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11 Jun 2010
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पेशा बदलने का वक़्त! (हास्य-व्यंग्य)

इस देश में कुछ हस्तियों को देखकर एहसास होता है कि उनका अपने काम में मन नहीं लग रहा। वक़्त आ गया है कि वो पेश बदल लें। इस सूची में पहला नाम है युवराज सिंह का। कहा जाता है कि बचपन में क्रिकेट उनका पहला प्यार नहीं था। पिता के दबाव में वो क्रिकेट खेलने लगें।
 
नीरज बधवार
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लेखक का ख़त!

सम्पादक महोदय,नमस्कार!लेखक भले ही समाज में फैले भ्रष्टाचार, गिरते सामाजिक मूल्यों, स्वार्थपूर्ण राजनीति पर कितना ही क्यों न लिखे लेकिन उसकी असल चिंता यही होती है कि उसका भेजा लेख टाइम से छप जाए। मानवीय मूल्यों की गिरावट पर उसे दुख तो होता है लेकिन साथ ही
 
नीरज बधवार
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सारी शामें उनमें डूबीं, सारी रातें उनमें खोयीं! (हास्य-व्यंग्य)

कॉलेज का नया सत्र शुरू होने वाला है। आए दिन अख़बार-टीवी में फैशनेबल लड़कियों की तस्वीरें आती हैं, जिनमें अक्सर दिखाया जाता है कि एक बला की खूबसूरत लड़की अपनी सहेली से बात कर रही है और पीछे कोने में खड़े दो लड़के किसी ओर दिशा में मुंडी घुमाए हैं। मैं कभी
 
नीरज बधवार
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अपनी-अपनी पहचान! (व्यंग्य)

दुनिया को एक बड़ा-सा क्लास रूम माना जाए और अलग-अलग देशों को स्टूडेन्ट्स तो बड़ी रोचक तस्वीर उभरती है। कक्षा में जहां जापान जैसे कुछ मेहनती बच्चे हैं, जिन्होंने सिर्फ पढ़ाई-लिखाई के दम पर पहचान बनाई है जो सिर्फ अपने काम से काम रखते हैं तो वहीं अमेरिका
 
नीरज बधवार
May 30 2010 03:23 PM
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एक आध्यात्मिक घटना! (हास्य-व्यंग्य)

आजकल परीक्षा परिणामों का सीज़न चल रहा है। रोज़ अख़बार में हवा में उछलती लड़कियों की तस्वीरें छपती हैं। नतीजों के ब्यौरे होते हैं, टॉपर्स के इंटरव्यू। तमाम तरह के सवाल पूछे जाते हैं। सफलता कैसे मिली, आगे की तैयारी क्या है और इस मौके पर आप राष्ट्र के नाम
 
नीरज बधवार
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लोकतंत्र की ख़ातिर!

देश में अगर बहुत-सी बुरी चीज़ें हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि हम कुछ अच्छी चीज़ें न होने दें और अगर कुछ अच्छी चीज़ें हो रही हैं तो ये भी ज़रूरी नहीं कि बुरा होना रूक जाए। अच्छाई-बुराई के इस सह-अस्तित्व को भारत से अच्छा और किसी ने नहीं समझा। दिल्ली में
 
नीरज बधवार
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नग और नगीने!

वक़्त आ गया है कि क्रिकेट की हार को हम क्रिकेटीय कारणों से आगे बढ़ कर देखें। बहुत हो चुका ये कहते-कहते कि हमारे गेंदबाज़ों की गति कुछ ब्लैक एंड व्हाइट हिंदी फिल्मों से भी धीमी है, फील्डिंग देश की कानून-व्यवस्था से भी लचर है और शॉर्ट पिच गेंदें देख
 
नीरज बधवार
May 14 2010 12:59 PM
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नैतिकता के टावरों से बंजी जम्पिंग!

