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दिल-ए-नादाँ

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07 Jun 2010
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२५ साल का इंतज़ार और नाटकनुमा न्याय

कभी-कभी लगता है की शहर भी अपने लोगों की तरह हमें कर्ज़दार बनते हैं. आज भोपाल गैस त्रासदी पर अदालत का मज़ाकनुमा फैसला आने के बाद मुझे लग रहा है की भोपाल के गले से लिपट के रो लूँ. शायद उसका मन भी कुछ हल्का हो जाये. १५००० से ज्यादा मौतों और २५ साल के मानसिक
 
संदीप पाण्डेय
टैग: bhopal-genocide
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साए में धूप

इससे पहले की आप अपनी रोजाना की जद्दो जहद को अंतिम समझ लें.इन तस्वीरों को गौर से देखिये..ये तस्वीरें मैंने पिछले साल के जाड़ों में इंदौर से ४०-४५ किमी की दूरी पर ली थीं। यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती हैचलो यहाँ चलें और उम्रभर के लिएन हो कमीज तो पाँवों
 
संदीप पाण्डेय
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दिल-ए-नादाँ

मेल पर आया एक चुटकुला आप सब से साझा कर रहा हूँ। मजेदार है। कृपया इसे बिना किसी वाद के चश्मे के पढ़ें और आनंद उठायें - ब्लॉगरWhat If Columbus Had Been Married ?· Where are you going?· With whom?· Why?· How are you going?· To discover what?· Why only you?·
 
संदीप पाण्डेय
May 31 2010 06:23 PM
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दिल-ए-नादाँ

अनिल गोयल भोपाल में रहते हैं। मां पर लिखी गई उनकी कविताएं दिल को छू लेने वाली हैं। उसी चौखट से उनके कविता संग्रह का नाम है। उन्होंने इस बार एक अभिनव प्रयोग किया है संग्रह की प्रत्येक कविता के साथ इंटरनेट से डाउनलोड की गई कोई तस्वीर चस्पा है जाहिर है
 
संदीप पाण्डेय
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मंटो मेरा महबूब अफसानानिगार

मंटो के जन्मदिन पर पिछले साल यह पोस्ट लगाई थी। इस साल नया कुछ नहीं लिख सका सो उसी लेख को थोड़े हेरफेर के साथ लगा रहा हूं- ब्लागरआज 11 मई है मेरे महबूब अफसाना निगार सआदत हसन मंटो का जन्मदिन। मंटो की एक पंक्ति है-‘‘ मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी
 
संदीप पाण्डेय
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मंटो मेरा महबूब अफसानानिगार...

आज 11 मई है मेरे महबूब अफसाना निगार सआदत हसन मंटो का जन्मदिन। मंटो की एक पंक्ति है-‘‘ मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी यह सोचता है कि सबसे बड़ा अफसाना
 
संदीप पाण्डेय
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निरुपमा के लिए

युवा पत्रकार निरुपमा पाठक की दिल दहलाने वाली हत्या ने हमारे बीच रह रहे छदम प्रगतिशीलों के नकाब उतार दिए हैं. वो अब हत्यारी कौम के पक्ष में खुल कर सामने आ गए हैं. वो निरुपमा की मौत के अस्पष्ट कारणों के कानूनी पेंच को इतनी मजबूती से उठा रहे हैं जैसे की
 
संदीप पाण्डेय
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निरूपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं

सोचा नहीं था कि नए लैपटाप पर कुछ लिखते हुए इस तरह हाथ कांपेगा। 29 अप्रैल 2010 वो तारीख थी जिस दिन निरूपमा पाठक नामक एक युवा सपने का असामयिक अंत हुआ था। वो भी किसके हाथों! उसके घरवालों ने उसकी महज इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह एक लड़के से शादी करना चाहती
 
संदीप पाण्डेय
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मार्क पोलिस का गिटार और चे-ग्वेरा (उदय प्रकाश का साक्षात्कार - 3)

