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14 Jun 2010
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एक कहानी समीर लाल उड़न तश्तरी की

ये समीरजी चाँद वाले और चाँद को खिलोना लिखने वाले। ये भी लिख डालते कि चाँद नहीं तो रमज़ान की ईद नहीं। जब चाँद पर इंसान बस जाएंगे तो बच्चे ईद कैसे मनाएंगे? ये समीरजी, लिखते बहुत हैं और इनपर कई चिट्ठकारों ने काफ़ी कुछ लिखा है मगर ये हंसता मुसकुराता पुरुष कभी
 
शुऐब
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आप हमको भूल गए?

बकवास छापने हम किसी से कम नहीं क्योंकि हम ख़ुदा हैं और अपनी 85वीं बकवास क़िस्त छापने आए हैं ताकि याद दिलादें हम आज भी ज़िन्दा हैं। अरे भई, हमारे ख़ुदा होने का क्या क़सूर? उस ज़माने के इतने सारे ख़ुदाओं ने चांस मारलिया तो अब हम क्यों नहीं? जब हम छोटे थे,
 
शुऐब
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आजकी कहानी मेरी ज़बानी

हमारे सीनियर चिट्ठाकार जो मुझे जानते हैं यही राए देंगे कि पहली फ़ुरसत मे विवाह करलो। हालात भी कुछ ऐसे हैं कि मेरी हालत को देख शादीशुदा बुज़र्ग यही कहेंगे। सुबह घर से आफ़िस केलिए निकला था। और जब आफ़िस के बिलकुल क़रीब पहुंचा तो सामने एक बुलडोज़र खुदाई मे
 
शुऐब
May 13 2010 05:59 PM
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इस कहानी को आगे कौन लेजाए?

ख़ुदा का सवाल है कि इस कहानी को आगे कौन लेजाए? मियां कभी पेशाब से पसीना निकलते मेहसूस किया आपने?। जारी बाक़ी फिर कभी [ये ख़ुदा है - 84 ]
 
शुऐब
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तालिबान, अलक़ाईदा, शुएब और सानिया

होसकता है ठाकरेजी स्वर्गवास होगए, वरना अबतक आमना, सामना और दूसरे रोज़नामा का पहला पन्ना अपने बयानों से काला करडालते कि शुएब और सानिया की शादी मे अलक़ाईदा या तालीबान का पक्का हाथ है। इस होने वाली शादी को लेकर मीडिया वालों ने ऐसा भांगडा डाला कि अब तो उबामा
 
शुऐब
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हा हा हा

इसलिए कि बहुत दिनों बाद हमने अपना चिट्ठा देखा तो मुंह से यूंहि हा हा हा निकल आया। अगर किसी को पसंद ना आए तो ही ही ही करलें इजाज़त है। कई बार अपना चिट्ठा देखा मगर जी भरके आज ही देखा। पुरानी क़िस्तों पर नज़र डाले तो ख़ुदपे हंसी आगई, बकवास छापने मे कोई [...]
 
शुऐब
Feb 10 2010 01:45 PM
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अगर प्रार्थना स्वीकार हो?

कैसी दुआ और प्रार्थना? अगर दुआ क़बूल होती तो आज हम भारत के प्रधानमंत्री होते। जारी बाक़ी फिर कभी [ ये ख़ुदा है - 82 ]
 
शुऐब
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ख़ = से ख़ैरियत

भाड़ मे जाएं वे लोग जो अपने ख़ुदा को भूल ओबामा पर नोबेल पुरस्कार चढ़ाया। भाड़ मे जाएं वे लोग भी जो भारत से दान मे ज़मीन ली और आजतक भी ख़ैरियत से नहीं। और भाड़ मे जाएं वे लोग भी जो बोलते हैं कि चीन देश ने भारत को चारों ओर से घेर रखा [...]
 
शुऐब
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मुझे मां बेहन वाली गाली ना दो

बस मे ट्रेन मे विमान मे या जहां कहीं भी कोई नया मिलजाए, स्लाम नमस्ते के बाद बात चीत शुरू होती है फिर नाम पूछते हैं तो जवाब मे बोलता हूं कि मेरा नाम शुऐब है तो वापस बोलते हैं - ओह आप मुसल्मान हो? मेरे दिल मे एक ही उत्तर ग़ुस्से मे निकलता है “तेर
 
शुऐब
Oct 17 2009 12:10 PM
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कृपया हमारी बात का बुरा मत मानो!!

पुराने ज़माने के ख़ुदाओं की मौज थी कि अशिक्षित लोगों मे आए और छागए। और पिछले ज़माने के लोगों का काम-धाम कुछ था नहीं बस यूंही बेकार बैठे रहते थे कि उन ख़ुदाओं पर अंधों के जैसा ईमान ले आए। और हमारी क़िस्मत देखो कि नये ज़माने के ख़ुदा हैं, ८० क़िस्तें होगई
 
शुऐब
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वीरान बालकोनी

रोज़ाना आज भी सुबह बालकोनी पर खड़े अंगडाई लेने ही वाले थे कि याद आया सामने ख़ूबसूरत पड़ोसन कल ही किसी और जगह नया फ़्लैट ख़रीदकर शिफ़ट होगए। वैसे पिछले दो वर्शों से बाकाईदा सुबह ठीक समय पर अंगडाई लेने हम अपनी बालकोनी पर तैयार रहते कि आजसे अपने बिसतर पर
 
