सब कुछ's Image
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
06 Jun 2010
कुल प्रविष्टियां
30
पाठक भेजे
512
पसंद
8
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
17.07
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें

सब कुछ

दुनिया बनाने वाले - शरद तैलंग के स्वर में
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

सब कुछ

 
शरद तैलंग
पसंद करें
1
नापसंद करें

सब कुछ

 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : हमारी मिन्नतों पर वो अगर कुछ ..

हमारी मिन्नतों पर वो अगर कुछ ध्यान न देता, ज़माना नाम उसको फिर कभी भगवान न देता । मुझे हर हाल में चाहत तुम्हारी ज़िन्दा रखनी थी, तुम्हारे इक इशारे पर मैं वरना जान न देता । न होती उसको मेरे चैन से सोने की जो चिन्ता, मुझे आराम करने के लिए शमशान न देता ।
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : ग़र ज़माने का करम उसको कभी

ग़र ज़माने का करम उसको कभी खल जाएगा, वो सज़ा हमको मिलेगी सब यहाँ जल जाएगा । यूं तो हमने खैरियत लिख दी उन्हें मज़मून में, हम शिकस्ता हाल हैं उनको पता चल जाएगा । इतनी बारिश में अगर जो घर तुम्हारा बह गया, फ़िक्र क्या है अब ख़ुदा के घर में तू पल जाएगा । हमन
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : जब दिलों में प्यार का मंज़र बनेगा

जब दिलों में प्यार का मंज़र बनेगा, देखना उस दिन ख़ुदा का घर बनेगा । बन गया अपने वतन का वो तो लीड़र, कुण्डली में था कि जो तस्कर बनेगा । है यकीं इक दिन ख़ुदा देगा मुझे भी, पर न जाने कब मेरा छ्प्पर बनेगा । सांस ले ली बाप ने भी आख़िरी अब, फूल जैसा भाई भी नश्त
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : इतना ही एहसास बहुत है

इतना ही एह्सास बहुत है, वो अब मेरे पास बहुत है । उसके आगे सच्चे मन से, दो पल ही अरदास बहुत है । क़िस्मत न हो सीता जैसी, महल हैं कम, बनवास बहुत है । जो हैं पानीदार यहाँ पर, उनकी देखो प्यास बहुत है । ये सुनना गाली लगता है, ’तू अफ़सर का खा़स बहुत है’ । अन
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : पत्थ्रर सा जो दिल होता है

पत्थर सा जो दिल होता है, वो फिर किस काबिल होता है । तुझे भूलने की कोशिश ही, काम बड़ा मुश्किल होता है । पहले तिल तिल खुद मरता है , तब कोई का़तिल होता है । कागज़ पर मैं दिल रख देता, जि़क्र सरे महफ़िल होता है । क़हर तो लहरें ही ढ़ातीं हैं, रुस्वा हर साहिल
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : मेरा साया मुझे हर वक्त कुछ

मेरा साया मुझे हर वक़्त कुछ बदला सा लगता है, मगर ये साथ देता है तो फ़िर अपना सा लगता है। सितारे भी तो रातें जाग कर हरदम बिताते हैं, अब अपना दर्द उनके सामने अदना सा लगता है। नदी जब सूख जाती है तो खुश होते किनारे हैं, दख़ल देना किसी का बीच में गन्दा सा लग
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कोटा दशहरा मेले में प्रस्तुति

कोटा राष्ट्रीय दशहरा मेले में स्वतन्त्रता दिवस के स्वर्ण जयन्ती कार्यक्रम में गीतान्जली संस्था की ओर से प्रस्तुति देते हुए ।
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : उन हसीं लम्हों को फिर आबाद करना

उन हसीं लम्हों को फिर आबाद करना तुम कभी बचपन के दिन भी याद करना । लौट आएं फिर से वो गुज़रे ज़माने, तुम खुदा से बस यही फ़रियाद करना । दिल तुम्हारा भी गगन में उड़ चलेगा । कै़द से पंछी कोई आज़ाद करना । नाखुदा के ही भरोसे पर न रहना, तुम खुदा को भी सफ़र में य
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : इस जहाँ में अब ये किस्सा आम है

इस जहाँ में अब ये किस्सा आम है, प्यार जो करता है वो बदनाम है । वो तो इंसां को खुदा सा पूजता है, इस तरह का मुझ पे इक इल्जा़म है । सारी दुनियां को वो ठोकर मारता है, जिसके हाथों में सुरा का जाम है । खुश है वो बाजी़ सियासत की बिछा, जिनके पत्तों में तुरुप
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : दर्द के साथ दोस्ती कर ली

दर्द के साथ दोस्ती कर ली, इसलिए मैंनें खुद्कुशी कर ली । अश्क़ आँखों में कै़द रह न सके, दिल की हालत की मुखबरी कर ली । उनकी आँखों में जो सागर देखा, हमने आँखों में इक नदी कर ली । ज़िन्दगी को संवारने के लिए, हमने बरबाद ज़िन्दगी कर ली । हाले दिल जब किसी से
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

सब कुछ

स्वर्गीय मुकेश की याद में रोटरी क्लब तथा गीताञ्जली कोटा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि महाराज कुमार इज्यराज सिंह तथा उपस्थित जन समुदाय
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

सब कुछ

रोटरी क्लब तथा गीताञ्जली कोटा द्वारा स्वर्गीय मुकेश की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुति देते हुए शरद तैलंग । संगत करते हुए ब्रजेश दाधीच तथा वेद प्रकाश । नीचे बैठे हुए विश्वामित्र दाधीच और डाँ विजय सरदाना
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : बहुत से लोग नंगे पाँव जब..

