अंकित

अंकित "सफ़र" की कलम से

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18 Jun 2010
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मानसून का advertisement

मुंबई में मानसून का प्रचार अभियान (हल्की फुल्की फुहारें) शुरू हो गया है, वैसे ये बताता चलूँ कि 'मानसून' से मतलब मानसून से ही है ये कोई मीरा नायर की फिल्म नहीं है, ....................ये वो है जिसके बारे में मौसम विभाग कभी सही नहीं बता पाया इसलिए इस बार
 
अंकित "सफ़र"
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एक खुशबू टहलती रही (काव्य संग्रह) - मोनिका हठीला (भोजक)

८ मई, २०१० को सीहोर, मध्य प्रदेश में जनाब डा. बशीर बद्र , जनाब बेकल उत्साही, हर दिल अज़ीज़ राहत इन्दौरी और नुसरत मेहंदी साहिबा के कर कमलों द्वारा मोनिका हठीला (भोजक) दीदी के काव्य संग्रह "एक खुशबू टहलती रही" का विमोचन हुआ.माँ सरस्वती की वीणा से निकले शब्द
 
अंकित "सफ़र"
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ये तजुर्बे जीतने के, हार को छूकर हैं निकलें

बात कहाँ से शुरू करूं? अरे आपने वीनस की ये पोस्ट "मेरा 'मैं' और हमारा 'सफ़र'" पढ़ी या नहीं, सच कहा है वीनस ने और बहुत आसान लफ़्ज़ों में एक धारा प्रवाह के साथ, हम में से अधिकतर की, खासकर मेरी तो शुरूआती कहानी बयाँ कर ही दी है. तालाब से, हाँ तालाब से ही हम
 
अंकित "सफ़र"
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खास लम्हें.........

कभी-कभी लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं या कहें कि मिल नहीं पाते कुछ एहसासों के लिए, किन्ही खास लम्हों को कलमबद्ध करने के लिए मगर तस्वीरें उस काम को काफी हद तक आसान कर देती हैं और खामोश रहते हुए भी कई बातें कह जाती है उन लम्हों के बारे में जो अपने आप में इतने
 
अंकित "सफ़र"
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मेरी साँसों में बहती है........

बहरे मुतदारिक मुसमन मक्तूअ (२२-२२-२२-२२)बेचैनी का ये आलम भी.पागल तुम दीवाने हम भी.प्यार भरे तेरे इस ख़त मेंलफ्ज़ चले आये कुछ नम भी.मेरी साँसों में बहती हैतेरी साँसों की सरगम भी.इक संदूक मिला खुशियों काएक पोटली में कुछ ग़म भी.साथ चले आये बारिश केबीती
Apr 22 2010 10:58 AM
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गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक

गुरु जी (आदरणीय पंकज सुबीर जी) द्वारा इस्लाह की हुई ये ग़ज़ल आप सभी से रूबरू हो रही है.गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक.बहुत दूर जाके भी जायें कहाँ तक.गलत राह पर उसका गिरना तो तय था भला साथ देती दुआयें कहाँ तक.अहम् को बचाने की जद्दोज़हद में वो
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२३ मार्च, १९३१

आज से ठीक ७८ वर्ष पहले, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हँसते-हँसते फांसी के फंदे को चूमा था. कभी ना मरने वाले उस जज़्बे को सलाम.९ अप्रैल, १९२९ को केंद्रीय सभागार में फेंके गए पर्चे में लिखा था....................."It is easy to kill individuals but you
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मेरे कुछ आवारा साथी

कुछ ज्यादा ही ख़ामोशी हो गयी इन दिनों इस ब्लॉग से मगर आज ये ख़ामोशी मेरे कानों में जोर से चीख के गयी है. चलिए इस चुप्पी को तोडा जाये. बिना पोस्ट के दोस्तों कौन सा मुझे अच्छा लग रहा था मगर वक़्त था कि इजाज़त ही नहीं देता था मगर आज बहुत मिन्नतों से माना
Mar 16 2010 01:21 PM
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ग़ज़ल टहनियों पे नयी सोच खिल के

वैसे आज जिस ग़ज़ल से आप मुखातिब हो रहे हैं वो आपके लिए नयी नहीं है, गुरु जी के ब्लॉग पे चल रहे तरही मुशायेरे में आप इससे रूबरू भी हो चुके होंगे मगर इसमें एक नया शेर है जिससे इस पोस्ट को लगाने का छोटा सा कारन मिल गया. इस ग़ज़ल का आखिरी शेर नया है. जो लोरी
 
अंकित "सफ़र"
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मैं पंछी हूं मुहब्‍बत का, फ़क़त रिश्‍तों का प्‍यासा हूं

ऐसा लग रहा है कि ब्लॉग पे पोस्ट किये हुए एक अरसा हो गया है, काफी दिन हो गए थे और ब्लॉग पे कोई पोस्ट नहीं लिखी थी. कुछ व्यस्तता कहूं या नेट कि निर्धारित सीमायें मगर जो भी हो.......... भोपाल जाना और सीहोर जाके गुरु जी का साक्षात् सानिध्य पाकर अगर ख़ुद को
 
अंकित "सफ़र"
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बात करेगा मुद्दे की, पेड़ पका जो इक फल है।

आजकल ज़्यादा वक्त नही मिल पा रहा है, ऍम.बी.ऐ के आखिरी दौर में हूँ(मतलब प्लेसमेंट्स)। एक कोशिश की है कुछ ख्याल आ गए थे और फ़िर कलम रुकी नही....................... जिद में उसकी बादल है। बचपन कितना पागल है। . डूबेगा जो उतरेगा, ख्वाहिश ऐसा दलदल है। . मैं
 
अंकित "सफ़र"
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चाँद खिलौना तकते थे

चाँद खिलौना तकते थे। जब यारों हम बच्चे थे। रिश्तों में इक बंदिश है, हम आवारा अच्छे थे। डांठ नही माँ की भूले, जब बारिश में भीगे थे। कुछ नए शेर जोड़ रहा हूँ.................................... पास अभी भी हैं मेरे, तुने ख़त जो लिक्खे थे। ठोकर खा के जाना
 
अंकित "सफ़र"
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अमनों-सुकू का होगा इम्तेहान कब तलक?

इस अमनों-सुकू का होगा इम्तेहान कब तलक? ये जेहाद लेगा मासूमों की जान कब तलक?" बहुत से सवाल अब भी अपने जवाब की तलाश में हैं? क्या हम कुछ सीख पाएंगे या फ़िर सब भूल कर अगले सबक(बम विस्फोट) का इंतज़ार करेंगे और हर बार की तरह शहीदों के बलिदान को टीका टिप्पणि
 
अंकित "सफ़र"
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Dec 29 2009 11:46 AM
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न सूर्य बन सकें अगर, चराग बन जला करें।

पिछली पोस्ट में किये गए वादे के मुताबिक हाज़िर हूँ एक नयी ग़ज़ल के साथ, जो गुरु जी के आशीर्वाद से कृत है. उठो के कुछ नया करें। ज़मीं को फिर हरा करें। जो प्‍यार से मिले उसे मुहब्बतें अता करें। न सूर्य बन सकें अगर चराग बन जला करें। हुआ हो गर बुरा भी तो पल
 
अंकित "सफ़र"
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वो परिंदे नए चहचहाते रहे

वैसे तो ये ग़ज़ल, आप से गुरु जी के ब्लॉग पे तरही मुशायेरे में रूबरू हो चुकी है. कुछ पुरानी भी हो गयी है मगर कहते है ना पुरानी चीज़ या कहें की ग़ज़ल और निखरती है तो इसी आस में इस ग़ज़ल को यहाँ ले आया. वैसे जब गुरु जी स
 
अंकित "सफ़र"
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एक लिफाफे में रखी है बीती कुछ यादें

काफी दिनों बाद आना हुआ है ब्लॉग पे, लिखने को बहुत कुछ है मगर सब समेट नहीं पाउँगा......................... वैसे आप लोगों को ये खबर तो होगी ही की मैं आजकल भोपाल में हूँ और सीहोर में भी उपस्थिति दर्ज करवा रहा हूँ. गुरु जी से मिलना किसी सपने के
 
अंकित "सफ़र"
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झूठ भी सच सा जहाँ है

पिछली ग़ज़ल पे आप सब से मिली हौसलाफजाई और गौतम भैय्या से हुई बात को दिल में संजो कर आ गया हूँ एक छोटी बहर की ग़ज़ल के साथ। गुरु जी ने अपना बेशकीमती वक्त देकर इसे इस लायक बनाया है. बहरे रमल मुरब्बा सालिम ( २१२२-२१२२) झूठ भी सच सा जहाँ है। प्रेम की ये वो ज
 
अंकित "सफ़र"
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मेरे अंदाज़ में तू घोल बचपन की उमर वो एक

आ गया हूँ आपके सामने एक नयी ग़ज़ल के साथ. तिरछी कलम से लिखी हुई ग़ज़ल, अब आप सोच रहे होंगे ये भला तिरछी कलम से लिखी हुई ग़ज़ल क्या होती है? दरअसल पंतनगर में जब मैं शुरूआती दौर में ग़ज़ल(बेबहर) लिखा करता था तो मेरे साथ मेरे हमउम्र के शायर दोस्त भी थे और हम सब
 
अंकित "सफ़र"
Oct 14 2009 07:44 PM
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हमारा बचपन कुछ खास था...........

क्या आप बचपन के उन बेफिक्र और मस्ती भरे दिनों की कमी महसूस कर रहे हैं? मैं तो कर रहा हूँ...........कभी कभी लगता है की सुविधाएँ हमें बहुत कुछ देकर बहुत कुछ छीन भी लेती है. जब मैं छोटा था तो तब घर में दूरदर्शन के अलावा कोई और चैनल नहीं आता था और अगर कहीं
 
अंकित "सफ़र"
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Oct 06 2009 03:06 PM
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कैसे हैं आप सब लोग?

कैसे हैं आप सब लोग?मुंबई वापिस लौट आया हूँ लखनऊ से, वहां कंचन जी से मिलना हुआ (सभी का सलाम उन्हें दे दिया है तो कोई नाराज नही होना)। खूब खातिरदारी हुई उनकी दीदी के घर में, एक कारन तो कंचन जी से पहली बार मिलने का था और दूसरा उनकी पदोन्नति का (आपको पता है
 
अंकित "सफ़र"
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खेल गली के भूल गए सब...............

राजस्थान में एक महीने की ट्रेनिंग के बाद कुछ ही वक़्त बिताया मुंबई में और फिर आ गया उत्तर प्रदेश में, वैसे आजकल लखनऊ में डेरा जमाया हुआ है और यहीं पर बना रहेगा ९ सितम्बर तक. वीनस जी ने पूछा था की इलाहाबाद कब आना हो रहा है? वीनस जी इस बार तो मौका नहीं मिल
 
अंकित "सफ़र"
Aug 22 2009 04:48 PM
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राजस्थान में गुज़रे कुछ हसीं पल......

राजस्थान जाने का अवसर मिलना मेरे लिए एक खास बात थी क्योंकि इससे पहले मैं कभी वहां गया नही था और काफी तमन्ना थी इसे करीब से देखने की जो पूरी हुई। मैंने ऑफिस के काम के साथ-साथ घूमने का कोई मौका नही गवाया और काम से फुर्सत मिलते ही निकल पड़ता था उस जगह की
 
अंकित "सफ़र"
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मेरे हौसलों में दुआ आपकी है........

सबको नमस्कार,जैसे पूरे देश में सूखे के हालत थे या हैं वैसे कुछ वक्त से मेरा ब्लॉग भी एक अदद पोस्ट की मार झेल रहा था मगर आज उसमे एक नई ग़ज़ल की बारिश हो गई है...........मगर इस हालत के कुछ कारन थे, दरअसल आजकल मैं अपने ठिकाने(मुंबई) से दूर राजस्थान में हूँ या
 
अंकित "सफ़र"
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दास्ताँ-ए-बारिश और चंद शेर

मुंबई में बारिश ने दस्तक दे दी है और मेरे घर पे कुछ खास अंदाज़ में दी है । अपने नए मेहमान का इस्तकबाल कुछ खास तरीके से किया जिसे वो शायद भुला ना पाए । हर शनिवार और रविवार को ऑफिस में काम करना मना है सीधे कहूं तो छुट्टी है । मैं इसी मौके का फायदा उठा क
 
अंकित "सफ़र"
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घर में कोई मेहमा आने वाला है....

सलाम दोस्तों, फ़िर से आपके सामने हूँ एक नई ग़ज़ल के साथ जो गुरु जी (पंकज सुबीर जी) के आर्शीवाद से इस रूप में आई है। चीज़ मुहब्‍बत है जादू की इक चाबी। लहजा बदला, बातें भी बदली बदली। उनसे मिलना सालों बाद करे पागल, खत को खोल टटोल रहा बातें पिछली। हाथ पकड़ ज
 
अंकित "सफ़र"
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पढ़ाई ख़त्म, पहली नौकरी और भी बहुत कुछ पहला ...........

सबको मेरा सलाम, जल्द आने का वडा किया था मगर देर हो गई मगर उस देर का कुछ कारन है। पहले जैसे दिन अब नही रह गए हैं, जब तक पुणे में पढ़ाई कर रहा था तब तक २४*७ नेट उपलब्ध था मगर जैसे ही वो पूरी हुई और नौकरी लगी तो फ़िर सुख के दिन भी गए। मई १५ को वाशी, नवी
 
अंकित "सफ़र"
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ताज़ा ग़ज़ल.............

आप सभी को मेरा नमस्कार, काफी दिनों बाद ब्लॉग पे आना हुआ है, पहले माफ़ी मग्न चाहूँगा................ पुणे से जाने के बाद सीधे घर का रुख किया थ और घर जाके वक्त का पता ही नही चला, इसी बीच में दिल्ली आना भी हुआ, फ़िर लगा की काफ़ी दिनों तक मस्ती कर ली......
 
अंकित "सफ़र"
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अलविदा ओ VAMNICOM....................

आप सभी को मेरा नमस्कार, आज कहने को बहुत कुछ है मगर ये तय नही कर पा रहा हूँ, कैसे कहूं और क्या- क्या कहूं। मैं पंतनगर, उत्तराखंड से "गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय" से कृषि स्नातक करके पुणे MBA करने आया था दो साल पहले, और अब जा
 
अंकित "सफ़र"
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तेरी उफ़, हर अदा के वो उजाले याद आते हैं।

आप सभी को मेरा नमस्कार, आज मैं जो ग़ज़ल यहाँ लगा रहा हूँ, उसे आप गुरु जी और हठीला जी द्वारा आयोजित किए गए तरही मुशायेरे में पहले ही पढ़ चुके होंगे। अपने आप में अद्भुत मुशयेरा था ये, मैं भी पहली बार मसहिया ग़ज़ल लिखी है। अब आप ही बताएँगे की मैं अपनी इस कोश
 
अंकित "सफ़र"
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गुरु जी ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए शुभकामनायें और एक ग़ज़ल

आप सभी को मेरा नमस्कार...................... सर्वप्रथम गुरु जी (पंकज सुबीर जी) को ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए शुभकामनायें। .................................................... एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, काफिया ज़रा मुश्किल था................. असलूब :- स्टाइ
 
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होली मुबारक

आप सभी को मेरा नमस्कार .................................. होली की शुभकानाएं।
 
अंकित "सफ़र"
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खिलखिला कर कैसे हँसतें हैं भला, अब तो बच्चा ही कोई सिखलाएगा।

आप सबको मेरा नमस्कार................ काफी दिनों के बाद एक ग़ज़ल लगा रहा हूँ, कुछ व्यस्तताओं में घिरा हुआ था मगर अब कोई शिकायत का मौका नही दूंगा। अब के जब सावन घुमड़ कर आएगा। दिल पे बदली याद की बरसाएगा। . मन से अँधियारा मिटेगा जब, तभी अर्थ दीवाली का सच
 
अंकित "सफ़र"
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"मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं"

आप सभी को नमस्कार, एक महीने बाद कुछ लिखने बैठ रहा हूँ ब्लॉग पे, छमा चाहता हूँ. मगर व्यस्तता ही कुछ ऐसी थी और है भी की समय ही नही मिल पा रहा था. गुरु जी भी नाराज़ थे की मैंने कोई पोस्ट नही लगाई, इसी एक महीने में काफी अच्छा अनुभव मिला, जिनमे से एक था अ
 
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.....मैं क्या कहूं

मैंने अपनी पिछली रचना में भारी गलती करी थी, एक मायने में अगर वो गलती नही करता तो इतनी जल्दी गुरु जी से बात करने का सौभाग्य नही मिल पाता। उसी की हुई गलती को सुधारने की कोशिश करने की मैंने कोशिश की मगर वो हो ना सका और एक नई ग़ज़ल बनी। मगर इस ग़ज़ल का एक
 
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दिल के धड़कने का तुम सबब मत पूछो......

दिल के धड़कने का तुम सबब मत पूछो। लिल्लाह उसका चेहरा गज़ब मत पूछो। . कम ना पड़े तेरा प्यार का ये सागर, दिल है मिरा इक सहरा तलब मत पूछो। . तेरे बिन लगे है लम्हा सदी सा मुझको, कैसे जियूं तनहा यार अब मत पूछो। . दीदार तेरा दिल की कोई धड़कन हो, कितना मैं हू
 
अंकित "सफ़र"