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25 May 2010
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खोयी थी खेल-खेल में........

.. ख़ुद को ढूँढ़ता हूँ या खुदी को ढूँढ़ता हूँकैसी ये बेखुदी है मै किस को ढूँढ़ता हूँ !कस्तूरी हिरन जैसे मैं भी दौड़ रहा हूँ खुद से बाहर जाके ख़ुदा को ढूँढ़ता हूँ !पढ़ ना सका हूँ मैं लिखा आज तक उसकाइन हाथों की लकीरों में मुकद्दर को ढूँढ़ता हूँ !अश्कों के
 
निर्झर'नीर
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सिर्फ तुम्हारे लिए !

......... बरसों से दिल की तलहटी में दबी हुई कुछ बेसूद उम्मीदें और बेकार सी बातें कुछ बेपर्दा ख्याल और बेनूर ख्वाबकुछ बेज़ार ख्वाहिशें और बेरब्त तमन्नाएं दिल की क़ैद से बाहर आने को बेताब हैंमैं भी तलाश रहा हूँ उन शब्दों को जो समेट
 
निर्झर'नीर
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क़ैद

ज़हन और दिल पेतेरी यादों के सायेइस क़दर छाये हैजैसेपहाड़ी कंदराओं केआखिरी हिस्से मेंछाया हुआ अँधेरावक़्त भी खड़ा हैपाएदार की तरहएक ही जगह परना सहर होती हैना शाम ढलती हैउम्मीद की किरण भी दो कदम चलकरदम तोड़ देती हैलगता है ये रूहजिस्म से आज़ाद होकर भीजन्मों
 
निर्झर'नीर
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ख्वाब और ख्याल

रात मैंनेएक ख्वाब को आवाज दीख्वाब के दस्तक देने से पहलेएक खूबसूरत ख्याल आयाऔर मुझे जगाकरअपने साथ ले गयाचांदनी रात मेंख्वाब नेसुबह तक इंतजार कियाक्या करें ?ख्याल खूबसूरत हो तोवक़्त का पता ही नहीं चलतासहर हो गयीना ख्वाब रहाना ख्याल रहाआँखें बोझिल हैआज दिन
 
निर्झर'नीर
Mar 22 2010 12:31 PM
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दुआ

...................... मांगी ये दुआ किसने मेरी जिंदगी की खातिर दामन छुड़ा के देखो मेरी मौत जा रही है तपते हुए सहरा में दुआओं का करिश्मा है घटा बनके सर पे देखो मेरे साथ जा रही है रोशन रहें ये राहें इन गम के अंधेरों में दुआ बनके दीप देखो मेरे पास आ रही है
 
निर्झर'नीर
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बेबस जवानी....

बचपन याद नही बस याद है मुझे जिम्मेदारियों के बोझ से लड़कपन के लड़खड़ाते कदम इससे पहले की जवानी मेरे दर पे दस्तक देती में ताला लगा के चल दिया तलाश में रोटी की एक बार जब में गाँव गया था तब पता चला , वो आयी थी दर पे ताला देख उदास मन से मुझे ढूँढने शहर चली
 
निर्झर'नीर
Dec 29 2009 11:49 AM
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अक्सर सोचता हूँ !

अक्सर सोचता हूँ मैं तेरा ही एक रूप हूँ ! तू भी अकेली है में भी अकेला हूँ तुझे भी तलाश है एक आशियाँ की मुझे भी तलाश है एक अजनबी की ---अक्सर सोचता हूँ मैं तेरा ही एक रूप हूँ ! यकीनन तुझे मोहब्बत है मेरे वजूद से तू चाहती है मेरा साथ उम्र भर के लिए -----
 
निर्झर'नीर
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कोई तो वज़ा है .

हर अंज़ाम से वाकिफ़ हूँ मुझे सब जुर्म पता है ! जलता रहूँ इस आग में यही अब मेरी सज़ा है !! चाहूँ तो एक पल में ये दूनिया में छोड़ दूँ ! जीता हूँ मगर आज भी ये तेरी रज़ा है !! माना की मोहब्बत में मज़ा है जीने मरने का ! तुमसा हो जो दिलकश तो अदावत में भी मज़ा ह
 
निर्झर'नीर
Dec 29 2009 11:49 AM
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राह्-ए-मौहब्बत ~~

कठिन बहुत है प्यार की राहें तुम ना जाना इन राहों में जोगी बन के आज भी मजँनू घूम रहे हैं इन राहों में ! टूटे ख्वाबों के कुछ टुकड़े बिखरे होंगे इन राहों में हसरत होंगी पाँव के नीचे और छाले भी इन राहों में ! पार नदी के खड़ी हुई हैं कितनी सोहणी इन राहों मे
 
निर्झर'नीर
Dec 29 2009 11:49 AM
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कर्म और किस्मत

हम भी चले थे शौक से थी जिधर मंजिल मेरी दिल में था जोश-ओ-जुनूं और ख्वाब थे दौलत मेरी । नभ पे थी मेरी निगाहें उड़ने की चाहत मेरी होसलों के पंख थे और साथ थी हिम्मत मेरी । राह में पर्वत थे ऊँचे दूर थी मंजिल मेरी तूफ़ान पीछे रह गए थी चाल कुछ ऐसी मेरी थी मो
 
निर्झर'नीर
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जा रहे हो कौन पथ पर ?

