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ताना-बाना

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05 Jun 2010
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हमारा पर्यावरण हमारी चिन्ताएं ....हमारी नदिया ...(विश्व पर्यावरण दिवस पर...) //-

ये चित्र और स्लोगन अहिल्या बाई होलकर की पूर्व राजधानी महेश्वर घाट से करीब छ माह पूर्व लिया गया था ....नर्मदा किनारे स्थित इस घाट तक पहुँचने वाली एक संकरी सड़क पर दोनों तरफ की दीवारों पर पर्यावरण जागरूकता को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है ..पश्चमी मध्यप्रदेश
Jun 05 2010 04:25 PM
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पलाश के जंगल की तरफ देखो तो मानो आग लग गई हो ,पलाश फूलता है तो खूब दुःख देता है दर्द के साथ ,सारे फूल झड कर जमीन पर गिर बिखर जाने में अपना माथा धुनक

बहुत दिनों तक हलके नीले आसमान से उसे चिढ होती रही ..जब थी तब थी लेकिन अब नही ,ठीक जिसके नीचे एक पलाश का एक जंगल था उसका ...और स्मृतियों में अंटती हुई एक उनींदी शाम तेजी से घनी होती हुई ,जहाँ से दिल दिमाग उसे जंगल की पथरीली राहों संग झुलसा देने वाली गर्मी
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जलती-बुझती रोशनियों का एकालाप... एक माँ के दिल से... //-

ये एक बात बचपन से सुनती आई हूँ, मेरी नानी कहा करती थी, फिर माँ और जब में खुद एक 18 साल की बेटी की माँ हूँ तो अनायास मेरे मुँह से भी कभी-कभार ये निकल ही जाता है - "तुम (ये) लड़की क्या निहाल करेगी..!!"... लड़कियों से माँ को ही सबसे अधिक अपेक्षा होती है, वो
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काश कोई महसूस करता, मेरे शहर के तालाब की फैली..

काश कोई महसूस करता ,मेरे शहर के तालाब की फैली ,सीमातीत थरथराहट ,और मरी हुई -बेजान पत्तियों की ,लगातार कसमसाहट .डोंगियाँ चली जाती है ,इस पार से उस पार ,अपने विकृत अस्तित्व तले ,मरी हुई पत्तियों को ओर मारते हुए ,और छोड़ जाती है ,मौन तालाब के अंतर पर ,क्षण
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उदास गीत नहीं था उनके पास... जब्बार ढ़ाकवाला... एक श्रद्धांजलि... //-

कल जब inside news से खबर आई, जब्बार ढ़ाकवाला नहीं रहे, उनकी गाडी एक खाई में गिर गई... यह महज खबर नहीं थी मेरे लिए, कभी कभी शब्द भी दुखों को पकड़ नहीं पाते हैं, यकीन नहीं हुआ... अपना अकेलापन खोये बगैर जो व्यक्ति अपनी कविता में बना रहा, जीवन के राग-विराग में
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वो चीजें जिनके बीच ठिकाने बनाए गए उन चीजों के बीच चीजें द्रश्य रचती है, और पिघलती है .इक्छाओं के उच्त्तम तापमान पर , मौसम यूँ चीजों की शिनाख्त करता

वो चीजें जिनके बीच ठिकाने बनाए गएउन चीजों के बीच चीजें द्रश्य रचती है,और पिघलती है .इक्छाओं के उच्त्तम तापमान पर ,मौसम यूँ चीजों की शिनाख्त करता है ,और बुरा है यूँ उनकी पवित्रता भंग करना ,दुर्दिनो में बेतरतीब सा है चीजों का चरित्र ,बेमतलब रुझानो में
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देखना लौटती डोंगियों को जिनके आवारा मस्तूलों पर हवा के थपेड़ों ने जर्जर शब्दों में कुछ लिख दिया है .इस मायावी-दुनियावी का शायद कोई गीत ...