गजब मंजर है। चारों ओर लोग नैतिकता के टावरों से बंजी जम्पिंग कर रहे हैं। प्रतिस्पर्धा है तेज़ी से नीचे गिरने की। कर्तव्य की ज़मीन से भाग स्वार्थ के पैराशूट खोलने की। सालों से लोग सेफ लैंडिंग भी कर रहे हैं। और कभी-कभार जब रस्सी नहीं खुलती तो पता चलता है कि
 
नीरज बधवार
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नेताओं का उंगली क्रिकेट!

बीस-बीस के खेल में सामने आई चार सौ बीसी मेरे लिए उतनी उत्सुकता का विषय नहीं है, जितना इस चार सौ बीसी पर नेताओं की चिंता। लालू, मुलायम जैसे नेता क्रिकेट की बर्बादी पर जब संसद में आंसू बहाते हैं तो इसे देख मगरमच्छ तक असली आंसू बहाने पर मजबूर होता है। चिंता
 
नीरज बधवार
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थरूर को बख़्श दो!

मज़बूत मंत्री अगर सरकार की ज़रूरत होता है तो विवादित मंत्री विपक्ष की। ऐसे में जब बीजेपी बार-बार ये मांग करती है कि शशि थरूर इस्तीफा दें, तो मुझे तरस आता है। उसकी मांग सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वो वाकई इस्तीफे को लेकर गंभीर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था
 
नीरज बधवार
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विरोधियों का डब्ल फॉल्ट!

जब से सानिया मिर्ज़ा ने शोएब मलिक से शादी का एलान किया है लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। कुछ का कहना है कि ज्ञात इतिहास में भारत को पहुंचाया गया ये इकलौता ऐसा नुकसान है जिसके बारे में हम दावे से कह सकते हैं कि इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है! वहीं
 
नीरज बधवार
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महंगाई के रास्ते मोक्ष! (व्यंग्य)

सरकारों को लेकर हमारी नाराज़गी हमेशा बनी रहती है। महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर चीज़ के लिए हम उसे ज़िम्मेदार मानते हैं। हर पार्टी हमें अपनी दुश्मन लगती है। अपनी हर तकलीफ का श्रेय हम उसे देते हैं। मगर ये सब कहतें वक़्त हम शायद ये भूल जाते हैं कि सरकार
 
नीरज बधवार
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हम कमाते क्यों हैं?

मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आदमी के नाते ये सवाल अक्सर मेरे ज़हन में आता है कि हम कमाते क्यों हैं? क्या हम इसलिए कमाते हैं कि अच्छा खा-पहन सकें, अच्छी जगह घूम सकें और भविष्य के लिए ढेर सारा पैसा बचा सकें। या हम इसलिए कमाते हैं कि एक तारीख को मकान मालिक को
 
नीरज बधवार
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पपी और पापी!

जिस दुकान पर कल मैं सामान लेने गया, वहां एक जनाब अपने पपी के साथ कुछ खरीद रहे थे। वहां मौजूद एक लड़का जैसे ही पपी के पास से गुज़रा, तो वो जनाव बोल पड़े: देख के भइया, देख के... पैर मत रख देना इस पर…वरना खड़े-खड़े दस हज़ार का नुकसान हो जाएगा! हिंदी भाषा से
 
नीरज बधवार
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इंस्टैंट फल!

बाबा अपने शिष्यों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते थे। संयम के मायने समझाते थे। उनका कहना था कि इस लोक में अगर सद्चरित्र रहे तो उस लोक में एक से बढ़कर एक सुख-सुविधाएं मिलेंगी। गुरू की इसी शिक्षा पर चलते हुए एक शिष्य ने कभी किसी को बुरी नज़र से नहीं देखा। हर किसी
 
नीरज बधवार
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लिपस्टिक की लेडीफिंगर समझने की मुश्किल!

