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16 Jun 2010
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ईंट-गारे से छत नहीं होती

आज फिर अखबार में पढ़ा ...ऑनर किलिंग ...एक और बेटी भेँट चढ़ गई...जाने वाली की नजर से ...घर के बाहर तो छत तो नहीं होतीघर के अन्दर ही मेरी छत छीनी क्यों कर ?मेरे सिर पर जो लहराता था बादल बन करउसी बादल की नमी सोखी किसनेबिजली बन कर मेरी साँसों की गति रोकी
 
शारदा अरोरा
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नजर की गुफ्तगू

यूँ ही नहीं ढूँढती हैं आँखें , किसी को बेसबबदिल से दिल की राह जाती है , यूँ झलकजाते हुए जो नजर उठा कर भी न देखा उसनेबिन कहे समझो के हम उसके दिल से गए उतरमायूसी के मन्जर हैं या दिल का कमल खिलाबात इतनी सी पे रिश्तों के मायने जाते हैं बदलनजर की गुफ्तगू नहीं
 
शारदा अरोरा
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संवेदनाएँ छलती हैं

संवेदनाएँ चलती हैंऊँचा हो जाता है जबक़द सर सेसंवेदनाएँ छलती हैं ।मुश्किल हैमन चलता हैपकड़ के मुट्ठी में रखनाखलता है ।मन के पानी परबनती बिगड़ती तस्वीरेंबहुत बोलती हैं ;मौका लगते हीबाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।कोई ऐसी दिशा देकि न रोये नादाँखुद को छल के हीन
 
शारदा अरोरा
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खुद से ही दूर

नहीं जाना है उस गलीजो कर दे मुझे खुद से ही दूरपानी से पतला जीवन हैफिसला जाता है अपना ही नूरअग्नि से तेज क्रोध हैजल जाता है तन मन वजूदहवा से तेज मन है चलतानहीं संभलता है गति का अवरोधआकाश से खाली हैं गर विचार भारी नहीं है मन उदारधरती सा धैर्य है अगरफलें
 
शारदा अरोरा
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ऐसी होती है दोपहर

आँखों में कटता है पहरऐसी होती है दोपहरजीवन की दुपहरी दम माँगेनाजुक मोड़ों पर तन्हाईचुभता सूरज भी ख़म माँगेखोल ज़रा तू हाले-जिगरऐसी होती है दोपहरप्राण साथी का ही काँधा माँगेतप कर पिघली है तरुणाईघिरे बदरा से बरखा माँगेतपता आसमाँ भी गया है ठहरऐसी होती है
 
शारदा अरोरा
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इतनी सी नमी

कागद काले हैं कियेया धड़कन को पिरोया साँसों मेंनजर-नजर का फेर हैगीत बन जाते , शब्दों के हेर-फेर सेअजनबी से लगते हैंदिल का साज छेड़ कर देखोतराने बुनते हैंसागर अँजुली में लिएये वो दोना हैपी ले तो अपना सा हैछूटे तो धरती पर बिखरेकागद काले हैं कियेइसी के दम पे
 
शारदा अरोरा
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धुएँ का पहाड़

आदमी कुछ भी नहींहसरतों के सिवाधुएँ का पहाड़उठता हैक्या जाने किधर से आता हैचिँगारी दिखाने की देर हैलपटों से घिरा नजर आता हैकभी बेड़ियाँ , कभी पायलऔर ख़्वाबों की सैर-गाहकभी गुबार औरलपटों से झुलस जाता हैआदमी कुछ भी नहींचिँगारी , गुबार और लपटेंधुएँ का खेल
 
शारदा अरोरा
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तू जो है सबसे करीब

नीचे लिखी कविता में ...सबसे करीब ...जिसके लिए लिख रही हूँ , मेरी भान्जी...बड़ी दीदी की बेटी और मैं सबसे छोटी मासी । उसकी आँखों से जैसे तीव्र बुद्धि टपकी पड़ती थी । चेन्नई की इंजिनियर , अमेरिका से ऍम एस और फिर वहीं जॉब , आजकल डेप्युटेशन पर अपने हस्बैंड के
 
