनंत शुभकामनाएँ नए वर्ष की नई दिशा हो नई कामना, नई आस हो नई भावना, नई सोच हो नई सुबह की नई प्यास हो नई धूप हो, नई चाँदनी नई सदी का नव विकास हो नया प्रेम औ' नया राग हो हर सुख अपने आसपास हो नई रौशनी, नई डगर हो नया खून औ' नई श्वास हो नया रूप औ
 
डा.मीना अग्रवाल
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मुक्तक 7

ये नन्ही लड़कियाँ भी क्या अजब हैंउमीदों का नगर बसने लगा हैसँभाला है अभी तो होश, लेकिन अभी से मन में घर बसने लगा हैवो पर्दे पर जगह पाएगा शायद झलक अपनी दिखा जाएगा शायदवो इस इच्छा से टी.वी. देखती हैनज़र वो भीड़ में आएगा शायदउसे त्योहार की तो याद होगीयही उम्मीद
 
डा.मीना अग्रवाल
Oct 20 2008 10:33 PM
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मुक्तक 5

जीवन का सरोकार न जाने देनाअच्छे जो हों आसार न जाने देनाइक लम्हे में सदियों के छिपे हैं संकेतइक लम्हे को भी बेकार न जाने देनाअंधे के लिए दिन का उजाला बेकारसाहस न हो चलने का तो रस्ता बेकारविश्वास अगर खुद पर नहीं है तुमकोइस हाल में आँखों पर भरोसा
 
डा.मीना अग्रवाल
Oct 19 2008 03:18 PM
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मुक्तक 3

जीवन का मधुर गीत सुनाती हूँ तुम्हेंसोए हो तो सोते से जगाती हूँ तुम्हेंजो ढूँढने निकलेगा सो पाएगा वहीइक बात पते की यह बताती हूँ तुम्हेंक्यों बात कोई मनकी सुनाने आएक्यों घाव कोई अप्ने दिखाने आएक्यों आप ही हम हाल न पूछें उसकाक्यों हमको कोई हाल अपना बताने
 
डा.मीना अग्रवाल
Oct 19 2008 02:50 PM