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प्रेम जनमेजय

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13 May 2010
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हिंदी ब्लोगिंग की दिशा-दशा- मुकेश चन्द्र से बातचीत

अपनी चिंतनशील वैचारिक अभिव्यक्ति की तीव्रता के लिए ब्लॉगिंग को माध्यम बनाएं :प्रेम जनमेजयसोमवार, १० मई २०१०श्री प्रेम जनमेजय आधुनिक हिंदी व्यंग्य की तीसरी पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। पिछले तीन दशक से साहित्य रचना में सृजनरत इस साहित्यकार ने हिंदी
 
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अज्ञेय स्मारक व्याख्यान-2010प्रेम जनमेजय द्वारा दिए गए व्याख्यान का आलेख

शाश्वती 235, रिहाड़ी मोहल्ला, जम्मू . 180005/ मो. 9419210100/ 14.03.2010अज्ञेय स्मारक व्याख्यान-2010अज्ञेय व्याख्यानमालाः बदलते सामाजिक परिवेश में व्यंग्य की भूमिका’ पर प्रेम जनमेजय का व्यख्यान मित्रों, मैं उस पीढ़ी का हूं जिसने के स्वतंत्रता-शिशु की गोद
 
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वसंत, तुम कहां हो?

वसंत, तुम कहां हो? मैं बहुत दिनों से वसंत को ढूंढ रहा था। पता चला कि इस बार वो 20जनवरी को दिखा था, पर उसके बाद पता नहीं कहां चला गया। वसंत ने तो मुझसे उधार भी नहीं लिया है कि वो मुझ से मुंह चुराए। मैं किसी क्रेडिट कार्ड बनवाने वाली, उधार देने वाली, बीमा
 
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प्रेम जनमेजय का व्यंग्य

ओम गंदगीआय नमः आषाढ़ का प्रथम दिवस कवि कालिदास को अच्छा लगा था, मुझे भी अच्छा लगता है और मेरे साथ-साथ पूरी दिल्ली को अच्छा लगता है। पर मेरे अच्छे लगने और कालिदास के अच्छे लगने में उतना ही अंतर है जितना अंतर एक गरीब को अमीर की तुलना में न्याय मिलने का
 
प्रेम जनमेजय
Dec 29 2009 11:55 AM
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व्यंग्य- शतरंज के नए खिलाड़ी

शतरंज के नए खिलाड़ी0प्रेम जनमेजय प्रेमचंंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के नवाबों को तो आप जानते ही हैं पर क्या स्वतंत्र भारत के बाद पैदा हुए उन नवाबों को भी आप जानते हैंं जिनके दिमाग में हर समय शतरंज बिछी रहती है। सामंतशाही का युग चला गया, उनके साथ उ
 
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व्यंग्य--हम निंदा करते है

व्यंग्यहम निंदा करते हैं0 प्रेम जनमेजय हमने निदंा की है, हम निंदा कर रहे हैं और हम निंदा करते रहेंगें । जैसे-जैसे जब-जब धर्म की हानि होती है और प्रभु जन्म लेते हैं वैसे ही जब- जब इस देश में बम-विस्पफोट होता है, हममें निंदा जन्म लेती है और उसे हम करते
 
प्रेम जनमेजय
Dec 29 2009 11:55 AM
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व्यंग्य -- कैसे हो जजमान ...

कैसे हो जजमान ... आजकल मेरा अपार्टमेंट मोहल्ला रिटायर वाला हो रहा है । जिसे देखो रिटायर हो रहा है । ये सब रिटायर हैं पर टायर नहीं और ये दीगर बात है कि इनमें से कोई भी भूतपूर्व प्रधनमंत्राी नहीं है । टायर हो जाने से आदमी खुद तो घिसता ही है अपने आसपास
 
प्रेम जनमेजय
Dec 29 2009 11:55 AM
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व्यन्ग्य --था इश्क नहीं आसां

