मौन के खाली घर मे-                                       ओम आर्य's Image

मौन के खाली घर मे- ओम आर्य

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12 Jun 2010
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बंजर होने के ठीक पहले

चूहे दौड़ते थेउनके पीछे कुछ और चूहे दौड़ते थेऔर उनके पीछे कुछ औरउनकी दौड़ पेट तक हीं सीमित नहीं थीवे दिमाग की नसों तक पहुँच चुके थे और पूरे वक़्त दौड़-दौड़ कर उँगलियों से वासनाएं खुजाने में लगे रहते थे वे अलग-अलग कई बिल बनाते थे और नए इजाद किये तरीकों से
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शहर के जिस हिस्से में आज बारिश थी

शहर के जिस हिस्से में आज बारिश थीवहां आसमानकई दिनों से गुमसुम थाचुपचाप,जिंदगी से बाहर देखता हुआ एकटकपर आज बारिश थीऔर सूख चुके शहर कावो हिस्साएकाएक अब पानी पे तैरने लगा थाजैसे कि डूब कर मर गया होपर प्यार था कि जिए जाने की जिद में थाऔर इसी जिद मेंसेन्ट्रल
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रिश्ते भी देह बदलते हैं...

घर लौटता हूँतो तुम्हारी यादें,उसकी बाहों में खो जाती हैवैसे तो मुझे याद हैकि नहीं रहती इस शहर में अब तुमपर फिर भीधडकनों को न जाने क्या शौक हैरुक जाने का अचानक सेऔर दिल भी बहाने बना लेता है कितुम जैसा कोई दिख गया थावो सुबह अक्सर पूछ लेती हैरात को क्यूँ
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स्पर्श लौट आते हैं हथेली में

###आजकल न कविता हैन प्रेम हैऔर न प्रेम कवितायेंसिर्फ भेदती हुई एक खामोशी हैजो शाम केधुंधले प्रकाश के मर जाने के बाद भीचिलचिलाती रहती हैऔर एक कई रातों से नहीं सोया एकांत हैजिसमें तुम्हें कहीं न पाकरस्पर्श लौट आते हैं हथेली मेंऔर बिस्तर पे देर तक
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जरूरतें रात के वक़्त ज्यादा रोती थीं

लगभग हर सेकेंडवे एक बच्चे को जन्म देती थींऔर वे खुद सात की संख्या मेंहर घंटे मर जाती थींवे कुछ ऐसी दुनिया की औरतें थींजो सिर्फ आंकड़ों में विकसित होती थीजिस शहर मेंप्रधानमंत्री का निवास स्थान थाउसमें सब-सहारा से भी अधिक कुपोषित लोग थेमगर सरकार का यह कहना
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गुजरा वक़्त कान के पास आ कर बोलता है...

###पहाड़ों के नीचे की खाई झील बन गयी थीखारे पानी कीपर आँखों का बरसना नहीं रुका थारुका तो वो भी नहीं था...चला गया था आँखों से निकल करजाने किसकी फिक्र थी और कैसी जिद,पीछे छोड़ गया थापहाड़ पे बैठी आँखेंगुजरा वक़्तबिना बोले नहीं मानता,बिल्कुल कान के पास आ कर
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सफाई वाले ने बाल्टी भर-भर जिंदगी फेंकी

###इस घडीजब खुश सा है यहाँ हर कोईठहाके, संगीतफैशन, पार्टीसिगरेट, शराबभोग-विलास, उससे जुड़ा सुखऔर न जाने कितनी और चीजें,मैं देख रहा हूँइन सब की वजह सेकिस तरह मेरा दुख उपेक्षित होकरहाशिये पे चला गया हैसोंच रहा हूँ बहुत सारे लोगजो हासिये पे धकेल दिए गए
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दिल भात की पतीली का ढक्कन हो गया है

मैं जानती हूँतुमने देख ली होगीमेरे होंठों पे वो कांपती हुई कशिशऔर उनपे बार-बार जीभ फेर करभिंगाने की मेरी विवशताऔर भांप ली होगी वो कमजोरी भीजिसकी वजह से कोईकिसी की बांहों में निढाल हो जाता हैउस कुछ देर की मुलाक़ात मेंअब बताऊँ भी तोसदा गतिमान होने का दंभ
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लडकियां चोटी बांधना भूलती जाती थीं

