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नया प्रयत्न

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नयी प्रविष्टी लिखी
31 Dec 2009
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तुलसी जयंती पर तुलसीदास का एक भजन

यह भजन सुनें -तुलसी जयंती पर तुलसी स्मरण यहाँ भी ।
 
हिमांशु । Himanshu
Jul 28 2009 11:43 AM
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तुम्हारा स्पर्श (ऑडियो)

कविता पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें । कविता डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें ।
 
हिमांशु । Himanshu
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मेरी आवाज में मेरी कविता

कभी आडियो फाइल अपने ब्लॉग पर नहीं लगायी थी । आज जिस कविता को सच्चा शरणम पर पोस्ट किया उसे अपनी आवाज में रिकॉर्ड भी किया था । सोचा इसी बहाने इस पोस्टिंग को भी आजमा लूँ । यह सुनिये मेरी आवाज में मेरी कविता "महसूस करता हूँ, सब तो कविता है" जिसे आज मैंने
 
हिमांशु । Himanshu
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मैं स्टेशन के पास का वाहन-स्टैण्ड हूं

मैं स्टेशन के पास का वाहन-स्टैण्ड हूं जहां निज-मन के वाहन खड़े करने के लिये अपनी मुस्कराहट के चमकते सिक्कों से राहगीर मेरे प्रेम और दायित्व के टिकट खरीद लेता है । फिर पूरे कर अपने काम लौटता है और अपना मन-वाहन लेकर उड़ जाता है । बहुत-सी ऐसी ही मुस्कराहट
 
हिमांशु । Himanshu
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मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं

हर शख्स अपने साथ मैं खुशहाल कर सकूं मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं । फैली हैं अब समाज में अनगिन बुराइयाँ है लालसा कि बद को मैं बेहाल कर सकूँ। फेकूँ निकाल हिय के अन्धकार द्वेष को कटुता के जी का आज मैं जंजाल कर सकूँ। है प्रार्थना कि नाथ वृहद शक्ति दो
 
हिमांशु
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कैसे देख पाता ?

गुजरता था मैं जब भी दरवाजे से खुला रहता था वह, खड़ा रहता था कोई मेरी प्रतीक्षा में, दरवाजे के भीतर से एक मुस्कराहट चीरती भीड़ को चली आती थी मेरे पास, मैं अवश उस मुस्कुराहट से बँधा रूप-मग्न चलता जाता था अपने भीतर एक उजास का अनुभव करते हुए। उस समय मेरे म
 
हिमांशु
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ओ प्रतिमा अनजानी

ओ प्रतिमा अनजानी , दिल की सतत कहानी कहता हूँ निज बात सुहानी , सुन लो ना । डूबा रहता था केवल जीवन की बोध कथाओं में अब खोया हूँ मैं रूप - सरस की अनगिन विरह - व्यथाओं में सत्य अकल्पित - मधुरित - सुरभित , अन्तरतम में हर पल गुंजित ओ प्रतिमा अनजानी , दिल क
 
हिमांशु
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आपका हँसना

आपके हँसने में छ्न्द है सुर है राग है, आपका हँसना एक गीत है। आपके हँसने में प्रवाह है विस्तार है शीतलता है, आपका हँसना एक सरिता है। आपके हँसने में शन्ति है श्रद्धा है समर्पण है, आपका हँसना एक भक्ति है। आपके हँसने में स्नेह है प्रेम है करुणा है, आपका
 
हिमांशु
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वह आँसू कह जाते हैं

मेरा प्रेम कुछ बोलना चाहता है । कुछ शब्द भी उठे थे, जिनसे अपने प्रेम की सारी बातें तुमसे कह देने को मन व्याकुल था , पर जबान लड़खडा गयी। अन्दर से आवाज आयी "कोई बाँध सका है की तुम चले हो बांधने प्रेम को, शब्दों में । ठहर गया मैं । प्रश्न था, प्रेम बोलन
 
