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01 Jun 2010
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Brain-Drain is Better than Brain-in-Drain

  मेरी पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए खुशदीप सहगल जी ने इन शब्दों को उद्धरित किया था। द इकोनॉमिस्ट अखबार में १० सितम्बर २००५ को छपी एक सर्वे रिपोर्ट का शीर्षक था- Higher Education, Wandering Scholars. इस अखबार ने सर्वे रिपोर्ट में भारत के पूर्व
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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ये प्रतिभाशाली बच्चे घटिया निर्णय क्यों लेते हैं?

  आजकल इण्टरमीडिएट परीक्षा और इन्जीनियरिंग कालेजों की प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित हो रहे हैं। इण्टर में अच्छे अंको से उत्तीर्ण या इन्जीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंक से सफलता हासिल करने वाले प्रतिभाशाली लड़कों के फोटो और साक्षात्कार
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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साँईं बाबा का प्रसाद और ज्ञानजी की सेहत…

  आज वृहस्पतिवार है। शिर्डी वाले साँई बाबा के भक्तों का खास दिन। इस दिन व्रत-उपवास रखकर श्रद्धालु जन साँईं मन्दिरों में दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इलाहाबाद का मुख्य मन्दिर भी इस दिन विशेष आकर्षण का केन्द्र हो जाता है। श्रद्धा और सबूरी के बीज
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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अब तो बस करिए ज्ञान जी…

  रात को सवा दस बजे सोफ़े पर लेटकर जी-टीवी पर १२/२४ करोल बाग के काण्ड देख रहा था। लेटकर ब्लॉगरी नहीं कर सकता इसलिए शाम को एक घण्टा इसी प्रकार टीवी देखना अच्छा लगता है। ऑफिस और गृहस्थी के कामों की थकान मिटा ही रहा था कि फोन पर सूचना मिली कि ज्ञानजी के
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

  आज गिरिजेश भैया ने अपनी पोस्ट से गाँव की याद दिला दी। गाँव को याद तो हम हमेशा करते रहते हैं लेकिन आज वो दिन याद आये जब हम गर्मी की छुट्टियों में वहाँ बचपन बिताया करते थे। अपनी ताजी पोस्ट में उन्होंने पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब उकेरे हैं। एक बिम्ब
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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परदुःखकातर… :(

  वैशाख की दुपहरी में सूर्य देवता आग बरसा रहे हैं… ऑफ़िस की बिजली बार-बार आ-जा रही है। जनरेटर से कूलर/ए.सी. नहीं चलता…। अपनी बूढ़ी उम्र पाकर खटर-खटर करता पंखा शोर अधिक करता है और हवा कम देता है। मन और शरीर में बेचैनी होती है…। कलेक्ट्रेट परिसर में ही
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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निरुपमा के बाद रजनी को भी जान गँवानी पड़ी… क्यों???

  निरुपमा पाठक की मौत का मामला अभी अखबारी सुर्खियों से हटा भी नहीं था कि इलाहाबाद  में ऐसे ही क्रूर कथानक की पुनरावृत्ति हो गयी। इस बार किसी सन्देह या अनुमान की गुन्जाइश भी नहीं है। पुलिस को घटनास्थल पर मिले सबूतों के अनुसार परिवार वालों ने
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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वर्धा में अम्बेडकर को याद करने का तरीका अनूठा था…

  मेरी वर्धा यात्रा की प्रथम, द्वितीय, और तृतीय रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अब आगे… विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस से जब हम सेवाग्राम आश्रम के लिए निकले तो धूप चढ़ चुकी थी। यद्यपि यह आश्रम घूमने का सबसे अच्छा समय नहीं था, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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ग्यारह साल पूरे…

  लगता है कल ही की बात है जब हम थे कुआँरे निपट बेचारे फिर बारात सजाकर गये थे दूल्हा बने सबने नाच-नाच कर जश्न मनाया ससुरालियों ने हमें खूब बनाया लेकिन हमें खूब भाया रचना से सृजन सुनहरा दौर शुरू हुआ पहले बेटी, फिर बेटा वागीशा, सत्यार्थ उसके बाद
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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वर्धा परिसर का परिक्रमण और चाय पर चर्चा…

  कुलपति जी के आवास से रात का भोजन लेने के बाद राजकिशोर जी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो.सचिन तिवारी, प्रो. सुवास कुमार के साथ हम गेस्ट हाउस लौट आये। वहाँ खुले आसमान के नीचे चबूतरे पर कुर्सियाँ डाल रखी गयीं थी। दो बुजुर्गवार लोग तो सोने के लिए अपने कमरे
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

  रेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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वर्धा में पूरा होता गान्धी का एक सपना…

  आप जानते ही होंगे कि सरकारी कोषागार कार्यालय वित्तीय वर्ष की समाप्ति करीब आने पर अत्यधिक व्यस्त हो जाते हैं। इस बार भी स्थिति बदली नहीं थी। पन्द्रह मार्च के बाद ही ऑफिस में कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी। घर आकर ब्लॉगरी करने की हिम्मत नहीं पड़ती।
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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क्षमा प्रार्थना…

  हे मूषक राज, बहुत भारी मन से आपको विदा कर रहा हूँ। आपको कष्ट देने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लेकिन क्या करूँ, आपने हमारे परिवार को ऐसा मानसिक कष्ट दिया कि आपको अपने घर से दूर कर देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। आपसे विनती करने का कोई माध्यम
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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ढाबा संस्कृति और बर्बाद होते बच्चे…

  “साहब मुझे यहाँ से छुड़ा दीजिए… ये लोग मुझे बहुत मार रहे हैं…” अचानक कान में ये शब्द पड़े तो मैं अपने मोबाइल के मेसेज पढ़ना छोड़कर उसकी ओर देखने लगा। एक लड़का बिल्कुल मेरे नजदीक आकर मुझसे ही कुछ कहने की कोशिश कर रहा था। करीब तेरह चौदह साल की उम्र का वह
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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तेली के बैल का गोल-गोल चक्कर…

  इस पूरे प्रकरण पर कुछ नया कहने लायक बचा ही नहीं है। मूल पोस्ट और उसकी चर्चा के बीच अभिमन्यु प्रसंग की याद दिलाती एक अन्य पोस्ट और इन पोस्टों पर आयी टिप्पणियों को आद्योपान्त पढ़ने के बाद मन बड़ा दुविधाग्रस्त हो गया। कुछ बोलें कि न बोलें। जार्ज बुश की
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
Mar 07 2010 10:20 PM
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ताजा हवाओं ने कहला दी एक ग़जल…

  पिछले दिनों त्रिवेणी महोत्सव की धूम में एक बहुत अच्छे कार्यक्रम की चर्चा करने से चूक गया था। मैने पहले भी आपलोगों का परिचय इमरान प्रतापगढ़ी और उनकी संस्था ताजा हवाएं से कराया था। इस नौजवान शायर में कुछ अलग हटकर अनूठे सांस्कृतिक आयोजन करने का उत्साह
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
Mar 02 2010 07:38 PM
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त्रिवेणी महोत्सव में प्रयाग की धरती पर उतरे सितारे…।

  उन्नीस फरवरी से पच्चीस फरवरी तक लगातार सात दिनों तक इलाहाबाद में गीत, संगीत, नृत्य, कविता और शायरी की स्वर लहरियाँ यमुना नदी के तट पर बने शानदार मंच से बिखरती रहीं और रोज शाम को शहर का सारा ट्रैफिक बोट-क्लब मुक्तांगन की ओर मुड़ जाता रहा। सेवेन
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
Feb 28 2010 07:17 PM
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त्रिवेणी महोत्सव आला रे…

  प्रयाग का माघ मेला समाप्त हो चुका है। मेला प्रशासन मेला सकुशल सम्पन्न होने की खुशी मनाने और धन्यवाद ज्ञापन हेतु सत्यनारायण की कथा आयोजित कराकर और प्रसाद का वितरण कराकर सुदीर्घ परम्परा का निर्वाह कर चुका है। सारे तम्बू उखड़ चुके हैं और करीब दो माह
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
Feb 19 2010 03:30 AM
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बुद्धू सा खड़ा मैं…।

  ब्लॉग जगत की हलचल से अलग रहते हुए अपनी सरकारी नौकरी बजाने में ही हलकान हो जाने पर मैने मन को समझा लिया कि इसमें बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऑफ़िस से लौटकर घर आने के बाद शर्ट की बटन खोलने के पहले कम्प्यूटर का बटन ऑन करने की आदत पड़ गयी थी। उसे
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
Feb 15 2010 08:20 AM
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राम रसोई हुई मुखर…|

बुरा हो इस ब्लॉगजगत का जो चैन से आलस्य भी नहीं करने देता। एक स्वघोषित आलसी महाराज तुरत-फुरत कविता रचने और ठेलने की फैक्ट्री लगा रखे हैं। इधर-उधर झाँकते हुए टिपियाते रह्ते हैं। रहस्यमय प्रश्न उछालते हैं और वहीं से कोई सूत्र निकालकर कविता का एक नया प्रयोग
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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घुस पैठी थकान…

  इतवार का बिहान सिर तक रजाई लिए तान घर में की खटपट से बन्द किए कान आंगन में धूप रही नाच छोटू ककहरा किताब रहा बाँच फिर भी न आलस पर आने दी आँच कुंजीपट खूँटी पर टांग धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग   कूड़े का ढेर
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!

  भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत के चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका - हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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एक घटिया व्यक्ति को चुनने के लिए इतनी कसरत… बाप रे बाप?

  जनवरी की बेहद सर्द रात… एलार्म की घण्टी भोर में साढ़े चार बजे बज उठी है। घर के तीनो मोबाइल सेट एक साथ बजे हैं। तीनों में एलार्म इस लिए सेट किए कि कहीं कोई चूक न हो जाय। मामला इतना संवेदनशील है कि तैयार होकर साढ़े पाँच बजे तक हर हाल में निकल पड़ना है।
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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इलाहाबाद में अमरूद के लिए तरसने का मजा… !?!

  मुझे इलाहाबाद में नौकरी करते हुए ढाई साल हो गये। इसके पहले एक दशक से कुछ ही कम साल विद्यार्थी के रूप में यहाँ गुजार चुका हूँ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर गंगानाथ झा छात्रावास में रहते हुए हम रोज शाम को लक्ष्मी टाकीज चौराहे पर चाय पीने आते और फलों
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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मुर्दा पीटना बन्द कर कुछ अच्छा सोचें नये साल में…

  कलम उठाकर लिखते थे हम शुभकामनाएं नये साल की लिफाफे को सजाकर कुछ फूलों की डिजायन से भरते थे उसमें अपना सुलेख ग्रीटिंग कार्ड तैयार कर लेते थे- सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ अपने गुरुजनों को, सखा और सखियों को, बस थमा देते थे अपनी शुभकामनाएं। स्कूल में
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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अवकाश-त्रसित मन की आकुलता में समाया क्रिकेट…

जिलाधिकारी द्वारा प्रकाशित छुट्टियों की लिस्ट अपनी ऑफिस टेबल के शीशे से दबाकर सभी अधिकारियों की तरह मैने भी लगा रखा है। हाँलाकि उसमें दिखने वाली सभी छुट्टियाँ हम ट्रेजरी वालों को नसीब नहीं होती। स्थानीय अवकाश, निर्बन्धित अवकाश और कार्यकारी अवकाश के द
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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गृहिणी की कविता

मन के भीतर उमड़-घुमड़ कुछ बादल सघन ललक बरसन पर पछुआ की धार से छितर-बितर कुछ टुकड़ा इधर कुछ खाँड़ उधर   घर के भीतर की खनखन कलरव बच्चों का कि अनबन घरनी के मन में कुछ तड़पन फिर ठनगन उठता नहीं स्वर गगन बस होती भनभन मन ही मन घरवाला अपने में मगन देख ना सके
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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खाकी में भी इन्सान बसते हैं और कम्प्यूटर में…!?!

पिछले रविवार की सुबह बड़ी मायूसी के साथ शुरू हुई थी। शनिवार तक कम्प्यूटर में वायरस का प्रकोप इतना बढ़ चुका था कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ा था। डॉक्टर (इन्जीनियर?) ने कहा कि इसे भर्ती करना पड़ेगा। पूरा चेक-अप होगा। तंत्रिका तंत्र में इन्फ़ेक्शन पाये जाने पर
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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छः दिसम्बर का वार्षिक रुदन और मुकाबला बेशर्मी का...

अयोध्या का एक अर्थ ‘जहाँ युद्ध न हो’ पढ़ा था। लेकिन जब भी छः दिसम्बर की तारीख आती है मीडिया में तलवारें निकल आती हैं। उस त्रासद घटना का विश्लेषण करने के लिए बड़े-बड़े विद्वान, विचारक और राजनेता पत्रकारों द्वारा बुला लिए जाते हैं और टीवी पर पैनेल चर्चा श
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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एक वी.आई.पी. शादी जयपुर में...।

आजकल शादियों का मौसम चल रहा है। ज्योतिषियों ने बता दिया कि शादी के लायक शुभ मुहूर्त की तिथियाँ गिनती की ही हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि एक ही तिथि में अनेक शादियों के निमन्त्रण मिल जा रहे हैं। अकेले सबको निभा पाना कठिन हो गया है। लेकिन कुछ खास शादियाँ ऐ
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है...?