पतझर कि उमस भरी सुबह में एकाध दिन ऐसा भी होता है ,...यही की एक छोटी सी जगह में दो तीन शब्दों से बना एक नाम अपने तपे हुए रंग में घटित होता हुआ दिखाई देता है,एकदम अनुतरित ,गुपचुप अपने मौन में ,अपनी यात्रा से उबा हुआ,थका सा ,आरोह-अवरोह में लेकिन किसी पूर्व
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इन दिनों सेमल के पेड़ पर ... //-

वो अपनी चुप्पी में मगन है,अपने दुःख में सुखी, -गर्वोंमुक्त,अपनी जीत में हार कि ख़ुशी लिए ,अपने सच के झूट से चमत्कृत ...वक्त से आगे जाना चाहता है ,सितारों के पार ,ना जाने किस-किस में व्यक्त होना चाहता है ,उसका सुख....इन दिनों सेमल के पेड़ पर ,लाल सुर्ख
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// काशी बाई का सूरज....मुश्किलें चाहे जीतना आदमी को मजबूत बना कर जीना आसान बना दे लेकिन मुश्किल हालात में जीना आसान काम नहीं है ...//

काशी बाई का नाम सूरज बाई होना था दिनभर तपने के बाद दूसरों को गर्माहट और रौशनी की खुशी दे कर डूब जाने वाला ...मुश्किलें चाहे जितना आदमी को मजबूत बना कर जीना आसान बना दे लेकिन मुश्किल हालात में जीना आसान काम नहीं है, हालांकि नई प्रौधोकियाँ ,भ्रूण ह्त्या
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मध्यप्रदेश की बाघ कला के ये हुनरमंद कलाकार... "अब इन्हें अपनी जिन्दगी में कोई बड़े चमत्कार की दरकार भी नहीं" //-

यूं तो हर दिन महीनो सालों दर साल वो काम करते रह्ते हेँ,कपड़ों को रंगना धुलाई करना उन पर भिन्न आकार-प्रकार के छोटे बड़े पारंपरिक फूलों या अन्य डिजाइन की छपाई करना उनका पेशा है...और उनकी आजीविका का एक मात्र साधन भी अपने पेशे में पारंगत होने के बावजूद
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जो कहा जाना है -वो जो कहने से छूट जाता है ... अक्सर वही सब कुछ कह देने को... जहां दहकने शुरू हुए हेँ अभी-अभी पलाश..//

यूं तो वसंत आया हैकहने को ---ठिठुरते शिशिर की शीत के बाद ,इस बार थोडा जल्दी ,लेकिन यकीन है ..इस-बार खराब मौसम ,और इतने खराब वक़्त में भी ,उस छोर से बंधा होगा कोई गुनगुना पल जैसे नाव बंधी होती है ,एक गहरी आश्व्शति में ,दिखने वाली शांत सी सतह पर ,बावजूद
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शहर में जंगल, जंगल में एकांत पार्क, पार्क में सफ़ेद सिरस का पेड़... "Don't leave anything except your footprints"...

नए साल की पहली सुबह ,सड़क के दोनों ओर कोहरे में ढंके पेड़ अधमुंदी आँखों से सुबह की सैर पर निकले लोगों की धीमी पदचाप की आवाजों के साथ आगे बढ़ते क़दमों का स्वागत करते हैं, घास और पत्तियों पर से गुजरते एक ख़ास आवाज़,एक ख़ास खुशबू के साथ, सुबह होती ही जाती
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एक तपिश थी शब्दों को जलना था,वहीँ म्रत्यु की पदचाप थी, चमत्कार था ,अनेक नामो में समाई उसकी उष्मा थी... //