हिमांशु
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उसकी याद ही अच्छी

खो ही जाऊं अगर कहीं किसी की याद में तो बुरा क्या है? व्यर्थ ही भटकूंगा - राह में व्यर्थ ही खोजूंगा - अर्थ को व्यर्थ ही रोऊंगा - निराशा के लिये, न पाऊंगा प्रेम, दुलार और स्नेह का आमंत्रण, फ़िर डूब जाने को प्रेम में खो जाने को प्रीति में, आनन्द के असीम
 
हिमांशु
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बात, यदि अधूरी है

बात, यदि अधूरी है तो उसका अर्थ नहीं, यदि संभावनायें हैं तो उसे पूर्ण कर लेना व्यर्थ नहीं। कहा था किसी ने स्वीकार है मुझे भी- "कविता करो न करो कवि बन जाओ" और अपनी इस सहज मनोदशा में उस अदृश्य कविता में ही खो जाओ। पर कवि जिसके लिये "कविता एक कवच है, और
 
हिमांशु
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पढ़ा तुम्हारा गीत-पत्र

एक खामोशी-सी दिखी एक इंतिजार भी दिखा अनसुलझी आंखों में बेकली का सिमटा ज्वार भी दिखा, आशाओं के दीप भी जले विश्वास के सतरंगी स्वप्न भी खिले लगा जैसे हर सांस वीणा के सुर में सुर मिलाकर गुनगुना रही हो, और जैसे कोई काली-सी कोयल एक थके राही को प्रेम का,निश
 
हिमांशु
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कितना सिखाओगे मुझे?

चेहरे पर मौन सजा लेते हो क्योंकि बताना चाहते हो मुझे मौन का मर्म, हर पल प्रेम और स्नेह से सहलाते हो मुझे शायद बताना चाहते हो एक स्नेही,एक प्रेमी का कर्म आकंठ डूब जाते हो हास्य में मेरे जैसे गर्हित की आस के लिये शायद देना चाहते हो यह जीवन-दर्शन कि 'जी
 
हिमांशु
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प्रेम पत्रों का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद 6

इस छ्लना में पड़ी रहूं यदि तेरा कहना एक छलावा. तेरे शब्द मूर्त हों नाचें मैं उस थिरकन में खो जाऊं तेरी कविता की थपकी से मेरे प्रियतम मैं सो जाऊं अधर हिलें मैं प्राण वार दूं यदि उनका हिलना एक छलावा. प्रिय तेरे इस भाव-जलधि में मैं डूबी, बस डूबी जाऊं तेर
 
हिमांशु
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नहीं, प्रेम है कार्य नहीं

प्रेमिका ने कहा था-"प्यार करते हो मुझसे?" प्रेमी ने कहा-"प्यार करने की वस्तु नहीं. मैं प्यार ’करता’ नहीं, ’प्यार-पूरा’ बन गया हूं. यहां इसी संवाद का विस्तार है- कहने वाला कह जाता है सुनने वाला सुन लेता है लेकिन कहने और सुनने में कहीं विभेद छिपा होता
 
हिमांशु
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प्रेम पत्रों का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद 5

अब तक जो मैं हठ करती थी, हर इन्सान अकेला होता मुझे पता क्या था जीवन यह अपनों का ही मेला होता. यही सोचती थी हर क्षण केवल मनुष्य अपने में जीता उसके लिये नहीं होता जग, ना वह किसी और का होता. किसी एक का, किसी एक से मिलना परम असम्भव है अलग-अलग दो अस्तित्व
 
हिमांशु
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कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है 2

तुम पर तो होकर न्यौछावर हम सब कुछ थे वार गये पर सत्य कहो, क्यों इस समाज के लघु चिंतन से हार गये यह समाज तो कहने को केवल अपनों का मेला होता सत्य कहूं तो इस समाज में हर एक व्यक्ति अकेला होता पर एक अनोखी बात! प्रीति की रीति जिसे भी आ जाती है और जिसे यह
 
हिमांशु
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कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है

