"दो बातें एक एहसास की..."

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21 Apr 2010
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अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं...

महफ़िल में कुछ परेशां से बैठे हुए जब सबकी नजरो में भी रहकर खुद को लाख छुपाने की कोशिश के बाद मिले एकांत में जब कुछ पंक्तियों को संजोया तो जो रचना बन पड़ी वो आपके सामने प्रस्तुत है....हम आरजू के सितम से घबराने लगे हैं,अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं|
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कुछ बातें परम्परा 2010 की...

कुछ कहने से पहले मै ये बता दूँ की मै यहाँ किस परम्परा की बात कर रहा हूँ | ये परम्परा एक कार्यक्रम है हमारे सामान्य अध्ययन की कोचिंग संस्थान ध्येय के द्वारा आज गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हमारे बैच के ख़त्म होने पर दी जा रही एक विदाई समारोह की|
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आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा...

आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा जितना वहम है कोहरा उतना घना नही होगा |सैंतालिस में फरमान जारी कर बैठे थे हर जन को आजादी का अहसास हुआ होगा |आज भी भुखमरी पर बहस जारी थी होंठो पर हंसी, हाथों में जाम भी होगा |उजली खादी की फिर जमघट सजी
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हकीकत में न ले चलो दोस्तों...

मुझे हकीकत में न ले चलो दोस्तों, बस इक बार कहूँगा बेगुनाह हूँ दोस्तों| कदम पहले बढ़ाने की कोशिश की हर सफ़र में  ठहर गया तूफानों से रास्ते जब बदल गए दोस्तों|  हर हाथ सहारे को बढतें रहे हर पल  गलत थे जो उसको उधार कह गए दोस्तों| चोट खाकर
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ज़माना बदल गया...

एक दिन पार्क में बैठा मै किसी सोच में डूबा था| तभी वहाँ कुछ रोचक प्रसंग दिखाई पड़ा, जिसे मैंने कागज पर उतार कर उस तीर से एक और निशाना साधने की कोशिश की| जिसे मै और अच्छा कर सकता हूँ, लेकिन दिमाग के थके होने और जल्दबाजी के कारण जैसे बन पड़ी आपके सामने
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"पल-पल बढ़ती हुयी..."

एकांत में बैठा मै कुछ सोच रहा था की तभी कुछ लिखने की चाह में मैंने कलम उठा ली| फिर जो भावनाए निकली वो अब आपके सामने प्रस्तुत है..... पल-पल बढ़ती हुई  रिश्तों की गहराई में  खामोश निगाहों से  कहती थी वो कुछ बातें,  समझ बनी तो 
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"तोहफा..."

ये रचना मैंने अपने लखनऊ विश्वविद्यालय में दोस्तों के मस्ती के साथ बीती जिंदगी के दौरान लिखी थी, जो डायरी के पन्नो में नीचे दबी पड़ी थी। आज जब नजरो के सामने मिली तो उन्ही एहसासो को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर दिया.......वो बचपन के छूटे हुए पलवो हंसते हुए गुजरा
Oct 02 2009 07:57 PM
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"कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं..."

कुछ घटनाओं को जब मैंने कल्पना के चादर में लपेटा तो यही पंक्तियाँ बन पड़ी। जिसमे मैंने हास्य का तड़का देने का भरपूर प्रयास किया है। ये मेरा हास्य का प्रथम प्रयास अब आपके सामने प्रस्तुत है......... आज भी हम ठण्डी आहें भरा करतें हैंकागज के जहाज अक्सर उछाला
Oct 02 2009 07:38 PM
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"मीत बना मै घूम रहा हूँ..."

अपनी पी.जी. पूरी करके पढाई के कारण लखनऊ छोड़ने के बाद एक दिन मधुशाला पढ़ते हुए, तनहाइयों में बच्चन जी की साकी, प्याला, हाला और मधुशाला को अपनी भावनाओ में डाला तो ये रचना बन पड़ी थी..... जिसे मै अपने डायरी के पन्नो से निकालकर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा
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"एक सबक हमने सीखी अब आप भी सीखों भाई..."

कहतें हैं ठोकरे इन्सान को चलना सीखती हैं। इसका उदाहरण बचपन से ही मिलता चला आ रहा है। जब अपने बडों से ज्ञात होता है की बचपन में पहला कदम बढ़ाने से पहले हमने कितनी ठोकरे खायी है। जिसका सबूत भी शायद शरीर के किसी भाग पर किसी पुराने चिन्ह के रूप में दिख जाता
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"मासूम शाम आ गई..."