क्या वो इक्छाओं का परिविस्तार था .उच्चारित स्वरों में ,ना कह कर भी कितने गहरे उतर गई एक उम्र वसंत मेरे भीतर था ,वर्षा और शीत भी आग की लपट भी और उमस भी थी, साथ जीने की जीवनेछा धुंधले पृष्टों में दबी थी बीते कई मौसमों की पदचाप थी घर के जिस कोने में दिय
Dec 29 2009 11:45 AM
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//वक्त के पार -अव्यक्त .उस वक्त की तरह

तुमने एक बहुत उंचा-नीचा उबड़-खाबड़,कंटीला-पथरीला ,पहाड़ गढा मेरे लिए और कहा -जा रहो और करो इन्तजार ताउम्र ये आजमाने की कोशिश थी ,या दूर बहुत दूर रहने की कवायद नही जान पाई ...फिर एक पुल बुना मैंने , अपनी संवेदनाओं के छोटे बहुत छोटे टुकड़े जोड़कर, ढलान
Dec 29 2009 11:45 AM
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इच्छाएं, सेकेण्ड की सुई की तरह अन्दर ही अन्दर एक ही वृत में गोल घूमती है... समुद्र किनारे फ़िर जंगल एक नए सिरे से जलता है, पीछे काली ज़मीन छोड़ता...

एक अशिष्ट बदलाव था अध् चटके फूल चटकीली धुप मैं खिले बिना ही सिरे से काले हो सूख कर झड़ रहे थे गर्म बजती हुई हवा सन्नाटे को चीरती, भरी दोपहरी अजीब तर्क जुटाती,...गले ना उतरने वाले ,एक पुर इत्मीनान समय का कोने मैं दुबके बैठे रहना ..किसी विस्मृत नाद का
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गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इ

कुछ गीतों के पास हम जाते हेँ ,और कुछ हमें बुलातें हेँ ,जिनकी आद्रता हमारे मन प्राण और आँखों में बस जाती है उन गीतों की सच्चाई और संवेदना हमारी चेतना को छूती ही नहीं, हमारी आत्मा को थाम भी लेती है. दुःख जैसे शाश्वत सच को सुख में तब्दील करने वाला संगीत
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//-जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है.. उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है...

लगातार होती बेमौसमी बारिश से आँगन की दीवारों से प्लास्टर छोटे-बड़े टुकड़ों की शक्ल में झड रहा-था,जिस दीवार से सटकर दोपहर की हलकी अप्रत्याशित धूप में थोड़ी देर बैठकर वो कुछ पढ़ना चाहती थी.लेकिन उसे इरादा बदलना पडा,खिड़की से आती मामूली धूप के लकीर नुमा
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मणिपुर की लोह स्त्री शर्मीला की कहानी - शर्मीला समय की उचाइयों पर...

मणिपुर की रहने वाली शर्मिला इरोम की ९ साल पहले एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप मैं पहचान थी ,वो स्थानीय समाचार पत्र मैं महिला मुद्दों पर बेबाक लिखा करती थी,लेकिन शर्मिला से जब मैं ७ मार्च २००९ को मिली तब वो एक कैदी थी और उसी दिन उसे मणिपुर के
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उसका खुश चेहरा,और सात तालों में कैद चुप्पी बोलती है घोलती है --बेखबर, जलतरंग की झिलमिल / / -

एक छोर से आसमान ढह गया धूल-धूसरित, धरती भी थोडी सी डूबी, और जम गई -इस बीच एक धुन्द सी और ये कहते -कहते रुंध गया है गले में ये जो ,कुछ एक ही समय में , अगम राह में निर्जन इकठ्ठा कोई संत्रास , भीतर-बाहर उफनता है ये तो ..ठीक नहीं धूप सर पर है और नापना शू
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प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...//-

