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युवा सोच युवा ख्यालात

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16 Jun 2010
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क्या देखते हैं वो फिल्में...

मंगलवार को एक काम से चंडीगढ़ जाना हुआ, बठिंडा से चंडीगढ़ तक का सफर बेहद सुखद रहा, क्योंकि बठिंडा से चंडीगढ़ तक एसी कोच बसों की शुरूआत जो हो चुकी है, बसें भी ऐसी जो रेलवे विभाग के चेयर कार अपार्टमेंट को मात देती हैं। इन बसों में सुखद सीटों के अलावा फिल्म
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पागल दोनों तरफ हैं

हफ़ीज़ चाचड़शनिवार 29 मई को कराची प्रेस क्लब गया तो वहाँ मेरे कुछ पत्रकार मित्र हिंदी और उर्दू भाषा के बीच हुए विवाद पर चर्चा कर रहे थे. मैंने कहीं पढ़ा था कि अमरीका में हिंदी पढ़ाने वाले एक अध्यापक घूमते घूमते दिल्ली से सड़क के रास्ते लाहौर पहुँच गए
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किसान एवं टुकड़े दो रचनाएं

किसानफटे पुरानेमटमैले से कपड़ेटूटे जूतेमटमैले से जख्मी पैरकंधे पर रखा परनाढही सी पगड़ीअकेले ही खुद से बातेंकरता जा रहा हैशायदमेरे देश का कोई किसान होगा।परना- डेढ़ मीटर लम्बा कपड़ाटुकड़ेबचपन मेंजब एक रोटी थी,तो माँ ने दो टुकड़े कर दिए,एक मेरा, और एक भाई कालेकिन
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फिल्म राजनीति की समीक्षा, भावना सोमाया की कलम से

राजनीति के विषय को लेकर हमारे यहाँ बहुत सारी फिल्में बनी हैं. कुछ घरेलू राजनीति के बारे में हैं जैसे खानदान,अपने-पराए या संसार …. कुछ जुर्म की राजनीति पर जैसे कंपनी या सरकार...कुछ प्यार की राजनीति पर जैसे देवर, गाईड या अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी…या फिर
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एक इंसान ऐसा चाहिए : मनोज सिंह

एक इंसान ऐसा चाहिए : मनोज सिंह  रिश्तों में कुछ सीधी सरल सी उलझनें होनी चाहिएआदमी को जीना है गर तो एक अदद दुश्मन चाहिएमजा होश से जीने में है जानता हूँ मैं यह बातपर कभी साकी मिले तो दो घूंट पीनी चाहिएरहमत है उसकी जिन्दगी बख्सी उसनेकबूल मेरे दिल को यह
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कितने और हैं पैसे और शहीदी ताज?

कुलवंत हैप्पी कितने शहीदी ताज और मुआवजा देने के लिए पैसे हैं, शायद सरकार के लेखाकार और नीतिकार सोच रहे होंगे? साथ में यह भी सोच रहे होंगे कि बड़ी मुश्किल से हवाई हादसे की ख़बर के कारण जनता का ध्यान बस्तर से हटा था, नक्सलवाद से हटा था। चलो अफजल गुरू को
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बुजुर्ग की खुशी का रहस्य

मैं कभी नहीं भूल सकता, एक बड़ा सा घर, और वो बुजुर्ग, जो सुबह सुबह मुझे गैलरी में खड़ा मिलता है। मैं उसको देखता हूँ, वो मुझे देखता है। हल्की सी मुस्कान का आदान प्रदान होता है दोनों में, और फिर मैं आगे बढ़ जाता हूँ, बिना कुछ बोले। इस तरह की वार्तालाप कई दिनों
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हैप्पी अभिनंदन में दीपक "मशाल"

हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, वो शख्सियत अपनी माटी से शारीरिक तौर पर तो दूर है, लेकिन रूह से जुड़ी हुई है। यही जुड़ाव तो है, जो कोंच छोड़ने और बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैंड पहुंचने के बाद भी हिन्दी ब्लॉग जगत के दीपक "दीपक मशाल'
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एक खत कुमार जलजला व ब्लॉगरों को

