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सच्चा शरणम्

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11 Jun 2010
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शैलबाला शतक - २

माँ के काली स्वरूप की अभ्यर्थना के चार कवित्त पुनः प्रस्तुत हैं । इस शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं ।  रौद्र-रूपा काली के सम्मुख दीन-असहाय बालक पुकार रहा है । माँ इस रूप में भी ममतामयी है..किसी भी
 
हिमांशु । Himanshu
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शैलबाला शतक

जीवन में ऐसे क्षण अपनी आवृत्ति करने में नहीं चूकते जब जीवन का केन्द्रापसारी बल केन्द्राभिगामी होने लगता है । मेरे बाबूजी की ज़िन्दगी की उसी बेला की उपज है ’शैलबाला शतक’! अनेकों झंझावातों में उलझी हुई जीवन की गति को जगदम्बा की ही शरण सूझी ।
 
हिमांशु । Himanshu
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अर्चना जी ने गाया : सखिया आवा उड़ि चलीं...

मेरी इस प्रविष्टि में मैंने और चारुहासिनी ने एक गीत ’सखिया आवा उडि़ चलीं..’ गाया था ! मेरे और चारुहासिनी द्वारा गाए युगल गीत को अर्चना जी ने अपनी आवाज दी है प्रस्तुत प्रविष्टि में ! गीत उन्हें अच्छा लगा, उन्होंने गाया ! बात यह भी बतानी जरूरी है कि अर्चना
 
हिमांशु । Himanshu
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भोजपुरी के तुलसीदास ’रामजियावन दास’ : कवि ’बावला’

रामजियावन दास ’बावला’ को पहली बार सुना था एक मंच पर गाते हुए ! ठेठ भोजपुरी में रचा-पगा ठेठ व्यक्तित्व ! सहजता तो जैसे निछावर हो गई थी इस सरल व्यक्तित्व पर ! ’बावला’ भोजपुरी गीतों के शुद्ध देशज रूप के सिद्धहस्त गवैये हैं ! सोच कर नहीं लिखा कभी,
 
हिमांशु । Himanshu
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ध्वनित नारीत्व : शलभ श्रीराम सिंह

मृत्यु !शलभ श्रीराम सिंहजन्म : 05-01-1938मृत्यु : 22-04-2000जन्म स्थान : मसोदा, जलालपुर, फैजाबाद (अम्बेडकर नगर), उ०प्र०प्रकाशन : कल सुबह होने के पहले, अतिरिक्त पुरुष,त्रयी-२ में संकलित, राहे-हयात, निगाह-दर-निगाह, नागरिकनामा, अपराधी स्वयं, पृथ्वी का प्रेम
 
हिमांशु । Himanshu
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सेजिया से सइयाँ... (चैती ) और उस्तादों की जुगलबंदी में चैती-धुन

यूँ ही टहलते हुए नेट पर यहाँ पहुँच गया, शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और सितार के धुरंधर विलायत खान की जुगलबंदी में चैती धुन सुन कर अघा गया । आपके सामने ले आया हूँ ! सुनिये, रस पगिये । अभी कुछ दिन पहले ही अपने प्रिय संगीत-स्थल पर छन्नूलाल मिश्र जी की चैती
 
हिमांशु । Himanshu
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कह दिया मैंने ..

मेरी अपनी एक ज़िद हैरहने की, कहने की और उस ज़िद का एक फलसफ़ा ।यूँ तो दर्पण टूट ही जाता हैपर आकृति तो नहीं टूटती न !उसने मेज पर बैठी मक्खी कोमार डाला कलम की नोंक सेक्या मानूँ इसे ?विगत अतीत में दलित हिंसा की जीर्ण वासना काआकस्मिक विस्फोट
 
हिमांशु । Himanshu
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हाय दइया करीं का उपाय...

चारु और मैंइधर संवाद-स्वाद, फिर अवसाद के कुछ क्षणों से गुजरते हुए चारुहासिनी की मनुहार से बाबूजी के लिखे कई गीत यूँ ही गुनगुनाता रहा । अपनी सहेलियों को बाबूजी के लिखे गीतों को गा-गाकर सुनाना और फिर अपनी इस समृद्धि पर इतराना उसकी बाल सुलभ क्रिया हो गयी है
 
हिमांशु । Himanshu
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माँ भी कुछ नहीं जानती

"बतलाओ माँ,बालमणि अम्मामलयालम कविता की शीर्ष कवयित्री । प्रख्यात भारतीय अंग्रेजी साहित्यकार ’कमला दास’ की माँ ।जन्म : १९ जुलाई १९०९,मृत्यु : २९ सितम्बर २००४’सरस्वती सम्मान’ सहित अनेक सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित । कवितायें दार्शनिक विचारों एवं मानवता के
 
हिमांशु । Himanshu
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तब ’नारी’ हो जाउँगी..