ह र साल दिवाली आती है मनो- कूढा-करकट हम घर से बाहर फ़ेंक देतें हें पर मन मस्तिष्क पर जमा थोडी भी धूल हम नहीं उतार पातें हें ... लाख गुनी ग्यानी कह गये की मन का मनका फेर .पर अब तो सब कुछ असंभव लगता है ..ये भी सच है की किसी के मन में हम चाहे जितना गहरा
Oct 14 2009 07:42 PM
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-एक पुरसुकून आसमान की तलाश ,मन खुश था अपने ही सवाल पर जो उसके जवाब की प्रति क्रिया से छूट गया था चलो अच्छा हुआ... एक कांट-छांट मन की सतह पर होती है

लगातार बरसात की नीम ठंडक से चिढ होती है ,बहुत दिनों तक धूप ना निकले तो मन कुढ़ता है खैर बरसात को कभी ना कभी तो रुकना ही होता है बारिश ख़त्म भी होती है ,हलकी सी धूप के साथ मौसम में ठंडक की शुरुआत ,धूप वाली ठण्ड, मन को तसल्ली ...मिलती है इस सुकून के साथ की
Sep 26 2009 09:07 AM
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माँ मुझे यकीन है तुम मुझे सुन रही होगी... शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...//

शब्द घुप्प अंधेरों में चले गये थे ,मां के अर्थों में शब्दों को ढूढना कितना मुश्किल ...मां थी जब सूरज यूँ ही नियत स्थान से निकलता था लेकिन डूबता मां की आँखों में ही था ..कितने ही काम, ताजे-बासे ,कितनी आशाएं ,कितनी चिंताएं एक साथ संजोई दिखलाई पड़ती थी उनकी
Sep 02 2009 12:24 AM
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/इच्छाओं की एक छूटी हुई अधूरी फेहरिशत में हमारे नमकअश्रु के प्रार्थनाओं के जलतीर्थ में तुम चाहो तो भी ना चाहो तो भी

तुम नही चाहोगे तो भी बदलेंगे .मौसम घूमेगी..धरती बरसेंगे बादल और आएँगे ,याद हमऔर वे लौटेंगी तितलियाँ ..बेहिचक तुम्हे छू कर,जिनके पंखों पर लिक्खी समय ने कदाचित् एक इंद्रधनुषी इबारत तुम नही चाहोगे --तो भी, इस ब्रह्मांड के ख़त्म होने से पहले देखोगे
Aug 29 2009 11:17 PM
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//कच्चे कचनार के नीचे खड़े भाई खूब याद आते हैं... उस छोटी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हासिल थी जहाँ हमे..//

किसी छोटे बच्चे की गुल्लक मैं रखी ,सहेजी और जतन से जोड़ी गई निधि की तरह , उसके भीतर छोटे बड़े सिक्कों और मुडे-तुडे नए पुराने नोटों की शक्ल मैं जब स्मृतियों को जोड़ती हूँ ...वक़्त जरूरत तोड़ती हूँ --फिर सोचती हूँ ,यदि स्मृतियों को जीवन से हटा दें या उसमें
Aug 05 2009 12:22 PM
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कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास

कुछ चीजों के साथ समय का फेरा था /औरइतिहास के जीवाश्म मैं परिवर्तित होने से /बचा हुआ समय ही है-/ और था /हमारे पास / तुम कभी नही जान पाओगे / पानी मैं घुलती / मौसमों मैं डूबती / एक सघन सात्विक मौन शाम / तुम्हारे ओझल होने तक / किस कदर निरंतर पीछे छूटती ह
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'प्रेम एक ऐसा दृढ़ निश्चय है ,जो हमारी आत्मा के साथ रहता है और जो वतमान को अतीत तथा भावी युगों से जोड़ता है ,

खलील जिब्रान की एक पुस्तक '' दी अर्थ गोड्स का हिन्दी मैं अनुवाद धरती के देवता नाम से .. माई दयाल जैन ने किया था और इसका चौथा सस्करण [ १९८९ ] मैं सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन द्वारा हुआ था जिसकी कीमत केवल ६ रूपये मात्र है जो मुझे देहली के फूटपाथ से मिली
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//बलात्कार एक स्त्री का अवमूल्यन है,उसके मौलिक अधिकारों का उलंघन,न्यायविदों के हाथ मैं सिर्फ कलम है, कोई मिसाल, नही कोई मशाल नही जिसे बतौर पथ प्रदर्शक

