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14 Mar 2010
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एक नए मोड़ पर लोकतंत्र

अगले 15 साल में पूरी भारतीय राजनीति एक बार महिलाओं के लिए जगह बनाने को मजबूर होगी। यही डर पुरुष सांसदों को सता रहा है।
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सर्वश्रेष्ठ... बेहतरीन... लासानी... लाजवाब...

यही विशेषण बचे हैं, जिनसे इस खिलाड़ी का ज़िक्र हो सकता है, क्योंकि इससे कम कहना न्याय नहीं होगा...
Feb 25 2010 11:53 AM
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बटला हाउस - सच और झूठ से आगे...

पुलिस-कानून की ताकत से 'भीतरी' आतंकवाद ख़त्म न होगा, क्योंकि पुलिस और कानून के रवैये ने ही तो इन्हें बनाया है...
Feb 16 2010 10:03 AM
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शर्म आती है... सचमुच, शर्म आती है...

अपने जनप्रतिनिधियों से पूछिए - जिन्हें आपने सत्ता नहीं दी, उनके सामने वे साष्टांग क्यों करते हैं... क्या उन्हें शर्म नहीं आती...
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थियेटर नया हो गया... पुराना छूट गया...

हबीब तनवीर ग्रुप के लिए वारिस खड़ा नहीं कर पाए... नतीजा, 'नया थियेटर' फिर पुराना हो गया... वक्त है, इसे बचा लीजिए...
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दर्शकों का 'रण'

26/11 के बाद ताज में टहलने पर जिस तरह मीडिया में रामू की थू-थू हुई उसकी भड़ास रामू ने 'रण' जैसी फिल्म बनाकर निकाली।
Feb 01 2010 07:04 PM
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क्या है ज्योति बसु होने का मतलब...

जिस पौधे को उन्होंने मजबूत पेड़ में बदला था, वह उनके जाते ही खुद के पैदा किए तूफान में उखड़ता नज़र आ रहा है...
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क्या वाकई पाक क्रिकेटरों का अपमान हुआ...?

नीलामी में देश के नुमाइंदे नहीं, बिजनेसमैन बैठे थे… और आईपीएल का मकसद प्यार बढ़ाना नहीं, पैसा बनाना है…
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सिरफिरे खयाल, नए साल की शुभकामनाएं...

न नए साल में सब नया होता है, न पुराने में सब पुराना... पुराने में कई नई चीजें शामिल हैं, जो पुरानी नहीं पड़तीं...
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कोटला से देश क्यों हो शर्मसार...?

जो संस्था टैक्स रियायतें लेने के अलावा कोई उत्तरदायित्व नहीं मानती, उसकी ग़लती के लिए देश शर्मसार क्यों हो...
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शिकार हो रहा है टाइगर का...

कुछ लोगों के लिए मीडिया हथियार होता है... काश, वुड्स के घर में झांकने से पहले मीडिया अपनी आत्मा में भी झांक लेता...
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फिर नहीं लौटेगा यह सुनहरा दौर...

कई ढल चुके, कई ढलने के कगार पर हैं... लेकिन लगता नहीं, क्रिकेट के क्षितिज पर इतने सितारे एक साथ फिर कभी उभरेंगे...
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कम नहीं हुआ है एड्स का खतरा...

यह सच है कि अब हम एड्स पर चर्चा से भी परहेज़ करते हैं। कोशिश रहती है कि हम इसके खतरों के बारे में बात न करें...
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घड़े में घड़े जितना ही समाया...

प्रभाष जी, सागर थे आप, लेकिन घड़े में घड़े जितना ही समाया... वह आकाश चला गया, जो हमारी छत बन जाया करता था...
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तेंदुलकर 20 साल बाद...

बीते 20 सालों में अपने मास्टर ब्लास्टर ने क्रिकेट को नई परिभाषा दे दी है....
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लौट आइए प्रभाष जी, हमें ज़रूरत है…

एक बार फिर से हमारे कंधे पर हाथ रख दीजिए… यह जताने के लिए कि आप कहीं नहीं गए हैं, यहीं हैं, हमारे बीच…
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अपने ही जादू में घिरता बाज़ीगर...

माना कि फिल्में सितारों के दम पर चलती हैं, लेकिन सितारे भी याद रखें, वे भी फिल्मों के दम पर ही चलते हैं...
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गृहमंत्री करेंगे माओवाद से संवाद

चिदंबरम माओवादियों के ख़िलाफ़ साझा मुहिम की तैयारी में जुटे हैं। आखिरी चेतावनी उछाल रहे हैं माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़ें...
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चांद...चांद... कितना पानी!

विज्ञान को जादू की तरह देखने की फितरत ने ऐसा माहौल बना दिया है, जैसे अब चांद पर बस्तियां बसेंगी और सैलानी जाएंगे...
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चीन ने पूछा, हिन्दुस्तानी क्यों नहीं बोलते हिन्दी...

