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गली करतार सिंह

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27 Mar 2010
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दिल्ली टू रैय्याम वाया पटना दरभंगा-पार्ट-1

रात भर के सफर में नींद ठीक ठाक आई। सुबह होते होते ट्रेन पटना पहुंच गई, राजेंद्र नगर टर्मिनल पर उतरा, पहले ये नहीं था कुछ अरसा पहले खुला है, पहले तो पटना जंक्शन पर उतरना पड़ता था, खैर बाहर निकलने पर पटना की धुंधली सी धूल भरी, थोड़ी उमसाई सुबह इंतजार कर
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जब आया आखिरी खत

उस रोज भी हमेशा की तरह सूरज निकला....जाड़े की सुबह...बादलों से ढंका आसमान...गीली सर्द सुबह......रात भर झमाझम बारिश हुई...बाहर भीगती रही अन्नू बाबू की बाइक...नालों में पानी भर गया था...पेड़ जो मुहल्ले में थोड़े बहुत बच गए थे उनमें से दो तीन अपन के अहा
Dec 29 2009 11:54 AM
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ये साल अच्छा है...

ढलती शाम की पीली-धुंधली-सिमटती सी धूप कई बार भीड़ में भी अकेलेपन का अहसास कराती है... खासकर अगर आप इंडिया गेट जैसी जगह पर हों तो अकेलापन आपको काटने भले ही नहीं दौड़े लेकिन दार्शनिक जरूर बना देता है....इत्तफाक से क्रिसमस वाले दिन मेरी छुट्टी थी...दिन
Dec 29 2009 11:54 AM
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खामोश समंदर प्यासा है...

ये शीर्षक अपने दोस्त जैगम इमाम की कविता से उधार लिया है...ये गुस्ताखी मुझे करनी पड़ी...क्योंकि जब वो रौ में अपनी नज्म सुना रहे थे तो रहा ना गया....पंक्तियां यूं ही ले लीं...लेकिन इनके पीछे का फलसफा बाद में समझ में आया....जिंदगी के चौराहे पर कभी आप ठि
Dec 29 2009 11:54 AM
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आंधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है...

अचानक मन उदास हो चला...कहानियां अब भी हैं जो अब सामने आ रही हैं....मुंबई हमलों की कहानियां...घटनाएं जो आज भी मन को छू जाती हैं....वाकये जो सिहरने के लिए मजबूर कर देते हैं...इस लेख के लिए हेडिंग जो चुनी बेशक वो टोन आपको बदला सा लगे...पर मुझे इस उदास द
Dec 29 2009 11:54 AM
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मोशे फिर मुस्कुराएगा...

मुंबई के आतंकी पागलपन को गुजरे कई दिन हो गए...लेकिन चौबीसों घंटे टीवी चैनलों पर तबाही का जो मंजर दिखाया गया वो अभी ताज़ा है...घाव अभी सूखा नहीं है....आतंकी हमले पहले भी हुए हैं...लेकिन जो खूनी छाप इन हमलों ने छोड़ी है...उसे मिटाना बहुत मुश्किल है....
Dec 29 2009 11:54 AM
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उस शहर में मेरा घर भी था...

उस साल दिल्ली में जाड़े ने सबको कंपकपा दिया था...पीली बीमार सी धूप...मोटे लबादे भी बेअसर ....तभी एक रोज दिसबंर के महीने में नई दिल्ली स्टेशन पर अकबकाया सा एक ट्रेन से उतरा था...बेशुमार भीड़ में कहीं खोया सा...भीड़ के रेले के साथ साथ हो लिया....बाहर न
Dec 29 2009 11:54 AM
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उसे भूलने की दुआ करो!

चमकती दमकती दुनिया का ये वो कड़वा सच है जिसका दर्द दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में कभी भी महसूस किया जा सकता है...आपके सामने से बेहद परिचित सा चेहरा गुजर रहा है...लेकिन उसकी निगाह मे एक अजीब सा अजनबीपन है...एक सर्द सा अहसास....वो आपको पहचान रहा है...ल
Dec 29 2009 11:54 AM
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बंद गली का आखिरी मकान!

अक्सर सियासत से जुड़े लोगों की शिकायत होती है कि चाहे मसला कुछ भी हो सारा दोष उनपर मढ़ दिया जाता है। हो सकता है एक-आध मामले में उनकी आपत्ति वाजिब हो...लेकिन ज्यादातर मामलों में नहीं....मराठी मानुष के बहाने सियासत का कोड़ा फटकार रहे राज ठाकरे औऱ हाल क
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Dec 29 2009 11:54 AM
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बड़ा बेदर्द पेशा है, इसमें कोई साझीदार नहीं!

वो खबर आंखों के आगे से किसी भी आम खबर की तरह गुजर जाती...लेकिन ऐसा नहीं था...जिंदगी के चंद बरस साथ काम किया था...एक ही दफ्तर में आना जाना...चंद डेस्कों का फासला...लेकिन ये फासला अक्सर मिट जाया करता...जब हम किसी बात पर मजाक करते...गपियाते...हंसते-बोलत
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Dec 29 2009 11:54 AM
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हत्यारे दौर में अब किसी को नाम मत बताना !

जिन लोकल ट्रेनों को मुंबई की लाइफ लाइन कहा जाता है...वही लाइफलाइन धर्मदेव के लिए डेथ वारंट लेकर आई...बड़े अरमानों के साथ धर्मदेव ने खोपोली से लोकल पकड़ी होगी...पहले कुर्ला औऱ फिर गोरखपुर के लिए ट्रेन पकड़नी थी...पर्व के मौके पर जा रहा था...जाहिर है स
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Dec 29 2009 11:54 AM
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इस पगलाई व्यवस्था में किसी का बचना मुश्किल है!

राहुल राज...एक ऐसा लड़का जिसे हम आप कल से पहले तक नहीं जानते थे...जो पटना से बोरिया-बिस्तर उठाए दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में मुंबई पहुंचा...कभी नहीं लौटने के लिए...उसी राहुल राज का चेहरा अब भी आंखों के सामने कौंध रहा है...बेस्ट की डबल डेकर बस की खिड
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...फिर नींद रात भर क्यूं नहीं आती!

सपने, बाइक और सी-१३ का आखिरी कमरा नींद से नींद का सफर कैसा होता है...ये कोई अन्नू बाबू से सीखे...सोने से प्रिय कुछ भी नहीं...शायद इसलिए कि सपनों से उन्हें बहुत लगाव था....लेकिन सपने, बाइक और सी-१३ के आखिरी कमरे में ही जिंदगी तो नहीं चलती...अखबार के त
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गतांक से आगे...

अबतक आपने पढ़ा -एक खत अचानक मिलता है...उस सुबह...सी-१३ के दरवाजे पर अब आगे ...अलसाई भीगी औऱ सीली सुबह का मोह छोड़कर...लिहाफों की गरमाहट से बाहर निकलकर हॉट डिस्कशन का दौर शुरू....कुछ वाकई चिंतित तो कुछ के मन में बस ये चिंता सता रही थी कि आखिर अन्नू बा
Dec 29 2009 11:54 AM
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अपने-अपने दोजख

ख्वाबों के जंगल में भटकते हुए पीली धूप के किसी पेड़ तले उकताए, हारे, हांफते एक दूसरे को निहारते... कुछ महीने पहले सैय्यद जैगम इमाम की कविता पर लिखते वक्त अहसास नहीं था कि पीली धूप के पेड़ों तले एक दोजख भी है...लेकिन नहीं वो भूल थी जिसका अहसास मुझे अब
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....तब कलेजा फट गया

भावुक नहीं हूं..... धर्म कर्म में दिलचस्पी भी बस स्वार्थ भर...गहरी मुसीबत में फंसे तो देवी-देवताओं को याद कर लिया....लेकिन फिर क्यों आंखें गीली हो गईं...गला रुंध गया...बरसों पीछे छूट गया वो नदी जैसा गंगासागर तालाब याद आया......घाटों पर छूटने वाले पटा
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हो सके तो माफ कर देना...

हो सकता है आज सुबह आप जब चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहे हों तो ये खबर कहीं किसी कोने में दिख जाए....खबर का शीर्षक कुछ इस तरह से हो सकता है...सिर में चोट लगने से मजदूर ने दम तोड़ा....बहुत मुमकिन है कि तीन चार लाइनों की ये खबर अखबार में फिलर (खा
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टीवी, टीआरपी औऱ गरियाने का समाजशास्त्र !

हाल के कुछ महीनों में खबरिया चैनलों की खूब खिंचाई हुई...कभी मुंबई हमलों के बहाने धोया गया तो कभी टीआरपी के पुराने डंडे को हथियार बनाकर पीटा गया.... हद तो तब हो गई जब टीवी की दुनिया में कुछ महीने या कुछ सालों पहले तक सक्रिय रहे पत्रकारों ने भी बड़ी बे
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अजीब दास्तां है ये...

सोचा था, आज भी नहीं लिखूंगा...लेकिन ऐसा हो ना सका...सो एक बार फिर हाजिर हूं.... जून की तपती दुपहरियों के इस जानलेवा मौसम में दिल्ली अक्सर लुटी-पिटी और बेदिल सी दिखती है....तब भी ऐसा ही था...सुबह से गर्म हवा के थपेड़े औऱ चढ़ते सूरज के साथ धूप का मिजाज
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इस धंधे में कोई अजातशत्रु नहीं!!!

नवभारत टाइम्स, दिल्ली के एक्जीक्यूटिव एडीटर और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार अब इस संस्थान के हिस्से नहीं रहे। सूत्रों के अनुसार 58 वर्ष की उम्र पूरी हो जाने पर उन्होंने संस्थान से रिटायरमेंट ले लिया। --- हाल ही में एक वेबसाइट पर प्रकाशित खबर खबर पढ़ते
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पर कितना मुश्किल है भूल जाना...

सालों पहले जब दिल्ली में रहने के बाद पटना लौटा था तो वहां का रेलवे स्टेशन विचित्र लगा था...क्योंकि आंखों में तब नई दिल्ली का लंबा-चौड़ा स्टेशन बसा था जिसमें कई प्लेटफॉर्म औऱ दिन-रात गुजरती ट्रेनों से उतरते मुसाफिरों का कभी ना खत्म होने वाला रेला सिर
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इस शोकगीत में कोई नायक नहीं!

आमतौर पर शोकगीत महानायकों के लिखे जाते हैं...गाए जाते हैं...उनके नहीं जिनका गुजरना आपके हमारे जीवन को कहीं से रत्ती भर भी नहीं छूता.... लेकिन उस तस्वीर में ऐसी बात नहीं थी....तस्वीर अखबारों मे छपी थी....वो जो टाइम्स के एशियाई हीरो की लिस्ट में कभी शु
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जरा उन 53000 लोगों के बारे में भी सोचिएगा!!!

जो कल तक अभेद्य किले दिखते थे वो सेकेंडों में रेत के महल की तरह भरभरा कर गिर पड़े...जिनकी नींव सबसे ठोस मानी जाती थी...वहां एक ऐसी अंधी सुरंग निकली जिसमें लाखों निवेशकों का भरोसा दफन हो गया....लेकिन फिक्र यहां नहीं है---बाज़ार है तो घाटा भी होगा...मं
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पीली धूप का पेड़ !

ख्वाबों के जंगल में भटकते हुए पीली धूप के किसी पेड़ तले उकताए, हारे, हांफते एक दूसरे को निहारते... -सैय्यद जैगम इमाम की कविता का एक अंश पीली धूप के पेड़ आपने कहीं देखे हैं....शायद नहीं...इन दरख्तों को आप महसूस कर सकते हैं...हकीकत में नहीं बल्कि ख्वाब
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जाइए भाई चीरा लगवा के आइए...

जॉन डीकोस्टा की डाय़री के इस पन्ने के लेखक हैं रवि बुले रवि बुले का परिचय -हिंदी में नई कहानी के नए दौर की नींव मजबूत करने में रवि बुले शिद्दत से जुटे हुए हैं.....फिलहाल मायानगरी में सक्रिय...फिल्मों का नया व्याकरण गढ़ने की बेचैनी इन दिनों उनकी पहली प
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...और कोहरे को चीरता वो आ गया !

पिछले पन्नों पर : आपने अन्नू बाबू का किस्सा पढ़ा...उनकी शख्सीयत के बारे में जो कुछ मुझसे बन सका...पूरी शिद्दत के साथ बयान करने की कोशिश की...लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जो अभी कहा जाना बाकी है....पाठकों की भारी मांग पर अन्नू बाबू की जिंदगी के बहाने अपनी जि