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शब्दयोग सारथी-पत्रिका

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06 Jun 2010
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हिन्दू आध्यामिक दर्शन-भक्ति के विभिन्न स्वरूप मान्य (hindu adhyamik sandesh-bhakti ke alag laga roop)

विरोधः कर्मणीति चैन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्।।हिन्दी में भावार्थ-यदि देवताओं की पूजा, यज्ञादि कर्म में विरोध आता है तो उसे ठीक नहीं मान लेना चाहिये क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय में अनेक रूप धारण करना संभव है-ऐसा देखा गया है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय
Jun 06 2010 01:50 PM
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श्रीमद्भागवत गीता एक स्वर्णिम ग्रंथ है-रविवारीय चिंतन (shri madbhagvat geeta a golden book)

अपना अपना विचार है और उसके अभिव्यक्त होने की भी अलग अलग शैली होती है। इसलिये किसी के कुछ लिखने और पढ़ने पर उस आदमी के आंतरिक मनस्थिति की भी जानकारी मिल जाती है। इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग पढ़ते कम हैं लिखने और कहने के लिये लालायित अधिक रहते
May 30 2010 01:33 PM
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हिंदू धर्मं सन्देश-क्लेश वाला काम करने से बचें

मनुस्मृती  के अनुसार -----------------------------यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्म्न्ः।तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।हिन्दी में भावार्थ-जिस कार्य से मन को शांति तथा अंतरात्मा को खुशी हो वही करना चाहिये। जिस काम से मन को
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चाणक्य नीति दर्शन-अपने गुणों की स्वयं प्रशंसा करना अज्ञान का प्रमाण (khud ki taarif agyan ka praman-chankya neeti)

पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।हिन्दी में भावार्थ-चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा अन्य लोग  करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और
May 20 2010 09:23 AM
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मनुस्मृति-भोजन करते समय मन को प्रसन्न रखें (hindu dharma sandesh-tanavmukt hokar bhojan grahan karen)

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चेतकुत्सयन्दृष्टवा हृध्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः।।हिंदी में भावार्थ-मनुष्य को जैसा भोजन मिले उसे देखकर प्रसन्नता हासिल करना चाहिए। उसे ईश्वर प्रदत्त मानकर गुण दोष न निकालते हुए उदरस्थ करें। भोजन करते हुए अपनी झूठन न छोड़ें।
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पतंजलि योग साहित्य-जात पांत से मुक्त होने पर ही जीवन का आनंद

जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।हिन्दी में भावार्थ-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण
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मनुदर्शन-धर्म के विषय पर झूठ बोलने वाला नरक में गिरता है (manu smriti-dharma aur jhooth)

अवाविशरास्समस्यन्धे कित्वषी नरकं व्रजेत्।च प्रश्नवितर्थ ब्रूयात्पृष्ठः सनधर्मनिश्चये।।हिन्दी में भावार्थ-धर्म के विषय पर पूछे जाने पर उसका उत्तर झूठा देने वाला भयानक अंधेरे से भरे नरक में गिरता है।एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्तवं कल्याण मन्यसे।नित्यं
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May 08 2010 09:51 AM
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कौटिल्य दर्शन-डरपोक की संगत करना भी ठीक नहीं

प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि।सुखाभियोज्यो भवति विषयेऽप्यतिसक्तिमान्।।हिन्दी में भावार्थ-विरक्त प्रकृति वाले राजा को उसके लोग युद्ध में ही छोड़कर चले जाते हैं और विषयों में आसक्त पुरुष को थोड़ा सुख देकर ही जीत लिया जाता
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May 06 2010 08:55 AM
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विदुर दर्शन-क्षमावन पुरुष की राह देवता भी देखते हैं (kshamavan purush aur devata)

अतिवादं न प्रवदेव वाद्येद् योऽनाहतः प्रतहन्यान्न घातयेत्।हन्तुं च यो नेच्छति पापकं वै तस्मै देखाः समुहयन्त्यागताय।।हिन्दी में भावार्थ-जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात न स्वयं कहता न दूसरे को कहने के लिये प्रेरित करता, बिना मार खाये किसी को नहीं मारता और न
May 01 2010 09:33 AM
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संत कबीरदास जी के दोहे-राम की भक्ति का रंग न चढ़े तो दोष किसे दें(ram ki bhakti ka rang-kabirdas ji ke dohe)

राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।कहु धौं कौन
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मनु दर्शन-झूठी गवाही देने वाले को होता है जलोदर रोग (jhoothi gavahi dena bura-manu darshan)

साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।हिन्दी में भावार्थ-झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में
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श्रीगुरुवाणी-घमंड अनेक संकटों का कारण (shri guruvani-ghamand sankat ka karan

‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।हिन्दी में भावार्थ-गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-हंसों में बगुले की तरह होता है ज्ञानियों में अज्ञानी (economic of kautilya-hans aur bagula)