मुक्ति पर इतना विवाद, खुलेपन पर इतना हंगामा क्यों ? युग बीते, परक्या तुम्हारी लोभ से ललचायी आँखों से पूर्व-राग का नशा नहीं उतरा ? शाश्वत कुंठा या कायरताहो गयी न अभिव्यक्त !संस्कार दुबक गयाशिक्षा का, समाज काजग गई न निसर्ग की सोई भूखहो
 
हिमांशु । Himanshu
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करुणावतार बुद्ध - 10

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैंमानवता की चेतना का संस्कारकरने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकोंबार अनेकों तरह से उद्धृत होकरपुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जानेको प्रेरित करते हैं । इनकी अमितआभा धरती को आलोकित करतीहै, और
 
हिमांशु । Himanshu
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Mar 06 2010 04:35 AM
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इस थकानमय निशि में प्रिय.. (गीतांजलि का भावानुवाद )

In the night of weariness let me givemyself up to sleep without struggle,resting my trust upon thee.Let me not force my flagging spirit intoa poor preparation for thy worship.It is thou who drawest the veil of nightupon the tired eyes of the day to
 
हिमांशु । Himanshu
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Mar 04 2010 08:32 AM
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फाग-छंद ( संकलित ) - 2

बिहारी  फाग-रंग चढ़ गया है इन दिनों सब पर ! नदा कर चुप बैठा हूँ, ये ओरहन सुनना ठीक नहीं । अपना कौन-सा रंग है ख़ालिस कि रंगूँ उससे ! सो परिपाटी का रंग चढ़ा रहा हूँ । मेरा उद्यम इतना ही है कि जिन कवियों के नाम आप यहाँ देखेंगे, उनकी रचनाओं से फाग-छंद छाँट
 
हिमांशु । Himanshu
Feb 28 2010 10:23 PM
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फाग-छंद ( संकलित ) - 1

घनानंद (राग केदारौ) फाग-रंग चढ़ गया है इन दिनों सब पर ! नदा कर चुप बैठा हूँ, ये ओरहन सुनना ठीक नहीं । अपना कौन-सा रंग है ख़ालिस कि रंगूँ उससे ! सो परिपाटी का रंग चढ़ा रहा हूँ । मेरा उद्यम इतना ही है कि जिन कवियों के नाम आप यहाँ देखेंगे, उनकी रचनाओं से
 
हिमांशु । Himanshu
Feb 27 2010 04:16 PM
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पिया संग खेलब होरी...

सखि ऊ दिन अब कब अइहैं,पिया संग खेलब होरी ।बिसरत नाहिं सखी मन बसियाकेसर घोरि कमोरी ।हेरि हिये मारी पिचकारीमली कपोलन रोरी ।पीत मुख अरुन भयो री -पिया संग खेलब होरी । अलक लाल भइ पलक लाल भइतन-मन लाल भयो री ।चुनरी सेज सबै अरु नारीलाल ही लाल छयौ री ।आन कोउ रंग
 
हिमांशु । Himanshu
Feb 23 2010 10:26 AM
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तुम क्यों उड़ जाते काग नहीं !

तुम क्यों उड़ जाते काग नहीं !व्याकुल चारा बाँटते प्रकट क्यों कर पाते अनुराग नहीं ।दायें बायें गरदन मरोड़ते गदगद पंजा चाट रहे क्या मुझे समझते वीत-राग फागुन की बायन बाँट रहे, हे श्याम बिहँग, इस कवि-मन की क्या कभी बुझेगी आग नहीं ।प्रयोग की गली में अनाड़ी
 
हिमांशु । Himanshu
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Feb 21 2010 05:18 PM
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तुमने चुपके से मुझे बुलाया ..

Photo Source : Googleतुमने चुपके से मुझे बुलाया ।पूजा की थाली लेकरसाँझ सकारेहाथों में, तुम चलीबिखर गयी अरुणाभा दीपक मेंचली हवासाड़ी सरकी’सर’ से  सर सेदीपक भकुआयाकँपती लौ ने संदेश पठायातुमने चुपके से मुझे बुलाया ।कंगन खनका हाथों मेंखन खन खन् न् न्स्वर
 
हिमांशु । Himanshu
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Feb 18 2010 06:27 AM
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मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो ..