मेरे अन्दर एक डार्क जोन बन गया थावहां पानी नहीं पहुँचता थाऔर मुझे पसीझने के लिए भीपानी दूर से लाना पड़ता थानदियाँ एक थींपर उनका पानी बंटा हुआ थापानी को बिना महसूस किये नहा लिए जानाआम बात थीआज की रात आप एक औरत हैंऐसा उसे किसी ने न तो कहा थाऔर न हीं महसूसा
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बढ़ते तापमान में गुलदाउदी, गेंदा और गुलाब

इसमें कोई अतिरंजन या रोमांटिसिज्म नहीं हैजब मैं कह रहा हूँकि आजकल रोज जुड़ रहा है थोड़ा-थोड़ा प्यारहमारे बीचपहले से जमा होते प्यार मेंरोज बढ़ रहा है प्याररोज खिल रहे हैंगुलदाउदी, गेंदा और गुलाब हमारे बीचबढ़ते प्यार के साथयह एक अलग सा अनुभव है मेरे
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सूखती नदियाँ और उदासी

दिन ऊबर-खाबड़ थेऔर रास्ते में जो नदियाँ मिलती थींउनका पानी नीचे उतर गया होता थाबारिश पे चील-कौए मंडराते थे ईश्वर को कोसती थी एक बूढी औरत गीली हवा के इंतज़ार मेंरातों का अँधेरा टूट जाता थाऔर रातें सुबह तक बिखरी हुई मिलती थींया रस्सी से लटकी हुईंख्वाब से
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जरूरतें, विश्वास और सपना

जब तुम घोंप आयेउसकी पीठ में छुरामैंने देखाउसके खून में पानी बहुत थाजिन मामूली जरूरतों को लेकरतुम घोंप आये छुराउन्ही जरूरतों नेकर दिया था उसका खून पानी**तुम बार-बार खोओगेविश्वासकहीं सुरक्षित रख केवे इधर-उधर हो जाते हैंरोजमर्रा कीकुछेक जरूरी चीजों के
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जरूरतें, विश्वास और सपना

जब तुम घोंप आयेउसकी पीठ में छुरामैंने देखाउसके खून में पानी बहुत थाजिन मामूली जरूरतों को लेकरतुम घोंप आये छुराउन्ही जरूरतों नेकर दिया था उसका खून पानी**तुम बार-बार खोओगेविश्वासकहीं सुरक्षित रख केवे इधर-उधर हो जाते हैंरोजमर्रा कीकुछेक जरूरी चीजों के
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मौन के खाली घर मे- ओम आर्य

मैं तुम्हें हमेशा याद रखना चाहता थाइस तरह कितुम्हारे बारे में सोंचते हुएमैं चबा जाऊं अपने नाख़ूनऔर मुझे दर्द का एहसास तक न होमैं चाहता थाकि तुम मेरी जिन्दगी कासबसे बड़ा दर्द बन कर रहो,एक घाव बन करजिसमें से हमेशा मवाद निकलेताकि तुम्हें बेवफा कहने की जरूरत
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आवाज की हमने कभी नही सुनी !

सुबह-सुबह इक ख्वाब गिर गया है आँख सेनींद काँप उठी थी शोर सेआवाज,जिसकी अन्तिम स्थिति मौन होनी चाहिए थीसंगीत से निकल कर शोर हो चुकी हैहमारे समानांतरपरन्तु तेज बढ़ते हुएयह हिला देगीएक दिन इस पूरी कायनात कोकेवल वही कान बचे रह जायेंगेजो सुन पायेंगेकर्णातीत
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अपने दुखों को सार्वजनिक करने से बचते हुए...