पथ को तुम देखो जरा मन की आँखें खोलकर सत्यपथ को छोड़कर तुम जा रहे हो कौन पथ पर ! ना प्यार के साए है इस पथ ना कोई हमराह है काफिलों को छोड़कर तुम जा रहे हो कौन पथ पर ! ना कोई मंजिल है इस पथ ना लौटने के है निशाँ इंसानियत को छोड़कर तुम जा रहे हो कौन पथ पर
 
निर्झर'नीर
Dec 29 2009 11:49 AM
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नववर्ष

नववर्ष   एक पल ही तो है जो जोड़े रखता है अतीत को भविष्य से आने वाले को जाने वाले से सिर्फ मन के भाव बदलते है यथार्थ में कुछ नहीं बदलता बदलते है तो सिर्फ अहसास कुछ सपने , कुछ ख्वाहिशें उम्मीदों की कुछ किरणें  हौसलों के पंख नववर्ष का
 
निर्झर'नीर
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कदम धरती पे रहने दो.

कदम धरती पे रहने दो भले ही नभ पे हो नजरें  सितारा बनके तुम टूटो कहीं ऐसा ना हो जाये गुमां था जिनको पंखों पे जो निकले नापने नभ को थके हारे वो पंछी भी जमीं पर लौट कर आये ये माना की जरुरी है ये दौलत और ये सौहरत मगर किस काम के ये सब जो रिश्ते ह
 
निर्झर'नीर
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स्वाभिमान..

शूक्ष्म अंतरित शब्द अभिमान और स्वाभिमान ये शब्द समेटे है अपने आप में सागर की गहराई और अनंत आकाश इतिहास गवाह है एक ओर जहां ......... दुर्योधन का अभिमान महाभारत का कारण बना रावण के अभिमान ने रामायण की रचना की . दूसरी ओर वहीं ............... अपने स्वाभि
 
निर्झर'नीर
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जिंदगी क़र्ज़ है

इतना तो मुझको भी मालूम था साथ साया अंधेरों में रहता नही मेरे सर पे था सूरज चमकता हुआ मगर मेरे क़दमों में साया ना था । बन के में जोगी भटकता रहा जिगर में कहीं दर्द पलता रहा सिसकता रहा आह भरता रहा बेखुद था क्या - क्या में करता रहा ! रूह बेचैन है दिल भी
 
निर्झर'नीर
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समेटे हूँ मैं टुकड़ों को

सबब थी जीने का जो भीहर उस ख्वाहिश ने दम तोडाखामोशी इस कदर छाईकी सब ख्वाबों ने घर छोड़ा । दर-ओ-दीवार जिस घर कीमुझे जाँ से भी प्यारी थीफ़क़त इस पेट की खातिरमैंने उस घर को भी छोड़ा । तलाश-ए-जीस्त में हमनेखाक छानी है सहरा कीमसर्रत छिन गई तब सेवतन जब से मैंने
 
निर्झर'नीर
Sep 11 2009 02:27 PM
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अश्क बनकर बह..

सहरा में भटकता राही और प्यास की व्याकुलता भूख से बिलखते बच्चे की बेबस माँ का मर्म बेटे की अर्थी से झुकता बेसहारा बाप का कन्धा शूखती फसल के पत्तो को देखते किसान की बेकशीबाढ़ में बहती जिंदगी और मौत के आलिंगन का अहसासमेरे दिल में ऐसे ही कुछ अहसासों का ज्वार
 
निर्झर'नीर
Aug 29 2009 02:19 PM
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चकवे जैसी प्रीत मेरी

चाँद के जैसी सूरत तेरी चकवे जैसी प्रीत मेरी जोगी जैसे फिरूं भटकता इश्क कहे ये रीत मेरी ! शमां हुस्न की परवाने को ले बाँहों में जला रही है हुस्न कहे, ले हार गया तू इश्क कहे ये जीत मेरी ! तेरे प्यार की एक बूँद में जीवन डोर बंधी मेरी मैं सदियों का प्यास
 
निर्झर'नीर
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परी है तू

परियों की कहानी सुनते थे परियों के सपने बुनते थे तू ख्याल मेरा तू मेरी सहर तू मेरा तसव्वुर परी है तू चाँद फलक का तेरा बसेरा ताबीर है तू मेरे ख्वाबों की गुलशन की महक रंगों की चमक एक तेरे बिना सब गायब थी मेरा तन महका मेरा मन महका तेरे आने से उपवन महका
 
निर्झर'नीर
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रोज चूल्हे की तरह

मैं हर रोज एक हसरत को दफ़न करता हूँ। रोज आँखें क्यूँ ? नया ख्वाब सजा लेती हैं॥ रोज गिरती है दर-ओ-दीवार जिन मकानों की। उम्मीदें फ़िर से वो ही घर क्यूँ? बना देती है॥ रोज चूल्हे की तरह जलते हैं दिल में अरमां। दिल क्यूँ? फ़िर उसी बस्ती को बसा देता है॥ यहाँ
 