कुछ वर्ष पूर्व मुंबई की एक चलती ट्रेन मैं ,एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार हुआ ,उस कम्पार्टमेंट मैं करीब सात-आठ लोग थे जिनमे एक बडे अखबार का संवाददाता भी था ...उस वक्त टी वी चैनल्स ,अखबारों मैं ये ख़बर प्रमुखता से आई ,और चली गई ...बाद के वर्षों मैं भी
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एक चौकन्नी चिडिया की तरह मन आसन्न खतरे को भांप लेता है ओर एक खीज भरे रास्ते से गुजर जाता है... क्या मांगू उससे वो सब कुछ दे सकता है.

वो जितना आगे बढ़ी थी ,उतना ही पीछे लौटना था ..उस मुकाम से जहाँ वो थी आदेश पहले था और नियति बाद मैं ..गिने चुने क़दमों के साथ बिल्कुल आगे देखते हुए ..लौटना पीछे की ओर नियत दूरी को पैरों से साधते हुए .बचपन मैं ये खेल भाई-बहन दोस्तों के साथ खेलते हुए वो
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// लाल कृष्ण आडवाणी के सितारें गर्दिश मैं...हार की संभावना ..सुनिश्चित

लगभग साढे पन्द्रह लाख आबादी वाले अहमदाबाद की गांधी नगर संसदीय सीट पर इस बार लालकृष्ण आडवाणी का मुकाबला कांग्रेस के सुरेश पटेल से है...भा.जा .पा के घोषित प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी जी ने इस क्षेत्र मैं १५ सालों से लगातार जीत हांसिल की है .और
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कुछ आहटें बाहर है ,कुछ दस्तकें भीतर,समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मेंअपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं ....,

अब भी कुछ टूट रहा है धरती मैं, और छूट रहा है ,आकाश मैं , थोडा सा झांकते हुए ,चट्टानों से, कुछ भीग रहा है पहाडों के पार, कुछ आहटें बाहर है , कुछ दस्तकें भीतर, समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मैं, अपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं किस तरह पवित्र और सुरक्षित रखा है
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मेरे पास ना कोई सबूत है,ना दलील मैं सिर्फ उसकी कहानी छाप सकती हूँ ...चार कहार मिले डोलिया उठाय -अपना बेगाना छूटो ही जाय .

मध्यप्रदेश में मुंगावली खुली जेल के लिए प्रसिद्ध रहा है हालांकि अब वहां जेल नही ,बस्ती के गरीब-बेसहारा लोगो ने कच्ची-पक्की दीवारें उठाकर वैध-अवैध सर छुपा सकने लायक घर बना लिये है ,लगभग चार साल पहले मेरा वहां जाना हुआ था, कुछ पत्रकार साथी और एक महिला
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ताना-बाना

यूँ कहें कि जब कुछ घट रहा होता है तो वो सच होता है ,लेकिन कितना ..उस घटने के बाद ही पता चलता है चीजें और वक्त अपनी अर्थवत्ता साबित करती हें,और कभी कभी दलीलें कारगर नही होती ...उसने कैसे -कैसे बहाने किए अपने आप से ..तब एक अलग ढंग से पसरे सन्नाटे ने धू
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पिता...तुम हो आस-पास हमारे....

पिता...तुम हो हमारे आस-पास महाबोधि वृक्ष थे तुम जिसकी छाया में पनपी ये साधारण काया हमारी हथेलियों की रेखाओं में बसी है , तुम्हारी कर्मठ ऊर्जा की गर्माहट, महकता है तुम्हारा चेहरा अब भी केया गंध सा हमारे बचपन की सौंधी शरारतों में मीठी मुस्कराहटों में..
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यूँ किसी को हाथ पकड़ कर इस दुनिया के कबाड़ से अलग किसी ऊंचाई पर बैठा देना.....और एक मुकम्मल सच में बासी होते दिन... उससे ना पूछिए...