शुऐब
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फ़्लू का आलू बन गया

इत्र की ख़ुशबू जैसा ये कैसा फ़्लू फैल गया, दूसरों का देख हमने भी चेहरे पे मास्क चढ़ालिया। हमारे इस अंदाज़ पर अन्य लोगों ने कुछ ना बोला मगर गली मे आराम फ़रमा रहे कुत्तों को हमारा ये अंदाज़ पसंद ना आया। झटसे खडे होकर हमारे मूंह पे भोंकना शुरू करदिया। ज्लदी
 
शुऐब
Aug 31 2009 03:40 PM
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हमारी अच्छी क़िस्मत

पता नहीं किसका चेहरा देखकर नींद से जागे थे! सुबह बाहर निकलते फ़क़ीर से ही पाला पड़ना था? बासी मूंह लिए मूंह पर ही शिकायत ठोंका - बड़े नसीबों वाले हैं आप कि यूं बैठे बिठाए ख़ुदा बन बैठे और हमें देखो जनमसे भिखारी। पता नहीं कौनसी जड़ीबोटीयां खालिए थे कि
 
शुऐब
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ख़ुदा फिसल गए

स्नान के बाद पाकवसाफ़ कपड़े पहन जूंही अपनी जन्नत से बाहर निकले….. हमारे फ़्रिश्ते भी अजीब हैं, अब इनकी जगह इंसानों को काम पे लगाना होगा। रात भर बारिश, घुटनों तक पानी। सुबह उठे तो फिर भी हलकी बारिश जारी। तैयार होकर बाहर निकले ही थे अपनी ही जन्नत
 
शुऐब
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पाकिस्तानी बच्चे

अपने ही घर से बेघर होने वालों की बोलती तस्वीरें तस्वीर पर क्लिक करने पर मोशन ब्लॉग मे और भी तस्वीरें हैं।
 
शुऐब
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पब्लिक ट्रांसपोर्ट

जूंही बस मे चढ़े हमे उतारदिया, दूसरी बस मे चढ़े वहां से भी उतारदिया। यूं चढ़ते उतारते जैसे आदत बन गई। बस के अंदर लिखा था यहां ज़नाना टिकाती हैं दूसरी ओर लिखा था यहां मर्दाना पधारते हैं अब चूंकी हम ख़ुदा हैं तो कहां बैठे? भइ, कहां बैठे? जब पृथ्वी पर इ
 
शुऐब
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ख़ुशनसीब सुअर - बदनसीब पाकिस्तान

शेयर अर्ज़ है - बातों बातों मे तुमने हमारी मारली बातों बातों मे हमने तुम्हारी मारली वाह बहुत घटिया शेयर है बोले तो शेयर कहलाने के लायक़ भी नहीं। चूंकि हम ख़ुदा हैं जो बोलदिए बस वही शेयर है, चाहें तो शेर पर शेयर ठोकदें। क़यामत जैसी गर्मी से जान छूटते ह
 
शुऐब
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जनरल वार्ड

मगर अब भी आप खेल छोड़कर जासकते हैं। और एक करोड़ रूपयों केलिए ख़ुदा की स्क्रीन पर ये रहा अगला प्रश्न - “ख़ुदा अगर इंसान होते तो कौनसे देश मे पैदा होते?” (ए) अफ़ग़ानिस्तान (बी) पाकिस्तान (सी) इराक़ (डी) सौडान “तीनों लाईफ़ लाईन आपके पा
 
शुऐब
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स्कूल-डे (भाग तीन)

क्लासरूम की ज़ीनत बढ़ाने केलिए ख़ुदा ने प्रधान अध्यापक श्रीमती ज़ीनत को बुलाया और शिकायत करदी - बड़े अजीब किसम के बच्चे हैं, हम पढ़ा रहे हैं और यहां देखें सब मूंह खोले सो रहे हैं। श्रीमती ज़ीनत ने ख़ुदा से कहा - आप बच्चों को कुछ ऐसा पढ़ाएं कि वे जाग उठे
 
शुऐब
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भूख की आवाज़

किसी ने पूछा - भारत और पाकिस्तान की जंग मे जीत किसकी होगी? ख़ुदा ने बताया - मियां, ये तो तैय है नुक़सान आम जनता का ही होगा फ़र्क़ सिर्फ इतना कि पाकिस्तान को जिस काम केलिए तीस मिनट दर्कार हों वहीं भारत सिर्फ दो मिनट मे काम तमाम करदे। लेकिन ताजुब की बा
 
शुऐब
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सलाम आतंकवादीयों पर

कड़ाके की सर्दी मे लिहाफ़ मे लिपटे ख़ुदा को जगाना कोई आसान काम नहीं। सुबह का अख़बार भी ठीक नही था, मुंबई की सुर्ख़ीयों के सिवा कोई और ख़बर नहीं थी। टीवी चैनलों पर ख़बरें बोलने वाले ऐसे बोखलाए जारहे थे जैसे ख़ुद बम पर बैठकर बोल रहे हों। सिर्फ़ दो दिनो
 
शुऐब
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ज़रूरत से ज़्यादा ख़ुदा (ख़ुदा की वापसी)

ये ख़ुदा है - 66 ] महीनों ख़ामोशी को तोडते हुए अचानक ख़ुदा को फिरसे बकवास की सूझी और साथ मे हज़ारों दर्शकों को जलसागाह खींच लाए फिर अपनी जेब से पर्ची निकाल सर्सरी नज़र डालते हुए खंकारने के बाद भाषण पढ़ना शुरू ही किया था कि एक समाचार पत्रकार ने पूछलिया
 
शुऐब