ब्लाग जगत से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने पर जो अजीब सी बेचैनी रही उसके बारे में क्या कहूं। हुआ दरअसल ये कि लंबे समय तक वफादार साथी रहा मेरा डेस्कटाप कंप्यूटर अचानक साथ छोड़ गया। ये जो पिछले लगभग १५ दिनों का अंतराल था वह डेस्कटाप की शहादत व नए लैपटाप के
 
संदीप पाण्डेय
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यह एंड आफ एनोसेंस है (उदय प्रकाश का साक्षात्कार-2)

दिनेश श्रीनेत- आज की तारीख में या पहले भी आप रचनात्मक स्तर पर कब इतना दबाव महसूस करते हैं कि यह लगने लगे कि अब कुछ लिख ही देना चाहिए।उदय प्रकाश- मैं तो शायद यह कहूं कि लेखक जो होता है वह 24 घंटे लेखक होता है।अगर कोई एसी व्यवस्था हो... जैसे लुई बुनुएल की
 
संदीप पाण्डेय
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जो कमजोर हैं वो मारे जाएंगे (उदय प्रकाश का साक्षात्कार -1)

हमारे समय के सबसे सशक्त कथाकारों में से एक उदय प्रकाश का यह साक्षात्कार दिनेश श्रीनेत ने लिया है। साक्षात्कार का प्रकाशन संदर्श (अंक-14 2009) में हुआ है। हाल ही में इस पर मेरी नजर पड़ी। उदय प्रकाश की पहली रचना जो मैंने पढ़ी थी वह थी इंडिया टुडे साहित्य
 
संदीप पाण्डेय
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हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही जा रही है

हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगीऔर तुम मारे जाओगेऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम होवरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहींऔर मारे जाओगेहँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते होसब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकरएक
 
संदीप पाण्डेय
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भगत सिंह की याद में

उनकी शहादत के 75 वर्ष पूरे होने पर ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फाँसी दी तो वे केवल तेईस साल के थे। लेकिन आज तक वे हिन्दुस्‍तान के नौजवानों के आदर्श बने हुए हैं। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने जितना काम किया और जितनी बहादुरी दिखायी, उसे
 
संदीप पाण्डेय
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"मैं बेसब्री से सिनेमा के अंत की प्रतीक्षा कर रहा हूं"

जब मैं आलोचक था तब भी स्वयं को फिल्मकार मानता रहा। आज मैं स्वयं को आलोचक मानता हूं , एक प्रकार से हूं भी, बल्कि पहले से कहीं अधिक मुखर। अब मैं समीक्षा लिखने के बजाय फिल्म बनाता हूं, आलोचनात्मकता इसमें समा गई है। मैं खुद को एक एसा निबंधकार मानता हूं, जो
 
संदीप पाण्डेय
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स्त्रियां

पढ़ा गया हमें जैसे पढ़ा जाता है कागजबच्चों की फटी कापियों का चनाजोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!देखा गया हमको जैसे कुफ्त हो उनींदे देखी जाती है कलाई घड़ीअलसुबह अलार्म बजने के बाद!सुना गया हमको यों ही उड़ते मन से जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गानेसस्ते
 
संदीप पाण्डेय
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इलास्टिक व एक अन्य कविता

पुनीत की दो कविताएं इलास्टिक व घूम रहा है अब भी:उनका परिचय मेरे ब्लाग पर यहां पढ़ेंहोते है कई तरह केरिश्तो के बंधनकुछ सूत से कच्चेज़रा सी हरकत , टूट गएकुछ लोहे से मज़बूतजोर लगाओ , पंख पसारोफर्क नहीं कुछ पड़ता हैहमारा रिश्ताबंधन है इलास्टिक काअब न जाने
 
संदीप पाण्डेय
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सिर्फ आरक्षण से क्या होगा?

