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कुमार अम्‍बुज

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07 Jun 2010
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एक कराह फड़फडाकर उड़ती है

एक कराह फड़फड़ाकर उड़ती हैमिक्लोश राद्नोतीआधी रात के करीब मेरी माँ ने मुझे जन्म दियासुबह तक वह मर चुकी थीजैसे तने से एक कोमल डाल फूटती है उसमें से मैं उगादिन का दुख अभी बाकी थाअपने सिर के नीचे तुम्हारा दायाँ हाथमैं तुम्हारी नब्ज में चलते हुये खून को सुनता
 
कुमार अम्‍बुज
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दुखद प्रतीक्षा

पाब्‍लो नेरूदा की कविता 'द अनहैप्‍पी वन' का अनुवाद।अनुवाद अंतत: एक पुनर्रचना ही है।दुखद प्रतीक्षापाब्लो नेरूदा मैं उसे बीच दरवाजे पर प्रतीक्षा करते हुए छोड़करचला गया, दूर, बहुत दूरवह नहीं जानती थी कि मैं वापस नहीं आऊंगाएक कुत्ता गुजरा, एक साध्वी गुजरीएक
 
कुमार अम्‍बुज
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Feb 27 2010 11:02 PM
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गद्य के कुछ नमूने

गद्य के कुछ नमूने1 ईश्‍वर रेडियम, ईथर अथवा कोई वैज्ञानिक योग है। ईश्‍वर एक रासायनिक प्रतिक्रिया है।2 आप यह बता सकते हैं कि आपने क्‍या स्‍वप्‍न देखा और तोते ने क्‍या कहा क्‍योंकि पक्षी एक अयोग्‍य गवाह है।3 उनके चेहरे पत्‍थरों पर नमक से बने चेहरों के समान
 
कुमार अम्‍बुज
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एक सिम्‍फनी है

अकेली गहराती रात में एक खिडकी के पीछे एक अनाम लैम्‍प जल रहा है। जैसे इस लैम्‍प के जलने से ही यह रात इतनी गहरी है। लगता है कि मैं जगा हुआ हूं, अंधेरे में अपनी कल्‍पनाओं में डूबा हुआ, बस इसी वजह से ही उधर, वहां रोशनी है।शायद हर एक चीज इसलिए है क्‍योंकि कुछ
 
कुमार अम्‍बुज
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आज की रात लिख सकता हूं मैं

पॉब्‍लो नेरुदा की 20 प्रेम कविताओं में से इस कविता के संसार में अनेक भाषाओं में अनगिन अनुवाद हुए हैं। हिन्‍दी में ही इसके कम से कम दस से अधिक अनुवाद किए गए हैं। इससे जाहिर है कि यह कविता अछोर व्‍यंजना, प्रेम, उदासी और हार्दिकता से भरी है। यह कविता बत
 
कुमार अम्‍बुज
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सब तुम्हें नहीं कर सकते प्यार

यह मुमकिन ही नहीं कि सब तुम्हें करें प्यार यह जो तुम बार-बार नाक सिकोड़ते हो और माथे पर जो बल आते हैं हो सकता है किसी एक को इस पर आए प्यार लेकिन इसी वजह से ही कई लोग चले जाएंगें तुमसे दूर सड़क पार करने की घबराहट खाना खाने में जल्दबाजी या ज़रा-सी बात पर
 
कुमार अम्‍बुज
Dec 29 2009 11:55 AM
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मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है।

पहल -71' में जो डायरी प्रकाशित हुई थी, उसमें से यह एक अंश यहाँ दे रहा हूँ। इसमें केवल एक पंक्ति अभी तीन महीने पहले और शामिल हुई है। शायद यह दिलचस्‍प लगे। मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है। 27-06-98 रचनाशीलता में मौलिकता एक तरह का मिथ है। जिस त
 
कुमार अम्‍बुज
Dec 29 2009 11:55 AM
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मैं क्यों लिखता हूँ ?