शारदा अरोरा
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अब आगे तपस्या होगी

मैं उससे मिली थी , कभी घूमते वक़्त रास्ते में पतिदेव ने परिचय कराया था , ये हमारे बैंक में कम्पनी सेक्रेटरी हैं । परसों रात खबर मिली , ट्रेन से उतरते वक़्त ट्रैक में फँस जाने से उसकी दोनों टाँगें......लेखनी लिखने से इन्कार कर रही है , दिलासे के लिए भी शब्द
 
शारदा अरोरा
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बुलबुलें जाने लगी हैं

एक हफ्ते की छुट्टी लेकर दोनों बेटियाँ घर आईं , चौथे दिन से ही उल्टी गिनती का अहसास होने लगा था , मन पहले डूबा , फिर हौले से तैर कर ऊपर आया और खुद को समझाते हुए जग से कदम मिलाते हुए चलने लगा | इस प्रक्रिया को इस कविता में सहज ही महसूस किया जा सकता है |
 
शारदा अरोरा
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देर उतनी ही हुई है

जागी हुई रात के सोये हुए सपनोंदेर उतनी ही हुई हैजितनी दूरी है मेरे रूठे हुए अपनोंपलकों की मुंडेरों पर , थम गये होज़रा ठहरोकोई जागा है शब भर कोजादू की छड़ी हो तुमसपने सब हो जाते अपनेबन्द आँखों में करवट ले लोसच का रँग भर दोजागी हुई रात के सोये हुए पाहुनोंदेर
 
शारदा अरोरा
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न जाने कौन सी बात

उड़न तश्तरी की ताजा पोस्ट से प्रेरणा लेकर न जाने कौन सी बात पहचान बनेवो मुलाकात कल्पना की उड़ान बने पल्लवित होती बेलें , नाजुक ही सहीबढ़-बढ़ के छूने को आसमान बने तपन गर्मी की , बौरों से लदेपेड़ों के फलों की मिठास का गुमान बने चाँद सूरज हैं नहीं दूर हमसेधरती
 
शारदा अरोरा
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अन्तिम विदाई

12 मार्च , चाचा जी ऐसे चले गए जैसे बड़े भाई के पीछे-पीछे लक्ष्मण चले गए हों अपने लिए कितने कठोर नियम थे और दुनिया के लिए कितने नर्म दिल ! तीस साल पहले कितने ही गाँवों के सरपँच रहे ...निष्पक्ष फैसले और राजा जैसे दिल के साथ सबका आदर-सत्कार प्रसिद्धि तो
 
शारदा अरोरा
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जरुरी नहीं के

जरुरी नहीं केलौटें वो रास्तेजिनसे थे गुजरेअरमाँ के वास्तेपलट कर कभी फिरनहीं आने वालागुजरा था जो पलरहबर के वास्तेजिन्दा तो कर लेंकहाँ हैं वो हमकहाँ हो वो तुमखो गए रास्तेजब थे खड़े हमआँखें बिछायेहुए न मेहरबाँकिस्मत के रास्ते मेरी आवाज़ में ( एक कोशिश की है
 
शारदा अरोरा
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दुआ सलाम बन जाती

छुअन भी सपने कीरँग प्याली में बेशुमार भर देतीठहरे हुए पानी मेंमीठी सी जल-तरँग भर देतीतपती हुई धरती परछिटक के चाँदनी बिखर जातीबोझिल कदम उठते हीपँखों की उड़ान बन जातीसपने में देख कर सपनाखुमारी नींद की उतर जातीगुम हो गयी थी आशना तूलिका रँग उमँग भर जातीकौन
 
शारदा अरोरा
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ये ज़िरह को तोलता

अभाव भी है बोलतादिलों के भेद खोलतातड़प कसक के साथ हीआँखों में है डोलताधरती के सीने मेंये ज़िरह को तोलतासमेटना था नभ कोये गिरह को खोलतापा लेते जो मुक्कमिल जहाँतो कौन क़दमों में जान डालताशोर भी इसी का हैहै बाँध सारे तोड़तासात पर्दों में रखा हुआअस्तित्व को
 