आम आदमी और आम बजट की शायद यही नियति है। हमेशा उम्मीद की जाती है कि शायद अब ये संघर्ष कर खुद को ख़ास बना लें, लेकिन नहीं। बजट और आदमी ने खुद के आम होने को स्वीकार कर लिया है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इतनी बार छले जाने के बावजूद आम आदमी ने बजट से फिर
 
नीरज बधवार
Mar 06 2010 10:38 AM
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नाम में क्या नहीं रखा! (हास्य-व्यंग्य)

नाम में क्या नहीं रखा!जैसे ही नर्स डिलिवरी रूम से निकल ये बताती है कि ठाकुर साहब लड़का हुआ है, ठीक उसी समय इस सवाल की भी डिलिवरी हो जाती है कि बच्चे का नाम क्या रखा जाए? मौजूदा समय में बच्चे का नाम रखना उसे पैदा करने से भी कहीं बड़ी चुनौती है। मां-बाप
 
नीरज बधवार
Mar 02 2010 08:10 AM
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भारतीय होने की सुविधा!

टाइगर वुड्स के माफ़ीनामे के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों में ‘सच के सामने घुटने टेकने’ की कमज़ोरी एक बार फिर उजागर हुई है। समाजशास्त्रियों को ज़रूर विचार करना चाहिए कि आखिर क्यों ये लोग वे सब बातें सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेते हैं, जो हम बंद कमरे में
 
नीरज बधवार
Feb 26 2010 09:43 AM
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मेरी सम्पत्ति घोषणा! (हास्य-व्यंग्य)

हाल-फिलहाल वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापों के बाद से मैं काफी सहम गया हूं। उससे पहले मधु कोड़ा के यहां हुई छापेमारी में भी मुझे काफी घबराहट हुई थी। रोज़-रोज़ के तनाव से तंग आकर मैंने तय किया है कि हाईकोर्ट के जजों की तर्ज पर मैं
 
नीरज बधवार
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चरित्रहीन चप्पल!

हिंदुस्तान में रहते हुए अगर आप रचनात्मक हो गए हैं तो इसे आपका दुस्साहस ही माना जाएगा वरना तो नई सोच पर हमारे यहां इतने पहरे हैं कि लकीर के प्रति फकीरी छोड़ना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि घटिया चुटकुलों, वाहियात फिल्मों, बेहूदा विज्ञापनों का हमारे यहां
 
नीरज बधवार
Feb 16 2010 08:37 PM
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महंगाई पीड़ित लेखक का ख़त!

सम्पादक महोदय,पिछले दिनों महंगाई पर आपके यहां काफी कुछ पढ़ा। कितने ही सम्पादकीयों में आपने इसका ज़िक्र किया। लोगों को बताया कि किस तरह सरिया, सब्ज़ी, सरसों का तेल सब महंगे हुए हैं और इस महंगाई से आम आदमी कितना परेशान है। ये सब छाप कर आपने जो हिम्मत दिखाई
 
नीरज बधवार
Feb 13 2010 10:22 AM
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चंचल बाला ठाकरे!

बचपन में गली क्रिकेट खेलते हुए हममें से बहुतों ने खुद को स्टार माना है। हद दर्जे की बेसुरी आवाज़ के बावजूद सिर्फ ‘स्टेज पर गा लेने की हिम्मत’ के कारण हम कॉलेज के किशोर भी कहलाए। कॉलोनी में एक-आध को चपत लगा हम मोहल्ले के दादा भी हुए। मगर मान्यता का यही
 
नीरज बधवार
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जिसके आगे न, पीछे ना! (हास्य-व्यंग्य)

टीवी खोलते ही जिस चैनल पर मैं रूकता हूं वो हरिद्वार से सीधी तस्वीरें दिखा रहा है। हड्डियां कंपा देने वाली ठंड में लोग पवित्र स्नान कर रहे हैं। एंकर बताती है कि सुबह चार बजे से ही यहां स्नान करने वालों का तांता लगा है। देश भर से लाखों लोग पवित्र स्नान
 
नीरज बधवार
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मुहावरों में पिलती बेचारी सब्ज़ियां (हास्य-व्यंग्य)

बीवी ने अगर सब्ज़ी अच्छी नहीं बनाई तो आप किस पर गुस्सा निकालेंगे? बीवी पर या सब्ज़ी पर। निश्चित तौर पर बीवी पर। लेकिन, इस देश में मर्द चूंकि सदियों से बीवी से डरता रहा है, इसीलिए उसने चुन-चुन कर सब्ज़ियों पर गुस्सा निकाला दिया। यही वजह है कि ज़्यादातर
 
