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08 Mar 2010
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तुम कितनी सुंदर हो

-डॉ. अशोक प्रियरंजनजब भी होता हूं उदासआसपास फैली होती हैंजिंदगी की अनगिनत परेशानियांतब जेहन में चमकती हैतुम्हारी मुस्कराहटगालों पर रोशन दीयेदिल में उतर जाने वाली आंखेंमौन में भी गूंज उठता हैतुम्हारी आवाज का जादूसांसों में महकने लगता हैतुम्हारा अहसासगमक
 
dr. ashok priyaranjan
टैग: कविता
Feb 14 2010 12:03 AM
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तुम्हारे बिना!

-डॉ. अशोक प्रियरंजनजिंदगी में कई बार चारों तरफबिखरती हैं खुशियां ही खुशियांमहकने लगते हैं फूलफैलने लगती है उनकी खुशबूआंखें देखती हैंहजारों हजार सपनेउम्मीदों की किरणेंफैलती हैं चेहरों परकह जाती हैं, बहुत कुछ बिना कहेपर मैं उन्हें महसूस नहीं कर
 
dr. ashok priyaranjan
टैग: कविता
Jan 30 2010 12:10 AM
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इस देश के हालात से बापू उदास हैं

दंगे औ फसादात से बापू उदास हैं, इस देश के हालात से बापू उदास हैं । सपनों की जगह आंख में है मौत का मंजर, हिंसक हुए जजबात से बापू उदास हैं । बढते ही जा रहे हैं अंधेरों के हौसले, जुल्मों की लंबी रात से बापू उदास है ं। बंदूक बोलती है कहीं तोप बोलती, हिंस
 
dr. ashok priyaranjan
Dec 29 2009 12:01 PM
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तुम्हारी आंख के आंसू?

डॉ. अशोक प्रियरंजन कई सवाल ऐसे होते हैं जो करते हैं हमेशा परेशान, पैदा कर देते हैं हर बार चंद नए सवाल। ऐसा ही एक प्रश्न खड़ा है मेरे सामने, काफी तलाशने के बाद भी नहीं मिल पा रहा इसका जवाब इसीलिए जेहन में अक्सर कौंधता रहता है यह सवाल मेरी आंखों में कै
 
dr. ashok priyaranjan
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रूप जगाए इच्छाएं

डॉ. अशोक प्रियरंजन तुम्हारी आंखों में देखे हैं मैने हजारों सपने, जिंदगी का हर पल महकता रहता है तुम्हारे सपनों से, खुशियां खिलती हैं फूट पड़ती हैं उनसे इंद्रधनुषी सपनों की बेशुमार किरणें, तब मन में जन्म लेती है एक इच्छा, इन सपनों में भर दूं अपने सपनों
 
dr. ashok priyaranjan
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गालों पर गुलमोहर महके

डॉ. अशोक प्रियरंजन आंखें करतीं झिलमिल, ओंठ खुशी से चहके, मौसम ने ऐसा रंग बदला, गालों पर गुलमोहर महके । खुले केश लहरा लहरा कर करते हैं गलबहियां गोरा मुखड़ा ऐसा लगता जैसे चंदा चमके । आंखें, खुशबू, रूप सलोना और नए मीठे कुछ सपने, इतनी दौलत पाकर अब तो कदम
 
dr. ashok priyaranjan
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प्रेम मिलन

डॉ. अशोक प्रियरंजन भौतिक सुख पाने का माध्यम होता है शरीर । नहीं फूटती इसमें शाश्वत और अनंत नेह की कालजयी कोंपल । जन्म जन्म तक जलने वाली प्रेम की अमर ज्योति जन्म लेती है आत्मा से । शरीर बंधा रहता है जाति उम्र और सौंदर्य के खोखले बंधन में । जकड़ा रहता
 
dr. ashok priyaranjan
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रूप तुम्हारा

डॉ. अशोक प्रियरंजन सपनों में आकर बस जाता रूप तुम्हारा, हर पल अपने पास बुलाता रूप तुम्हारा । कुछ खट्टी कुछ मिट्ठी यादें करती आंख मिचौली, अक्सर पूरी रात जगाता रूप तुम्हारा । आंखें, खुशबू, ओंठ सलोने और चमकता चेहरा कितने सारे रंग दिखाता रूप तुम्हारा । तु
 
dr. ashok priyaranjan
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अधरों पर खिलते फूल

डॉ . अशोक प्रियरंजन शब्द बन जाते हैं फूल महकने लगती है उनकी अर्थवत्ता संपूर्ण ब्रह्मांड में जब वो खिलते हैं तुम्हारे अधरों पर ठहर जाता है कोलाहल रुक जाती है हवा की सरसराहट सन्नाटा बुनता है वातावरण में नई भाषा ऐसे में बोलती हैं सिर्फ आंखें मुखर होता ह
 
dr. ashok priyaranjan
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सपनों का सफर

डॉ. अशोक प्रियरंजन तैरते हैं असंख्य सुनहरे सपने बेशुमार ख्वाहिशें जिंदगी के गीत उम्मीदों के फूल तुम्हारी आंखों में जब भी झांका हूं इन आंखों में तो महसूस की है मैने अथाह गहराई उभरते देखे हैं अनेक प्रश्न जो रह जाते हैं हर बार अनुत्तरित? अक्सर झलकती है
 
dr. ashok priyaranjan