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हम लोगों की दुनिया

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08 Mar 2010
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यहां के राम कौन हैं? आदर्श स्थिति क्या है और आदर्शवाद क्या है?

एक व्यक्ति खुद की तुलना अभिमन्यु से करते हैं। यहां इस ब्लाग जगत में स्वयंभु अभिमन्यु कौन है? यहां के राम कौन हैं? आदर्श स्थिति क्या है और आदर्शवाद क्या है? किसी वस्तु या किसी चीज को अतिरेक कर प्रस्तुत करना कुछ समझ में नहीं आता, वह भी अति शुद्ध हिन्दी
 
प्रभात गोपाल झा
Mar 06 2010 10:09 AM
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अरे बंदर है क्या..

बचपन में शरारतें करते देखकर प्यार से लोग प्यार से उलाहने भरतेअरे बंदर है क्या..हमने अपने स्टेटस में लिखा-हम सबके अंदर-है एक बंदरबंदर हमें अपनी हरकतों से अपनी ओर खींचता है। कुछ-कुछ मजा आता है। उसकी फुर्ती लाजवाब होती है। पलभर में यहां से वहां। मैं उसकी
 
प्रभात गोपाल झा
Mar 05 2010 11:00 AM
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क्या ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत में हमारी रैंकिंग क्या है, इसी से हम अच्छे या बुरे लिक्खाड़ माने जाएंगे?

आज एक नया सवालक्या ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत में हमारी रैंकिंग क्या है, इसी से हम अच्छे या बुरे लिक्खाड़ माने जाएंगे।हमें लगता है कि हम एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास क्यों करें? विचारों का सम्मान होना चाहिए, व्यक्ति का नहीं। व्यक्ति बेहतर विचार से महान
 
प्रभात गोपाल झा
Mar 04 2010 09:55 PM
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नारीवादी समर्थकों से सवाल है कि उनका मुहं तब क्यों नहीं खुलता, जब खुद नारी ही नारी की शोषक होती है।

नारी समर्थकों और सौंदर्य समर्थकों की नोक-झोंक के बीच में बेनामी महाराज का कूदना, कुछ ऐसा लगा जैसे नारद मुनि देवलोक से उतर आये  हों। पिनका-पिनका कर बहस को आगे बढ़ा रहे थे। सारे दोस्तों ने दामिनी नामक फिल्म जरूर देखी होगी। दामिनी एक महिला रहती है। उसी
 
प्रभात गोपाल झा
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क्या किसी ब्लाग पर विषय से अलग महिला की तस्वीर लगाना उचित है?

क्या किसी ब्लाग पर विषय से अलग महिला की तस्वीर लगाना उचित है?पूरी स्थिति जानने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं। इसमें व्यवस्था पर प्रहार तो किया गया है, लेकिन महिला की तस्वीर को पोस्ट में लगाना कहीं से उचित नहीं मालूम पड़ता है। क्या ये भी ब्लाग की
 
प्रभात गोपाल झा
Mar 03 2010 09:25 AM
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शशि थरूर जी आपका अगला बयान क्या है?

शशि थरूर क्या हैं और कौन हैं, सब जानते हैं। उनकी संयुक्त राष्ट्र में बतौर अधिकारी की पारी को भी हम गर्व से याद करते हैं। अहा जिंदगी में शशि की जिंदगानी की कहानी को पढ़ा था। उसमें उन्होंने बताया था कि वह पढ़ने में काफी तेज थे। काफी तेज। उनके
 
प्रभात गोपाल झा
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Mar 01 2010 05:17 PM
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ये होली खुशियां लाये...

ये होली खुशियां लाये। दुख के काले रंगों पर खुशी के हजारों रंगों के छींटे पड़ें। आपकी जिंदगी रंग-बिरंगी हो, रहे और ये जिंदगी गुजरती रहे
 
प्रभात गोपाल झा
Feb 28 2010 05:01 PM
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क्या बात है, लाजवाब हैं ये तस्वीर

हमारे एक पारिवारिक मित्र कुछ दिनों पहले गये थे हांगकांग। वहां के Giant Buddha/Po Lin Monastery, Hong Kong की कुछ खास तस्वीरें खींचकर भेजी हैं। जो यहां आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। HAPPY NEW YEAR
 
प्रभात गोपाल झा
Dec 29 2009 11:45 AM
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नारी स्वतंत्रता के नाम पर अंधी बहस