शारदा अरोरा
Mar 08 2010 10:53 AM
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लरज़ते हुए लफ्ज़

क्या ब्लॉग की दुनिया में कोई ऐसा जानकार है ?....जो कन्धे के बार बार डिस्लोकेट होने के कारण जो मेंब्रेन (झिल्ली ) फट जाती है ....जिसके लिए डॉक्टर उसकी सिलाई का ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज बताते हैं ....या फिर साथ ही साथ शैलो केप्सूल ( उथला) के लिए हड्डी कुरेद
 
शारदा अरोरा
Mar 04 2010 12:24 PM
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वो इतनी दूर

रँग आसमान का नीला क्योंविरह पतझड़ सा पीला क्योंयादों का तना गठीला क्योंनश्तर सा समय नुकीला क्योंकोई पूछ के आए तो उससेवो इतनी दूर रँगीला क्योंसपनों का पुलिन्दा चटकीला क्योंभरमों का रँग भड़कीला क्योंदिल में जो छुप कर बैठा हैपूछो पूछो , वो सजीला क्योंआशा की
 
शारदा अरोरा
Feb 25 2010 11:26 AM
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मुँह मोड़े फिरते हैं

कल गढ़-गँगा के उसी पुल और सड़क से गुजरी , जहाँ ठीक बीस साल पहले १७ फरवरी के ही दिन मेरी दीदी ने एक सड़क हादसे में अपने प्राण गँवा दिए थे | पिछले साल चाची जी के स्वर्ग-वास के बाद तेरहवीं से एक दिन पहले जब सब लोग बैठे थे , चाची जी की बहन ने मेरी दीदी को याद
 
शारदा अरोरा
Feb 18 2010 11:13 AM
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किसके नाम पर लड़े

किसकी धज्जियाँ हैं उड़ींकिसके नाम पर लड़ेजिसके लिए लड़े हो तुमइन्सानियत शर्मसार हैकोई सुनता नहीं जो आवाजेंदँगा-फसाद , आगजनीसदियों तलक कराहतीपीढ़ियों का कौन जिम्मेदार हैनिशाने पर है भाईचारासाजिशों का न शिकार होमजहब तो सिर्फ रास्तासबकी मंज़िल एक हैइन्सानियत
 
शारदा अरोरा
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थोड़ी चलने को जगह

लू को मैं समझ लेती हूँ ठँडी हवाथोड़ी चलने को जगह हो जायेशाम को मैं समझ लेती हूँ सुबहइसी टुकड़े पर सुबह की खेती करकेथोड़ा आसमाँ मेरे नाम हो जाये दीवारों से उलझूंगी तो चलूँगी कैसेसिर पर खड़ा सूरज सम्भालूँगी कैसेतपिश में थोडा आराम हो जायेउड़ जाती हैं धज्जियाँ
 
शारदा अरोरा
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मन का पखेरू तो

रुक कर जरा सोचें कि मन क्या तलाशता है ........ मन का पखेरू तो चुगता है सोनाये इसकी ज़िदें हैं , ये इसकी हदें हैंकितना भी समझाओ , समझे न बैन...काया के पिन्जरे में आवाजें भली होंकल हो न हो , ये दिन रैन .........मन का पखेरू तो चुगता है सोनाजग को दिखावा ,
 
शारदा अरोरा
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जीवन का पलड़ा भारी है

दुर्भाग्य से न तो समझौता करें , न ही दुर्भाग्य को निमंत्रण दें .......जिन्दगी हर हाल में चलती रहनी चाहिए .......क्योंकि जिन्दगी से ज्यादा खूबसूरत कोई चीज है ही नहीं ......करें तो जिन्दगी से समझौता करें | दूसरे के मन का सदा ख्याल रखें , कोई चुभती हुई बात
 
शारदा अरोरा
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नया साल कुछ ऐसे आया