जॉन डन (John Donne) की कविता ’द कैनोनाइजेशन’ (The Canonization) का भावानुवादपरमेश्वर के लिये मौन अपनी रसना रहने दोमुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो ।लकवा गठिया-सी मेरी गति को चाहे धिक्कारोया मेरा खल्वाट भाल मेरा दुर्भाग्य निहारोबनी रहो तुम पर
 
हिमांशु । Himanshu
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Feb 13 2010 06:21 AM
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मुझे मौन होना है

मुझे मौन होना है तुम्हारे रूठने से नहीं,तुम्हारे मचलने से नहीं,अन्तर के कम्पनों सेसात्विक अनुराग के स्पन्दनों से । मेरा यह मौन तुम्हारी पुण्यशाली वाक्-ज्योत्सना को पीने का उपक्रम है,स्वयं को अनन्त जीवन के भव्य प्रकाश में लीन करने की
 
हिमांशु । Himanshu
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Feb 11 2010 09:15 AM
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फागुन मतवारो यह ऐसो परपंच रच्यौ..

’आचारज जी’ का आह्वान सुन लपके ही थे कि तिमिरान्ध हो गये (यूँ फगुनान्ध होने को बुलाये गये थे ) । बिजली फिर ब्रॉडबैण्ड - दोनों ही रूठ गये । उस वक्त जो लिखा था, पोस्ट नहीं कर पाया । अभी कर रहा हूँ, कारण खुद को जोड़ने की क़वायद है महोत्सव से -(१)ठौर-ठौर
 
हिमांशु । Himanshu
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प्राण रच रहे तम का खेला (गीतांजलि का भावानुवाद )

Clouds heap upon clouds and itdarkens. Ah, love, why dost thou letme wait outside at the door all alone ?In the busy moments of the noon-tidework I am with the crowd, but onthis dark lonely day it is only forthee that I hope.If thou showest me not the
 
हिमांशु । Himanshu
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स्वलक्षण-शील

’महाजनो येन गतः..’ वाला मार्गभरी भीड़ वाला मार्ग हैनहीं रुचता मुझे, जानता हूँ यह रीति-लीक-पिटवईयों की निगाह में निषिद्ध है, अशुद्ध है ।चिन्ता क्या ! मेरी इस रुचि में (या अरुचि में)बाह्य और आभ्यन्तर,प्रेरणा और व्यापार की साधु-मैत्री है
 
हिमांशु । Himanshu
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आया है प्रिय ऋतुराज ...

“वसंत एक दूत है विराम जानता नहीं,संदेश प्राण के सुना गया किसे पता नहीं । पिकी पुकारती रही पुकारते धरा गगन,मगर कभी रुके नहीं वसंत के चपल चरण ।” वसंत प्रकृति का एक अनोखा उपहार है । आधी फरवरी से आधे अप्रैल तक का समय वसंत का समय है । इसमें स्वतः ही वृक्षों
 
हिमांशु । Himanshu
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सौन्दर्य लहरी - 2

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का
 
हिमांशु । Himanshu
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शिशिर-बाला

साढ़े छः बजे हैं अभी । नींद खुल गयी है पूरी तरह । पास की बन्द खिड़की की दरारों से गुजरी हवा सिहरा रही है मुझे । ओढ़ना-बिछौना छोड़ चादर ले बाहर निकलता हूँ । देखता हूँ आकाश किसी बालिका के स्मित मधुर हास की मीठी किरणों से उजास पा गया है । सोचता हूँ, कौन मुस्करा
 
हिमांशु । Himanshu
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तरुणाई क्या फिर आनी है ..

तरुणाई क्या फिर आनी है !चलो, आओ !झूम गाओप्रीति के सौरभ भरे स्वर गुनगुनाओहट गया है शिशिर का परिधानवसंत के उषाकाल मेंपुलकित अंग-अंग संयुतझूमती हैं टहनियाँ रसाल कीऔर नाचता है निर्झरगिरि शिखरों से उतर-उतरकहता है - तरुणाई क्या फिर आनी है !झाग भरी बरसाती
 
हिमांशु । Himanshu
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करुणावतार बुद्ध - 9

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैंमानवता की चेतना का संस्कारकरने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकोंबार अनेकों तरह से उद्धृत होकरपुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जानेको प्रेरित करते हैं । इनकी अमितआभा धरती को आलोकित करतीहै, और
 
हिमांशु । Himanshu
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नये साल में रामजी...