तुर्की लेखक ओरहान पामुक ने नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय `माय फादर्स सूटकेस´ शीर्षक से अपना `नोबेल लेक्चर´ दिया था। इस लंबे भाषण का एक हिस्सा पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें लिखने के लिए जो आस्था, कारण और प्रतिबद्धता प्रकट की गई है, वह कुछ खास मायनों में
 
कुमार अम्‍बुज
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एक स्‍त्री मेरा इं‍तजार करती है

अमेरिकी कवि वॉल्‍ट व्हिटमैन ने अपने जीवनकाल में कुल एक ही कविता संग्रह 'लीव्‍ज ऑव ग्रास' प्रकाशित कराया और इसे ही वे जीवन भर अद्यतन करते रहे। प्रस्‍तुत कविता दैहिकता से शुरू होकर गहरी सामाजिकता में बदलती जाती है। इसमें स्‍त्रीवाद के वे सूत्र भी देखे
 
कुमार अम्‍बुज
Dec 29 2009 11:55 AM
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अपना शहर एक असमाप्त खोज है

शुरुआत के लिए यह एक गद्य है। कुछ कविताएं ठहरकर। बड़े शहरों का आकर्षण विचित्र है। वे लोगों को उस तरह अपनी तरफ खींचते हैं जैसे आलपिनों को कोई बड़ा चुंबक। उनकी परिधि और प्रभाव क्षेत्र में आनेवाले तमाम गांव-कस्बे उनमें धीरे-धीरे समा जाते हैं। आसपास एक निर्
 
कुमार अम्‍बुज
Dec 29 2009 11:55 AM
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फूल रखो तो फूलदान की तरह

डायरी अंश कमरे में एक सुराही रखी है। शो पीस की तरह। उसमें फूल भी रखे जा सकते हैं। फूल रखो तो फूलदान की तरह है। यह उतनी सुंदर नहीं है। इसे देख कर सुंदर, सुघड़ और पूर्णाकार की सुराहियाँ याद आती हैं। सुराही को देखना एक कला को देखना है। जब-जब भी मैं सुराह
 
कुमार अम्‍बुज
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जैसा समाज होगा वैसा परिवार

पिछले वर्षों में कुछ नयी-पुरानी अवधारणाओं और नैतिकताओं पर विचार करता रहा हूं। फलस्‍वरूप छोटे-छोटे लेख/टिप्‍पणियां संभव हुईं। उनमें से विचारार्थ कुछ यहां दे रहा हूं। उस क्रम में यह पहला लेख। जैसा समाज होगा वैसा परिवार पूँजीवादी समाज में परिवार का स्वर
 
कुमार अम्‍बुज
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मेरा प्रिय कवि

अनेक मित्रों के आदेश और विशेष तौर पर नव्‍यतम पीढ़ी के चर्चित कथाकार और मेरे प्रिय चंदन पाण्‍डेय के आग्रह को रेखांकित करते हुए, संकोच के साथ ही सही, अब अपनी कुछ कविताएं यदा-कदा लेकिन नियमित तौर पर यहाँ देता रहूँगा। मेरा प्रिय कवि वह हिचकिचाते हुए मंच
 
कुमार अम्‍बुज
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ट्रेड यूनियनों के भूले हुए काम और चुनौतियॉं

पिछले लेख से किंचित सम्‍बद्ध लेकिन स्‍वायत्‍त और स्‍वतंत्र तरीके से कुछ वैचारिक बिंदु प्रस्‍तुत करने वाला यह एक लेख और दे रहा हूं। आशा है, गंभीर पाठकों के लिए यह आवश्‍यक उत्‍तेजना दे सकेगा। ट्रेड यूनियनों के भूले हुये काम और चुनौतियाँ ट्रेड यूनियनों
 
कुमार अम्‍बुज
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श्रमिक यंत्र नहीं, जीवित मनुष्‍य है

