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सरजूपार की मोनालीसा

http://sarjuparkimonalisa.blogspot.com/
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08 May 2010
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काबुलीवाला

(रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी)मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात
May 09 2010 02:15 AM
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जाने क्यों वो गुल्लक आजकल मुझे घूरता रहता है

जाने क्यों आजकल हर घर से बहुत शोर आता हैधब-धब-धब की आवाजें, लगता है छत पर कोई कूद रहा हैचीखना चिल्लाना, रोना-गाना लगता है “कुछ” हो गयाजाने क्यों आजकल सूरज भी अकड़ा हुआ हैनाराज है शायद मुझसेसबसे पहले जगाने के लिए मुझे ही आ जाता हैमैं रात चाहे कितनी देर से
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भारत में पहली बार

भारत में पहली बार साइन लैंग्वेज में डच फिल्मकारों की तरफ से 5 शॉर्ट फिल्मों को देखने का मौका- साधो का एक और खास कार्यक्रम।
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सवालों की बौछार

एक रोज शिवी ने सवालों की बौछार कर दीये क्या है-वो क्या है...ये गुल्लक है...ये पित्ज़ा...ये बप्पा जी हैं...ये प्रिंटर है...और ये इरेज़र है...शिवी का अगला सवाल थाइरेज़र क्या होता है,मैंने कहाजब लिखते वक्त कोई गलती हो जाती हैतो इरेज़र से उसे मिटा देते
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An Invitation For Music Lovers

This is a concert organized in the memory of my Ustadji's father Ustad Ashique Ali Khan.Please do come and enjoy the music !!! SARANGI NAWAZ USTAD ASHIQUE ALI KHAN MUSIC & AWARD CEREMONYVENUE: KAMANI AUDITORIUM MANDI HOUSE ON Feb 25,2010 7 PM Onwards
Feb 24 2010 12:15 PM
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शिवी और शहंशाह

एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहलखूब सुनी थीं ये लाइनेंबीते साल की आखिरी तारीख यानी 31 दिसंबर को हम आगरा में थे...शिवी* ने ताजमहल देखाऔर कुछ तो वो याद कर सकती नहींकिसने बनवाया, क्यूं बनवायाकिसके लिए बनवायाये सब वो जानकर करेगी भी क्या...हां पर, ताज का
Feb 15 2010 08:12 PM
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इसे विज्ञापन कतई ना समझे....

28 साल की रश्मि की पहली किताब, वो भी रूपा पब्लिकेशन से... इस पर तो चर्चा होनी ही चाहिए, चर्चा इसलिए होनी चाहिए क्योंकि मीडिया मौजूदा वक्त के सबसे चर्चित विषयों में शुमार है। इतना चर्चित कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन तक मीडिया पर बनी फिल्म में काम कर रहे
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नया ज्ञानोदय में प्रकाशित मेरा संस्मरण

इस संस्मरण को मैंने दो हिस्सों में लिखा है। मेरी चुनौती की दो शक्लें हैं- पहली भावनात्मक चुनौती और दूसरी पेशे की चुनौती। मैंने 2004 से लेकर अगले दो साल में 4 पाकिस्तान दौरे किए हैं, पाकिस्तान के तमाम रास्ते, तमाम गलियां मुझे याद हैं। पाकिस्तान में कुछ
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नया ज्ञानोदय का मीडिया विशेषांक अब उपलब्ध है...

नया ज्ञानोदय का मीडिया विशेषांक अब बाजार में है। 128 पन्नों के इस विशेषांक की कीमत 35 रुपये रखी गई है। अप्रैल 2009 से लेकर दिसंबर 2009 का वक्त लगा, इस अंक को प्लान करने से लेकर बाजार में आने तक...पर अंक आया तो देखकर खुशी हुई। एक मित्र तो रात भर में पूरा
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प्रगति मैदान...काहे की प्रगति?

कई बरस पहले की बात है इंडिया टुडे ने “ये भदेस भारतीय” की कवर स्टोरी के साथ एक अंक प्रकाशित किया था। जहां तक मुझे याद है काफी आलोचना हुई थी, उस अंक की...आलोचना की वजह बड़ी साफ थी कि हम भारत को आगे ले जाने की बजाए खुद ही उसकी कमियां गिनाने पर अमादा हैं
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हंगामा है (इसलिए) बरपा...