आज पेकिंग विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 50 से अधिक लड़के-लड़कियां बड़े चाव से हिन्दी सीख रहे हैं...
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दुश्मन नंबर वन

विशेष अदालत में विशेष अभियोजक उज्ज्वल निकम ने कहा कि वह कसाब के दुश्मन नंबर एक हैं...
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जारी है इन्सान की कुदरत से लड़ाई...

आप कह सकते हैं कि शायद हम उस युग में हैं जिसमें किसी भी समय, कहीं भी, किसी के साथ सेक्स किया जा सकता है।
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बुढ़ापे को संवारो, भविष्य सुधर जाएगा...

जहां नौनिहालों का भविष्य सुधारने की बात की जाती है वहीं बुजुर्गों को भी सर्वोपरि रखने की बात की जानी चाहिए...
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आन पड़ी है ऑनलाइन वोटिंग की जरूरत

युवाओं में वोट के लिए उत्साह है, लेकिन उनकी व्यस्तताएं भी हैं। वोट न डालने जाने के उनके तर्क भी कभी-कभी अकाट्य होते हैं।
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देश से बाहर आईपीएल कराने के फायदे!

घटिया खेल राजनीति को इस बार जबर्दस्त धक्का लगा। मैदान से बाहर खेलने वाले 'खिलाड़ियों' को ज्यादा मौका नहीं मिला।
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हमेशा जनता ही जीती है भारत में...

नेताओं को याद रखना होगा कि जनता की आदत है सही फैसला करने की, जिसे वे 'अप्रत्याशित' बताते हैं...
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नेताओं का अकेला एजेंडा...एक और बयान!

के चुनाव में इंदिरा का 'गरीबी हटाओ', 77' के चुनाव में इंदिरा हटाओ, 80' के चुनाव में स्थिरता मुद्दे बने थे।
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कौन बने हमारा प्रधानमंत्री?

कुछ छिपे हुए खिलाड़ी भी मैदान में हैं जो अपने भाग्य से 'छींका' टूटने की उम्मीद कर रहे हैं।
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क्या सिर्फ चिदम्बरम से नाराज़ था जरनैल...?

अब उस घाव के दर्द को जानने और समझने की ज़रूरत है, जो 1984 से उस समुदाय के सीने में नासूर बनता जा रहा है...
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ऐसे पैदा होते हैं नेता...

कल तक वरुण गांधी अपना अस्तित्व ढूंढ़ रहे थे। आज वह कह रहे हैं कि 'डिमांड' बढ़ गई है...
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क्या यह सिर्फ एक बलात्कार है...?

क्या एक बाप की मर्यादा और बेटी के स्वाभाविक सहारे को छिन्न-भिन्न कर देने के लिए कोई सज़ा नहीं होनी चाहिए...?
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धर्मनिरपेक्षता वही जिसमें धर्म की बात नहीं

नेताओं की नजर में जिस धर्म के लोग जितने कम पढ़े-लिखे और गरीब होंगे वो धर्म के नाम पर उतना ही एकमुश्त वोट देंगे।
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बिखरता जा रहा है पाकिस्तान...

पाक को फिलहाल तिनके का सहारा ढूंढना भी मुश्किल हो रहा है... अब उसके पास वक्त कम है, चुनौतियां ज्यादा...
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संवेदनाओं को झंकृत करता बार्थोलोम्यू का ख़ज़ाना

अपने समय की इस बहुआयामी प्रतिभा ने '50 से '70 के दौर का इतिहास कैमरे में संजो रखा था, जो अब हमारे सामने है...
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खबर विशेष : ये पब्लिक है, ये सब जानती है!

कम से कम किसी फिल्म को ऑस्कर मिलने या न मिलने से यह नहीं माना जा सकता है कि फिल्म सर्वश्रेष्ठ है।
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आसां नहीं है रोक पाना इस जोश-ओ-जुनून को...

युवाओं के जोश-ओ-जुनून के आगे हमेशा सभी चुनौतियां फीकी पड़ी हैं।
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आखिर इस उबाल की वजह क्या है...

न जाने क्यों दर्शक मैच में अपने पक्ष को हारता देख- 'लूज कंट्रोल' हो जाते हैं और बात मार-पिटाई तक जा पहुंचती है।
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मीडिया पर लगाम कितना उचित?

गलतियां किससे नहीं होती, गलती हुई है, तो सुधार भी होगा। मीडिया ने अपने ऊपर स्वयं बंदिशें लगाई हैं...
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पहले खुद को तौलें तब बॉलीवुड पर बोलें!

बिग बी के ब्लॉग पर इस बहस को फिर एक शुरुआत दी गई कि आखिर कब तक भारत की 'गरीबी' को दिखाकर बेचा जाता रहेगा।
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हिंसात्मक लोकतंत्र ही है नियति...!

किसी ने कहा है कि हथियारों की होड़ हथियार रखने से ही खत्म होगी। तो क्या लोकतंत्र में हिंसा आज की हकीकत है...