अवधी क्यार पहिला ब्लॉग's Image

अवधी क्यार पहिला ब्लॉग

http://manjheriakalan.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
08 Mar 2010
कुल प्रविष्टियां
23
पाठक भेजे
510
पसंद
17
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
22.17
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास- क़ासिद (16)

आजु जानौ टिल्लू के स्कूल म छुट्टी अहै। दादी सबेरे बताएनि तौ लेकिन इनकी समझि कुछु नाई आवा कि आजु काहे क छुट्टी है कौनौ तिथि आए जहिमा दादी देर लगे मंदिर म पूजा करती हैं। टिल्लू मौका निखारि क आयशा क घरे पहुंचि गे। दून्हौं याक दूसरे के समहे बैठि हैं। आयशा क
Feb 13 2010 01:54 PM
पसंद करें
2
नापसंद करें

अवधी उपन्यास- क़ासिद (15)

अइसी आयशा आसमान तन निगाहें लगाए टुकुर टुकर देखि रहीं, वइसी टिल्लू क नींद नाई आ रही। ऊई अपने बिस्तर पर परे परे कुलबुला रहे। दादी याक दुई दांय लरिकवा तन देखेनि। टिल्लू जानौ आसमान म तारा गिनि रहे। दादी कित्तौ कड़क होएं लेकिन आखिर आहीं तो अम्मै ना। बिचरेऊ
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास- क़ासिद (14)

सांझ घिरि आई। थोरेहे द्यार म आसमान म नखतौ चमकन लाग। नौकर चाकर लोग अपने अपने काम म व्यस्त हुइगै और शुक्लाजी टीवी खोलि क बैठि है टीवी द्याखन। आजु दुई तीन दिनि बादि बत्ती आई है। फत्त्तेपुर चौरासी जैसे गांवन म बिजली आवबु कौन्यो त्यौहार ते कम नाई है। पहले तो
पसंद करें
1
नापसंद करें

अवधी उपन्यास- क़ासिद (13)

शुक्लाजी अपने लरिका पर अपनी अम्मा क पानी छिड़कत देखेन त पानी केरि बूंदन त जइसे उन क्यार अतीत टपकन लाग। वा सामौ अइसिहि रहै। शुक्लाजी केरि छत पर तेरे तमाम टोली आवति दिखाई दे रही रहैं। जेत्ते लोग इ टोलिन म सामिल रहैं सब कि जबान पर याकै बात- जय श्री राम, जय
Jan 15 2010 12:44 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

अवधी उपन्यास- क़ासिद (12)

कुबेरि बेरिया गांवन म वौ बखत होति है जब घरन के बाहर गोरु हरहा पहुंचन लागति हैं। जिनके घर मा लालटेन है उई लालटेन क सीसा साफ करैम औ मिट्टी का तेल चेक करन लागत हैं औ जिनके घर मां कुप्पी है उ अपनि अपनि कुप्पिन केरि बाती क्यार ल्यांड़ा झरिहा क कुप्पी जला देति
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें

...पर ज़बां हो दिल की रफ़ीक

हसरत मोहानी - १) - पंकज शुक्ल यह बात तबकेरि आय जब हम पत्रकारिता केरि पढ़ाई कर रहेन रहै। तब दैनिक जागरण, कानपुर क्यार याकै पत्रकार और कवि हम पंचन का पत्रकारिता पढ़ावै आवत रहैं। उन तेरे हम याक दिन ऐसे हे पूछ दीनि कि पंडित जी यौ बताओ, डायरेक्टर बी आर चो
पसंद करें
0
नापसंद करें

अलैया बलैया या कि बल्ला उपला

मुंबई 17 अक्टूबर। आज भोरहरे तेरे खिड़की के पास बइठि क यू सोचित आए कि का वाकई मा ऊई सारी बातै बिला जइहैं, जिनका देखि के हम पंचे बड़े भएन। काल्हि मुंबई म बहुत गर्मी रहै, टेंपरेचर 37 डिग्री के आसपास रहै। शाम क तनुक मौसम जुड़ान तो हम कहा कि चलौ थोड़ी द्य
पसंद करें
0
नापसंद करें

किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार

बात आगे बढ़ावै ते पहिले पहिले तनुक बानगी द्याखौ। ई कुछ प्रसंग आहीं जउन याक अवधी किताब तेरे लीन गे हैं। 1. ठगी क्यार प्रसंग:....रात मा जब हमरे सब रुकेन तौ हमैं इहै सोचि-सोचि कै बहुत देर तक नींद नहीं आई कि ई सब ठग हैं! हम जागै कै पूरी कोसिस किहेन लेकिन
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

यह किसान की दुनिया

जमींदार कुतवा अस नोचैं देह की बोटी-बोटी, नौकर प्यादा औरु करिन्दा ताके रहै लंगोटी। पटवारी खुरचाल चलावैं बेदखली इस्तीफा, रोजई कुड़की औ जुर्माना छिन-छिन नवा लतीफा। मोटे-झोटे कपड़ा-बरतन मोटा-झोटा खाना, घर ते खेत ख्यात ते बग्गरू कहूं न आना जाना। नंगा ठग्गा
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

झाड़े रहौ कलक्टरगंज...

हम पंचै जब ते गांव छोड़ि के शहर में पढ़ाई करै पहुंचेन, गांव देहात की बोली छोड़ि क खड़ी बोली ब्वालै लागेन। गांव वाले दादा की पहली बहुरिया तक तो सब कोई देहाती ही म ब्वालत रहा। लेकिन, जइसेहे गांव म दूसरि बहुरिया लखनऊ त आई, सबका जइसे खड़ी बोली का भूत सवा
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (11)

दादी चाय क कप लैइके बिल्कुल नेरे आ गईं तबहिनौ शुक्लाजी का पता नाई चला। ऊ पता नाईं टीवी म का देखि क बस मुस्कुरवतै रहे। दादी चाय क कप नेरे याक स्टूल पर धरि दीन्हेनि। “ का बात है बच्चा ? का देखि क मुस्कुरा रह्यौ ?” शुक्लाजी शायद अबहिनौ अपनी अम्मा केरि ब
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (10)

आयशा याक दाएं सोचेन कि यू लरिकवा जौनि बात कहि रहा है, वइहमा एहि क्यार मतलबु का है। “ बतइहौ तो नाईं ” ... आयशा तनिक द्यार कइहां हिचकिचानि कि कहूं याक बाह्मन केरे लरिका साथै बातै करेम कौनौ बतंगड़ ना बनि जाए। फिर ना जानै का सोचिक, ऊई अपन हाथु आगे बढ़ा द
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (9)

अरे तो एहिते का भा। छोटे बड़े क बात एहिमा कहां ते आगै। बात कौनौ नई चीज़ सीखै कि होए तो छोटेहो बड़ने का सिखा सकति हैं। “ टिल्लू अबकी दांय पूरे भरोसे के साथ बोले। उई जा तो रहे रहैं ख्यालन लेकिन आयशा तेरे मुचौटा करेम उनका मज़ा आवन लाग है। आयशा क तनिकौ उ
पसंद करें
1
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (8)

जइसे टिल्लू क पहिलेहे ते पता होए कि अब का होए वाला है। टिल्लू अपन बस्ता दुआरे हे धरि दीन्हेनि हवेली केरे गेट क तीर और ह्वानै ठाढ़ हुइके गाना गावन लाग, “ ख्वाजा मेरे ख्वाजा..दिल में समा जा , ......अली का दुलारा.. , ख्वाजा मेरे ख्वाजा..। “ लरिकवा केरि
पसंद करें
2
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (7)