दस साल पहले संघ लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार में एक सदस्य ने मुझसे पूछा था कि भारत के राजनेताओं और पश्चिमी देशों के राजनेताओं में मौलिक अन्तर क्या है? मेरे बायोडेटा में शायद यह देखकर कि मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी रह चुका हूँ उन्होंने मुझसे यह मुश्क
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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बाल दिवस पर चच्चा, दादा और परदादा से भेंट

आज सुबह-सुबह बच्चों को ‘हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे’ बोलकर ऑफिस गया तो इस वादे के साथ कि शाम को कहीं घुमाने ले जाएंगे। आज ‘सेकेण्ड सैटर्डे’ के कारण ट्रेजरी में काम कम होने की उम्मीद थी। मन में खुशी थी... जल्दी लौट आऊंगा और बच्चों की ख़्वाहिश पूरी करने और अप
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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गर्ज़ू नचनिया तेल दै दै नाचे...!

ग्रामीण परिवेश में बिताए बचपन के दिनों से मेरे मन में अमिट रूप में जो चरित्र अंकित हैं उनमें ‘नाच पार्टी’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले मर्दों की छवि विशेष कौतूहल का विषय रही है। यह ‘नाच’ शादी-विवाह के अवसर पर बारातियों के मनोरंजन के लिए आ
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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इलाहाबाद का फेफ़ड़ा... जहाँ साँसें ताजा होती हैं!

बहुत दिनों बाद आज छुट्टी टाइप मूड के साथ बिस्तर छोड़ने को मिला। जगने के बाद तुरन्त कोई जरूरी काम नहीं था। सिविल सर्विसेज की मुख्य परीक्षा के सिलसिले में कोषागार के द्वितालक दृढ़कक्ष (double-lock strong-room) को सुबह -सुबह खोलने की जिम्मेदारी भी आज नहीं
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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इलाहाबाद की राष्ट्रीय संगोष्ठी के बाद...

यह पोस्ट सातवें आसमान से लिख रहा हूँ... कारण है आप सभी की जोरदार, शोरदार और बेजोड़दार प्रतिक्रियाओं की सतत्‌ श्रृंखला। वाह, मुझे तो उड़न तश्तरी होने का इल्म हो रहा है... (आदरणीय समीर जी क्षमा याचना सहित) श्री विभूति नारायण राय जी से २३ अगस्त २००९ को
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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इलाहाबाद की राष्ट्रीय ब्लॉगर गोष्ठी से पहले...

१) भाव हमारे शब्द उधार के... पाँच दिनों की ट्रेनिंग पूरी करके लखनऊ से इलाहाबाद लौटा हूँ। पत्नी और बच्चे बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। दीपावली की छुट्टी मनाने मेरे दो भाई भी अपने-अपने हॉस्टेल से आ चुके थे। घर में एक जन्मदिन भी था। लेकिन मुझे इसकी खु
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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हाय रे तेरी किस्मत...

तीर्थयात्रा से लौटकर दुबारा कामकाज सम्हालने को जब मैने ऑफिस में प्रवेश किया तो पाया कि नये बॉस ने कदम रखते ही यहाँ रंग-रोगन लगवाकर, गमले रखवाकर, सुनहले अक्षरों में नामपट्टिका लगवाकर और ‘फेसलिफ्ट’ के दूसरे तमाम उपायों द्वारा यह संकेत दे दिया है कि अब
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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अनूप जी, अब सम्हालिए... सेमिनार तय हो गया!!

  पिछली पोस्ट में मैने जिस सेमिनार के न हो पाने की बात बतायी थी उसके आयोजन की तैयारी में आदरणीय अनूप शुक्ल जी ने बहुत समय खर्च किया था। जाने कितने चिठ्ठाकारों से चर्चा में लगे रहे। इन्होंने जाने कितने आदि, अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी चिठ्ठाकार
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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ब्लॉगिंग का राष्ट्रीय सेमिनार जो आज हो न सका...

  यदि तिथि बदली न होती और कार्यक्रम अपरिहार्य परिस्थितियों में टला न होता तो मैं आज १९ सितम्बर को इलाहाबाद में देश के अनेक मूर्धन्य चिठ्ठाकारों का दर्शन लाभ पाकर अभिभूत हो रहा होता। हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवारा, और हिन्दी मास की
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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प्रगति मैदान के पुस्तक मेले से खबरें अच्छी नहीं हैं...

  किताबों की खुसर-फुसर... भाग-४ “...स्टॉल में रखी किताबें एकदम अकेली हैं। उनका अकेलापन अस्तित्ववादी नयी कविता और नयी कहानी के अकेलेपन से ज्यादा बड़ा सच है और भयावह है। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। दिखते हैं तो ऊँघते प्रकाशक और उनके कर्मचारी। लोग उनतक
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी