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योगेंद्र मौदगिल

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12 Jun 2010
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छोरियां क्या से क्या हो गयी............

ज़िन्दगी इक व्यथा हो गयी.प्रीत की दुर्दशा हो गयी.देखते, देखते, देखते...ज़िन्दगी क्या से क्या हो गयी.आया तूफ़ान महंगाई का,सारी खुशियां हवा हो गयी.पीड़ा इतनी बढ़ी अंततः,कुल दिनों की दवा हो गयी.मूं छिपाती फिरै मुफ़लिसी,लो अमीरी अना हो गयी.देख टीवी को अम्मा
 
योगेन्द्र मौदगिल
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कुछ सुनती, कुछ कहती बातें........

कुछ सुनती, कुछ कहती बातें.खामोशी से बहती बातें.हाय, ज़माना देख-देख कर,मन भीतर ही रहती बातें.सच कहना तो मुश्किल है भई,मुझको अक्सर कहती बातें.उन्हें समझना कठिन नहीं रे,सीमा में जो रहती बातें.ज्वालामुखी फूटता है तब,जब बातों को सहती बातें.सुन कर हवा-हवाई
 
योगेन्द्र मौदगिल
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मैं हूं औरतज़ात, है मेरा........

लीजिये संडे है आजसमझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूंदिमाग भी लगता है छुट्टी पर हैफिर भी आदतन कुछ पुरानी पंक्तियांप्रस्तुत करता हूंकाग़ज़, कलम, दवात का रिश्तासमझो तो जज्ब़ात का रिश्तामैं हूं औरतज़ात, है मेराभरे उजाले, रात का रिश्तामजदूरी, क्या मांग ली
 
योगेन्द्र मौदगिल
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मरा सभी की आंख का पानी..........

बिग-बी, राखी, एकता रानीघर-घर की बस यही कहानीटेली-वीज़न देख-देख करबच्चों पर चढ़ रही जवानीसास बनी है बास अगर तोबहू स्वयंभू है पटरानीनाती-पोते कम्प्यूटर केदेख फालतू दादी-नानीविग्यापन भी कैसे-कैसेमरा सभी की आंख का पानीजिस को देखो वो ही नंगागये कुएं में
 
योगेन्द्र मौदगिल
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जज साहब को जूता चहिये........

दादा दिनेश राय द्विवेदी की हार्दिक इच्छा थी कि कचैहरी के सामने भी आईना रखा जाये उन के आदेश पर मैंने प्रयास भर किया है विश्वास है कि दादा के साथ-साथ आप सब भी मेरा समर्थन करेंगें लंपट, चोर, लुटेरे, डाकू मिलते यार कचैहरी मेंकैक्टस भी चंपा के जैसे खिलते यार
 
योगेन्द्र मौदगिल
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उर्मिल पूछ रही लछमन से.......

तन का क्या विश्वास रे जोगीतन तो मन का दास रे जोगीभगवे में भगवान बसे हैंजटा-जूट विन्यास रे जोगीउर्मिल पूछ रही लछमन सेकौन दोष मम् खास रे जोगीजाम-सुराही छूट गये सबछूट गया अभ्यास रे जोगीसूरज, चंदा, जुगनू, तारेकिस को, किस की आस रे जोगीतितली, भंवरे, कोयल,
 
योगेन्द्र मौदगिल
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देख कचहरी में चलती हैं.....

भाई सतपाल ख्याल जी ने राहत इंदौरी साहब का मिसरा ग़ज़ल कहने के लिये अपने ब्लाग आज की ग़ज़ल पर लगाया था इस खूबसूरत मिसरे पर जो भी जैसा भी कह पाया उन्हें भेज दिया था लेकिन मिसरे का नशा दिमाग़ से उतरा नहीं सो उन्हें भेजने के बाद भी शेर होते रहे रदीफ बदल कर
 
योगेन्द्र मौदगिल
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हरियाणे का चौपाली किस्सा....