मृत्युंजय कुमार झासंसदीय गरिमा को तार- तार कर राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो गया है। बिल पास होने पर एक दुसरे की धुर विरोधी बीजेपी नेता सुषमा स्वराज और सीपीम नेता वृंदा करात ने गले मिलकर खूब जश्न का इजहार किया। ऐसे और भी कई नजारे संसद के गलियारों
 
संदीप पाण्डेय
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दुख पालने वाली लड़की

रुलाई धुलाई छोड़कर इधर थोड़ा बैठोएक एक कर खोलो दुख की पोटली..दिखाओ अपने छुपाए हुए जख्मों कोकितने दिनों मे ये कितने गहरे हुएऐ लड़की सुन रही हो!बाहर जरा फैला दो यह सबदुख तुम्हारे बिल्कुल भीग गए हैंहवा में होती है एक विलक्षण खासियतकुछ दुखों को उड़ा देती है
 
संदीप पाण्डेय
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Mar 07 2010 09:32 AM
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राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनता रंगपंचमी

मालवा की होली का रंग देश के अन्य इलाकों की होली से जुदा है। देश के ज्यादातर इलाकों में जहां यह रंगीला त्योहार एक दिवसीय कोरम बनकर रह गया है वहीं मालवा निमाड़ अंचल में अभी भी लोग पांच दिन तक रंगों में डूबे रहते हैं। धुलंडी से लेकर रंगपंचमी तक मालवा फगुआ
 
संदीप पाण्डेय
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केदारनाथ सिंह की दो कविताएं

तीसरे सप्तक के कवि, आलोचक और चिंतक प्रोफेसर केदारनाथ सिंह को हिंदी अकादमी द्वारा 2009-10 के लिए प्रतिष्ठित शलाका सम्मान देने की घोषणा की गई है। बनारस हिंदू विशविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने यहीं से पीएचडी की उपाधि हासिल की। उत्तरप्रदेश के
 
संदीप पाण्डेय
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दो चार कदम चल सकते हो

दो चार कदम चल सकते हो ,दो बातें भी कर सकते होदो दिन की है पहचान मगर ,तुम इतना तो कर सकते होदो कदम जो मेरे साथ चलोतो जान सकोगे दशा मेरीकुछ भाव मेरे , कुछ शब्द मेरेकुछ आग मेरी , कुछ व्यथा मेरीमैं चलूँगा धीरे-धीरे ताकिबातें सालो साल चलेंमुझसे भी धीरे चले
 
संदीप पाण्डेय
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यौन कुंठित कट्टरपंथी हैं हुसैन

आज दोपहर ओम भाई से हुसैन साहब के बारे में बात हो रही थी। उन्होंनेएक बात कही कि हुसैन के लिए भारत की नागरिकता का त्याग करनाइतना ही महत्व रखता है जितना कि उनका जूता – चप्पल न पहनना ।हुसैन अच्छे कलाकार हैं. ढेर सारे दूसरे कलाकारों की तरह. ये उठता हैकि हुसैन
 
संदीप पाण्डेय
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पुनीत की कवितायेँ

आप पुनीत से मिलेंगे तो मेरे इस हंसमुख युवा दोस्त की आँखों में एक अजीब सा खलल दिखेगा आप को। उसका एक मासूम सा सपना है जिसे करोडो आँखें अलग अलग समय में देखती रही हैं । वो इस दुनिया से खुश नहीं है और एक दिन इसे बदल देना चाहता है। पुनीत को पढना अच्छा लगता है।
 
संदीप पाण्डेय
Feb 27 2010 08:25 PM
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सचिन का दोहरा शतक, प्रभाष जी आप देख रहे हो न...