कई दिनों से यहाँ मै लिखने से दूर रहा। इस बीच मैंने कुछ लिखा भी तो उसे यहाँ लिखने का मन नही हो पाया और कुछ व्यस्तता ऐसी रही की यहाँ से दूरी भी बनी रही। एक बार फ़िर आप लोगो से उस दूरी को हटाते हुए, मै यहाँ अपनी कुछ भावनाओं को कुछ पंक्तियों के माध्यम से
Sep 07 2009 05:55 PM
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"यादों की इक रेल चली..."

बस ऐसे ही एकांत में बैठा था मै की अन्तरमन कुछ पाने को व्यग्र सा हो रहा था। मैंने उसी समय अपनी कलम उठा ली और भावनाओ को एक पन्ने पर दर्ज कर दिया............. उसी एहसास की बातें अब आप लोगों के सामने यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.............यादों की इक रेल चली
Sep 07 2009 05:51 PM
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"तनहाई..."

लिखा मैंने इसे काफी पहले था लेकिन आज फ़िर से इसे आप सब के सम्मुख पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये रचना तब आई थी जब हम सब मित्र लखनऊ विश्वविद्यालय की जिंदगी में मस्त थे। और देर रात फ़िल्म देख कर और मस्ती करके जब मै अपने कमरे पर आया तो इकदम अकेला था, तब ही जो
Sep 07 2009 05:49 PM
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बरसीं लाठियाँ, हाय लोकतंत्र...

देश में और दिल्ली में उस राष्ट्रीय पार्टी की सरकार है जिसने देश को पहली लोकतांत्रिक सरकार दी थी। लेकिन लोकतंत्र के नाम पर क्या मिला अपने बेबशपन को देखकर यह प्रश्न कभी-कभी जहन को काफी उद्वेलित कर देता है। सन् १९४७ के पूर्व जहाँ हमारे पूर्वजों का अंग्रेजों
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'मेरे ४६९ बनाम हिन्दी ब्लॉग टिप्स पर अब तक ५३...'

हमारे भारतवर्ष में ये संस्कार है की किसी भी नए कार्य के शुभारम्भ, कार्य के पूर्ण होने या किसी कार्यक्रम, भोज अथवा विशेष त्योहार होने पर लोगो को निमंत्रण दिया जाता है, इस आकांक्षा के साथ की वे हमारे उपरोक्त किसी भी कार्यक्रम में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज
Sep 07 2009 05:45 PM
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"जब भी ये मन उदास होता है..."

इस रचना को मैंने कुछ दिन पहले लिखा था। परन्तु कुछ कारणों वश उसे तब नही दे पाया था। इसे मैंने तब लिखा था, जब किसी अपने के कारण मुझे कुछ दुःख पहुँचा था और इत्तेफाक देखिये उस बार फ़िर मै अकेला ही था। उसी समय जो भावनाएं निकली उन्हें पन्ने पर दर्ज कर दिया और
Sep 07 2009 05:29 PM
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"रक्तदान महादान..."

अभी कुछ दिन पहले मै एम्स में रक्तदान करने गया था । हांलाकि इसे दान की श्रेणी में नही रख सकते क्योंकि मै किसी अपने की जरूरत पर रक्त देने गया था । मेरे मित्र विकास के पिता जी का यहाँ ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन होने वाला था, इसीलिए यहाँ के डॉक्टरों ने चार य
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"आज स्वयं (लोकेन्द्र) के जन्म दिन पर..."

आज २१ मई के दिन जीवन में पहली बार है जब मै अपने परिवार और मित्रों के साथ नहीं हूँ और जन्मदिन की शुभकामनाएं और आर्शीवाद प्रत्यक्ष रूप से नही बल्कि मोबाईल और इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त कर रहा हूँ। आज मै पहली बार अपने जन्म दिन पर दिल्ली में हूँ। जिस क
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"किसी का इंतजार बाकी है..."

न अब कोई बात बाकी है न कोई रात बाकी है तमन्नाओं में जाने क्यूं अब भी इक शाम बाकी है, न कोई ख्वाब बाकी है न कोई सफर बाकी है डायरी में जाने क्यूं अब भी कुछ याद बाकी है, न वादा था किसी का न कोई आरजू बाकी है दिल में न जाने क्यूं किसी का इंतजार बाकी है !!
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"जागरुक मतदाता, उभरता लोकतंत्र..."

वर्तमान चुनाव के परिणाम को देखकर एक संतोष जनक स्थिति उत्पन्न होती है । मजबूत पार्टी के रूप में तो मतदाताओ ने कांग्रेश को प्रस्तुत किया है लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में मजबूत नेता को अभी आना बाकी है । इस बार के चुनाव में मतदाताओ ने अत्यधिक अवसरवादियों
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"गुलाल..."