महा कमीणएक बर की बात...म्हारे महाकंजूस ताऊ के खानदानी पंडत नै बताया अक् ताऊ, अगर तू जिंदगी मैं और भी मजे लेण चाहवै तो पांच कमीणों को भोजन करवा दे...ईब भाई ताऊ महा कंजूस... पांच कमीणों नै भोजन क्यूक्कर करवावै...?सोच म्हं पड़ग्या....ताई बोल्ली, रै ताऊ, सोच
 
योगेन्द्र मौदगिल
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आज का दिन है खास दिन जैसे......

हो गये रिश्ते आलपिन जैसे.दिलो-दिमाग़ डस्टबिन जैसे.मन में अंबार कामनाऒं का,अब तो जीना हुआ कठिन जैसे.होड़ जोखिम की और पैसे की,लोग हैं बोतलों के जिन्न जैसे.आज उनका दीदार जम के हुआ,आज का दिन है खास दिन जैसे.साल दर साल उम्र खो बैठे,लम्हा-लम्हा या दिनबदिन
 
योगेन्द्र मौदगिल
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सुण बै ढपोरशंख.....

ब्लाग एक सार्वजनिक अभिव्यक्ति का माध्यम है लेकिन कईं बार ऐसा लगता है कि लोग इसे बपौति मान रहे हैं अपनी समझ से बाहर है मामला मगर कुछेक टिप्पणियों के पढ़ने के बाद एक ताज़ा छंद आप सब की नज़्र करता हूं किसुण बै ढपोरशंख तू तो बेटे बावला हैएक बात बार-बार-बार
 
योगेन्द्र मौदगिल
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ये दुनिया भी सर्कस जैसी........

मन की बातें, घर की बातें.जैसे हों नश्तर की बातें.नदिया के सपनों में आईं,रातों-दिन सागर की बातें.नाशवान क्योंकर करते हैं ?जीवन में नश्वर की बातें !ये दुनिया भी सर्कस जैसी,बातें भी जोकर की बातें.पैमाने भी बतलाते हैं,साक़ी की सागर की बातें.जीवन देती बदल
 
योगेन्द्र मौदगिल
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मैं अर म्हारी घरआळी.........

मैं अर म्हारी घरआळी9 मई 1984 को हम दोनूं अरेंज्ड सूत्र में बंधे थे 26 साल होगे पर न्यू लाग्गै जणूं कल की ए बात सैखैर........
 
योगेन्द्र मौदगिल
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संवाद छंद-3

एक और संवाद छंदमौल्लड़ हरियाणा में मस्तमौला युवाऒं व चिरयुवाऒं, रंडवों व विधुरों के लिये प्रयोग कर लिया जाता हैं ताऊ भी ऊपरी वर्ग का चौपाली हास्य संबोधन हैमौल्लड़ से संबंधित एक चौपाली किस्सा पढें उसके बाद छंद का आनंद लेंलै सुण ले ताऊ, नवा किस्सा... गाम
 
योगेन्द्र मौदगिल
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संवाद छंद-2

एक और संवाद छंदनेता पत्नी से बोले एक दम्पति-एकसंतान सूत्र जनता को समझाऊंगाजनता तक सीधे संदेश मेरा पहुंचेगापहला बच्चा होते नसबन्दी करवाऊंगापत्नी तुनक कै बोली जनता नहीं हूं मैंजानती हूं तुझे तेरी बात में ना आऊंगीपहले के बाद तूने करवानी हो करालेमैं तो पूरे
 
योगेन्द्र मौदगिल
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संवाद-छंद-1

घनाक्षरी कवित्त या छंद या जो भी हो में मुझे लगता है कि तुकांत बदले नहीं जाते किंतु विषय व कहन के अनुसार निम्न रचना में तुकांत बदल गये रचना प्रस्तुत है मैंने इसे संवाद-छंद शीर्षक दिया है आप सब सुधिजन इस पर भी ध्यान देंसंवाद-छंदमल्लिका शेरावत आधा मीटर
 
योगेन्द्र मौदगिल
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'नहीं चाहिये मुझको पोती'....