पिता जी का देहान्त और नये साल का आगाज़नया साल कुछ ऐसे आयाछूट गयी बरगद की छायाकानों में ये फुसफुसायाआशीर्वाद कहाँ जाता है खालीआसमाँ से इक हाथ है आयाधीर-नीर में , वक्त-बेवक्त मेंएक हौसला साथ ले आयाबीज वही है , फूल उगा लोकाँटों का सँग-साथ भी भायाचल पायें हम
 
शारदा अरोरा
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पिता जी को एक अंजुली श्रद्धा की

हैबोकी , उकाड़ा जिला मिंटगुमरी ( अब पकिस्तान में ) , १९२० के आसपास का कोई साल , एक बालक का जन्म हुआ , माँ ने तमन्ना की कि ये बालक सारे गाँव का चौधरी बने और नाम रख दिया ' चौधरी |' १३ , १४ साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया | अपने से छोटे पाँच
 
शारदा अरोरा
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निष्ठुर छल गया जीवन

एक मित्र के पिता के दुनिया से चले जाने के बाद , मित्र की माँ जब जब मुझे मिलीं रोईं जरुर , जैसे अतीत के गले लग आईं हों | क्या हमने कभी बुढापे की आँख से जिन्दगी को देखा है ? जीवन के उत्तरार्ध को जाता हुआ जीवन साथी भी साथ छोड़ गए निष्ठुर छल गया जीवन काँप
 
शारदा अरोरा
Dec 29 2009 11:41 AM
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कल तो थी उँगली पकड़े

९ दिस म्बर , बेटी का जन्मदिन तेरी आँखों से देखे सपने तेरी नजरों से देखी दुनिया कल तक तो थी पकड़े उँगली आज सपनों के पँख उधार दिये बचपन के दिन तो यूँ गुजरे हँसते रोते , मेरी मुनिया दस्तक जो दी इस यौवन ने फूलों की डाल निहाल हुई सँग तेरे गुजरे गलियों से
 
शारदा अरोरा
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मैं हूँ एक परिन्दा

मैंने देखा कि मैं हूँ एक परिन्दा जल थल है मेरे क़दमों में और पँखों में सिमटा नभ है नन्हीं नन्हीं मेरी उड़ानें दिखता सारा जग है मिल जुल कर सब साथी उड़ते कोई बन्धन कहीं नहीं है मैं उड़ता सागर की लहरों के ऊपर आसमान की बाहों में हर बार पलट आता हूँ धरती के
 
शारदा अरोरा
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सबक अभी बाकी है

प्रेम ही रास्ता खोलता है , निर्मल आकाश का वरना तंग गलियों में कहाँ गुजर बाकी है छिल जाता है जिगर , घबरा के मुँह फेरता है जमीर धड़कनें साँसों से कहती हैं , सफर अभी बाकी है मोहरे बने हैं हम , खाता खुला है कर्मों के हिसाब का जिन्दगी मुस्करा के कहती है ,
 
शारदा अरोरा
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सुन्दर सा ज्यों मुखड़ा कोई गुलाब का

नौ नवम्बर ०९ , आज बेटे का बीसवाँ जन्मदिन है , छोटा सा था जब माउन्ट आबू में बेटियों की राजस्थानी ड्रेस में फोटो खिचवाई थी तो इन्हें भी कहा कि राजस्थान की पारम्परिक ड्रेस में एक फोटो खिंचवा लो ; सिर हिला कर कहने लगे कि नहीं ये नहीं पहनूंगा फ़िर ख़ुद ही
 
शारदा अरोरा
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सोने दे मुझे शब भर को

सोने दे मुझे शब भर को कितनी है कीमत अपनों की आराम की कीमत कितनी है आँसू न कर पाये कीमत उधड़ा है जिगर सिलाई की कीमत कितनी है सब्र कितने वक्त का , ये बता ये सफर है या मुकाम आड़े वक्त के साथी , क्या यही है मेरा ईनाम सोने दे मुझे शब भर को poems
 
शारदा अरोरा
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दीपमलिके

दीपमलिके , हम तेरे इन्तजार में घर सजा के बैठे रहे मन भी है सजता यूँ ही इस बात से अछूते रहे होती है दीवाली किसी की उपहारों से भरी हो जाते हैं उनमे ही गुम और किसी की यूँ दिवाली तेल है न रुई बाती हो जाए बत्ती ही गुल स्वागत हैं करते जलते दियों का है नहीं
 