कुमार जलजला को वापिस आना चाहिए, जो विवादों में घिरने के बाद लापता हो गए, सुना है वो दिल्ली भी गए थे, ब्लॉग सम्मेलन में शिरकत करने, लेकिन किसी ढाबे पर दाल रोटी खाकर अपनी काली कार में लेपटॉप समेत वापिस चले गए, वो ब्लॉगर सम्मेलन में भले ही वापिस न जाए,
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युवा कवि नितिन फलटणकर की रचना-रास्ते

:-नितिन फलटणकरमैं उजाला बन चला था,रास्तों को नापने।आह! अचानक आंधी आई।मैं बुझ गया गुमनाम बनकर।लोग ढूँढते रहते मुझे, मैं उनका साया बन गया।और बस वो चल दिए, फिर खुला आसमान बनकर।यह मुझे मालूम न था,के जिंदगी अपनी नहीं।मैं तो आंधी से लड़ रहा था,मामूली इन्सान
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युवा कवि नितिन फलटणकर की "त्रिशूल"

त्रिशूल-नितिन फलटणकर ऑंख में भूख थी, और हाथ में बंदूक थी।साथ उसके विनाश था, और कांपती किसी की रूह थी।वो लड़ रहा था, अपने आपसे।न्याय के वासते।न्याय की छांव भी धूप से तेज थी।छोड़ आया था वह खून के रिश्ते।खून के लिए उसके हाथ में मौत थी। उसे न पता था, वह कर रहा
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मेरे दिल की बात - शिवम् मिश्रा

मेरे दिल की बात - शिवम् मिश्रा जो मरे कोई "नेता" तो रोते है हजारो,झुकते है "झंडे" और "सिर" भी |न होती कोई आँख नम,न पड़ता फर्क किसी को,जवान बेटे , भाई होते शहीद ,जब जब गिरते 'मिग', फटते बम मेरे देश में ..... |रोता है दिल ,रोता हूँ मैं भी ....क्यों है
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युवा कवि नितिन फलटणकर की रचना-दिल्ली

दिल्ली तो बस डूब रही है छोटे-छोटे गलियारों में।सत्ता के संघर्षों में और नेता के ललकारों में।इस बिंदी की लाली, अब धीरे-धीरे उतर रही है।अपनों की ही मौंतों से दिल्ली, सुलग-सुलग कर जल रही है।अब रास्ते भी दिल्ली के कुछ सूने सूने लगते हैं।जिनको हम आदर्श मानते,
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हैप्पी अभिनंदन में इंदुपुरी गोस्वामी

हैप्पी अभिनंदन में आज, आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो पेशे से टीचर, लेकिन शौक से समाज सेविका एवं ब्लॉगर हैं। वो चितौड़गढ़ की रहने वाली हैं, ब्लॉगिंग जगत में आए उनको भले ही थोड़े दिन हुए हैं, लेकिन सार्थक ब्लॉगिंग के चलते बहुत जल्द एक
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तो के चक्कर में तोता

मेरे पड़ोस में मेरा एक मित्र रहने आया है, जिस घर में वो रहने आया, वहाँ एक पालतू तोता भी है, जो पिंजरे में बंद रहता है, पालतू पंछियों की तरह। उसको कैद में देखकर मित्र ने अपने मकान मालिक से कहा, "इसको आजाद क्यों नहीं कर देते?"। उसने आगे से जवाब दिया,
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नो एंट्री, वेलकम और थैंक यू

कुलवंत हैप्पी आप ने अक्सर देखा होगा कि आप "थैंक्स" कहते हैं तो सामने से जवाब में "वेलकम" सुनाई पड़ता है, मेंशन नॉट तो गायब ही हो गया। ये ऐसे ही हुआ, जैसे अमिताभ के स्टार बनते ही शत्रूघन सिन्हा एवं राजेश खन्ना की स्टार वेल्यू। कभी कभी थैंक्स एवं वेलकम का
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दिलों में नहीं आई दरारें

लेखक : कुलवंत हैप्पी पिछले कई दिनों से मेरी निगाह में पाकिस्तान से जुड़ी कुछ खबरें आ रही हैं, वैसे भी मुझे अपने पड़ोसी मुल्कों की खबरों से विशेष लगाव है, केवल बम्ब धमाके वाली ख़बरों को छोड़कर। सच कहूँ तो मुझे पड़ोसी देशों से आने वाली खुशखबरें बेहद प्रभावित
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वरना, रहने दे लिखने को

रचनाकार : कुलवंत हैप्पी तुम्हें बिकना है,यहाँ टिकना है,तो दर्द से दिल लगा लेदर्द की ज्योत जगा लेलिख डाल दुनिया का दर्द, बढ़ा चढ़ाकररख दे हर हँसती आँख रुलाकरहर तमाशबीन, दर्द देखने को उतावला हैबात खुशी की करता तू, तू तो बावला हैमुकेश, शिव, राजकपूर हैं देन
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20 साल का संताप, सजा सिर्फ दो साल!

देश का कानून तो कानून, सजा की माँग करने वाले भी अद्भुत हैं। बीस साल का संताप भोगने पर सजा माँगी तो बस सिर्फ दो साल। जी हाँ, हरियाणा के बहु चर्चित रूचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ मामले जिरह खत्म हो चुकी है, और फैसला 20 मई को आना मुकर्रर किया गया है, लेकिन हैरानी
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ब्लॉगी पत्रकारिता पीत पत्रकारिता?

नेट पर पीत पत्रकारिता ब्लॉग जगत को आए दिन प्रिंट मीडिया के धुरंधर निशाना बनाते हैं। कागजों को काला करते हैं। क्या सच में ब्लॉग जगत के भीतर पीत पत्रकारिता होती है? जहाँ लिखने की आजादी हो, यहाँ लिखने वाला खुद संपादक हो? वहाँ ऐसी बात लागू होती है क्या? हो
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हैप्पी अभिनंदन में शिवम मिश्रा

ब्लॉग ने पूरे हिन्दुस्तान को एक मंच पर ला खड़ा किया है, ब्लॉगिंग के बहाने हमको देश के कोने कोने का हाल जानने को मिल जाता है। देश का कितना बड़ा भी न्यूज पेपर हो, लेकिन आज वो ब्लॉग जगत के मुकाबले बहुत छोटा है। अखबार गली कूचों में बांट कर रह गया है, कारोबार
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आज भी हीर कहाँ खड़ी है?

कुलवंत हैप्पी समय कितना आगे निकल आया, जहाँ साइंस मंगल ग्रह पर पानी मिलने का दावा कर रही, जहाँ फिल्म का बज़ट करोड़ों की सीमाओं का पार कर रहा है, जहाँ लोहा (विमान) आसमाँ को छूकर गुजर रहा है, लेकिन फिर भी हीर कहाँ खड़ी है? रांझे की हीर। समाज आज भी हीर की
May 10 2010 06:30 PM
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माँ दिवस पर "युवा सोच युवा खयालात" का विशेषांक

अगर आसमाँ कागद बन जाए, और समुद्र का पानी स्याही, तो भी माँ की ममता का वर्णन पूरा न लिख होगा, लेकिन फिर शायरों एवं कवियों ने समय समय पर माँ की शान में जितना हो सका, उतना लिखा। शायरों और कवियों ने ही नहीं महात्माओं, ऋषियों व अवतारों ने भी माँ को भगवान से
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कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं आती

म्ममानौ मई को माँ दिवस है, इस शुभ अवसर पर अलग अलग रचनाकारों द्वारा लिखी गई माँ से सम्बंधित काव्य रचनाओं को आपके समक्ष पेश करने का युवा सोच युवा खयालात की ओर से यह एक छोटा सा प्रयास है। इस प्रयास को आपकी ओर से मिल रहा प्यार मेरे हौसले को और बढ़ाता है। निदा
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माँ याद आई व बरसात : समीर लाल "समीर"

नौ मई को माँ दिवस है, इस शुभ अवसर पर अलग अलग रचनाकारों द्वारा लिखी गई माँ से सम्बंधित काव्य रचनाओं को आपके समक्ष पेश करने का युवा सोच युवा खयालात की ओर से यह एक छोटा सा प्रयास है। इस प्रयास को आपकी ओर से मिल रहा प्यार मेरे हौसले को और बढ़ाता है। निदा
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सोनू उपाध्याय की रचना - माँ

नौ मई को माँ दिवस है, इस शुभ अवसर पर अलग अलग रचनाकारों द्वारा लिखी गई माँ से सम्बंधित काव्य रचनाओं को आपके समक्ष पेश करने का युवा सोच युवा खयालात की ओर से यह एक छोटा सा प्रयास है। इस प्रयास को आपकी ओर से मिल रहा प्यार मेरे हौसले को और बढ़ाता है। निदा
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आलोक श्रीवास्तव की रचना-अम्मा

नौ मई को माँ दिवस है, इस शुभ अवसर पर अलग अलग रचनाकारों द्वारा लिखी गई माँ से सम्बंधित काव्य रचनाओं को आपके समक्ष पेश करने का युवा सोच युवा खयालात की ओर से यह एक छोटा सा प्रयास है। इस प्रयास को आपकी ओर से मिल रहा प्यार मेरे हौसले को और बढ़ाता है। निदा
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चार दीवार-इक देहरी माँ - सुधीर आज़ाद

नौ मई को माँ दिवस है, इस शुभ अवसर पर अलग अलग रचनाकारों द्वारा लिखी गई माँ से सम्बंधित काव्य रचनाओं को आपके समक्ष पेश करने का युवा सोच युवा खयालात की ओर से यह एक छोटा सा प्रयास है। इस प्रयास को आपकी ओर से मिल रहा प्यार मेरे हौसले को और बढ़ाता है। निदा
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खट्टी चटनी जैसी माँ।-निदा फाज़ली

आगामी नौ मई को माँ दिवस है, इस विशेष अवसर पर युवा सोच युवा खयालात लेकर आया है निदा फाज़ली की एक नज्म। और कल पढ़े सुधीर आजाद की माँ पर लिखी एक अद्भुत नज्म। बेसन की सौंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ।याद आती है चौका बासन,चिमटा फूँकनी जैसी माँ।बाँस की खुर्री
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हैप्पी अभिनंदन में यशवंत महेता "फकीरा"

क्षमा चाहता हूँ, पिछले मंगलवार को मैं आपके सामने किसी भी ब्लॉगर हस्ती को पेश नहीं कर पाया। समय नहीं था कहना तो केवल बहाना होगा, इसलिए खेद ही प्रकट करता हूँ।हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, उनको अनुभवी जनों और बुद्धिजीवियो का
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लफ्जों की धूल-6

लेखक कुलवंत हैप्पी(1)जिन्दगी सफर है दोस्तो, रेस नहीं,रिश्ता मुश्किल टिके, अगर बेस नहीं,वो दिल ही क्या हैप्पी जहाँ ग्रेस नहीं,(2)कभी नहीं किया नाराज जमाने को,फिर भी मुझसे एतराज जमाने को, जब भी भटकेगा रास्ते से हैप्पी, मैं ही दूँगा आवाज जमाने को(3)क्या
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दार्शनिक संगीतज्ञ का फकीराना ठाठ

अनिल त्रिवेदी, इंदौर की कलम से।पुराना झीना-झीना कुर्ता, मटमैली लुंगी और बेतरतीब ब़ढ़ी हुई दा़ढ़ी। देखने पर सहसा विश्वास नहीं होता कि हम स्वनामधन्य शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व के सुपुत्र मुकुल शिवपुत्र से रूबरू हैं। इस दार्शनिक संगीतज्ञ का यही निराला
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इससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी?