क्या अपने तर्कों से दूसरो के दुखों की शिनाख्त की जा सकती है नए होने के लिए प्रतिपल मरना जरूरी था .और अपने दुःख को रूक कर देखना भी इसलिए अनिवार्य हो गया ..तर्क के नियमों का अतिक्रमण किए बगैर ,औरकुछ ऐसा जानना -खोजना भीतर से बाहर की तरफ जो उसके सुख का क
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मणिपुर-इम्फाल मैं मानव अधिकारों ke हनन का सिलसिला कई सालों से लगातार,कई संगठनों ने आवाज़ बुलंद की है

होली के दुसरे दिन इम्फाल -मणिपुर -मेघालय से लौटना करीब १० दिनी यात्रा के बाद....इ मेल बॉक्स मैं ढेरों होली की शभ कामनाएं ,शुभकामनाएं स्वीकार करने और देने का कोई ओचित्य नजर नही आता ,यकीं माने रंग और खुशियाँ बेमानी लगतेंहैं जब हमारे ही देश के किसी दूसर
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मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं,

मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं मर्दों की इस तानाशाह दुनिया मैं, दरवाजे खोलो और दूर तक देखो खुली हवा मैं ,औरतें जहाँ भी हैं ,जैसी भी हैं पुरी शिद्दत के साथ मौजूद हैं -वे हमारे बीच अन्धेरें मैं रौशनी की तरह हैं औरतें हंसती हैं खिलखिलाती हैं खुशियाँ बर
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पतझर मैं बारिश- हालाँकि मौसम के टूटकर गिरते पत्तों में पुरानी उदासियाँ जज्ब है... प्रेम करते हुए चुप रहने की तरह...

कोई भीड़ मैं आसानी से कैसे गुम हो सकता है ,वो भी तब- जब प्रेम एक जरूरी ताक़त की तरह मौजूदा चीजों को नए सिरे से देख रहा हो चाहे ये रह रहकर खो जाना या मिलना कितना ही मुश्किल या आसन हो और,साथ ही अच्छी पुरानी से शुरुआत करना ,ये वक्त खुश होने के निर्णय लि
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वसंत के इन दिनों मैं,

वसंत के इन दिनों में कभी तो मिलो ,कहीं तो मिलो /कुछ बातें हों गिले शिकवें दूर हों /तुम्हे भी तो पता लगे / कितना अच्छा होता है /कभी-कभी पुल पार करना..... अपनी डायरी से ----कवि अनाम
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गुमी हुई चीजें मिल जाती हैं, कभी नही ,और कभी अप्रत्याशित खुशियों की तरह सामने आ जाती है..

अक्सर ही हम अपनी जिन्दगी मैं चीजें खो देतें हैं ,.कभी लापरवाही से और कभी भाग्य से वो हमारी हो करभी.... नही होती,कभी चोरी तो कभी नष्ट हो जाती है लेकिन हम उन्हें वहीँ तलाश नही करते जहाँ मिलने की उम्मीद होती है ,वरन एक सीमा तक हमारा मन चीजों की तलाश उन
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शब्दों अर्थों मैं बदले ,या अर्थों के पहाड़ बने,

शब्द अर्थों में बदले या अर्थों के पहाड़ बने , फर्क नही पड़ता, कभी - कभी शब्दों अर्थों की बात, फिजूल लगती है शिखर पर नही जाना मुझे.... आओ ढूँढ निकालें महा समुद्र, सीपियों,शंखों सुनहरी मछलियों,मोतियों वाला... (उस दिन कितने पत्ते झड़े थे, जब जाते हुए देखा