hindigen's Image
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
17 Jun 2010
कुल प्रविष्टियां
61
पाठक भेजे
1439
पसंद
40
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
23.59
पसंद करें
2
नापसंद करें

जीवन वृक्ष !

नव पल्लव साअद्भुत बचपन और चलेदो चार कदम तो डाल पकी औ'बन गया पौधा,अपने पैरों खड़ा हुआफिर   तो जीवन के चरणों सानित नव विकसित किशोर, युवा सावृक्ष  वही सम्पूर्ण हुआ.शाखों पे शाखेंपल्लव की उस घनी छाँव में अपने ही पौधों को पालाआया माली काट
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: kavita
पसंद करें
5
नापसंद करें

एक अंतहीन इन्तजार...........!

इन्तजारकिसी अच्छे पल काकितना मुश्किल होता है?लगता हैठहर गयी काल की गतिसुइंयाँ रुक गयीं सूरज और चाँद भीरुक गए हैंकिसी इन्तजार में.बयार गगन में सहमी सीकिसी संकेत के इन्तजार मेंअधर में लटकी सीत्रिशंकु बनी है.और हमसांस थामेदेख रहे हैंऐसे काल परिवर्वन की
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
3
नापसंद करें

कैसी ये ख़ामोशी ?

आजकल खामोश क्यों?कलम तेरी,क्या जज्बा संघर्ष काकुछ डिगने लगा है?या फिरअपनी लड़ाई मेंबढ़ते कदमों के नीचेबिछाए गए कुछ काँटों की चुभनडराने लगी है.कुछ इस तरह रखो कदमचरमरा के पिस जाएँ,कांटे क्या लोहे की सलाखें भीजज्बों के आगेमुड़कर बिछ जायेंगी.कटाक्ष,
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
3
नापसंद करें

लिखा नहीं जाता !

गीत और ग़ज़ल लिखे नहीं जातेलिख जाते हैं,कौन सा पल, कौन का निमिष ,मन के दर्पण परछोड़ दे एक लीकऔर मनभावों की लड़ियाँ, अक्षरों के मोती पिरोकरशब्दों के हार बनाने लगता है.जब सब ख़त्म हो जाएँतब उठाकर देखोकुछ न कुछअंतर्वेदना हो या उल्लासएक रचना बन
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
2
नापसंद करें

ये हादसों की इमारत !

ये जिन्दगीहादसों की इमारत है,जिसकी एक एक ईंट के  तले दबेइस जिन्दगी केकुछ न भूलने वाले हादसे ही तो हैं.इसको आकार देने मेंकभी मन सेकभी बेमन सेदायित्वों को ओढ़े ख़ामोशी सेयंत्रवत सक्रियये हाथ और पैर चलते रहे . मष्तिष्क और ह्रदय मेरी
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
5
नापसंद करें

किसी की आँख का आँसू!

आँख से आँसू किसी के यूं ही नहीं झरतेदर्द को पीकर जुबान जब थाम लेते हैं सिसकियों के खौफ सेगम को दबाते हीकिसी के आँख से रुकने का नहीं नाम लेते हैं.पार्क की एकांत बेंच परसुनसान सा कोना पकड़करचुपचाप पी गरल अपमान औ' तिरस्कार काइस
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: kavita
पसंद करें
3
नापसंद करें

ये दर्द बयां करती है !

ऐसा नहीं कि जो ये कलम चल रही है,हर दिशा में आग उगल रही है.नाहक  ही बन्दूक सीहर समय गरजा करती है.कभी इसके दर्द को समझो,ये सच हैकि ये लिखती यथार्थ हैमगर ये कोई न कोई दर्द बयां करती है.चाहे वे शब्द स्याही की जगहआंसुओं से सने होंशब्दों ने
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
4
नापसंद करें

हाशिये में दर्द !