दुबई सहर। दोपहरि हुइगै औ सूरज जि तना जेठ म अपने हियां तपति है, वहिते कई दर्जा ऊपर सूरज दुबई म तपि रहा। सड़क पर हिया हुआं याक दुई मज़ूर दिखाई परति हैं औ जिनका बहुत ज़रुरी है वेई घर ते बाहर निकरे हैं। चाहे पैदरि होय या फिर एसी कारन मइहां। दुबई म दौलत स
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (6)

दादी तख्त प बैठे लकड़ी कि रिहल पर धरी रामचरित मानस पढ़ि रहीं। पासै म बाई काम करि रही। टिल्लू तख्त पर बैठि हैं। स्कूल केरि यूनीफॉर्म पासै म परी है, इ केवल कच्छी पहने तख्त प बैठ हैं। सब किताबें पूरे तख्त प हियन हुअन फैली परी हैं। दादी क रामचरित मानस पा
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (5)

स्कूल म दूसर घंटी बाजे के बाद सब लरिकवा औ मास्टर मैदान म एकट्ठा भे। पहिले प्रार्थना भै फिर राष्ट्रीय गान। प्रार्थना खत्म होए क बाद सब लरिकवा अपनी अपनी क्लासन म जा रहे। टिल्लू क साथै तीन चार लरिकवा औरउ है। टिल्लू का वंदे मातरम बहुत नीक लागत है। उइ अब्
पसंद करें
1
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (4)

स्कूल कि यूनीफॉर्म पहिरे तमाम लरिकवा स्कूल कि तरफ दौरत जा रहे। राह म साइकिल वाले ऐसी वैसी बचिकै निकरि रहे कि कौनो लरिकवा चोटा ना जाए। बाज़ार क्यार दुकानदार अपनी अपनी दुकानदारी म मसरुफ हुइगै हैं। बाज़ार म लोगन कि आवाजाही बढ़न लागि है। टिल्लू इन पंचन क
पसंद करें
0
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (3)

दादी केरे लोटा के पानी क धार पर टिल्लू क्यार कान लाग हैं। जैसे हे पानी खत्म भा टिल्लू तुरतै छति के याक कोना म टोकरी म धरे पटाखा क्यार बरसाती हटावन लाग, जेहिते यू जानि परे कि पटाखन कइहां धूप दिखावे खातिर इ ऊपर आए हैं। दादी कनखिन तेरे इ लरिकवा केरि हर
पसंद करें
1
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (दूसरी कड़ी)

खान चाचा के घर ते आवै वाले आलाप केरि आवाज़ पूरे मोहल्ला म गूंजि रही है। तबहिनै पांडे अखबार वाले दादी की छत पर अखबार फ्याकत हैं। दादी क्यार घरु ऐस है कि एहि कि छत तेरे आयशा केरे घर का आंगन साफ दिखाई परति है। पिछले महिना भै रामायण के टाइम लगावा गा तूल
पसंद करें
3
नापसंद करें

अवधी उपन्यास - क़ासिद (1)

मुर्गा अबै बांग नाई दीन्हेसि तेहिते पता चलति है कि भोरहरे म अबै देर। लेकिन, दाद देयक होई पंडिताइन कि जे भोरहरे ते पहिले है नहा धोक पहुंत जाती हैं शीतला माता क मंदिर। शीतला माता क नहावे ते पहले वै पहुंचती हैं बगल म अंग्रेजन के जमाने के बने सिवाला पर।
पसंद करें
1
नापसंद करें

यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो...

आजु हम पंडित चंद्र भूषण त्रिवेदी उर्फ रमई काका केरि याक कविता लाए हन। रमई काका रहइया उन्नाव क्यार रहइया रहैं अउर बैसवारी अवधी म बहुत कुछ लिखेन। उनक्यार लिखा प्रहसन “बहिरे बाबा” आकाशवाणी लखनऊ के सबते मसहूर कार्यक्रमन म माना जाति है। रमई काका केरे बारे