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अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं...
महफ़िल में कुछ परेशां से बैठे हुए जब सबकी नजरो में भी रहकर खुद को लाख छुपाने की कोशिश के बाद मिले एकांत में जब कुछ पंक्तियों को संजोया तो जो रचना बन पड़ी वो आपके सामने प्रस्तुत है....हम आरजू के सितम से घबराने लगे हैं,अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं|
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Apr 21 2010 01:55 PM


Shuffle