दर्द को हाशिये में डालो,मुस्कानों के सिलसिले से एक इबारत नयी लिखो,उनके बीच बसबिंदियाँ दर्दों की हों.गर मुस्कानें  कम लगेंखोज लो  बचपन मेंनिर्दोष, खामोश जिंदगियों में  और उनको बाँट लोजग के सारे गमउनके
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: kavita
पसंद करें
2
नापसंद करें

पत्थर बना दिया !

सोचती हूँ अब भी  न जाने क्यों,वक़्त के थपेड़ों ने मुझेपत्थर बना दिया.थी तो मैं समंदर के किनारे की रेतजिसने रखे कदम दिल में समा लिया.प्यार के अहसास सेइतना सुख दियाहर आने वाले कोअपना बना लिया.अब मगर बात कुछ और हैबोले बहुत बोल ज़माने
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: पत्थर
पसंद करें
3
नापसंद करें

प्यासी धरती - प्यासे मन!

बंजर धरती दरकन माटी की,दरका देती हैदिल सैकड़ों के.पर क्या करते?गर आंसुओं से बुझती प्यास हर आँखइतना रोती औ'नीर बहा देती, प्यास से पपड़ाये होंठों की प्यासशीतल कर देती.मन में उमड़ते विचारों के बादल इतना बरसातीआकाश में उठी
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: kavita
पसंद करें
4
नापसंद करें

नाम रोशन कर्मों से!

लोग कहते हैं ,जमाना बदल गया है.बेटे और बेटियां एक समान,पर फर्कदिख जाता है,कुलदीपक होना जरूरी है.वंश  का नाम चलेगा.लड़कियाँ थोड़े ही चलाती हैं.हम क्यों भूल जाते हैंगर लड़के कुलदीपक है,तो लड़कियाँ कुल ज्योति क्यों नहीं? नाम रोशन बेटे या बेटियां
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
1
नापसंद करें

वो कहाँ खो गया?

बचपन मेंजो था अब वो कहाँ?न  जाने वो कहाँ खो गया?ये सवाल उठा मन मेंऔर फिर वो याद आया -घनी अमराइयों मेंपेड़ों के झुरमुटकटती थी दुपहरन लगती थी धूप.जेठ की दुपहरियानिबडिया के नीचेठंडी हवा थीन चुभती थी धूप.पानी  भरी नहर थीकुँओं  की जगत
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
1
नापसंद करें

कल और आज !

छत कि मुंडेर पर बैठीनीचे लगे वृक्षों को  देखकर ठंडक काअहसास ले रही थी.फिर नजर पड़ी शाखों के बीच घोंसले में बैठेपक्षियों के नवजात शिशु बंद आँखों से माँ की बाट जोह रहे थे.कब आएगी औ'कब डालेगी दाना मुंह मेंफिर अपने पंखों तलेछिपा कर
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
3
नापसंद करें

संवेगों को लगाम दो!

क्यों भटक रही है?ये नयी पीढ़ी,न जमीं का अहसास न आसमां का अंदाज  पैरों के तले जमीं का अंदाज जो देखा खिसकी नहीं है,बस खिसकने के अंदेशे में खुद को कत्ल कर लिया.अभी कितना जीना था?किसके लिए जीना था?कुछ भी नहीं सोचा,कितने बेसहारे छूटे
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
2
नापसंद करें

आतंकवाद कहाँ नहीं है?

हर किसी अप्रिय घटना के घटित होने पर,हम कोसते हैंआतंकियों को.गालियाँ हम क्यों देते हैं?जिनको हमने देखा ही  नहीं.आतंकवाद के नाम परचंद लोगों कोदेखते रहते हैं,अरे ये आतंकी कब नहीं थे?कहाँ नहीं थे?हर काल में रहे हैं.हर  बार किसी नए नाम
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
0
नापसंद करें

तिरंगे में लिपटे शवों को सलाम!

तिरंगे में लिपटे इन वीरों को सलाम. क्या इस नमन तक ही हमारे कर्तव्यों की हैइति श्री.फिर पढेंगे कोईदूसरी खबर पर उस खबर के पीछेक्या बचा सकते है खुद को?उन चीत्कारों से निर्बाध बहते आंसुओं के प्रवाह सेकैसे रहेगी ये सूनी गोद ?कैसे
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: vatan aur gaddar
पसंद करें
0
नापसंद करें

ये अश्क दरिया है !