नीरज बधवार
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समस्या भी तो एक संभावना है।(व्यंग्य)

रेड लाइट पर रुकते ही मेरी नज़र सड़क किनारे पानी की पाइप लाइन पर पड़ती है। आज फिर इसमें लीकेज हो रहा है। पिछले एक महीने में ये नज़ारा मैं तीसरी बार देख रहा हूं। बड़ी-सी जलधारा फूट रही है और आसपास लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ है। एक भाई वहीं कपड़े धोने के
 
नीरज बधवार
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स्नानवादियों के खिलाफ श्वेतपत्र

सर्दी बढ़ने के साथ ही स्नानवादियों का खौफ भी बढ़ता जा रहा है। हर ऑफिस में ऐसे स्नानवादी ज़बरदस्ती मानिटरिंग का ज़िम्मा उठा लेते हैं। जैसे ही सुबह कोई ऑफिस आया, ये उन्हें ध्यान से देखते हैं फिर ज़रा सा शक़ होने पर सरेआम चिल्लाते हैं... क्यों..... नहा कर
 
नीरज बधवार
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खेल है झेल!

कहा जा रहा है कि फिरोजशाह कोटला मैदान में जो कुछ हुआ उसे भारत कलंकित हुआ है। जिस पिच पर ये मैच खेला गया, वो डीडीए की घटिया राजनीति से भी ज़्यादा बुरी थी। उस विकेट पर अगर कुछ देर और मैच होता, तो भारत-श्रीलंका के आपसी सम्बन्ध खतरे में पड़ सकते थे। 23 ओवर
 
नीरज बधवार
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चरित्रहीनता का जश्न!

टाइगर वुड्स मामले पर पूरे अमेरिका में हंगामा मचा हुआ है। हर कोई उनकी प्रेमिकाएं और तलाक के बाद उनकी बीवी को मिलने वाला पैसा गिनने में लगा है। बताया जा रहा है कि कैसे योजनाबद्ध तरीके से वुड्स ने इतने सालों तक पत्नी और परिवार को धोखा दिया। मगर ये पूरा
 
नीरज बधवार
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लेखक और बीवी!

कोई भी लेखक दस-बीस फीसदी प्रतिभा और सत्तर-अस्सी फीसदी गलतफहमी के दम पर ही लेखक बनता है। ये अहसास और जबरन खुद पर थोपी गई ये ज़िम्मेदारी कि मेरा जन्म कुछ महान करने के लिए हुआ है, लेखक को हमेशा रोज़मर्रा के छोटे-मोटे काम करने से रोकता है। वो मानता है कि
 
नीरज बधवार
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द ग्रेट इंडियन वेडिंग तमाशा!

ये मेरे मित्र की मति का शहादत दिवस है। आज वो शादी कर रहा है। मैं तय समय से एक घंटे बाद सीधे विवाह स्थल पहुंचता हूं, मगर लोग बताते हैं कि बारात आने में अभी आधा घंटा बाकी है। मैं समझ गया हूं कि शादी पूरी भारतीय परम्परा के मुताबिक हो रही है। तभी मेरी नज
 
नीरज बधवार
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जूत्यार्पण नहीं, माल्यार्पण के हैं हक़दार!

सड़क किनारे जिस रेहड़ी वाले से मैं सब्ज़ी खरीद रहा हूं, वहीं अचानक एक पुलिसवाला आकर रुकता है। वो इशारे से सब्ज़ीवाले को साइड में बुलाता है। वापिस आने पर जब मैं सब्जीवाले से बुलाने की वजह पूछता हूं, तो वो पहले कुछ हिचकिचाता है। फिर कहता है कि यहां खड़
 
नीरज बधवार
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लौह राष्ट्र!