यह लेखअविनाश जी की डिमांड पर मोहल्ले के लिए जल्दबाजी में लिखा था। आप भी पढ़ें- संदीप कभी कभी ही ऐसा होता है कि हम कर्मचारी से इंसान हो जाते हैं अचानक। आज शाम जब ऑफिस पहुंचा, सचिन 165 पर खेल रहे थे। रेल बजट देखा रहाथा कि एक साथी ने बताया सचिन 175 पर पहुंच
 
संदीप पाण्डेय
टैग: खेल
Feb 24 2010 10:37 PM
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मखमली आवाज का वो जादुई स्पर्श ।

संगीत की ताकत, उसके जादू के जिन किस्सों को हम बचपन से सुनते आए हैं। उनकी हकीकत से रूबरू होना हो तो तलत महमूद की मखमली आवाज से होकर गुजरना होगा। तलत साहब की आज 86वीं सालगिरह है।1924 में लखनऊ के एक रवायती मुस्लिम परिवार में जन्में तलत महमूद को कुदरत ने
 
संदीप पाण्डेय
Feb 24 2010 01:17 PM
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असफल प्रेम और आत्महत्या

आज अखबार में छपे राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में रोजाना कम से कम दस युवा असफल प्रेम के चलते जिंदगी से तौबा कर लेते हैं। ये आंकड़ा गरीबी व बेरोजगारी के कारण होने वाली खुदकुशी की घटनाओं की तुलना में कहीं ज्यादा है।हम तब शायद
 
संदीप पाण्डेय
टैग: टूटन
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प्रेम के लिए दो मिनट का मौन

कल वैलेंटाइन डे है। कुछ साल पहले जब मैं भोपाल में था तब वहां इसका ताजा-ताजा विरोध शुरू हुआ था। उन दिनों मैंने यह कविता लिखी थी। एक बार ब्लाग पर डाल चुका हूं आज दोबारा पोस्ट कर रहा हूं।फागुन के पागल महीने मेंहम चाह ही रहे थे गाना बसन्ती गीतकी आ गयानए
 
संदीप पाण्डेय
Feb 13 2010 02:23 PM
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मुहाजिरनामा

मुहाजिर का अर्थ है एक जगह से उखड़कर दूसरी जगह नए सिरे से बसने वाला। इस तरह देखें तो हम सब के भीतर कहीं एक मुहाजिर बैठ हुआ है। मुंबई से मालवा तक मुहाजिरों की एक परंपरा सी बन गयी है. कोई बाखुशी मुहाजिर का चोला ओढ़ रहा है तो किसी के के लिए शब्द मजबूरी और
 
संदीप पाण्डेय
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किसका जूता, किसका सर...

यह पहली बार नहीं हुआ है और हर बार नजरअंदाज किया गया हैं फर्क सिर्फ यह है कि इस मर्तबा ‘इस बार बार की गलती’ के साथ ऐसी शख्सियत का नाम जुड़ा है जिसे हम गुलजार के नाम से जानते हैं और जो हमारी नजरों में पाकीजा एहसास की तरह दर्ज रहा है। बिल्कुल उनके लिखे गीत
 
संदीप पाण्डेय
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धर्म की नितांत दार्शनिक व्याख्या क्यूं।

अजीत कुमारधर्म को लेकर अपने अपने समय में दार्शनिकों की घोषणाएं चाहे जो भी रही हो। व्यवहारिकता के धरातल पर धर्म की अपरिहार्यता समाज में पहले भी थी और आगे भी रहेगी। ईश्वर को मृत मानने की नीत्शे की घोषणा से लेकर विचार और इतिहास के अंत तक की कई घोषणाएं की जा
 
संदीप पाण्डेय
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पत्रकार की छंटनी पर हल्ला क्यों नहीं

पत्रकार की छंटनी पर हल्ला क्यों नहीं मृत्युंजय कुमार झा अनिल चमड़िया की महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में नियुक्ति रद्द किये जाने को लेकर ब्लॉग पर हाय तौबा मची हुई है। इतना ही नहीं अब इसको लेकर ह्स्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है।
 
संदीप पाण्डेय
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जानलेवा खेल

रात एक बजेजाने किस मूड में भेजे गए उस इमेल कोसुबह संभलने के बाद उसने ख़ारिज कर दिया हैये जिन्दगी हैलव आज कल नहींवह कहती हैमैं कहना चाहता हूँ की जिन्दगीराजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहींप्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बाउससे अपरिचित हो पाना बस का नहींचाहे वो
 
संदीप पाण्डेय
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अथ श्री महाकाल दर्शन कथा