दूसरी किश्‍तनौकरी और दासता में कुछ फर्क हैसंस्थान में अधिक समय गुजारने का सीधा प्रभाव यह पड़ता है कि शेष समय में भी संस्थान और काम आपका पीछा करता है। यह लगभग वैसा ही है जैसे लंबी रेल-यात्रा के बाद, घर के बिस्तर पर सोते हुए भी हमारी नींद में हमें रेल-बर्थ
 
कुमार अम्‍बुज
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यह व्‍यवस्‍था तुम्‍हें मार नहीं डालना चाहती

'श्रम के घंटे और मनुष्‍य का अवकाश' लेख की यह तीसरी और अंतिम किश्त।यह कुछ बड़ा अंश है। लेकिन आशा है कि इसे धीरजपूर्वक पढ़ लिया जायेगा।जीवन-स्तर और जीवन की गुणवत्ताजो लोग तर्क देते हैं कि यदि वे अपना कार्यालयीन काम छोड़कर जाएँगें तो अगले दिन वही काम करना तो
 
कुमार अम्‍बुज
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जनगीत

अशोक नगर इप्‍टा और प्रलेस के साथी, जिनमें हरिओम राजौरिया, पंकज दीक्षित, राजेश खैरा, विनोद शर्मा जैसे दसियों साथी शामिल हैं, वे जनगीत गायन में इतनी भावना, हार्दिकता और ऊर्जा भरते हैं कि वह सुनने का एक अनुभव हो जाता है। उसी तरह के अनुभवों को स्‍मरण करत
 
कुमार अम्‍बुज
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'श्रम के घंटे और मनुष्‍य का अवकाश'

'श्रम के घंटे और मनुष्‍य का अवकाश' शीर्षक से यह निबंध करीब चार साल पहले 'कथन' पत्रिका में प्रका‍शित हुआ था और इसके कुछ अंश भी इधर-उधर आये थे। पिछली पोस्‍टों में दिए गए धर्म विषयक आलेख को जिस उत्‍साह और रुचि से पढ़ा गया, उससे मुझे आशा है कि इस निबंधात्‍मक
 
कुमार अम्‍बुज
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खाना बनातीं स्त्रियाँ

अनेक दोस्‍तों के आग्रह पर यह कविता यहां दे रहा हूं। शायद पसंद की जायेगी। पसंदगी से ज्‍यादा शायद इस स्थिति पर विचार किया जाये, जैसी इस समाज में हमने स्त्रियों की बना ही दी है। नियति की तरह। खाना बनातीं स्त्रियाँ जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया फि
 
कुमार अम्‍बुज
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वैज्ञानिकता को धोखा

धर्म पर पुनर्विचार करते हुए लिखे गए इस लेख की अंतिम किश्‍त। इतने लंबे लेख को, किश्‍तों में ही सही, पढ़ने के लिए पाठकों के प्रति आभार। और संलग्‍न आशा कि इस विमर्श को वे अपने-अपने स्‍तर पर बढ़ाएंगे। वैज्ञानिकता को धोखा धर्म से जुड़े चमत्कार हमेशा व्यक्त
 
कुमार अम्‍बुज
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धर्म एक अंधविश्‍वास है

धर्म के विकल्‍प पर पु‍नर्विचार की श्रंखला में यह चौथी किश्‍त। अंतिम किश्‍त जल्‍दी ही। धर्म की अपराजेयता अभी तक धर्म अपराजेय चला आ रहा है। उसके कुछ प्रमुख कारणों पर, संक्षेप में विचार करें तो सबसे पहला बिंदु यही उभरकर आता है कि वह एक अंधविश्वास है और
 
कुमार अम्‍बुज
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धर्म नशा है

धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार लेख की यह तीसरी किश्‍त। धर्म नशा ही है धर्म नशा है। अफीम से भी कहीं ज्यादा बड़ा नशा। कीर्तन करते-कराते समूहों, हथियार लहराते, नानाप्रकार के क्रियाकलाप करते, नाचते-गाते या छाती पीटते धार्मिक जुलूसों, सांप्रदायिक दंगों (वस
 