शारदा अरोरा
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अपना अपना जोग भया

दुख दारु सुख रोग भया दारु दारु उन्माद हुआ दुख न हुआ प्रमाद हुआ गीतों में ढल कर शाद हुआ किर्चों से मिल कर नाद हुआ खुशबू में बँट आबाद हुआ दुख दारु सुख रोग भया अपना अपना जोग भया poems
 
शारदा अरोरा
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टिम-टिम करती मेरी आशा का

जुगनू की तरह मेरी आशा बुन लेती है सन्सार पिया मेरी आँखों में पाओगे तुम अपना ही तो सार पिया दिल में मैं छुपा के रख लेती ये जग काँटों का हार पिया अट जाये फूलों से रास्ता ऐसा हो तेरा घर-द्वार पिया छल किया है किस्मत ने मुझसे कैसे कह दूँ इसे दुलार पिया हर
 
शारदा अरोरा
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कैसे खो दूँ मैं तुझे

एक बड़ी ही प्यारी मित्र ने कुछ ऐसा किया जो हमारे रिश्तों में कडुवाहट घोलने के लिए काफी था | ऐसे वक़्त में कुछ इन पंक्तियों से ख़ुद को समझाया | आँसू आ के रुक गयाआँख की कोरों पर कैसे नाराज हो जाऊँमैं तुझ से गैरों की तरहदुःख तो होता हैतेरी बेरुखी परकैसे खो
 
शारदा अरोरा
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लगती है एक उम्र

इतने कड़वे सचों का सामना करना आसान नहीं है , वास्तविक जिन्दगी में पत्नी के सच बोलने पर नोएडा का एक पति पँखे से लटक गया और एक ने पत्नी के गले पर ब्लेड मार मार कर मारने की कोशिश की | ऐसे सच को बर्दाश्त करना इसीलिये मुश्किल हो गया है क्योंकि इन्सान अपने किए
 
शारदा अरोरा
Aug 21 2009 10:25 AM
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मैं कह न पाऊँ अगर ......

मैं कह न पाऊँ अगर ...... मेरी मूक जुबाँ समझ लेना मेरी दुआओं का असर समझ लेना तेरे आस-पास मन्डराता हुआ , मेरा प्यार जान लेना तुम नज़रों में बाँध लेते हो कुछ यूँ वक़्त थाम लेते हो अपने बारे में भी कुछ जानते हो ! कहने सुनने से बहुत आगे नज़रों का सँसार हुआ
 
शारदा अरोरा
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निरीहों को क्या मालूम

मेले के दिनों में शहर से बाहर निकलते ही देखा कि एक चरवाहा बकरियों को हाँकता हुआ शहर की तरफ़ ला रहा है , पहला ख्याल दिल में यही आया कि ये या तो धर्म के नाम पर बलि चढेंगी या दुकानदारों और होटल वालों को बेची जायेंगी , आख़िर हश्र वही है अय्यड़ को हाँका है
 
शारदा अरोरा
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एक किरण आशा की

एक किरण आशा की , सपने हजार लाती हैडूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है १.तिनका-तिनका बिखरे हों , जमीं से उखड़े होंराहगुजर दिखलाती , एक किरण आशा कीमन्डराते बादलों से पँख उधार लाती हैडूबे हों कितने भी , पल में उबार लाती है २.बादलों से गुजरे हों ,रँग सब
 
शारदा अरोरा
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कैसे करें सच का सामना

कैसे करें सच का सामना ये पकड़ता है वही रग , जो बड़ी कमजोर है है बुलन्दी पर सितारा खुश हैं हम , कामना पुरजोर है दफ़न है सीने में कुछ कैसे कह दें के हम बड़े चोर हैं अपने दर्पण से भला कैसे छिपायें दाग हैं , बढ़ी धड़कन , मचा शोर है न जाते उस गली हम , जो ये
 
शारदा अरोरा