ऑफिस के रास्ते की मुख्य सड़क पर कुछ दिन पहले नाइट-आई लगाई गईं। ये देख तसल्ली हुई कि रात के समय सुविधा होगी। मगर क्या देखता हूं कि कुछ ही दिनों में एक-एक कर सभी नाइट-आई गायब हो गईं। सोचा तो यही लगा कि लोहे के खांचे में फिक्स होने के कारण उठाईगिरे उस प
 
नीरज बधवार
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कॉमनवेल्थ खेलों पर दिल्ली की छाप

दो हज़ार दस कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी में सरकार जी-जान से जुटी है। इन खेलों के बहाने हमें दुनिया को अपनी ताकत दिखानी है। यही वजह है कि इस आयोजन पर अब तक करोड़ों रूपया लग चुका है और करोड़ों लगाया जाना है। सरकार अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखना चाहती, यहा
 
नीरज बधवार
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सनसनी का बेंचमार्क!

ये बहस तो अवहेलना से आहत हो कब की आत्महत्या कर चुकी है कि न्यूज़ चैनलों को सनसनी परोसनी चाहिए या नहीं। अब तो सवाल ये है कि सनसनी का स्तर कैसे बनाकर रखा जाए। मतलब, आज से छह महीने पहले लोग जिस खबर पर हैरान होते थे, आज उसने उत्तेजित करना बंद कर दिया है।
 
नीरज बधवार
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सदाबहार कसूरवार!

कभी-कभी मुझे लगता है कि भारत का होना जितना भारतीयों के लिए ज़रूरी है, उससे कहीं ज़्यादा पाकिस्तान सरकार के लिए। अगर भारत नहीं होता तो पाकिस्तान की सरकारें करतीं क्या? वहां के हुक्मरान और सेना के रिटायर्ड अफसर तो कुछ गैर-रचनात्मक न पा सुसाइड कर लेते।
 
नीरज बधवार
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झूठ-फरेब के रास्ते, छुट्टी के वास्ते!

हाल ही में एक सर्वे में ये बात सामने आई कि बत्तीस फीसदी लोग ऑफिस से छुट्टी लेने के लिए झूठ बोलते हैं। इन आंकडों पर मुझे हैरानी हुई। मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि अड़सठ फीसदी लोग छुट्टी के लिए सच बोलते होंगे! वजह बेहद साफ है। ऑफिस से छुट्टी के पीछे सबसे
 
नीरज बधवार
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प्लास्टिक बधाइयां!

दीपावली से पहले पुलिस ने इतनी जगह छापेमारी कर नकली मावा, नकली घी और नकली पनीर भारी मात्रा में पकड़ा। मगर, वो संगठित अपराधियों की ऐसी जमात नहीं पकड़ पाई, जो हर दीपावली लाखों-करोड़ों लोगों का जीना हराम करती है। ये कौम है-मोबाइल मैसेज माफिया की। हर त्यो
 
नीरज बधवार
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दुर्घटना से देर भली!

कुछ लोगों का कहना है कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियां देखकर लगता है कि ये खेल दो हज़ार दस में न होकर, मानो दस हज़ार दो में होने हों। ऐसा कहने वालों के संस्कृति-बोध पर मुझे तरस आता है। ये लोग शायद भारत की कार्य-संस्कृति से वाक़िफ नहीं हैं। मेरा मानना ह
 
नीरज बधवार
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अपने-अपने गौरव द्वीप!

बुक स्टॉल पर किताबें पलटते हुए अचानक मेरी नज़र एक मैगज़ीन पर पड़ती है। ऊपर लिखा है, ‘गीत-ग़ज़लों की सर्वश्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका’। ‘सर्वश्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका’, ये बात मेरा ध्यान खींचती हैं। स्वमाल्यार्पण का ये अंदाज़ मुझे पसंद आता है। मैं सोचने लगता
 
नीरज बधवार
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री-लॉन्चिंग की आउटसोर्सिंग!

वैसे तो यह ट्रेंड गाड़ियों में ज़्यादा देखने को मिलता है। किसी कम्पनी ने कोई मॉडल लॉन्च किया। उसकी खूबियों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए, मगर जब गाड़ी बाज़ार में उतरी तो उसे वैसा रिस्पॉन्स नहीं मिला। जानकारों ने ख़ामियां बताईं और वो मॉडल वैसा परफॉर्म नहीं
 
नीरज बधवार