पिछली पोस्ट लिखने के 24 घंटों के भीतर ही ये खबर पढ़ने को मिल गई कि गुलाम अली साहब अब भारत नहीं आ रहे...उन्होंने एक अधिकारी से हुई बातचीत का ज्यादा खुलासा नहीं किया- पर इतना ज़रूर बोले कि ताजा हालात के मद्देनजर उन्हें भारत न आने की सलाह दी गई है। अली
Dec 29 2009 11:56 AM
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मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इनको काम दो

अभी कल परसों ही किसी अखबार में पढ़ा था कि ग़ज़ल सम्राट ग़ुलाम अली बिहार में किसी महोत्सव के दौरान अपना कार्यक्रम पेश करेंगे। अब आज ये पढ़ने को मिला कि टेलीविजन चैनल्स पर चलने वाले लॉफ्टर शोज़ में पाकिस्तान से आए कलाकार अपने घर वापस लौट गए हैं। मैंने
Dec 29 2009 11:56 AM
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बोलिए बोलिए...बोलने में क्या जाता है कि टीवी वाले बेवकूफ हैं! लेकिन...

टीवी चैनल्स पर मुंबई में हुए आतंकी हमलों को लेकर गलत ढंग से कवरेज का आरोप लगना शुरू हो गया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ...और आखिरी बार तो कत्तई नहीं। प्रिंट के बड़े अखबारों के बड़े-बड़े रिपोर्टर ये लिखना शुरू कर चुके हैं कि टीवी वालों ने तो ऐसा दिखा दिय
Dec 29 2009 11:56 AM
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चुप रहते तो अच्छा होता?

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाकों के दिन मुझे रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया था, उस एक दिन को छोड़ दिया जाए तो आतंकी हमलों को लेकर क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए इस पर मेरी राय का मेरे प्रोफेशन से कोई लेना देना नहीं है। लिहाजा ये पोस्ट मेरी एक सो
Dec 29 2009 11:56 AM
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साधो सबका, सब साधो हमारे

बहुत डरते डरते जीतेंद्र जी से SMS करके पूछा कि क्या साधो फेस्टीवल पर लिखी गई रिपोर्ट मैं अपने ब्लॉग पर डाल सकता हूं...जवाब आया- साधो सबका, सब साधो हमारे मजा आ गया, साधो के बारे में और जीतेंद्र जी के बारे में पहले भी इस ब्लॉग में थोड़ी बहुत बातचीत हुई
Dec 29 2009 11:56 AM
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मैं निमंत्रण दे रहा हूं...

सपनों का मर जाना” इस ब्लॉग को लेकर यारों दोस्तों से अक्सर बातचीत होती रहती है...मुझे भी लगता है कि मैं इस ब्लॉग के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूं...ज्यादातर पोस्ट सरजूपार की मोनालीसा (www.sarjuparkimonalisa.blogspot.com)के खाते में चली जाती है...रही सह
Dec 29 2009 11:56 AM
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ठहरिए...मिलिए जिंदगी की जंग जीतने वालों से

इसी साल चीन में ओलंपिक कवरेज के दौरान एक दिन इस कार्यक्रम को देखने का मौका मिला...सोच कर गया था कि 15-20 मिनट के शॉट्स एक पीटीसी और दो बाइट लेकर आधे घंटे में स्टोरी करके वापस आ जाउंगा...पर एक बार कार्यक्रम शुरू हुआ तो हिलने की हिम्मत नहीं हुई...मंच प
Dec 29 2009 11:56 AM
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डरिएगा नहीं...

सड़क पर पड़ी लाश को देखकर; कोई तो रूक जाता है, उस गरीब बेसहारा औरत को; कोई तो खाना खिलाता है, अंदर से जमा हो रहे फॉर्म को देखकर; कोई तो चिल्लाता है, मैं ऐसे काम नहीं कर सकता; कोई तो जा’के’ बताता है, उसकी नौकरी चली जाएगी अगर.... कोई तो कुछ बातें छिपात
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बिटिया....