उन्नत कृषि विग्यान हो गया.भोंदू, वृद्ध किसान हो गया.लोकतंत्र के नरकतंत्र में,हर हाकिम, शैतान हो गया.भूख उगा करती खेतों में,रहन, फ़सल-खलिहान हो गया.ऊंची हर दूकान हो गयी,फीका हर पकवान हो गया.आपस में लड़-लड़ कर घायल,अपना हिन्दुस्तान हो गया.राम-राज है, जब से
 
योगेन्द्र मौदगिल
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चार पंक्तियाँ

टिप्पणियां गवाह हैं कुछ पुराने मित्रों का पुनरागमन हुआ है कुछ नए मित्र भी जुड़े हैं. सभी को प्रणाम निवेदित करते हुए चार पंक्तियाँ सौंपता हूँ किनेताऒं को दूध पिलाना ठीक नहींनाग पंचमी रोज मनाना ठीक नहींकिसी ने खादी किसी ने भगवा धार लियायों ही जनता को बहकाना
 
योगेन्द्र मौदगिल
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सिर्फ दो लाइन

सिर्फ दो लाइन आप भी मूड में आ लिए अपना भी धीरे - धीरे बन रहा है पेश करता हूँ कि चौराहे की मिटटी को भई  जम कर लज्जा आती है दर्ज़न भर बेटों की अम्मां भीख मांगने आती है -- योगेन्द्र मौदगिल  
 
योगेन्द्र मौदगिल
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इक शेर

कुछ खास मूड नहीं लिखने का बस इक शेर याद आ रहा है किसब कुछ लुटा दिया तेरे प्यार में सितमगरइक भैंस बच गई थी वो आज बेच दी बाय बाय
 
योगेन्द्र मौदगिल
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दो-चार दोहे....

सम्बन्धों की इस कदर टुकड़े-टुकड़े डोरपिता खड़ा इस ऒर तो पुत्र खड़ा उस ऒरपिता-पुत्र में ठन गयी निकल पड़ी तलवारबूढ़ा बरगद रो पड़ा देख समय की धारहाथ-पांव ढीले पड़े मुरझा गया शरीरबेटे बोले बाप से खिंचवा ले तस्वीरघोड़ी चढ़ने तक रहा मैं अम्मां की आसपांव बहू के
 
योगेन्द्र मौदगिल
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योगेंद्र मौदगिल

आदरेय भाई अनिल पुसदकर जी की फोरस्ट्रोक टिप्पणी के सम्मान में एक क्षणिका प्रस्तुत करता हूं किआधुनिक रामभक्त ने इतिहास कुछ ज्यादा ही दोहरा दिया गर्भवती पत्नी को जंगल नहीं सीधे स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया --योगेन्द्र मौदगिल
 
योगेन्द्र मौदगिल
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इसका जवाब अनिल पुसदकर देंगें........

आप सबने पिछली पोस्ट में देखा और खूब देखा अनिल भाई जी ने तिलक किया टोपी पहनायी बढ़िया मगर साहब जिस अपनेपन और सादगी से मंद-मंद मुस्कुराते हुए पहली भेंट के रूप में भरे मंच पर ठहाकों के बीच लगभग आठ इंच लंबा और पौने तीन इंची व्यास का बचपन की गलतियों जैसा
 
योगेन्द्र मौदगिल
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छत्तीसगढ़ ३ और एक ग़ज़ल

बढ़िया मंच जमा था रायपुर और आसपास के सभी मीडियाकर्मी व रंगकर्मी होली के रंग में रंगे मस्ती में सराबोर थे संचालक महोदय ने तुरंत मेरा नाम पुकार दिया अनिल भाई ने मुझे तिलक लगा टोपी पहनाई फिर मैंने कविता पढ़ी श्रोता दूसरे ही मूड में थे फिर भी कविता चल गई
 
योगेन्द्र मौदगिल
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छत्तीसगढ़-२

पवन चन्दन जी ने सही फ़रमाया कि बात पानीपत से ही प्रारंभ होती तो बढ़िया रहता सो हे पाठकों मैं इस विवरण को पानीपत से ही शुरू करता हूँ. मेरी व्यस्तताओं के चलते बेटे दिवाकर ने मेरा रेसेर्वेतिओं कराया था और उसने टिकेट भी अपने पास रख ली. २५ कि रात उसने टिकेट
 