1]वे कहीं भी और कितना भी रो सकते हैंचाहे सड़क पे जोर-जोर सेया फिर कविता में चुप-चुपकवि होने सेउन्हें मिली हुई है इतनी छूटऔर ऐसा मान लिया गया है कि रोनाउनके काम का हिस्सा हैऔर इसलिए उस पर ज्यादा कान देने की जरूरत नहीं हैहाँ...कभी-कभी ताली बजाई जा सकती
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उल्के

आजकलये ताराटिमटिमाता रहता है अकेलाअभी कुछ रोज पहले तकदेखता था इसेचाँद के बहुत क़रीबउसकी मुलायम चाँदनी में नहाते हुएडर हैचाँद जब तक लौट कर आएये ताराकहीं उल्के में न बदल जाए
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जाने क्यूँ आज ये प्यार छोटा पड़ रहा है

कितनी देर और भला कितनी देर और लिखी जा सकती है इस तरह इक तरफ़ा प्रेम या विरह की कवितायें हालांकि यह किसी शक या शिकवा करने जैसा है और इसलिए मैं अभी तक बचता रहा हूँ यह कहने से कि मुझे नहीं मालुम तुम्हारी रातों में दरारें पड़ती हैं या नहीं और अगर हाँ तो क्या
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मौसम पे जब भी छलक के गिरता है प्यार !

मै तुम्हें कितना कम प्यार देता हूँऔर उतने से हीं तुम कितना ज्यादा भर जाती होऐसा नहीं है कितुम्हारी धारिता कम हैया इच्छापर जितना ख्वाब के भीतर रहकरदिया जा सकता है प्यारउतना मुश्किल होता है देनाख्वाब के बाहर रहते हुए, मेरे लिए और शायद किसी के लिए भी,तुम
टैग: कोख
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उस नीम के पेंड के पत्ते !

मैं अटक जाता हूँउस नीम के पेंड पे,जब भी कोई रंग हो,रौशनी होया फिर बसंत हो, बहार होआज भी होली पेशाम तक डोलते रहेंगे मेरी शाख पेउदासी के सफ़ेद रंग मेंसूखे हुएउस नीम के पेंड के पत्तेमैं अटक जाता हूँउस नीम के पेंड पेजो कभी गुलमोहर था
टैग: शाम
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अच्छी चीजों का इंतज़ार कितना अच्छा होता है न !

वो ठीक मेरेएहसास से लग कर सोती है आजकलऔर मैंअपनी नींद में उसे देखते हुएकभी-कभी जब जाग जाते हैं मेरे एहसास उससे पहलेतो रोकता हूँ उनका उठनाताकि नाजुक नींद टिकी रहे उसकी और मैं देख सकूँ वही सब जाग करजो देखता हूँ सोते हुएउसकी नींद यूँ लगती है जैसेभीतर हीं
टैग: सोना
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एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती हैवहीँ मैं हो गया हूँ खड़ाइस उम्मीद में किआज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगाअब जबकि सारी दुनिया ओट हो चुकी हैआवाज खींच के तुमने जो तानी है, उससेमैं बेसब्र हो रहा हूँ किकितनी जल्दी तुम झुक जाओ तानपुरे पेमुझे धुन देने के
टैग: आवाज
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मुहब्बत मानो फिर लौटी है

मुहब्बत मानो फिर लौटी हैबांहों को एक नाजुक से आगोश की आमद हैधडकनों को कुछ और धडकनों की आहट हैचाँद फिर कंगन सा हैऔर सितारे फिर आँचल सायूँ लगता है किवो मेरी उंगलियाँ ले जा करअपने हारमोनिअम पे टिका लेने वाली हैऔर मैं पिआनो की तरह बज जाने वाला हूँमैं जानता
टैग: आंचल
Feb 19 2010 11:24 AM
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जब सुनसान हो जाती है पृथ्वी

तुम बची रहोगीउन पुरानीउतार दी गयी कपड़ों की सिलवटों मेंऔर महसूस हो जाओगी अचानकजब किसी दिनयूँ हीं ढूंढ रहा होऊंगा कोई कपड़ाकुछ पोंछने के लिए,ये मैंने सोंचा नहीं थामुझे ये बिलकुल नहीं लगा थाकि इस सतही वक़्त मेंजब प्यार इतना उथला हो गया है,कोई इतने लम्बे
Feb 15 2010 02:19 PM
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फैशन, मैं और मेरा डर

पुरानापन फैशन में थापुरानी हवेलियाँ और किलेनए तरीके से पुराने बनाये रखे जाते थे,उजाड़-झंखाड़ हो चुकी इमारतों परलाखो डॉलर खर्च करकेउनके नवीकरण के दौरानउनका पुरानापन बचा लिया जाता थानए लोगों में पुरानी चीजों के लिए बड़ा लगाव थामगर सिर्फ चीजों मेंपुराने
टैग: जींस
Feb 13 2010 08:48 AM
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बार-बार 'चेन पुलिंग' हो रही है ...