सबसे पहले तो जितेंद्र रामप्रकाश का शुक्रिया....शुक्रिया इस बात का क्योंकि वो हिंदी कविता के लिए वाकई बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। कविताओं का फिल्म फेस्टिवल कराना कहीं से आसान काम नहीं...दरअसल कविताएं उनकी जिंदगी में रही हैं। मयूर विहार में उनके घर में ए
Dec 29 2009 11:56 AM
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बच्चन के बहाने दर्शन

भाई शिवेंद्र, ख्वाबों का सच होते सुना जरूर था, पर देखा नहीं था. अमिताभ बच्चन एक सपना था, जो हकीकत बनकर सामने खड़ा था. लीना यादव की फिल्म “तीन पत्ती”, मुराद सिर्फ इतनी थी कि सदी के महानायक के साथ काम करने का सिर्फ एक मौका मिल जाए. तारीख 7 अक्टूबर...से
Dec 29 2009 11:56 AM
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सरजूपार की मोनालीसा

करीब 10 साल बीत गए या बीतने वाले होंगे...इलाहाबाद में थिएटर के एक मित्र अभिषेक पांडे अपने नाटक की मीटिंग के लिए घर ले गए। बोले- चलो तो सही...कुछ ही दिन बाद नाटक के स्क्रिप्ट राइटर से उनका मनभेद और मतभेद दोनों हो गया...मित्र कहने लगे कि अब फिर आना होग
Dec 29 2009 11:56 AM
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सरजूपार की मोनालीसा

आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर मरगई फुलिया बिचारी की कुएं में डूब कर है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
Dec 29 2009 11:56 AM
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सरजूपार की मोनालीसा

कुछ महीनों पहले एक असफल कोशिश के बाद इस दुनिया में कदम रखने की दोबारा कोशिश
Dec 29 2009 11:56 AM
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नया ज्ञानोदय का मीडिया विशेषांक

कालिया जी के दफ्तर में बैठे बैठे एक रोज इस अंक की नींव पड़ी। मैंने बातों बातों में कहा कि ये सच है कि टीवी न्यूज इंडस्ट्री में सब कुछ सार्थक नहीं हो रहा है- पर पिछले कुछ सालों में कई खबरों ने समाज के सरोकार को ध्यान में रखा है। आज कोई भी नेता अधिकारी
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प्रभाष जी आपको स्कोर का अपडेट, सीरीज का अपडेट कहां बताना होगा? अपना नया पता, नया फोन नंबर तो बताकर जाते।

प्रभाष जी अपने जानने वालों को अक्सर एक किस्सा सुनाते थे। ईमानदार मारवाड़ी का किस्सा। कहते थे एक ईमानदार मारवाड़ी जब मरा तो उसके बहीखाते में कई किस्म का खाता था। लाभ खाता- हानि खाता- दान खाता जैसे कई खाते....पन्ने उलटने पर पता चला कि मारवाड़ी का एक व्
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टीवी मीडिया विशेषांक

टीवी की नौकरी के दबाव में निकाले गए थोड़े थोड़े वक्त को जोड़कर की गई मेहनत के बाद टीवी मीडिया विशेषांक की तैयारी पूरी हो चुकी है। भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय जनवरी में इस अंक को प्रकाशित करेगा। अंक में हिंदी टीवी पत्रकारित
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तुम लिखो पापा...

पिछले 4-5 महीने से कुछ भी लिखने का वक्त नहीं मिला, हिम्मत भी नहीं थी...बिटिया ने इतनी ताकत दी कि फिर कम से कम कुछ तो लिखने का मन किया...लाइनें अब आपके सामने हैं- एक रोज शिवी हाथ में पेंसिल लेकर आई दूसरे हाथ में एक पैड भी था बोली- पापा लिखो, मैंने पैड
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मुझे वोट दीजिए

तो लीजिए साहब, हम भी एक प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे हैं, घूमना-फिरना-इनाम वगैरह का लालच तो है ही, एक और बात दिमाग में आई है, इसे वोट बटोरने का हथकंडा कत्तई ना समझे...शायद आपको याद भी होगा कि इसी ब्ल़ॉग में कुछ महीनों पहले मैने अपनी चीन की एक रिपोर्
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एक ईमानदार राय...

ये एक मित्र की टिप्पणी है, मुझे लगा कि इसे ब्ल़ॉगवाणी के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए...जाहिर सी बात है ये मित्र एक दर्शक और पाठक भी हैं, लेकिन सुधांशु टीवी चैनल्स को सिर्फ कोसने के अलावा कुछ ईमानदार राय भी रखते हैं.. Media, irrespecti