अभी हाल ही में मैंने एक फ़िल्म ' गुलाल ' देखी है । लेकिन मै इस फ़िल्म को अच्छे से समझ नही पाया हूँ । शायद इसीलिए मै अब तक इस फ़िल्म को कई बार देख चुका हूँ । लेकिन हर बार इस फ़िल्म के छोटे पर बहुत मारक संवाद ने इस के बारे में मेरे विचार को लगातार बदला
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क्या है ये..?

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक निष्पक्ष, ईमानदार, और मजबूत सरकार के गठन का एक ही हल है वो है मतदान| देश के उज्जवल भविष्य के लिए हमें ही ५४३ चुन्निदा चेहरे विश्व जगत के सामने प्रस्तुत करने होगें। जिसमे अभी तक के मतदान प्रतिशता को देखकर काफी अफसोस
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दोस्त मिलतें हैं यहाँ दोस्त को बनने के लिए...

सच्चे दोस्तों का साथ पाकर जो खुशी, संतुष्टि और सम्पूर्णता का अनुभव होता है वह जिंदगी के कुछ खास सुखद एहसासों में से होती है। जहाँ लोग जिंदगी में सिर्फ़ एक सच्चे मित्र के मिलने की कामना करतें हैं वहीं ये खूबसूरत रिश्ता एक अच्छी संख्या में मेरे साथ है।
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"इक याद का तोहफा"

आज इक याद ने तोहफा दिया मुझको फिर उसकी दोस्ती का भरम दिया मुझको, कभी जो जख्म मिलें थे उससे तमगों की तरह फिर उसमे कमियों ने दर्द दिया मुझको, इक अहसान इस याद का फिर भी रहा पिछले दर्द की दवा मिलीं इक दर्द से मुझको, छिपाकर गम हमने हंसने की कोशिश की मगर झ
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"मीत बना मै घूम रहा हूँ"

मीत बना मै घूम रहा हूँ साथ लिए वीरानी को, यादों का अवरोध लगाकर बस यह आस लगता हूँ !! काश कहीं मिल जातें अपने मिल जाता फिर उनका साथ, संग होते सब मित्र हमारे साथ लिये सर्मध्दि को, मुझे दूरी का हे मित्रों कष्ट नहीं कुछ भी होता, मिलेंगी हमकों मंजिल इकदिन
Apr 23 2009 05:40 AM
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"इक और सुबह आई"

आज फिर दोस्ती के दिन की वो सुनहरी सुबह आ गई शांत सी जिंदगी में कमी का अहसास दिला गई हम न थे कभी तनहा फिर भी तनहाई महसूस करा गई खुशियों में थोडी सी कमी का अहसास दिला गई जिंदगी तो खुशनसीब है की दोस्ती साथ निभा गई देखों आज फिर वो सुनहरी सुबह आ गई वादा थ
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"तोहफा"

वो बचपन के छूटे हुए पल वो हंसते हुए गुजरा कल वो खुशी से झूमते हुए पल वो चोट खाये रोते हुए पल वो स्कूल की यादें वो नन्ही शरारतें दोस्ती में देखो इनका मजा क्या है !! वो यारों की मस्ती वो यारों से मस्ती बिछड़े दोस्तों की यादों की मस्ती वो दोस्तों का साथ
Apr 23 2009 05:40 AM
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"लौट आयीं हैं फिर यादें"

लौट आई हैं फिर यादें सुबह की उजालों सी, उन्मुक्त सी बीतें हुए ख्यालों सी अन्जानी सी, मतवाली सी सुखद भरी अहसासों सी, लौट आई हैं फिर यादें सुबह की उजालों सी, बचपन की हैं कुछ मीठीं यादें भोली सी हैं नटखट यादें बच्चे थें हम अब ये यादें हैं लड़तें थे हम य
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"इक गुडियाँ"

इक नन्ही सी गुडियाँ, प्यारी सी गुडियाँ, सिल्की सी गुडियाँ, माँ की दुलारी है गुडियाँ, थोड़ी सी सख्त पर दयालु है गुडियाँ, परियों के दिल से भी खुबसूरत है गुडियाँ, रोती है पल भर में, हँस देती है गुडियाँ, कहतें हैं सारे दोस्त, दोस्त के रूप तोहफा है गुडियाँ
Apr 23 2009 05:40 AM
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"निष्काम प्रेम बनाम रोमांटिक लव..."

कुछ दिनों पूर्व मेरे द्वारा लिखे गए लेख शाश्वत प्रेम या फटाफट मोहब्बत में मैंने डोपामाईन नामक रसायन के श्राव से प्यार रुपी आन्नद की शुरुआत का जिक्र किया था। परन्तु एक प्रश्न इसमे छिपा रह गया था की आख़िर फटाफट मोहब्बत अर्थात् रोमांटिक लव में और शाश्वत
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"तलाश..."