था इश्क नहीं आसां0प्रेम जनमेजय मेरे नाम में प्रेम शब्द अवश्य है पर मैंनें प्रेम-विवाह नहीं किया है । मैं नाम का ही प्रेम हूं । जैसे जनसेवकों से जनता, न्यायालय से न्याय, सुरक्षा कर्मियों से सुरक्षा, थाने से शिष्टाचार और पढ़ाने वालों से पढ़ाना दूर रहता
 
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दीपावली पर विशेष -अंधेरे का स्थानांतरण नहीं चाहिए

अंधेरे का स्थानांतरण नहीं चाहिए0प्रेम जनमेजय दीपावली समीप आती है तो मन दीपकों की संघर्षशील चेतना को लक्षित कर प्रसन्न एवं प्रेरित होता है परंतु यह सोचकर कि आधी रात को इन दीपकों के बुझते-बुझते हम तो सो जाएंगें और हमारे सोते ही अंध्ेारा सुबह के उजाले क
 
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लघु कथा- साहित्य में डब्ल्यू डब्ल्यू एफ

साहित्य में डब्ल्यू डब्ल्यू एफ0प्रेम जनमेजय एक समय था जब मनोरंजन के साधन कम थे और लोग मुर्गे, तीतर, बटेर आदि लड़वाया करते थे तथा सामान्य जन उन्हें बड़े चाव से देखता। मुर्गे, तीतर, बटेर आदि विशिष्ट जनों के पास ही हुआ करते थे और उन्हें पालने का दम भी उ
 
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एटमी करार का फंडा

इस एटमी डील के चक्कर में कुछ डील हुई हैं, कुछ हो चुकी हैं और कुछ होंगी । भारतीय प्रजातंत्रा का दूसरा नाम हो ही गया है ले-दे का खेल। डील करे जाओं और सरकार चलाए जाओ । अब एटमी डील के चक्कर में --कुछ बिल्लियों को आशा थी सरकार गिरेगी और उनके भागों छींका प
 
प्रेम जनमेजय
Dec 29 2009 11:55 AM
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व्यन्ग्य -तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मी

तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मी -प्रेम जनमेजय
 
प्रेम जनमेजय
Dec 29 2009 11:55 AM
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व्यन्ग -कन्या रत्न का दर्द

हास्य व्यंग्य कन्या रत्न का दर्द -प्रेम जनमेजय
 
प्रेम जनमेजय
Dec 29 2009 11:55 AM
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प्रेम जनमेजय का व्यंग्य-अंधेरे के पक्ष में उजाला

प्रिय/सम्माननीय झिलमिलाते दीयों की जीवंत मंगल वेला में आप सबको दीपावली की मंगलकामनाएं एवं हार्दिक बधाई प्रेम जनमेजय एवं परिवारअंधेरे के पक्ष में उजाला प्रेम जनमेजय मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, सं
 
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‘हिंदी दिवस’ या ‘पंडा दिवस’

हिंदी दिवस पर नई दुनिया के 14 सितंबर अंक में प्रकाशित श्री आलोक मेहता की विशेष टिप्पणी ‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’ पर प्रेम जनमेजय की टिप्पणी आलोक मेहता जी, ‘हिंदी दिवस’ पर आज की नई दुनिया में प्रकाशित अपकी विशेष टिप्पणी, ‘हिंदी दिवस के विरुद्ध’ से मैं पूरी
 
प्रेम जनमेजय
Sep 16 2009 08:59 AM
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श्री राजेंद्र यादव के नाम एक खुला पत्र

आदरणीय श्री राजेंद्र यादव जी, परनाम, साहित्य के इस तथाकथित असार संसार में ‘हंस’ को पढ़ने/देखने के, ‘जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ के अंदाज में अनेक अंदाज हैं। कोई साहित्यिक संत इसकी कहानियों के प्रति आकार्षित हो संत भाव से भर जाता है,
 