वो कला दीर्घास्कूल के बच्चों की मन मोहक तस्वीरेंबाल मन, कच्चे भावफिर भी बहुत बारीकी से उकेरा था.अपनी कल्पनाओं के अपनी संवेदनाओं केऔ' भावनाओं केप्रतिबिम्ब बना - कहीं शाम तो कहीं सवेरा  बिखेरा था.एक कोने में रखी एक
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
2
नापसंद करें

सवाल गुरुओं से !

 बहुत साल पहलेजब ये सब नहीं हुआ था,होता तब भी था ,किन्तु परदे में छुपा था.मेरा मन तब भीइनसे खफा था.वह प्रवचन दे रहा थाभीड़ से भरे पंडाल मेंगुरु की वाणीईश्वर का आदेशतभी मेरा अंतर बोला -'चाहे रखा होबहुरुपये ने वो वेश?'आत्मा शुद्ध होवाणी औ' मन
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: bhagva
पसंद करें
3
नापसंद करें

कल्पना - नए जहाँ की !

आओ रचें  एक विश्व ऐसा, एक लक्ष्य से जुड़ें सभी, व्योम के विस्तार सा,संसृति के विचार सा संयमित एक आचार सासंतुलित व्यवहार सा,हो विश्व एक परिवार सा.यत्न करें  संग-संग चलें,संयुक्त ही सब प्रयत्न हों,धीर धर के निपट लेंयक्ष प्रश्नों से सभी,उत्तर
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
1
नापसंद करें

ये तो सिर्फ व्यामोह है!

वह माली बगीचे काचुन चुन कर रोपी पौध थी,फिर दिया पानी और खाद थी, जिससे मिलें उन्नत सभीपुष्पों, पलों से लदे वृक्ष.पल्लवित पुष्पित हुए वे सभीहर्ष से माली की आँखें चमकने   लगीं.चुन-चुन कर पुष्पों के हार बना पहनेगा वो ऐसे सजीले स्वप्न
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: ghar
पसंद करें
0
नापसंद करें

अब नीलकंठ बनना नहीं!

अरे सरस्वती के पुत्रो/पुत्रियोमत रचो ऐसा किसरस्वती का अपमान हो.रचना वह नहींजो सिर्फ प्रशस्ति होरचना वो हैजिसमें समाई समष्टि हो.अनर्गल,निर्थक,निरुद्देश्य,इस कलम को उठाना उपासना नहीं,उसका अपमान है.जैसे वाणीचाहे मधुर बोले या उगले गरलसबकी अपनी
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: srishti
पसंद करें
0
नापसंद करें

महिला दिवस का शतक

एक शतक ये भी बना,क्या सुलझी है सौ गुत्थियाँ भी?शायद नहीं?इसको हमने कब जाना?जानकर भी  कभी अपना हक़ ही  माना,शायद  नहीं?संकल्प लिए गए,कर्म से जूझे भी,कभी गिरे उठे भी,परहम अभी भीसबको दिशा नहीं दे पाएउन्हें मुक्त नहीं करा पाएउन्हें
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: daayitva
Mar 08 2010 01:11 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

तिनका - तिनका आशियाँ!

वो  आकाश में  गुजरते हर जहाज को गौर से देखती शायद इसी में उसका बेटा होगा?यही सुना था,उसका बेटा हवाई जहाज की फौज में गया है.अब की आया तो बेड़ियाँ डाल दूँगी.घर-आँगन खाली-खाली सा अब देखा नहीं जाता.शहनाई 
 
रेखा श्रीवास्तव
Mar 05 2010 04:07 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

होली आई रे रंगीली!