धरम-करम में हालांकि अपनी कोई आस्था नहीं है लेकिन मां बाबूजी खासकर मां बहुत अधिक धार्मिक प्रवृत्ति की है। सो शुक्रवार को उन्हें लेकर महाकाल की नगरी उज्जैन गया था। पता नहीं क्यों बचपन से हर बार ऐसा हुआ है कि जब भी किसी धार्मिक स्थान पर गया हूं विरक्ति थोड़ी
 
संदीप पाण्डेय
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इश्किया : कमीने के घटिया एक्सटेंशन में ओमकारा की मिक्सिंग

विशाल भारद्वाज के नाम, विद्या बालान की धुंआधार प्रमोशन और गुलजार के कलमबद्ध कुछ खूबसूरत गीतों ने फिल्म इश्किया देखने पर मजबूर तो कर दिया लेकिन मामला कुछ जमा नहीं। इश्किया ठीकठाक फिल्म है लेकिन यह निराश करती है।पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले को
 
संदीप पाण्डेय
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विरोध ही बदलाव का मूल है...

अजीत कुमारव्यावसायिक सिनेमा और मीडिया, पापुलर कल्चर की वह सबसे पापुलर विधा है जिससे आप विचार या विरोध् के बुनाव या विस्तार की उम्मीद नहीं कर सकते। उल्टे खंडित सच के नाम पर यह विरोध्, संगठन, जनपक्षधरता और आंदोलन का लगातार माखौल उडाने में लगा है। आज की
 
संदीप पाण्डेय
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ज्योति बाबू की राजनीतिक स्वीकार्यता अप्रतिम थी

अजीत कुमार अपने पिछले संक्षिप्त आलेख में मेरा मकसद यह कहना था कि एक राजनेता की राजनीतिक उपलब्धि सत्ता में हिस्सेदारी पर भी बहुत कुछ तय होती है। लेकिन सत्ता के सहारे हासिल राजनीतिक उपलब्धि ज्यादातर मौकों पर सिद्वांत, विचारधारा और विकास को लेकर घोर
 
संदीप पाण्डेय
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अधिनायक

इस गणतंत्र दिवस पर मेरे प्रिय कवि रघुवीर सहाय की कविता अधिनायक आप लोगों के लिए राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है।मखमल टमटम बल्लम तुरही पगड़ी छत्र चंवर के साथ तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर जय-जय कौन कराता है।
 
संदीप पाण्डेय
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तीस मिनट का वजन कितना होता है...

यह जानकारी क्या रूह को कंपा देने के लिए काफी नहीं है कि देश में औसतन हर तीस मिनट पर एक किसान आत्महत्या कर रहा है। तीस मिनट कितना समय होता है लगभग उतना जितना मैं शायद अक्सर अपने दोस्त से मोबाइल पर बात करने में बिता देता हूं या फिर आफिस की कैंटीन में चाय
 
संदीप पाण्डेय
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दो संसार

ये कविता मिथिलेश ने लिखी है मेरे साथ इंदौर भास्कर में सेवारत हैं. मिथिलेश खेल डेस्क पर हैंजहाँ मैं रहता हूँवहीँ पास में एक नाला बहता हैनाले के पार एक अलग है दुनिया बसती हैइस पार से एकदम जुदाइस पार घर नहीं हैंबंगले हैंबड़ी कारें हैंलान हैंरोज धुलने वाली
 
संदीप पाण्डेय
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एल्विस प्रेस्ली : द किंग ऑफ़ रोंक एंड रोल

बीसवीं सदी में विश्व संगीत को नयी दिशा देने वाले फनकारों की यदि कोई सूची बनाई जाये तो क्या वह एल्विस प्रेस्ली के जिक्र के बिना पूरी होगी. ८ जनवरी १९३५ को अमेरिका के निहायत गरीब परिवार में जन्मे एल्विस ने आधुनिक संगीत को देश-दुनिया की दीवारों से परे ले
 
संदीप पाण्डेय