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तपनजब जून का महीना आता हैअपने प्राकतिक रूप मेंअपने पूर्ण अस्तित्व के साथसपरिपवार,दिल्ली में लोग तपते या जहां कहीं भी दिल्ली हैलोग तपते हैंभीष्ण गर्मी की तपन से ।लोग तपते हैंमैं भी तपता हूंपर, एक और अगन से।ये अगन है अभाव की ये अगन है खालीपन कीये अगन ह
 
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कल शाम सूरज मेरे घर में था

आप सब लोग उगते सूरज को भलि भांति जानते होंगें जो रोज सुबह आपके दरवाजे पर दस्तक देता है आपको अहसास दिलाता है कि सुबह हो गई और आप कर्मशील हो जाएं। मैं उस सूरज को भी जानता हूं जो अपनी कर्मशीलता के चलते आपकोे संवेदनशील अहसास दिलाता है और किसी भी शाम को उ
 
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व्यंग्य - होली का महिलाकरण

होली का महिलाकरण मेरी एक पत्नी है। एक मेरी पत्नी है। मेरी पत्नी भी एक ही है। मित्रों मैं अपनी पत्नी की कैसे भी व्याख्या करूं, उसमें ‘एक’ शब्द आएगा ही। दूसरा या दूसरी शब्द लाने का मुझमें साहस नहीं है। मेरे एक लेक्चरर मित्र इन दिनों अपने बड़े हुए वेतन
 
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व्यंग्य--मेरे स्लमडाॅग जीजाजी

मेरे स्लमडाॅग जीजाजी 0प्रेम जनमेजय पहले मैं अपने जीजाजी को जोरू का गुलाम कहती थी क्योंकि उन दिनों जोरू का गुलाम फिल्म हिट हुई थी और मेरे जीजाजी में उस हिट फिल्म के सभी गुण थे। अब स्लमडाॅग हिट हुई है और मुझे लगता है कि इस नाम के जितने हकदार मेरे जीजाज
 
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प्रेम जनमेजय को व्यंग्यश्री-2009 सम्मान

आध्ुनिक जीवन विसंगतियों से भरा हुआ है और बाजारवाद ने तो हमारे जीवन की स्वाभाविकता को नष्ट कर दिया है। व्यंग्यकार अपने समय का समीक्षक होता है इस कारण समाज में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। व्यंग्यकार का कर्म मनोरंजन करना कतई नहीं है, उसका कर्म तो
 
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व्यंग्य---ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग

ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग गर्मियों की इतवार की अलसाई सुबह का समय था और चढ़ती ध्ूप, मक्खियों की भिन्न-भिन्न तथा चिडि़यों की चांय चांय मेरे जैसे अलसाए लोंगों को वैसे ही बेचैन कर रही थी जैसे बढ़ती हुई मुद्रास्पफीति की दर से आजकल भारत सरकार बेचैन है ।
 
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‘व्यंग्य यात्रा’ का शीघ्र प्रकाश्य,आगामी अंक-श्रीलाल शुक्ल पर केंद्रित

श्रीलाल शुक्ल पर केंद्रित 'व्यंग्य यात्रा' का शीघ्र प्रकाश्यआगामी अंक संपादकः प्रेम जनमेजय पाथेय में श्रीलाल शुक्ल, रवींद्रनाथ त्यागी 'राग दरबारी' का पुनर्पाठ नित्यानंद तिवारी ,निर्मला जैन ,ज्ञान चतुर्वेदी साक्षात श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य की टैरेटरी बढ़
 
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राम वनवास का सीधा प्रसारण प्रेम जनमेजय आम चुनाव आने को हैं, सबसे बड़ा मुद्दा है-चुनावी मुद्दे की खोज। इधर राम पर भी खोज जारी है। जैसे चुनाव आते ही जनसेवकों का आम आदमी की ओर ध्यान आकर्षित होता है, वैसे ही राम की ओर भी होता है। इस बार राम मुद्दा दे रहे
 
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