ये नम हवायें बहुत हैं जख्मी सम्भलकर चलो कहीं ये दर्द न दे जायें, देखने में फूलों की सेज होगें वों अहसास में काटों की चुभन देंगें जो महक मिलने पर दोस्त न समझ लेना वरना रंगीन मुस्कुराहट की सजा देगा वो, निकल के इस माया के सरोवर से अब इक बागबां की तलाश क
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"इक आशा..."

कोशिश है कुछ पाने की लेकर छोटी सी इक आशा कहने को कुछ बाकी है लेकर थोड़ी सी अभिलाषा, खोने को तो हैं खो बैठे जीवन की जगीर कोई अब भी तो कुछ बाकी है शायद इक छोटी सी आशा !!
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"शाश्वत प्यार या फटाफट मोहब्बत..."

प्यार क्या होता, कब होता है, कैसे होता है और क्यो होता है? इस बात का अभी तक कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका है। किंतु दो पक्ष जरूर उभर कर आतें हैं, एक जो प्राचीन काल से चला आ रहा है शाश्वत प्यार तथा दूसरा है आधुनिक युग का फटाफट मोहब्बत जो दो-तीन मुला
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"जीवन की परिभाषा है"

जीवन की परिभाषा है कुछ सोची, कुछ आशा है है जीवन में क्या कुछ सोचों कुछ अधूरे किस्से, कुछ पाने की आशा है, कहाँ ठहर गए सब किस्से कहाँ रुके हैं सब अब भी खोना था जो, वो खो बैठे अब तो बस पाने की आशा है। दुनिया बहुत बड़ी है मित्रो आँखों में ये न समाएगी, करन
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"किसी के आने की भनक आज है"

किसी के आने की भनक आज है अकेले में मुस्कुराने की सनक आज है कहाँ खो चलें थे हम ख़ुद को फिर उसे पाने की तलब आज है, एक दोस्त हमारा आता होगा महफ़िल तो नही पर खुशबू जरूर लाता होगा होने को तो बस हम ही होंगे जो साथ खिलखिलाने की ललक आज है, फिर झगडेगें हम बारी
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"फिर कैसे वो खुशी दे गई..."

रात है सुहानी सी दिन भी तो था हसीन फिर क्यों लगता है ये मौसम अन्जाना सा, रास्ते पर है वीरानीं महफ़िल भी तो है सूनी सी फिर क्यों छाई है हम पर मदहोशी सी, गुम न है कोई बस है इक पुकार की दूरी पर फिर क्यों न निकलतीं है हमसे इक आवाज कोई, कुछ न चाहा था हमने
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"फिर कैसे वो खुशी दे गई..."

रात है सुहानी सी दिन भी तो था हसीन फिर क्यों लगता है ये मौसम अन्जाना सा, रास्ते पर है वीरानीं महफ़िल भी तो है सूनी सी फिर क्यों छाई है हम पर मदहोशी सी, गुम न है कोई बस है इक पुकार की दूरी पर फिर क्यों न निकलतीं है हमसे इक आवाज कोई, कुछ न चाहा था हमने
Feb 04 2009 08:42 PM
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"मेरी जिन्दगी का पहला प्यार..."

जब भी माँ-पापा के प्यार का अहसास उनकी मेरे पास गैर मौजूदगी का अहसास कराता है और इस बात से भी परिचय कराता है की कहीं दूर अपनी जागतीं आंखों में वो मेरे मंजिल पर पहुँचने का सपना संजोये हुए हैं और दोनों उस घड़ी का तत्परता से इंतजार कर रहें होंगे मै इस बा
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"इक याद का तोहफा"

आज इक याद ने तोहफा दिया मुझको फिर उसकी दोस्ती का भरम दिया मुझको, कभी जो जख्म मिलें थे उससे तमगों की तरह फिर उसमे कमियों ने दर्द दिया मुझको, इक अहसान इस याद का फिर भी रहा पिछले दर्द की दवा मिलीं इक दर्द से मुझको, छिपाकर गम हमने हंसने की कोशिश की मगर झ
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"फिर कैसे वो खुशी दे गई..."

रात है सुहानी सी दिन भी तो था हसीन फिर क्यों लगता है ये मौसम अन्जाना सा, रास्ते पर है वीरानीं महफ़िल भी तो है सूनी सी फिर क्यों छाई है हम पर मदहोशी सी, गुम न है कोई बस है इक पुकार की दूरी पर फिर क्यों न निकलतीं है हमसे इक आवाज कोई, कुछ न चाहा था हमने