*बार-बार 'चेन पुलिंग' हो रही हैजिंदगीथोड़ी देर के लिए रूकती हैऔर फिर चल देती हैबस हर बारचेन पुलिंग होने पेकुछ लोग जिन्दगी से उतर जाते है**शहर,जहाँ गुजारते हैं हमअपना लहू,अपनी मांस-मज्जाउम्र भर देते रहते हैंअपनी त्वचा का प्रोटीनइसके प्रदुषण कों देते हैं
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अभी मैं कविता के एक मुश्किल वक्फ़े में हूँ

अभी मैंकविता के उस मुश्किल वक्फ़े में हूँजहाँ अंतर्द्वंद मांग करता है एक सिगरेटऔर आस-पास के सारे लब्जकन्नी काटते लगते हैंहालांकिखुल कर सामने नहीं आ रहे अभी वेपर उनकी आँखों में इनकार की स्पष्ट रेखा हैऔर मैं भी ज्यादा जोर नहीं दे रहा उनपेये सोंच कर किकहीं
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पहले दुखों का मुक्त होना जरूरी है...

कुछ दुखों कों अस्तित्व में आना थामेरा शरीर काम आयामुक्त हुए वे देह पाकरमगर अपनी अंतिम यात्रा पेजाते-जातेवे राह बता गएऔर कई सारे दुखों कोऔर तब से उनकी आमदबदस्तूर जारी हैसोंचता हूँबहुत सारे सुख भी होंगेकतार मेंदेह पाकर प्रकट होने जाने के वास्ते खड़ेफिर
टैग: दुःख
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बारिश में भींगती शाम

भरी दोपहर में घर लौटकरदेखाकि तुम कहीं औरमुझसे दूर, बहुत दूरबारिश में भींगती शाम लग रही होमैंने अक्सर सोंचा हैकि तुम बारिश में भींगती शाम हीं होया उसके लिएमेराभरी दोपहरी में होना जरूरी हैऔर तबमेरी आँखें मुस्का गयी हैं ये जान कर किदरअसल मेरी सोंच हीं
टैग: शाम
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जगहें, जहाँ प्यार अब उपस्थित नहीं

हालांकियूथ हॉस्टल के जरा आगेजहाँ शहीद स्मारक हैउनकी सीढ़ियों पे अभी भी होती है बारिशऔर कभी-कभी ख़ास सिर्फ उन सीढ़ियों के लिए हींऔर अभी भी बैठते हैं उन पेकुछ युगलमैं नहीं गुजरता उस तरफ सेउसी तरहडियर पार्क के पासअभी भी बिकती है कॉफ़ीबल्कि अब बढ़ गयी हैं कॉफ़ी
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सिरहाने में से आधा चाहिए...

सिरहाने में सेआधा चाहिए...जब आऊं किचेन से काम कर केऔर तुम पहले से रजाई में रहोतब चाहिएतुम्हारी हथेली और तलवे से आधा तापचाहिए अपने कंधे पे तुम्हारा एक हाथऔर कदम सारे साथ-साथजहाँ जहां मैं तुम्हारा आधा लेकरहो सकती हूँ पूरी,खड़ी हो सकती हूँ तुम्हारे
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एक जरूरी गैर-कविता !

मैंने उसकी मदद कर दी आजअच्छा लगा करनामैं उसे जानता नहीं थाइसलिए और अच्छा लगा करनाबाद में जब उसने जताया आभारऔर अच्छा लगाज्यादा अच्छा लगाउसकी आँख में देख करजिसमे दिखाई पड़ी मुझेएक कौंधी हुई विश्वास की लकीरकि अच्छे लोग अभी भी हैं दुनिया मेंउसकी आँखों में ये
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हमारे बीच केवल मेरा प्रेम उभयनिष्ठ है!

*थोडी देर वोदस्तक देती रहीबंद बदन परफिर इन्तेज़ार किया थोडाखुलने काफिर दी दस्तकफिर इन्तेज़ार कियाऔर आखिरकार बैठ गयीबदन के चौखटे पेबदन, अक्सर रूहों की नहीं सुनते!**स्वप्नों कीसारी नमी सोख लीवक़्त नेसूखे सपने रगड़ खा करएक दिन जला गएसारी नींद.***घडी भर की
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तुम्हें तो नीम भी नही मिलता होगा!

रात जब दो बजा देती है और लाख कोशिशों के बावजूद हर्फ़ उतार नहीं पाते उसकी आगोश कों कागज़ पे मैं कंही भी, जो भी मिल जाएउसमें समां जाने के लिएनिकल पड़ता हूँ सुनसान सड़क पर।मैं लिपट जाता हूँ नीम सेऔर देर तक लिपटा रहता हूंसोंचते रहता हूँ देर तकनीम की लम्बी उम्र
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बस थोड़ी देर और

हालाँकि रात के तलवों मेंचुभा पाला अभी नुकीला है,सुबह हर दफा मूंहखोलती है एक टुकड़ा धुंध के साथमाथे पर ठंड का गूमड़ लिएपीठ पर कोहरे की पोटली लादे,वक्त अभी डटा हुआ है औरकहता है सूरज लेकर ही आयेगा ......नए ऊर्जा का ,नये रंग का ,नये साल का .......वक्त के इस
टैग: एहसास
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ये दर्द रोज कम होता जा रहा है !!

सूरज जल्दी-जल्दी डूब कर शाम कर दिया करेगा और शाम अपने तन्हाई वाले हाथ रखने के लिए मेरे कंधे नही तलाशा करेगी तमाम खीझ और उब के बावजूद आत्मा बार-बार लौटा करेगी वासना से लदी उसी सूजन वाले शरीर में जिसे घसीटते रहने में अब कोई उत्तेजना बाकी नही होगी बिना
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रातों को क्या फ़िर बातें किया करेंगे हम ! !

देह के बाहर जाकर एक बेचैनी चहलकदमी करती है देर रात तक, शरीर में जरा दम सा घुटता है बाहर बरामदे में बिना बांह वाली एक कुर्सी है जिस पे वो बैठ जाती है जरा-जरा देर चल कर वहां एक सिगरेट लेने लगती है धुंआ अपने भीतर शरीर से खींच-खींच कर अन्दर धुंआ है अभी भ
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मैं लौटूंगा !!!

सबके प्यार और समझ के लिए सबका शुक्रिया !! नंदनी का विशेष रूप से...मैंने पिछला पोस्ट हटा दिया है..शायद अब उसकी जरूरत नहीं है। सभी लौटेंगे जानता हूँ... मेरे लौटने से पूर्व मेरी कविता लौट रही है... कुछ दुःख एक झुण्ड में चुप चाप जा रहे थे सड़क के किनारे उ
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मुझे kshama कर दिया जाए !!!!

बहुत कठिन समय है मेरे लिए भी...जानता हूँ, नंदनी के लिए उससे हजार गुना ज्यादा कठिन होगा। पर फिर भी कहूँगा कि यह जल्दबाजी में लिया गया एक कठोर फ़ैसला है। 'To err is human' जिस कमेन्ट की वजह से नंदनी इतनी आहत हुई है उसे लिखने के तुरत बाद अगली सुबह को मै
Dec 09 2009 06:59 PM
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मैं, रात का ये पहर और वह

रात के इस पहर में जिसके बारे में कोई विशेषण मुझे अभी नहीं सूझ रहा है और ना हीं बहुत स्पष्ट है कि कविता के शुरुआत में इसे कितनी अहमियत दी जानी चाहिए और कितना विशेषण क्यूंकि हमेशा की तरह इस कविता में भी मुझे तुम्हारे बारे में कहना है या फिर तुम्हारे बि