निर्झर'नीर
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है कर्ज उस शहीद का

वो भी लाल था किसी मात का वो भी नूर था किसी आँख का जो जला के अपनी ख्वाहिशें तेरे आज को सजा गया ! ए- नौजवां तू जाग अब ना जी मति को मारकर जो खा रहे है देश को दबोच और प्रहार कर ! जो भोग सारे त्याग कर ख़ुद कफ़न को बांधकर लहू की हर एक बूँद को वतन की भेंट कर
 
निर्झर'नीर
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कोई दरिया नही हूँ मैं

अब क्या डुबोयेंगीं मुझे तूफां की ये मौजें साहिल हूँ समुन्दर का कोई कस्ती नहीं हूँ मैं ! अब क्या बुझायेंगी मुझे गम की ये आंधियां जलता हूँ अनल जैसे कोई दीपक नहीं हूँ मैं ! ना खौफ रहबरी का ना डर है दुश्मनों से अभेद दुर्ग हूँ एक कोई बस्ती नहीं हूँ मैं !
 
निर्झर'नीर
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ऊँची-ऊँची चट्टानों से

ऊँची-ऊँची चट्टानों से 'नीर' गिरा निर्झर कहलाया चोट लगी जो तन-मन मेरे जग निर्मोही देख ना पाया ! झर-झर,झर-झर बहता जाए दर्द को अपने सहता जाए कोई ना जाने पीर पराई लहू जिस्म का कहता जाए ! मेरे दर पे जो भी आया मैंने सबको प्यासा पाया प्यास बुझाई मैंने उसकी
 
निर्झर'नीर
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छलक ना जाए लहू

इश्क में फूल चुने थे जो तेरी आंखों से ! बनके अब शूल उगे हैं वो मेरी आंखों से !! काँप जाती है मेरी रूह वफ़ा की बातों से ! छलक ना जाए लहू दिल का मेरी आंखों से !! मिलाई तुमसे नज़र हम ये भूल कर बैठे ! छिन गए सारे हसीं ख्वाब मेरी आंखों से !! है ये हस्ती- ए-
 
निर्झर'नीर
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नि:शब्द और खामोश

श्याह काली रातों में कुछ अहसासों के रेले ख्वाहिशों की गठरी लेकर मेरे पास आते हैं ! एक-एक कर सारे अहसास अपनी ख्वाहिशों की गठरी मेरे आगे खोलकर मुझसे मांगते हैं ! उन सारे अनछुए लफ्जों को जो मैंने कभी चुने थे ख्वाहिशों के साथ मिलकर सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्ह
 
NirjharNeer
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कुछ भी नही.

जब तक जियें हम कुछ ऐसे जियें ना हासिल हुआ ऐसा कुछ भी नही ! और जब मरें हम कुछ ऐसे मरें जहाँ में हमारा तो कुछ भी नही ! लोग जाते हैं सब कुछ यहीं छोड़कर मिलते हैं निशाँ और कुछ भी नही ! क्या आए थे करने क्या करते रहे हम सिवा प्यार के 'नीर' और कुछ भी नही !
 
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सफर जिंदगी का ..

दरिया है वक़्त का ये बहना है सबको इसमें बेबस बुझा- बुझा सा तनहा मैं बह रहा हूँ ! न बस में पकड़ सकूं उस कारवाँ को मैं उड़ती है जिसकी राह में गर्द -ए-सफर अभी तक ! ना हक है रुक के राह में करूँ उसका इंतजार आएगा मेरे बाद जो तनहा मेरी तरह ! वक़्त-ए-सफर अलग है
 
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हादसा एक नया आज...

होना था कुछ और कुछ हो गया ! हादसा एक नया आज फ़िर हो गया !! जो ज़माने की ठोकर में बरसों रहा ! आज पत्थर वो देखो खुदा हो गया !! ढूँढा था दिल ने जिसे दर - ब - दर ! रूबरू वो हुआ तो ये दिल खो गया !! जिसने बेखुद किया था मुझे एक दिन ! आज वो शख्स भी अजनबी हो ग
 
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रात के जैसी काली चादर ...

रात के जैसी काली चादर ओढ़ मेरा दिन आता है । तेरे दर पे दस्तक देने ख़ुद चलकर सूरज आता है ॥ देख के मेरे घर का रस्ता जुग्नू भी छुप जाता है । आसमान का हर तारा घर झांक के तेरे आता है ॥ काला बादल साथ हवा के देख मुझे उड़ जाता है । देख के बिखरी जुल्फें तेरी झ
 
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चुरा के ला ए हवा..

कैसे निकलेगा दम हमदम मिलन की आस बाकी है ! कफ़स हो बस तेरा दामन फ़कत ये प्यास बाकी है !! कत्ल करके वो मेरा अब भी छुपा बैठा है ! उसे डर है कहीं मुझमें अभी तक साँस बाकी है !! तू दर बंद ना कर साकी पलकों से मयकदे का ! पीने दे मय नज़र से अभी तो रात बाकी है
 
NirjharNeer