लेखक कुलवंत हैप्पीजिन्दगी सफर थी, लेकिन लालसाओं ने इसको रेस बनाकर रख दिया। जब सफर रेस बनता है तो रास्ते में आने वाली सुंदर वस्तुओं का हम कभी लुत्फ नहीं उठा पाते, और जब हम दौड़ते दौड़ते थक जाते हैं अथवा एक मुकाम पर पहुंचकर पीछे मुड़कर देखते हैं तो बहुत कुछ
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कौन कहता है मदर टरेसा नहीं रही

लेखिका : इंदु पुरी गोस्वामी  आज फिर कुछ लिखने के मूड में हूँ, भई मैं ठहरी बड़ी मूडी औरत इच्छा हुई तो लिख दिया नहीं हुई तो एक महीने तक की-बोर्ड को टच ही नही करना, इससे पहले कि मूड बदल जाये सोच रही हूँ क्यों ना थोडा बहुत और पका ही लिया जाये आप लोगों
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चर्चा विराम का नुस्खा : अधजल गगरी छलकत जाय

लेखक कुलवंत हैप्पी  यह कहावत तब बहुत काम लगती है, जब खुद को ज्ञानी और दूसरे को मूर्ख साबित करना चाहते हों। अगर आप चर्चा करते हुए थक जाएं तो इस कहावत को बोलकर चर्चा समाप्त भी कर सकते हैं मेरी मकान मालकिन की तरह। जी हाँ, मेरी जब जब भी मेरी मकान मालकिन
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नित्यानंद सेक्स स्केंडल के बहाने कुछ और बातें

लेखक कुलवंत हैप्पी नई दिल्ली से इंदौर तक आने वाली मालवा सुपरफास्ट रेलगाड़ी की यात्रा को मैं कभी नहीं भूल सकता, अगर भूल गया तो दूसरी बार उसमें यात्रा करने की भूल कर बैठूँगा। इस यात्रा को न भूलने का एक और दूसरा भी कारण है। वो है, हमारे वाले कोच में एक देसी
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लफ्जों की धूल-5

(1)कुलवंत हैप्पीअगर हिन्दु हो तो कृष्ण राम की कसम मुस्लिम हो तो मोहम्मद कुरान की कसमघरों को लौट आओ, हर सवाल का जवाब आएगाहैप्पी हथियारों से नहीं, विचारों से इंकलाब आएगा(2)नजरें चुराते हैं यहाँ से, वहीं क्यों टकराव होता हैचोट अक्सर वहीं लगती है हैप्पी यहाँ
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हैप्पी अभिनंदन में सुनील कटारिया

सुनील कटारियाहैप्पी अभिनंदन में इस बार आप जिस ब्लॉग हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उसने 'कौन कहता है आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' को सच कर दिखाया है असल जिन्दगी में, लेकिन ब्लॉग जगत में तो आए हुए इन्हें बड़ी मुश्किल से
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वत्स, तुम रो क्यों रहे हो : पीएम टू शशि थरूर

लेखक  कुलवंत हैप्पी एक बार की बात है, एक व्यक्ति रोता हुआ घर जा रहा था, रास्ते में रोककर एक साधु ने उससे पूछा, "वत्स, तुम रो क्यों रहे हो"। तो उसने कहा कि उसका साईकिल चोरी हो गया। साधु ने उसकी बात सुनते ही कहा, "भगवान ने तुमसे साईकिल छीना है,
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क्यों मुझे तेरा इंतजार रहता है : संजय भास्कर

जहाँ प्रेम में अलगाव प्रलय लाता है, वहीं कुछ समय का बिछोह प्रेम को नई लय दे जाता है। बिछोह दौरान प्रेमी के मन में जहाँ प्रेमी के प्रति स्नेह उमड़ता है, वहीं दुनिया भर की बातें सुन सुन कभी कभी एक अनजाना सा डर भी पनपने लगता है। कहीं वो हमें भूल तो नहीं गया,