कुमार अम्‍बुज
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धर्म कोई निजी परिघटना नहीं है

मित्रो, 'धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार' शीर्षक लेख की यह दूसरी किश्‍त। धर्म कोई निजी मान्यता या परिघटना नहीं है जो कहते हैं कि धर्म एक निजी आस्था, विश्वास और मान्यता की बात है। वे दरअसल भोले हैं या चालाक। जैसे भ्रष्टाचार, ईमानदारी, बेईमानी, चरित्रही
 
कुमार अम्‍बुज
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धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार

अपने सुधि एवं विचारशील साथियो के लिए कुछ वैचारिक लेख इस ब्‍लॉग में दे रहा हूं। ये विभिन्‍नलघु पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित हुए हैं। सबसे पहले धर्म विषयक‍ आलेख। प्रस्‍तुत लेख काफी बड़ा है इसलिए इसे चार किश्‍तों में दिया जा रहा है। यह लेख वसु
 
कुमार अम्‍बुज
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आध्या‍त्मिकता का खेल

हमारे साथी रचनाकारों , संयोग से दोनों के नाम अशोक पांडे हैं, के ब्‍लॉग्‍स यथा ' कबाड़खाना' और 'हमकलम' पर भी जावेद अख्‍तर का यह संभाषण प्रस्‍तुत किया गया है। इसे अनेक साथियों, पाठकों तक पहुंचना चाहिए, इस इरादे से यह वक्‍तव्‍य यहां भी दिया जा रहा है। व
 
कुमार अम्‍बुज
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'सर्वाइवल ऑव द फिटेस्‍ट'

डायरी का एक और अंश। कि कुछ बातचीत जारी रहे। 04.09.97 `सर्वाइवल ऑव द फिटेस्ट´ -सर्वोपयुक्त का बचना, `प्रजातियों के विकास´ के महान वैज्ञानिक डार्विन के इस सिद्धांत को लोग इधर `सभ्यता और समाज के विकास´ के संदर्भों में उदाहरण की तरह देने लगते हैं। यह आधा
 
कुमार अम्‍बुज
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कुमार अम्‍बुज

यहॉं डायरी एक और हिस्‍सा दे रहा हूँ। कुछ अन्‍य अंश बाद में। 20 मई 2002 प्रतिबद्धता को लेकर कुछ लोग लगातार इस तरह बात करते हैं मानो प्रतिबद्ध होना, कट्टर होना है। जबकि सीधी-सच्ची बात है: कि प्रतिबद्धता समझ से पैदा होती है, कट्टरता नासमझी से। प्रतिबद्ध
 
कुमार अम्‍बुज
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डर

डर रिल्के मैं पाँचवी मंजिल पर अपने बिस्तर में लेटा हूँ और मेरा दिन जिसमें कोई रोक-टोक नहीं है, एक ऐसी घडी के चेहरे की तरह है जिसके हाथ नहीं हैं। जैसे कुछ जो बहुत पहले खो गया था, एक सुबह यकायक वापस मिलता है सुरक्षित और सकुशल अपनी पुरानी जगह पर- जैसा ग
 
कुमार अम्‍बुज
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उसके विशाल पहलू में किसी मनुष्‍य के लिए जगह खाली है।

दोस्‍तो, अनेक सुझावों में संलग्‍न आग्रहों की रक्षा करते हुए यहां अंतराल ज्‍यादा न करते हुए, एक नयी पोस्‍ट डाल रहा हूं। यह कविता भाई यूनुस खान, आकाशवाणी, के लिए और उनसे क्षमायाचना सहित भी। लेकिन जल्‍दी ही अपना कुछ गद्य और दूंगा। और वॉल्‍ट व्हिटमैन की
 
कुमार अम्‍बुज