स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर वैचारिक मंथन का दौर जारी है। शायद एक खास ब्लाग ने इस मामले में अच्छा-खासा जोर लगा दिया है। मामला ये है कि आप आधे भरे ग्लास को आधा खाली या आधा भरा हुआ कह सकते हैं। एक बात कहना चाहूंगा कि स्त्री को आप मूल रूप से कब स्वतंत्र
 
प्रभात गोपाल झा
Dec 29 2009 11:45 AM
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टूटते रिश्तों की डोर संभालना जरूरी

हमारे रिश्ते में एक व्यक्ति का बेटा दूर दिल्ली में रहता है। बातचीत में किसी ने कहा-भाई, उसने तो खुद शादी कर ली। बिहार और झारखंड में उतना खुलापन नहीं रहने के कारण हम इन बातों को सहज में नहीं लेते। क्योंकि अब तक भी हम यहां अंतरजातीय विवाह या कहें खुद क
 
प्रभात गोपाल झा
Dec 29 2009 11:45 AM
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नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी, ये फासला क्यों?

क्या किसी लंबे सफर पर जाने के समय हमेशा उत्तेजना या कहें उल्लास को कायम रखा जा सकता है? क्या किसी सृजन के लिए लंबा समय नहीं चाहिए। क्या कोई भी प्रतिमा या कहें रचना कुछ पलों में तैयार हो सकती है। नहीं, कभी नहीं। ऐसे में इसके लिए एक खास चीज एकाग्रता की
 
प्रभात गोपाल झा
Dec 29 2009 11:45 AM
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मुझे तुमसे मोहब्बत... है... , क्या कहें, क्या करें...

कैटरीना कैफ और अक्षय कुमार पर फिल्माया गया गाना मुझे तुमसे मोहब्बत... है... , क्या कहें, क्या करें... वाला हाल है। निश्चित रूप से हॉल में दर्शक खींचने के लिए बनाया गया है। ठीक है...। बेटा फिल्म का गाना माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर पर फिल्माया गया, वह
 
प्रभात गोपाल झा
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आज भी कंपा जाती है वह रात... (श्रद्धांजलि लेख मृतकों के नाम)

ठीक एक साल पहले, २६ नवंबर की रात ११ बजे काम के बाद घर को विदा होने को थे। शांत रात, सर्द मौसम और सिकुड़ता देह बता रहा था कि शरीर कंबल की गरमी पाने को बेचैन है। तभी न्यूज चैनल पर मुंबई में गोली चलने की आवाज सुनाई पड़ी थी। बस यूं ही उत्सुकता बस मुरिया
 
प्रभात गोपाल झा
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पहल तो खुद से ही करनी होगी।

घुघूती बासूती नेट के दुष्प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। नेट के दुष्प्रभावों को लेकर चिंता जायज है। आज-कल इसे लेकर एक सब चिंता जाहिर कर रहे हैं। हालिया इंडिया टुडे के अंक में इस पर विशेष रपट भी है। लेकिन जब हर पांच घरों में से एक में नेट उपलब्ध हों, तो
 
प्रभात गोपाल झा
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पान दुकान भी सुनसान नजर आने लगे हैं

जब से टीवी कल्चर आया है। हर परिवार आधुनिकता के पायदान पर चढ़ता जा रहा है। इसमें पान खाने की संस्कृति में गिरावट ही आयी है। हमारे मिथिला में तो पान संस्कृति जड़ में समायी रहती है। लेकिन हमारे जैसे लोग, जो लगातार बाहर रहे, उन्होंने पान की ओर मुड़कर भी
 
प्रभात गोपाल झा
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अभिव्यक्त करो, लेकिन अंदाज बदल कर

आज-कल एक एडवर्टाइजमेंट में लड़की के चेहरे पर साटी गयी मूंछ उसके पुत्र के जन्म के समय तक जारी रहती है। यानी जन्म-जन्म का साथ देता प्रोडक्ट बताता है कि उसकी चिपकाहट में इतनी ताकत है कि वह छूटती ही नहीं। यहां बताने का तरीका भा जाता है। वे आफ एक्सप्रेशन
 
प्रभात गोपाल झा
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ये शख्स परेशान सा क्यूं है?

एक शख्स खुद की जिंदगी पर किताब लिखे जाने से परेशान है। जाहिर है कि किताब भी किसी खास व्यक्तिगत संबंध रखनेवाले व्यक्ति ने लिखी होगी। वह शख्स मशहूर है। उसकी जिंदगी की कुछ ऐसी बातों को दुनिया के सामने लाया गया है, जो कि मीडिया या कहें लोगों में रुचि पैद
 
प्रभात गोपाल झा
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माया कैलेंडर, दुनिया की २०१२ में तबाही और डरना मना है...

माया सभ्यता के कैलेंडर के हिसाब से २०१२ में दुनिया का खात्मा हो जायेगा। हालीवुड में एक फिल्म इसी पर बनी है। दहशत, विनाश और सृष्टि के खात्मे की कहानी रोमांचित करती है। हम कल्पनाएं करते हैं, डरते हैं और एक डर को जीते रहते हैं। हमारे भीतर का डर हमें हमे
 
प्रभात गोपाल झा
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कृपा करके अपनी अंगरेजी सुधारें, खुद को सुधारें और नाहक विवाद ना करें

वंदे मातरम गाने को लेकर बहस जारी है। एक भाई साहब ने अपनी पोस्ट का शीर्षक दिया है कि एक भी भारतीय मुसलमान देशभक्त नहीं है। उनकी अंगरेजी पर जरा गौर करें पैट्रियोटिक को पैट्रियोस्टिक लिख डाला। (no-indian-muslim-is-patriostic) भाई साहब आपने ये क्या कर डा
 
प्रभात गोपाल झा
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बचपन की तस्वीर कई मायनों में अलग हो गयी है

आज बाल दिवस है। स्कूलों में कार्यक्रम होंगे। एक साल फिर बीत जाएगा। २-३ साल के बच्चे स्कूल जाना शुरू कर रहे हैं। उनसे उनकी जिंदगी छीनी जा रही है। फ्लैट सिस्टम में रहते हुए कोई कम्युनिकेशन सिस्टम नहीं विकसित होता है। बच्चे अपने आप में बड़े हो रहे हैं।
 
प्रभात गोपाल झा
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पलायन पर आधारहीन चिल्लपों

पलायन ये शब्द आज-कल कानों में करंट दौड़ाता है। बिहार, यूपी के लोगों के दूसरे राज्यों में जाने को लेकर हंगामा मचता है। वास्तविकता क्या है? वस्तुस्थिति क्या है, इस पर शोध किये बिना राजनीतिक दलों के लोग चिल्लपों मचते-करते हैं। रोजगार कैसे पनपेगा, ये सोच
 
प्रभात गोपाल झा
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अगर जरूरत पड़े, तो जरूर सोचियेगा

कल बातें हो रही थीं, चर्चा का विषय था जीवन में हमारा उद्देश्य। कर्म करना मात्र उद्देश्य हो, उपभोग या कुछ ऐसा देकर जाना, जिसे लोग याद करें। कुछ दिनों पहले एक किताब पढ़ी था-द मांक हू सोल्ड हिज फेरारी। एक किताब जिसमें एक सफल बेचैन वकील के फिर से स्वयं क
 
प्रभात गोपाल झा
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हम तो साइलेंट मोड में मोबाइल को रखने के पक्षधर हैं

मुझे कुछ दिन पहले रिंग टोन रखने का चस्का लगा था, तरह-तरह के रिंग टोन्स। अरे कहां जा रिया है, या भाई साहब आपका फोन आया है, जैसे रिंग टोन्स। खोपड़ी भी पूरी खाली हो गयी है ऐसा लगता है इन्हें सुनकर। अगर जिंदगी बेमजा हो गयी है, तो इन रिंग टोन्स का उपयोग क
 
प्रभात गोपाल झा
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आज तक नहीं भूला जावेद मियांदाद का वह छक्का

क्रिकेट के खेल को अनिश्चितता का खेल कहा जाता है। कब क्या हो जाये, कोई नहीं जानता। शरजाह कप में चेतन शर्मा की उस आखिरी गेंद का आज तक नहीं भूला पाया हूं, जिस पर कि जावेद मियांदाद ने छक्का मारा था। भाग्य कब साथ दे जाये और कब दगा,हम नहीं जानते। उस गेंद क
 
प्रभात गोपाल झा
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कौन कहता है कि गजनी हिंसक फिल्म है?