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।हिन्दी में भावार्थ--ऐसे माता पिता अपनी संतान के बैरी है जो उससे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानो की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड
Apr 22 2010 09:07 AM
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भर्तृहरि नीति शतक-स्वर्ग की कल्पना अल्पज्ञान की देन (hindu dharma sandesh-swarg ki kalpana)

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैं क्योंकि तपस्या तथा साधना
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पतंजलि योग दर्शन-योगाभ्यास से उत्पन्न विवेक से प्रकाश फैलता है

योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।हिन्दी में भावार्थ-योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग
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भर्तृहरि नीति शतक-यहाँ हर कोई अभिनेता है (all men is actor-hindu dharma sandesh)

क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः क्षणं वितैहीनः क्षणमपि च संपूर्णविभवः।जराजीर्णेंगर्नट इव वलीमण्डितततनुर्नरः संसारान्ते विशति यमधानीयवनिकाम्।।हिन्दी में भावार्थ-क्षण भर के लिये बालक, क्षणभर के लिये रसिया, क्षण भर में धनहीन और क्षणभर में संपूर्ण
Apr 16 2010 09:11 AM
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भर्तृहरि नीति शतक-धन कि उष्मा से मनुष्य की प्रतिष्ठा बढ़ती है (Dhan aur pratishtha-hindi sandesh)

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव। अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।। हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर
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संत कबीर दर्शन-गुरु भक्ति के बिना राजा भी गधा (Guru Bhakti ke bina-kabir ke dohe)

तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं। कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।माटी लदै कुम्हार की,
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संत कबीर के दोहे-नशे का सेवन करने वाले इस संसार का दरिया पर नहीं कर सकते

अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए। छाजन भोजन हक्क है, अनाहक लेय।आपन दोजख जात है, और
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विदुर नीति-उपकार करे वही सच्चा बंधु (upkar kare vahi bandhu-hindi sandesh)

सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।हिन्दी में भावार्थ-वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।  
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Apr 09 2010 06:32 AM
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चाणक्य दर्शन-अपयश से प्राप्त धन किसी काम का नहीं (hindi adhyamik sandesh-Dhan aur yash)

अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।हिन्दी में भावार्थ-जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी
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भर्तृहरि नीति शतक-गरीब होने पर भी ज्ञानी सम्मानीय होता है (garibi aur gyan-hindi sandesh)

शास्त्रोपस्कृतशब्द सुंदरगिरः शिष्यप्रदेयाऽऽगमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभर्निर्धनाः।तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थ विनाऽपीश्वराः कुत्स्या स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः।।हिन्दी में भावार्थ- ग्रंथों का अध्ययन से उसमें वर्णित
Mar 26 2010 09:51 AM
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पतंजलि योग दर्शन-योग साधना से अशुद्ध बुद्धि का नाश होता है (yog sadhna se buddhi nirman)

योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।हिन्दी में भावार्थ-योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग
Mar 23 2010 10:09 AM
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मनु संदेश-गायत्री मंत्र और शांति पाठ का जाप करना फलदायी (Gayatri mantra aur shanti path-manu smriti)

सावित्रांछान्ति होमाश्य कुर्यात्पर्वसु नित्यशः।पितृंश्चैवाष्टकास्वर्चयेन्तिन्त्यमन्वष्टकासु च।।हिन्दी में भावार्थ-अमावस्या, पूर्णमासी तथा अन्य त्यौहारों पर गायत्री मंत्र तथा शांति मंत्र का जाप अवश्यक करना चाहिये।मंगलचारयुक्त्तः
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कौटिल्य दर्शन-कभी कभी उपेक्षासन भी करना चाहिए

निवातकवचान् हित्वा हिरण्यपुरवासिनः।उपेक्षयानमास्याय निजधान धनजयः।।हिन्दी में भावार्थ-महाभारत काल में अर्जुन ने हिरण्यपुर वासी जनों को छोड़कर उनकी उपेक्षा करते हुए निवातकवचों का  संहार  किया था। रिपूं वातस्य बलिनः संप्राप्याविश्कृतं
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संत कबीर वाणी-भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार (bhojan aur manushya-sant kabir ke dohe)

अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए। छाजन भोजन हक्क है, अनाहक लेय।आपन दोजख जात है, और
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपना लक्ष्य कभी बीच में न छोड़ें

 रत्नैर्महाहैंस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।सुधा विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिततार्थाद्विरमन्ति धीराः।।हिन्दी में भावार्थ-समुद्र मंथन करने से देवता लोग अनमोल रत्न पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए। भयंकर विष भी निकला पर उनको उससे भय नहीं हुआ और न
Mar 02 2010 08:18 AM
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भर्तृहरि नीति शतक-ज्ञानी रत्न का अपमान करने वाला निंदा योग्य