योगेन्द्र मौदगिल
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छत्तीसगढ़ यात्रा : भाग १

इस बार की होली मजेदार रही . दरअसल हुआ यों कि भिलाई स्टील प्लांट भिलाई के वार्षिक कविसम्मेलन का निमंत्रण था . प्लांट अधिकारी श्री  दीपक खरे जी के बुलावे पर श्री प्रदीप चौबे (ग्वालियर), श्री सांड नर्सिंघपुरी (नरसिंह पुर) श्री शशि कान्त यादव (विदिशा)
 
योगेन्द्र मौदगिल
Mar 04 2010 11:25 AM
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मुझे मेरे बेटे ने बाहों में भर कर.......

इन दिनों ब्लागिंग के लिये अधिक समय नहीं दे पा रहा हूं. समस्त ब्लागर जगत उदारता से क्षमा करे.इस बीच भाई सुबीर जी के आदेश पर कुछ शेर निकल आये थे. जिस दिन टाइप कर के उन्हें भेजने बैठा तो कम्बख्त लाइट चली गई. तो जितने शेर वहां चले गये सो चले गये शेष यहीं रह
 
योगेन्द्र मौदगिल
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योगेंद्र मौदगिल

विगत कईं दिनों तक ब्लाग जगत से दूर रहा आज समक्ष हूं पर समझ में नहीं आ रहा कि क्या पोस्ट करूं.....चलिये.... एक आयोजन के कुछ फोटो दिखाता हूं...पानीपत में विगत २५ दिसंबर २००९ को एक भव्य कवि सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमें सरदार प्रताप सिंह फौजदार (आगरा) कविता
 
योगेन्द्र मौदगिल
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चर्चा जारी रहने दो.....

विजयघोष के सन्नारों की चर्चा जारी रहने दो अपने-अपने अधिकारों की चर्चा जारी रहने दो वरना तुमको खा जायेंगे ये दहशत के सौदागर बात-बात में अंगारों की चर्चा जारी रहने दो जिन कूचों में खेल खेलते, बचपन छूट गया हमसे उन कूचों की, गलियारों की चर्चा जारी रहने द
 
योगेन्द्र मौदगिल
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राजभवन में राज हुआ है......

दुनिया एक कसाई बाडा, कत्ल यहाँ अरमानों का, देख यहाँ पर सौदा होता, निसदिन ही मुस्कानों का। तेज हवायें क्या कर लेंगी, मेरे मन की कश्ती का हमने तो बचपन से सामना, रोज किया तूफानों का। जब विकास की ज़द में आईं, सड़कें छाती चढ़ बैठीं नगरी में बिछ गया जाल, ब
 
योगेन्द्र मौदगिल
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कुछ सोचना होगा....

अगर चाहोगे तुम जीना तो मरना सीखना होगा के मिट्टी के खिलौनों में भी जीवन फूंकना होगा हरे पेड़ों पे चलती आरियों को रोकलो वरना नयी नस्लों को खमियाजा़ यक़ीनन भोगना होगा परिन्दों को मुंडेरों पर जरा तुम चहचहाने दो स्वयं उड़ जायेंगें जब बिल्लियों से सामना ह
 
योगेन्द्र मौदगिल
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शब्दों से सहवास मियां ........

उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां क्या अपनों कोधर के चाटे क्या अपनों की आस मियां इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का
 
योगेन्द्र मौदगिल
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उर्वशी के नाम पर......

कैद बख्शी है हमें यों ज़िन्दगी के नाम पर ज्यों अंधेरे का कत़ल हो रौशनी के नाम पर और क्या करते भला हम आदमी के नाम पर छल-कपट करते रहे हैं बन्दगी के नाम पर भूख की सौगात बच्चों को मिलेगी भेंट में युद्धरत संसार से नूतन सदी के नाम पर बुतपरस्ती का जुनूं बढ़
 
योगेन्द्र मौदगिल
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खुद को खुद से छलता पानी.....