गजनी फिल्म को लेकर जब बहस शुरू हुई, तो देखने की तीव्र इच्छा हुई। देखा और आमिर का कायल हो गया। कायल इस सेंस में आमिर ने १५ मिनट ही बातों को यादों को रख सकनेवाले इंसान के किरदार को जीवंत कर दिया। कहा जा रहा है कि गजनी हिंसक फिल्म है। लेकिन इससे ज्यादा
 
प्रभात गोपाल झा
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ब्‍लॉगर यानी चिट्ठाकार उर्फ मानाशाह ... मन की ताकत के बादशाह

हम कौन हैं पूछा गया तो जवाब नहीं आया सब मौन। ब्‍लॉगर मीडियाकर्मी प्रिंट से या इंटरनेट से। जाल में हैं हम नेट के। नेट खुद जाल ही है हम नेट के जाल में हैं। हम मौन नहीं मनन में हैं चिंतन में हैं विमर्श में हैं परामर्श में हैं निष्‍कर्ष में होते हुए उत्‍
 
अविनाश वाचस्पति
Jan 19 2009 10:49 PM
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भय मैनेजमेंट से बिगड़ रहा चिंतन

मनुष्य को सबसे ज्यादा डर मृत्यु से लगता है। हमारे ख्याल में मृत्यु तो आत्मा की स्वंतत्रता के लिए राह आसान बनाती है। लेकिन निरभीक मन की हर दिन होती मौत के बारे में आपका क्या ख्याल है? जब भी आप टीवी खोलेंगे, तो इंश्योरेंस कंपनी के एड आपको ख्याल दिला जा
 
प्रभात गोपाल झा
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रामखिलावन दूध में पानी क्यों मिलाता है?

भाई, मीठी जुबान से तीखी मिचॆ उड़ेल कर क्यों किसी का दिल दुखाते हो? अगर दो-चार ब्लागों का ही अखबारों में उल्लेख होता है, तो आप अपने ब्लाग को बेहतर ब्लागों के बारे में बताने का माध्यम बनायें। अखबार क्या और कितना ब्लागों के बारे में बतायेंगे। वैसे भी अख
 
प्रभात गोपाल झा
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हे देख-हे देख इ त पीछे ही......

हे देख-हे देख इ त पीछे ही पड़ गया है। कैमरा मैन से पीछा छुड़े लालू प्रसाद जी भागते चले जा रहे हैं। कैमरा मैन भी टीआरपी के लिए उनका पीछा करना अंतिम दम तक नहीं छोड़ता है। पवन द्वारा बनायी जा रही कारटून फिल्म का ट्रेलर पूरे चैनल पर छाया हुआ है। वैसे ज्य
 
प्रभात गोपाल झा
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हमें खुद को बदलना होगा

आज एक जनवरी २००९ बीत गया। कल से हम फिर उसी जिंदगी की जद्दोजहद में भिड़ जायेंगे। रोजमराॆ के कामों में लगे रहते हुए अपने चिड़चिड़ेपन को इस ब्लाग पर उतारते हुए शायद एक अनोखी लड़ाई लड़ेंगे। लेकिन क्या आपने गौर किया है, जब हम दूसरों की गलतियों को देखते है
 
प्रभात गोपाल झा
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एक किनारे ज्ञानदत्त जी, समीरजी......और दूसरे किनारे हैं महान एनोनिमस जी

कुछ दिनों पहले हमने पोस्ट डाली थी परिवारवाद का विरोध हो और एक-दो पोस्ट प्रतिक्रियावादी होकर लिखी। लेकिन उसके बाद अपने कुछ मित्रों को भी वही कहते हुए पाया, जिनके बारे में मैंने पोस्ट में जिक्र किया। उन साथियों का कहना था कि ब्लॉग जगत निंदा, कटाक्ष और
 
प्रभात गोपाल झा
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ये तो युद्ध है... जागो साथियों जागो

कल का मुंबई में आतंकी हमला आतंकवादियों के दुस्साहस की पराकाष्ठा है। हमारे फेल हो चुके सिस्टम की गवाही है। इन आतंकवादियों की हिम्मत देखिये,इन्होंने खुलेआम कहर बरपाया। आदमियों को बंधक बनाया। कल तक ये कार या स्कूटर में बम रखकर या छिपकर हमला करते थे। लेक
 
प्रभात गोपाल झा
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हिंदी ब्लागरों परिवारवाद का विरोध करो

ब्लॉग जगत को लेकर मंथन का दौर जारी है। एक पुराने वरिष्ठ ब्लागर साथी ने ब्लाग जगत में व्याप्त खेमेबाजी का विस्तार से वणॆन किया। फिर बाद में खुद को एक परिवार विशेष का बताया। लेकिन खुद को एक परिवार से जुड़े होने का बताने से ही यह साफ हो जाता है, वे खुद
 
प्रभात गोपाल झा