बहुत से लोग नंगे पाँव जब सड़कों पे चलते हैं, उन्हें बस देखने भर से हमारे पैर जलते हैं । न जाने क्यूं खु़दा बच्चों में अपने भेद करता है, कोई महलों में रहते हैं कोई गलियों में पलते हैं । ये दौलत हाथ का है मैल कहते है सुना सबको, जिन्हें मिलती नहीं है वे
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मुम्बई में सम्मान

मुम्बई में शरद तैलंग के सम्मान समारोह में कवि रास बिहारी पाण्डेय, संयोग साहित्य के सम्पादक मुरलीधर पाण्डेय, हृदयेश मयंक, शरद तैलंग ,खन्ना मुजफ़्फ़रपुरी तथा संजीब निगम
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मुम्बई में सम्मान

हिन्दी प्रचार एवं शोध संस्थान भायन्दर मुम्बई द्वारा सम्मानित किए जाने के अवसर पर शरद तैलंग, शायर खन्ना मुज़फ़्फ़रपुरी एवं संजीव निगम
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : यारी जो समन्दर को निभानी..

यारी जो समन्दर को निभानी नहीं आती, ये तय था कश्तियों में रवानी नही आती । वो तो हवा ने हम से दगा़ कर दिया वरना- क्या हम को इक पतंग उडा़नी नहीं आती ? साँपों के शहर में समझिए उसकी मौत है, जिसको सुरीली बीन बजानी नहीं आती । सारे सुबूत अपनी जुबां बन्द जो र
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : जब तलक आसमान बाकी है

जब तलक़ आसमान बाक़ी है, पंछियों की उडान बाकी़ है । अभी लंका ही ठीक है सीता, अभी इक इम्तहान बाक़ी है । चीर ज्यों द्रोपदी का बढ़ता गया, उसका अब भी लगान बाकी़ है । शेर पेडो़ पे चढ़ नही पाए, इसलिए ये मचान बाकी़ है । कैसे निर्दोष मैं कहूं खुद को, अभी तेरा बयान
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : तलवारें जब भी मियान मे...

तलवारें जब भी मियान में ख़ुद को कै़द समझतीं हैं, ऐसा दौर तभी आता है ख़ून की नदियां बहतीं हैं । बचपन हँसी ख़ुशी बीता करता था जिनको सुन सुनकर, वे कहानियाँ दादी के होठों पर आज तड़पतीं हैं । उनका धीरज टूट गया या यह ऐलान-ए-बगा़बत है, बिन मौसम जो आज बदलियाँ चा
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : आंतडियों से मिलकर उसका ..

आंतड़ियों से मिलकर उसका जाने ये क्या हाल हुआ ? ख़ंजर का चेहरा भी देखो शरम के मारे लाल हुआ । एक समन्दर के बावत बस इतना ही हम जान सके, कई कश्तियां लील गया वो तभी तो मालामाल हुआ । फूलों ने तानाशाही का वो भी आलम देखा है, जिसने गर्दन ऊँची की गुलशन में वही
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

सब कुछ

मेरा परिवार
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : इन दुकानों में सजा सामान ...

इन दुकानों में सजा सामान सब बेकार है, पहले जैसा अब कहीं भी तीज न त्यौहार है । दीप थोडी़ देर ही जलकर के देखो बुझ गए, अब न वैसा तेल है न तेल में वो धार है । खिड़कियाँ ही जब मकानों की सड़क की ओर हैं, फिर शिकायत क्या ? सड़क का आदमी बदकार है । सिर्फ़ नेताओं क
 
शरद तैलंग
Dec 29 2009 11:48 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

शरद तैलंग ’सृजन रतन सम्मान से सम्मानित २५.०८.०९

साथ में स्वप्नेश रतन, डॊ. गंगानी, डॊ. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी एवं महेन्द्र नेह साहित्यकार श्रीमती कमला’कमलेश’ से सम्मान प्राप्त करते हुए
 
शरद तैलंग
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : ज़िन्दगी की साँझ ज्यों ज्यों ढल रही है

ज़िन्दगी की साँझ ज्यों ज्यों ढल रही है,एक बस तेरी कमी ही खल रही है ।ख़ून परवाने का उसके मुँह लगा है,शाम होते ही शमा फिर जल रही है ।हौसला तो देखिए इस नाव का भी,मूंग छाती पर नदी की दल रही है ।चाल अपनी, ज़िन्दगी तो चल चुकी है,मौत अब तो चाल अपनी चल रही है ।चार
 
शरद तैलंग
टैग: ग़ज़ल
Sep 13 2009 01:19 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ग़ज़ल : कभी जागीर बदलेगी कभी सरकार बदलेगी

कभी जागीर बदलेगी, कभी सरकार बदलेगी ।मग़र तक़दीर तो अपनी बता कब यार बदलेगी ?अगर सागर की यूं ही प्यास जो बढती गई दिन दिन,तो इक दिन देखना नदिया भी अपनी धार बदलेगी ।हज़ारों साल में जब दीदावर होता है इक पैदा,ऒ ! नर्गिस अपने रोने की तू कब रफ़्तार बदलेगी ?सदा कल
 
शरद तैलंग
Sep 01 2009 11:00 PM
पसंद करें
3
नापसंद करें

ग़ज़ल " फ़ना जब भी हमारे राज़ होंगे.

फ़ना जब भी हमारे राज़ होंगे, अलग जीने के ही अन्दाज़ होंगे । खफ़ा उनसे मैं होना चाहता हूँ, मग़र डर है कि वो नाराज़ होंगे । ज़रा पन्नों को हौले से पलटना, वहाँ नाज़ुक भी कुछ अल्फ़ाज़ होंगे । बहुत महफ़ूज़ है पिंजड़े में चिड़िया, गगन में तो शिकारी बाज़ होंगे । वो दिन कब
 
शरद तैलंग