होली आई रे रंगीली,     उड़े मस्ती के रंग.....जले मन का कलुषहोली की लपटों के संग,गले मिले सब मानुषभूले कल की वो जंग.होली आई रे रंगीलीउड़े मस्ती के रंग....चलो खेले रे होलीभीगे रंग में अंग-अंग,गूंजे गीत फागुन केबाजे ढोल औ' मृदंग.होली आई
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: holi
पसंद करें
0
नापसंद करें

मुझे जीने का हक है!

न जाने क्यों बगावत करतन कर खड़ी हो गईवर्जनाओं और प्रतिबंधों कीजंजीरों को तोड़करनए स्वरूप मेंजंग का ऐलान कर.माँ लगी समझानेवे बड़े हैं,पिता हैं,भाई हैं ,उन्हें हक हैकि तुझे अपने अनुसारजीवन जीने देने का।नहीं, नहीं, नहीं..........बचपन से प्रतिबंधों कीजंजीरों
 
रेखा श्रीवास्तव
Feb 23 2010 02:47 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

hindigen

नारी का एक और सच ! जीवन समर्पित किया बचपन से बुढ़ापे तक बेटी बनी,एक गर्भ से,एक घर में, जन्म लेकर पली बढ़ी  सब कुछ किया.पर कही पराया धन ही गयी.बेटा सब कुछ पा  गयाउसको  कहा--ऐसा 'अपने घर ' जाकर करना ये मेरे वश में
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: naari
Feb 22 2010 12:33 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कर्म करो कुछ ऐसे!

यदि नारी होतो क्या?निर्बल मत बनो,याचना के लिएकर मत उठाओ,कर्म कर उन्हेंसार्थक बनाओ ।कर्म कभी होता निष्फल नहीं,कम कभी अधिक भी देता है,जन्म लेने की यही सार्थक दिशा होगीममता का जो सागरईश्वर ने दिया हैसिक्त कर प्रेम सेखुशी कुछ चेहरों पर लाओकभी इन हाथों
 
रेखा श्रीवास्तव
टैग: sarthakta
Feb 20 2010 12:42 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक रिक्त अहसास!

हाँमैं नारी हूँ,वन्दनीय औ' पूजिताकहते रहे हैं लोग,कितने जीवन जिए हैं मैंनेकहाँ तो सप्तरिशी की पंक्ति मेंविराजी गई,सतियों की उपमा देपूजी गई।मर्यादाओं में भी भारीपड़ रही थी,तब जागा पुरूष अंहकारउसको परदे में बंद कर दिया,सीमाओं में बाँध दियाचारदीवारी से
 
रेखा श्रीवास्तव
Feb 19 2010 03:42 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कलयुग का मसीहा !

आज के युग में कुछ ईसा बाकी हैंजो मानवता की सलीबेंअपने कंधे पर उठाये आज भी घूम रहे हैं.बगैर ये सोचे की कल क्या ये हमारे लिएसाथ होंगे?इससे बेखबरजीवन भर शक्ति भरतन-मन-धन से परोपकार करते रहे.पर वक़्त किसके साथ है?अपने वक़्त पर सबको
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
1
नापसंद करें

खारे पानी की कीमत!

वह सर पर कपड़ा रखेईंटें ढो रही थी,पास ही कहींदुधमुहीं बच्ची सो रही थी।आवाजें कारीगरों कीजल्दी करोजल्दी करोबराबर आ रही थीं।सहसा सोती बच्चीरोने लगी।शायद भूखी होगी।आँचल से दूधटप-टप कर बहने लगा।परबेटी को उठा नहीं सकतीपेट उसका भर नहीं सकतीपैसे जो कट
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
0
नापसंद करें

नववर्ष तुम्हें शत शत शुभ हो!

नववर्ष तुम्हें शत शत शुभ हो!नव प्रात अरुणिमा से बिखरेखुशियाँ और खुशहाली।प्रफुल्लित मन सेरखो पग नव दिवस में।जगमगाते सूर्य की किरणेंउल्लास भरें जीवन में।हर प्रात तुम्हारीहो होली सी,हर संध्या दीवाली बन चमके।वंदना के स्वर औ'अर्चना की उमंगों सेजीवन में ईश
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
4
नापसंद करें

सिर्फ आज जिया है!

विदा गुजरे साल को सब दे रहे हैं। गुजर रहे हैं साल-दर-साल सिर्फ रात औ' दिन के चक्र में न कल देखा, न देखेंगे। सिर्फ आज औ' आज अपना है। और इसी आज को जी सकते हैं। कुछ बदला है तो वक़्त के हिसाब से कलैंडर और तारीख बदलती है। तस्वीरे पुरानी और धुंधली होती हैं।
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
0
नापसंद करें

चुनाव - आंतरिक युद्ध

महासमर जिसको कहते रहे सब, क्या वाकई एक आंतरिक युद्ध है ? वही तो है -- देश कहाँ है? कहाँ जा रहा है? क्या भविष्य होगा? इसकी किसको ख़बर है, बस इतना ही तो है, हम तुमपर औ' तुम हमपर कीचड़ उड़ा रहे हैं, हमसे (जनता) कभी जानना चाहा है किसे चाहती है? क्या चाहती
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
0
नापसंद करें

कामना!

नव वर्ष नव मुकुलित कलियों सा खिलने को तैयार। इससे पहले विधाता तू इतना कर दे -- सद्बुद्धि, सद्चित्त , सद्भावना उन्हें दे दे, जिन्हें इसकी जरूरत है। जिससे कोई भी दिन नव वर्ष का रक्त रंजित न हो मानव की मानव से ही कोई रंजिश न हो, भय न छलके आंखों में मन म
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:50 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

विडंबना

आज अकेले, बीमार, बेवश चुपचाप पड़ी पर छत पर लटके पंखे के हर कोने को देख रही है। सारी बत्तियां बुझ चुकी है कब की, अब तो बंद हो चुकी है, रसोई में बर्तनों की खनक भी , वह भूखी शायद कोई पूछे खाना लाये, पर यह क्या? रात गहराती गई वह भूखे पेट करवटें बदलती रही
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
0
नापसंद करें

प्रार्थना जो सुन ली गई!

मैंने भगवान् से माँगी शक्ति उसने मुझे दी कठिनाइयाँ हिम्मत बढ़ाने के लिए। *मैंने भगवान् से माँगी बुद्धि उसने मुझे दी उलझनें सुलझाने के लिए। *मैंने भगवान् से माँगी समृद्धि उसने मुझे दी समझ काम करने के लिए। *मैंने भगवान् से माँगा प्यार उसने मुझे दिए दुखी
 
रेखा श्रीवास्तव
पसंद करें
0
नापसंद करें

गुमनामी के अँधेरे!

गोली, बारूद और धमाकों की राजनीति कराने वालो गुमनाम रहने वालो कहते हो की हम धर्म के लिए लड़ रहे हैं ladai। मत सताओ हमारे वर्ग को अपने वर्ग का पता तो बताओ वे कब तुम्हें अपना मानते हैं। क्यों अपनी कुंठाओं और वहशत को धर्म और वर्ग का नाम देते हो। खून के र
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:50 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अभिव्यक्ति!

जो कुछ जिया भावों से लिया औ' अंकित किया बंद पृष्ठों की धरोहर किसने देखी, किसने सुनी। दिशा मंच की मुखर अभिव्यक्ति ही हस्ताक्षर के नाम की पहचान बन गई, सबने सुनी सबने पढ़ी। नहीं पता सराही गई या फिर आलोचित हुई, मौन रही या मुखरित हुई छुआ मर्म या असफल रही अ
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:50 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक अभिव्यक्वी!

 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:50 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अर्थ!

रिश्तों के बदले अर्थों में अब कौन किसी का होता है। रिश्ते बेमानी हो जाते हैं, जब अर्थ पास नहीं होता है। रिश्ते खंडित होते देखे जब अर्थ बीच में आता है। इस पैसे की खातिर ही तो अपना अपनों को खोता है। एक निर्बल निर्धन ही तो है, जो रिश्तों को पानी देता है
 
रेखा श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:50 AM