नीचे की कविता , कविता नहीं , कहानी है । नीतू दीदी की कहानी कह रहा हूँ मैं । मेरे कस्बे के इकलौते राष्ट्रीयकृत बैंक में कैशियर होकर आयी थीं और पास के ही घर में किराए पर रहने लगीं थीं । सहज आत्मीयता का परिचय बना - कब गूढ़ हुआ - मैंने नहीं जाना । कुल छः
 
हिमांशु
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तुम्हारी प्रेम-पाती के लिए

तुम्हारे लिखने में बड़ा हौसला है । मेरे जीवन के गीत भी तुम्हीं ने लिखे प्रणय के स्वप्न तुमने ही अंकित कर दिए और हृदय के उन तारों को, जो वर्षों से सोये पड़े थे, तुमने ही अपनी लेखनी से झंकृत कर दिया । तुम्हारे लिखने में युगों-युगों की प्यास है पर आतुरता
 
हिमांशु
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सर्वत्र तुम

मैंने चंद्र को देखा उसकी समस्त किरणों में तुम ही दिखाई पड़े मैंने नदी को देखा उसकी धारा में तुम्हारी ही छवि प्रवाहित हो रही थी मैंने फूल देखा फूल की हर पंखुड़ी पर तुम्हारा ही चेहरा नजर आया मैंने वृक्ष देखा उसकी छाया में मुझे तुम्हारी प्रेम-छाया दिखाई प
 
हिमांशु
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तुम हँस पड़ते हो...

मैं अकेला खड़ा हूँ और तुम्हारे आँसुओं की धाराएँ घेर रही हैं मुझे , कुछ ही क्षणों में यह पास आ गयी हैं एकदम , शून्य हो गया है मेरा अस्तित्व बचने की कोई आशा ही नहीं रही, मैं हो जाता हूँ निश्चल, फ़िर धाराएँ जिधर चाहती हैं बहा ले जाती हैं मेरे जैसा अधीर, ग
 
हिमांशु
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तुम्हारे सामने ही तो अभिव्यक्त हूँ

कुछ अभीप्सित है तुम्हारे सामने आ खड़ा हूँ याचना के शब्द नहीं हैं ना ही कोई सार्थक तत्त्व है कुछ कहने के लिए तुमसे। यहाँ तो कतार है याचकों, आकांक्षियों की, सब समग्रता से अपनी कहनी कहे जा रहे हैं न तो मेरी तुम्हारे मन्दिर में कुछ कहने की सामर्थ्य है ना
 
हिमांशु
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वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ

मैं जिधर भी चलूँ मैं जानता हूँ कि राह सारी तुम्हारी ही है, पर यह मेरा अकिंचन भाव ही है कि मैं नहीं चुन पा रहा हूँ अपनी राह । मैंने बार-बार राह की टोह ली पर चला रंच भर भी नहीं, टिका रहा मैं जानता हूँ कि दस-दिगंत में तुम्हारा बधावा बज रहा है, पर यह मेर
 
हिमांशु
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एक दिन ब्रह्मा मिल जाते...

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते तो उनसे पूछता कुछ प्रश्न और अपनी जिज्ञासा शांत करता कि क्यों नहीं पहुंचती उन तक किसी की चीख ? उनसे पूछता कि जिसका ताना मजेदार, खूब रसभरा है फलदार क्यों नहीं हो गयी वह ईख ? और जानता कि जिसकी लकडियाँ बांटती हैं सुगंध चहुँओर उस च
 
हिमांशु
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एक स्त्री के प्रति

स्वीकार कर लिया काँटों के पथ को पहचाना फ़िर भी जकड़ लिया बहुरूपी झूठे सच को कुछ बतलाओ, न रखो अधर में हे स्नेह बिन्दु ! क्यों करते हो समझौता ? जब पूछ रहा होता हूँ, कह देते हो 'जो हुआ सही ही हुआ' और ' जो बीत गयी सो बात गयी' , कहो यह मौन कहाँ से सीखा ? ज
 
हिमांशु