उल्लास की संभावनायें लेकर आता है नववर्ष । न जाने कितनी शुभाकांक्षायें, स्वप्न, छवियाँ हम सँजोते हैं मन में नये वर्ष के लिये । अनगिन मधु-कटु संघात समोये अन्तस्तल में विगत वर्ष का विहंग उड़ जाता है शून्य-गगन में । हम नये फलक के लिये उत्सुक हो उठते हैं ।
 
हिमांशु । Himanshu
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शायद, आज मैं मिलूँगा तुमसे !

आज सुबह धूप जल्दी आ गयी नन्दू चच्चा को महीने भर का काम मिल गया छप्पर दुरुस्त हो गया आज बगल वाली शकुन्तला का "सर्दी नहीं पड़ेगी" की भविष्यवाणी फेल हो गयी - पन्ना बाबा चहक उठे रेखवा की अम्मा ने पहली बार ओढ़ ली शाल और आज पहली बार लछमिनियाँ ने बेच दिया पूर
 
हिमांशु । Himanshu
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करुणावतार बुद्ध - 8

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती
 
हिमांशु । Himanshu
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जब हो जाये दिवसान्त शान्त (गीतांजलि का भावानुवाद )

ज ब हो जाये दिवसान्त शान्त हो विहग काकली छन्द प्रभो अठखेली करते मारुत की हो जाय गिरा श्लथ मन्द प्रभो जब अखिल धरित्री निद्रा के अम्बर में लिपटी लेटी हो नत शिर मृदु सरसिज पंखुड़ियाँ मुद्रित दृग धुन्ध लपेटी हों । तब देना गहन तिमिर अंचल मेरे आनन पर खींच प
 
हिमांशु । Himanshu
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अधूरी कविता ...

एक पन्ना मिला । पन्ने पर फरवरी २००७ लिखा है, इसलिये लगभग तीन साल पहले की एक अधूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । अधूरी इसलिये कि उस क्षण-विशेष की संवेदना और भाव-स्थिति से अपने को जोड़ नहीं पा रहा और इसलिये भी कि एक प्रविष्टि का काम हो जायेगा .... -------
 
हिमांशु । Himanshu
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करुणावतार बुद्ध -7

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती
 
हिमांशु । Himanshu
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सौन्दर्य लहरी

सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला क
 
हिमांशु । Himanshu
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तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ ....

अम्मा गा रही हैं - "छापक पेड़ छिउलिया कि पतवन गहवर हो..." । मन टहल रहा है अम्मा की स्वर-छाँह में । अनेकों बार अम्मा को गाते सुना है, कई बार अटका हूँ, भटका हूँ स्वर-वीथियों में । कितनों को संगी बना लिया है अम्मा के गीतों से उठाकर, कितनों के गले मिल रोय
 
हिमांशु । Himanshu
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करुणावतार बुद्ध -6

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती
 
हिमांशु । Himanshu
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स्वर अपरिचित ...

बीती रात मैंने चाँद से बातें की । बतियाते मन उससे एकाकार हुआ । रात्रि  के सिरहाने खड़ा चाँद तनिक निर्विकार हुआ , बोला - "काल का पहिया न जाने कितना घूमा न जाने कितनी राहें मैं स्वयं घूमा और इस यात्रा में - जीवन से मृत्यु की अविराम- सब कुछ हुआ ज्ञ
 
हिमांशु । Himanshu
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करुणावतार बुद्ध -5

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती
 
हिमांशु । Himanshu
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प्राणों के रस से सींचा पात्र : बाउ (समापन किस्त)

एक आलसी का चिट्ठा - गिरिजेश भईया का चिट्ठा, स्वनाम कृतघ्न आलसी का चिट्ठा । यहाँ पहुँचते ही  होंगे -अवाक ! टिप्पणी को  विचारेंगे, होंगे किंकर्तव्य- विमूढ़ । अगिया बैताली और स्थितप्रज्ञ-दोनों एक साथ । बिलकुल बाउ की तरह ! बाउ, माने भईया का बनाय
 
हिमांशु । Himanshu
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प्राणों के रस से सींचा पात्र :बाउ (गिरिजेश भईया की लंठ महाचर्चा)

एक आलसी का चिट्ठा - गिरिजेश भईया का चिट्ठा, स्वनाम कृतघ्न आलसी का चिट्ठा । यहाँ पहुँचते ही  होंगे -अवाक ! टिप्पणी को  विचारेंगे, होंगे किंकर्तव्य- विमूढ़ । अगिया बैताली और स्थितप्रज्ञ-दोनों एक साथ । बिलकुल बाउ की तरह ! बाउ, माने भईया का बनाय
 
हिमांशु । Himanshu
Dec 04 2009 04:39 PM