जब भी रंग बदलता पानी. खुद को खुद से छलता पानी. पृथ्वी का अनमोल खज़ाना, उगती फसलें-चलता पानी. कहीं त्रासदी-कहीं ज़िन्दगी, मीलों-मील उछलता पानी. दुनिया भर ऐसे पसमंज़र, भूखे पेट-उबलता पानी. उस की मर्जी दे या ना दे, आंखें और छलकता पानी. - योगेन्द्र मौदगि
 
योगेन्द्र मौदगिल
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आंखों में.....

सपनों का अहसास, जरूरी आंखों में. लम्हा-लम्हा प्यास, जरूरी आंखों में. कस्में-वादे, हया-वफ़ा, रिश्ते-नाते, कदम-कदम विश्वास, जरूरी आंखों में. आएगा, लौटेगा, इक दिन परदेसी, टिकी रहे ये आस, जरूरी आंखों में. निंदक में, आलोचक में है फर्क बड़ा, हरपल ये आभास,
 
योगेन्द्र मौदगिल
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घर से घर के बीचोंबीच.....

इक धमाका सा हुआ जब से नगर के बीचोंबीच. कितनी दीवारें उठी फिर घर से घर के बीचोंबीच. इन दिवारों से कहो अब कानाफूसी बंद हो, हर कदम पर कान हैं अब इस शहर के बीचोंबीच. स्कूली बच्चे ढूंढते रिक्शा में बैठे गौर से, अपना भविष्य फिल्म के हर पोस्टर के बीचोंबीच.
 
योगेन्द्र मौदगिल
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हर हाकिम, शैतान हो गया...

उन्नत कृषि विग्यान हो गया. भोंदू, वृद्ध किसान हो गया. लोकतंत्र के नरकतंत्र में, हर हाकिम, शैतान हो गया. भूख उगा करती खेतों में, रहन, फ़सल-खलिहान हो गया. ऊंची हर दूकान हो गयी, फीका हर पकवान हो गया. आपस में लड़-लड़ कर घायल, अपना हिन्दुस्तान हो गया. राम
 
योगेन्द्र मौदगिल
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मुल्ला देख या.....

मुल्ला देख या पण्डे देख. लिये धरम के डण्डे देख. आहट हुई इलैक्शन की, बस्ती-बस्ती झण्डे देख. राजनीत का प्रेत चढ़ा, खादी वाले गण्डे देख. कहे भारती रो-रो कर, पूत हुए मुश्टण्डे देख. जंगल का कानून समझ, या शहरी हथकण्डे देख. सफल कैबरे, हूट कवि, सड़े टमाटर-अण
 
योगेन्द्र मौदगिल
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ऐसा भी क्या....

कंकरीट के चौबारे में, अद्भुत है नक्कासी. रौशनदान में अटकी चिड़िया, मर गई भूखी प्यासी.. इतनी सुविधा के हित खरचा-चर्चा चौबीस घंटे. दिन में गाहक, रात फैक्टरी, भैय्या के सब टंटे.. बाबा भेज दिये भैय्या ने उल्टे पैरौं गांव, मैली छत की हंसी उड़ाती, बरसाती क
 
योगेन्द्र मौदगिल
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गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र

गेरुआ : चार व्यंग्यचित्र घनाक्षरी में आज चौथा रासलीला प्रिय मुझे, जीवन भी रास लगे, इसीलिये क्षण-क्षण, रास रचा लेता हूं. रुक्मिणी अपनी को, रखता हूं घर में ही, बाहर तो बाहर की, राधा नचा लेता हूं. चाहे गिरे बिजली, पहाड़ टूट जाये पर, फिर भी मैं खुद को, ह
 
योगेन्द्र मौदगिल
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गेरुआ: चार व्यंग्यचित्र

गेरुआ: चार व्यंग्यचित्र-------घनाक्षरी में..... आज तीसरा नौकरी में भूखा रहा, बिजनेस में नंगा रहा, अक्समात् बुद्धि आई, धार लिया गेरुआ. फिर तो ये जीवन का, दर्शन समझ लिया, विचार-व्यवहार में, उतार लिया गेरुआ. मेरी कामनाएं भला, मारता वो कैसे कहो, मेरी काम
 
योगेन्द्र मौदगिल