शास्त्रोपस्कृतशब्द सुंदरगिरः शिष्यप्रदेयाऽऽगमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभर्निर्धनाः।तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थ विनाऽपीश्वराः कुत्स्या स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः।।हिन्दी में भावार्थ- ग्रंथों का अध्ययन से उसमें वर्णित
Feb 25 2010 08:24 AM
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संत कबीर के दोहे-कामना सहित भक्ति में निराशा भी हाथ लगती है

मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
Feb 23 2010 08:14 AM
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कौटिल्य दर्शन-निंदा रहित मनुष्य देवता समान

स्वभावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन व बान्धवान्।स्त्रीभृत्यान् प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम्।।हिन्दी में भावार्थ-स्वभाव से मित्र, सद्भाव स बंधुजन, प्रेमदान से स्त्री और भृत्यों को चतुराई से वश में करें।ये प्रियाणि प्रभाषन्ते प्रयच्छन्ति च
Feb 21 2010 08:55 AM
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संत कबीर के दोहे-धर्म का असली स्वरूप समझना जरूरी

संत शिरोमणि कबीरदास अपने समय के धार्मिक विवादों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि---------------------------------------------------------------------कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।। एक तरफ भारतीय हैं
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पतंजलि योग दर्शन-सवितर्क और निर्वितर्क समाधि (patanjali yog darshan-samadhi)

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्ति।।हिन्दी में भावार्थ-यह समाधि की प्रारंभिक अवस्था है जिसमें मनुष्य का ध्यान सासंरिक विषयों से पृथक तो हो जाता है पर शब्द, अर्थ और ज्ञान का आभास कहीं ने कहीं उसके मस्तिष्क में बना रहता है।  इसे
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Feb 13 2010 10:04 AM
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वेदांत दर्शन-ब्रह्म ज्ञान से पुरुषार्थ की सिद्धि (vedant darshan-brahmagyan aur purusharth)

पुरुषार्थोऽतश्शब्दादिति बादरायणः।। हिन्दी में भावार्थ-पुरुषार्थ की सिद्धि ब्रह्मज्ञान से होती है क्योंकि शब्द से ही यह सिद्ध होता है कि इसे बादरायण कहते हैं। आचारदर्शनात्। हिन्दी में भावार्थ-श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण देखने से सिद्ध होता है कि ब्रह्म विद्या
Feb 12 2010 09:49 AM
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वेदशास्त्रों से-परमात्मा के अलावा किसी अन्य की स्तुति नहीं करो (vedshastron se-pramatma ki stuti)

‘मा चिदन्यद् वि शंसत सखायो मा रिषणयत।’हिन्दी में भावार्थ-परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य की स्तुति मत करो क्योंकि ऐसा करने से अपने मार्ग से हट जाओगे। ‘आ घा गमद्यति श्रवत् सहस्त्रिणीभिरूतिभिः। वाजेभिरुप नो हवम्।हिन्दी में भावार्थ-प्रभु का बल अनंत और उनके
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श्रीगुरुवाणी-घमंड से अनेक विकार पैदा होते हैं उत्पन्न (shri guruvani-ghamand aur vikar)

‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।हिन्दी में भावार्थ-गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये
Feb 05 2010 06:25 AM
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कौटिल्य दर्शन बुद्धि और उद्यम के संयुक्त प्रयास से फल की प्राप्ति

धातोश्चामीकरमिव सर्पिनिर्मथनादिव।बुद्धिप्रयत्नोपगताध्यवसायाद्ध्रवं फलम्।।हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह अनेक धातुओं में मिला होने पर भी गलाने से प्रकट होता है तथा दही मथने से घृत प्रगट होता है वैसे बुद्धि और उद्योग से के संयुक्त उद्यम से फल की प्राप्ति भी
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संत कबीर के दोहे-ज्ञान के बिना जीवन में अंधेरा रहता है (gyan aur jivan-hindi sandesh)

चौसठ दीवा जाये के, चौदह चन्दा माहिं।तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं। कबीर गुरु की भक्ति बिन,
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चाणक्य दर्शन-धर्मग्रंथों की आलोचना वाले कष्ट उठाते हैं (Dhrama granthon ki ninda galat-hindu dharma sandesh)

दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।हिंदी में भावार्थ-दान से दरिद्रता, शील भाव से दुर्भाग्य तथा निष्ठा से भय का नाश होता है।अन्यथा वेदपाण्डितयं शास्त्रमाचारमन्यतथा।अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्चन्ति
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विदुर नीति-अनुशासनहीनता से ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है

अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।हिन्दी में भावार्थ-अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।धर्मार्थोश्यः
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चाणक्य की नीति-पुरानी बातों को याद करने से लाभ नहीं

अहो बत विचित्राणि चरितानि महाऽऽत्मनाम्।लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च।।हिंदी में भावार्थ-अहे! महात्माओं का चरित्र भी बहुत विचित्र होता है। एक तरफ वह धन को तिनके समान मानते हैं किन्तु उसके भार से झुक जाते हैं।गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव