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कुछ शब्द

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31 May 2010
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सारे रंगों को समेटती "धूप से रूठी चांदनी"

पिछले दिनों शिवना प्रकाशन, सीहोर से प्रकाशित कवयित्री (डा.) सुधा ओम ढींगरा का काव्य-संग्रह "धूप से रूठी चांदनी" पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। "धूप से रूठी चांदनी" से सुधा जी के संवेदनशील व्यक्तित्व का पता चलता है जिसे एक तरफ़ अपनी जड़ों से दूर होने का एहसास
 
रविकांत पाण्डेय
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सीहोर का मुशायरा, हठीला जी के घर काव्य-गोष्ठी और वो टैक्सी वाला

श्री विद्या के उपासकों के बीच प्रचलित है- यत्रास्ति भोगो न च तत्र मोक्षः यत्रास्ति मोक्षो न च तत्र भोगः। श्रीसुंदरी सेवनतत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव॥ जहां भोग है, वहां मोक्ष नहीं और जहां मोक्ष है वहां भोग नहीं। लेकिन त्रिपुरसुंदरी के आराधक को भोग
 
रविकांत पाण्डेय
May 16 2010 04:53 PM
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पागल मन को संकल्पों से करता कितनी बार नियंत्रित....

इधर कुछ व्यस्त हूं, तब तक एक पुराना गीत पढ़िये और अपनी राय बताइये-पागल मन को संकल्पों से करता कितनी बार नियंत्रितजबकि तुम्हारी एक झलक ही मुझको फिर आतुर कर जातीबैठ झील के कभी किनारेछेड़ दिया जो वीणा का स्वरविश्वामित्र तपस्या भूलेभूल गये सब योग मछेंदरचितवन
 
रविकांत पाण्डेय
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तुझे मुहब्बत बुला रहा हूं....

मित्रों, नमस्कार! बहुत दिनों बाद कोई पोस्ट लिखने बैठा हूं। लीजिये आज पढ़िये एक गीत और बतायें कैसा लगा ? आप चाहें तो मेरी बेसुरी आवाज में भी सुन सकते हैं-उदास राहों में गा रहा हूंतुझे मुहब्बत बुला रहा हूंसुनो अंधेरे के हमनवाओं मैं एक दीपक जला रहा हूंवो
 
रविकांत पाण्डेय
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होली में तू चूक न मौका दो घूंट भंग चढ़ाता जा

सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें। ब्लाग-जगत में भी पिछले कुछ दिनों से होली की धूम है। गुरूदेव ने तो अपने ब्लाग पर क्या ही जबरदस्त आयोजन कर रखा है, आप भी देखें। वैसे तो गुरूजी का आदेश था कि अपने ब्लाग पर होली मुशायरे वाली हज़ल लगाकर होली मनाई जाये मगर वो
 
रविकांत पाण्डेय
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दर्द बेचने निकले हैं श्री पंकज सुबीर, कौन है जो मोल लेगा ? और सुनिये एक गज़ल-सजायें दी है मुझे उसने मुस्कुराने पर

मित्रों, आज की महफ़िल में आपका स्वागत है। आज विशेष तौर आपके लिये गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी के स्वर में उन्ही का गीत "दर्द बेचता हूं मैं" । और साथ में सुनिये मेरी एक गज़ल जिसे उदारतापूर्वक गुरूदेव ने अपनी आवाज दी है।दर्द के इस गीत के लिये दादा गोपालदास
 
रविकांत पाण्डेय
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गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं के साथ जानिये अपने भारत को इस गीत के माध्यम से

सभी देशवासियों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें। इस अवसर पर सुनिये एक पुराना गीत जिसे फ़िर से स्वर दिया है लोकगायक मनोज तिवारी ने। गीत बटोही (राहगीर) को संबोधित है और शब्द आसानी से समझ में आने योग्य हैं। अपनी राय से जरूर अवगत करायें।
 
रविकांत पाण्डेय
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वसंत पंचमी पर नमन मां शारदे को एक तोटक के साथ

आप सबको वसंत पंचमी की अशेष शुभकामनायें। वसंत पंचमी मेरे लिये इसलिये भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मैंने विद्यारंभ इसी दिन से प्रारंभ किया था। मां के चरणों में एक तोटक रखता हूं। तोटक ठीक से पढा जाये तो अत्यंत कर्णप्रिय होता है। और आपको पता ही होगा कि
 
रविकांत पाण्डेय
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अपना भारत इक झंडे के नीचे आये तो कैसे

बहुत दिनों बाद एक गज़ल आपकी नज़र कर रहा हूं। गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी ने संवारकर इसे कहने लायक बनाया है। पढ़िये और बताइये कैसी लगी ?खून-पसीना खेतों में तो जनता रोज बहाती हैलेकिन किसके हल के नीचे बोलो सीता आती हैषडयंत्रों का खेल रचाता घात लगाकर झूठ
 
रविकांत पाण्डेय
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मोबाइल कवि-सम्मेलन, प्रकाश अर्श की मुश्किलें और वेदांत दर्शन का अनोखा प्रयोग

मोबाइल कवि-सम्मेलन यही नाम मुझे सबसे उपयुक्त लग रहा है। इसलिये क्योंकि यह ऐसा आयोजन था जिसमें कवि और श्रोता दोनों ही गतिमान थे। सुबह-सुबह उठना और कहीं जाना तो वैसे ही कष्टकारी होता है, तिस पर जाड़े की सुबह छह बजे। स्नान करके तैयार हुआ और देखा तो बाहर अभी
 
रविकांत पाण्डेय
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बहुत हुई पूजा देवों की, कर दो मूर्त्ति विसर्जन आज...

स्वतंत्रता दिवस मनाने का मेरा अपना ही ढंग है। सच कहूं तो भारत के संबंध में मुझे दिनकर जी की बात याद आती है जो कहते हैं- मानचित्रों में नहीं हृदय में शेष कहीं भारत है। चाहता हूं, प्रेम के गीत लिखूं पर जब अपने भारत को देखता हूं, जब देखता हूं इसके सामाज
 
रविकांत पाण्डेय
Dec 29 2009 11:48 AM
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मुझको याद तुम्हारी आती

मित्रों, नमस्कार! करीब महीने भर बाद वापस आया हूं और संयोग ऐसा है कि एक ओर इस साल को विदाई देनी है तो दूसरी ओर नये का स्वागत भी करना है। इस अवसर पर एक गीत पढ़ें और अपनी राय से अवगत करायें- ये तो हुई पुराने की विदाई और नये के स्वागत की बात पर अगर पूरे व
 
रविकांत पाण्डेय
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वो नन्ही कली एक आई है जबसे......

मित्रों नमस्कार। पिछले २१ नवंबर, शनिवार की रात्रि में कुदरत ने हमें ऐसी खुशी से नवाजा कि घर-आंगन सदा-सदा के लिये हरा-भरा हो गया। जैसा कि आपको गुरू जी की पोस्ट से पता चल ही गया होगा हमारे घर स्वयं आदिशक्ति पधारी हैं। जल्द ही फोटो लगाता हूं, तब तक इस न
 
रविकांत पाण्डेय
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रोते को हंसा दो तो कोई बात है साहिब, हंसते को रुला देना बड़ी बात नहीं है

मित्रों नमस्कार! आज आपको एक गज़ल पढ़वाता हूं। गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी ने इसे संवारकर कहने लायक बनाया है। पढ़िये और कैसी लगी, बताइये- मर - मिटने का गर जंग में जज्बात नहीं है कदमों में तिरे जीत की सौगात नहीं है रोते को हंसा दो तो कोई बात है साहिब हंसते
 
रविकांत पाण्डेय
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गीत न लिखता तो क्या करता

मित्रों, फ़िर से हाज़िर हूं आपकी खिदमत में। पढ़िये इस गीत को और अपनी राय से अवगत कराईये- एक तुम्हारा, मधुर हास है, दूजे ये मधुमास पुनीते! तीजे ठहरी, रात चांदनी, गीत न लिखता, तो क्या करता झरें अधर से, बोल प्रेम के, जब मदमाती, पुरवाई में ऐसा लगता, कूक रही
 
रविकांत पाण्डेय
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जितने भी थे गवाह वो सारे मुकर गये....

मित्रों, आज ये मेरी पचासवीं पोस्ट हाजिर है। कच्छप -गति से चलते-चलते आपके दुआओं के सहारे यहां तक आ पहुंचा हूं। इसी कड़ी में आज पढ़िये ये गज़ल जो आदरणीय प्राण शर्मा जी के सुझावों और आशीर्वाद के बाद कहने लायक बन पाई है- कुछ बिक गये, कुछ एक जमाने से डर गये
 
रविकांत पाण्डेय
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बोलो जय सियाराम....

मित्रों, आज प्रस्तुत करता हूं-सीधे-सादे शब्दों में एक रचना। बात आप तक पहूंचे तो टिप्पणियों से सूचित करें- डोली लूट गये खुद कहार, बोलो जय सियाराम भारतमाता भई लाचार, बोलो जय सियाराम विद्यालय से कालेजों तक, करता कौन पढ़ाई डिग्री की चिंता क्या करनी, ये कल
 
रविकांत पाण्डेय
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आंसुओं में डूबकर उस पार जाना चाहता हूं.....

बहुत दिनों बाद आप सबसे मुखातिब हूं इसलिये बहुत सारी बातें भी हैं सुनाने को-कुछ, जो हुआ और कुछ, जो इस होने का अर्थ निकलता है। २० अक्तूबर के लगभग फ़ुरसतिया जी का फोन आया कि इलाहाबाद में ब्लागरों का सम्मेलन है। हमने क्षमा सहित निवेदन कर दिया कि उन्ही दिन
 
रविकांत पाण्डेय
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मुझसे कहते वही कहानी, शुभदे ! चंचल नयन तुम्हारे

आप सबको दीपावली की शुभकामनाएं। जीवन के समस्त अंधियारे दूर हों इस मंगलकामना के साथ। चलते - चलते एक छोटा गीत , बतायें कैसा बना है ? अमर -कथा थी कभी सुनाई जो शिव ने उमा के कान में मुझसे कहते वही कहानी, शुभदे ! चंचल नयन तुम्हारे रोम -रोम आभारी मेरा तुमने
 
रविकांत पाण्डेय
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जन्मदिन मुबारक हो

११ अक्टूबर १९७५ का दिन है। हवा में चंदन की खुश्बू है , उपवन में फूल झूम रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरी प्रकृति उत्सव मना रही हो। अभी - अभी एक बालक का जन्म हुआ है। घर में सभी आनंदित हैं , बधाईयों का तांता लगा है। आंगन से सोहर की आवाज आती है ( साभार :
 
रविकांत पाण्डेय
Oct 14 2009 07:46 PM
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रोजी-रोटी के चक्कर ने....

सबसे पहले तो क्ष्मा-प्रार्थी हूं, लंबी अनुपस्थिति के लिये। इस बीच यूं तो काफ़ी कुछ हुआ और मर्मांतक पीड़ा हुई गौतम जी के बारे में जानकर। हां उनकी स्थिति में अपडेट जानकर राहत भी हुआ और ऊपरवाले के प्रति श्रद्धा भी। एक अच्छी बात ये भी है कि गुरूदेव श्री पं
 
रविकांत पाण्डेय
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विष और अमृत दोनों ही हैं शामिल मेरे गीतों में

आज हिंदी-दिवस है। हिंदी-दिवस की सार्थकता लंबी-चौड़ी बयानबाजी में नहीं है इसलिये बेहतर है हिंदी में कुछ लिख-पढ़कर इसे मनाया जाये। तो आज पेश है ये गीत आपकी सेवा में, जीवन के विरोधाभासों को समेटे हुये। मैं विध्वंस और सृजन दोनों को जरूरी मानता हूं। खेत से
 
रविकांत पाण्डेय
Sep 14 2009 10:13 PM
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चली हवाएं परिवर्त्तन की....

लीजिये एक और कविता पेश है, बिना किसी खास भूमिका के। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी।नींव डोलती राजभवन कीचली हवाएं परिवर्त्तन कीसहमी छाती नील-गगन कीबेला फिर शिव के नर्त्तन कीयह इंद्रजाल अब टूटेगाबंधन से मानव छूटेगाहां, फूल नया खिलने को हैधरती, नभ से मिलने को
 
रविकांत पाण्डेय
Sep 02 2009 12:29 AM
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दो छंद पढ़िये आज की हालात पर....

नमस्कार साथियों! आज की हालात पर कुछ कहना चाह रहा था। सोचा एक लंबा लेख लिखूं लेकिन अच्छा लगा कि बात कविता के सहारे आप तक पहुंचाई जाये। तो आइये जुड़ते हैं इस घनाक्षरी दंडक से-(१)खेत-खेत फैल गये, खर-पतवार अबकितना भी काटो पर, फ़िर-फ़िर आते हैंअपना ठिकाना नहीं,
 
रविकांत पाण्डेय
Aug 26 2009 01:37 PM
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प्रेम तो हर पल नया है......

आज इस कविता को पोस्ट करते वक्त ईश्वर से प्रार्थनारत हूं कि आप तक इसका सही भाव ही संप्रेषित हो। बस भूमिका में और कुछ लिखने का मन नहीं है।सदा वही मैं गीत सुनाऊं, तुमने चाहा है मुझसेपर ये कहता सत्य सृष्टि का, प्रेम तो हर पल नया हैहर ठौर उसी का वास अगर, एक
 
रविकांत पाण्डेय
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तीन डग में वामन वो, जग को नाप जाता है...

कई दिनों बाद फ़िर आपसे मुखातिब हूं, एक गज़ल के साथ जिसे संवारकर कहने लायक बनाया है गुरूदेव पंकज सुबीर जी ने। बहर है-बहरे हजज मुसमन अशतर। इसी बहर की प्रसिद्ध गज़ल जिंदगी की राहों में रंजो-गम के मेले हैं। भीड़ है कयामत की और हम अकेले हैं॥ उस्ताद जफ़र अली की
 
रविकांत पाण्डेय
Aug 13 2009 01:29 PM
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बंधन, जो मुक्ति का एहसास दिलाते हैं

विद्रोही मन किसी भी बंधन को मानता नहीं पर बात जब रक्षाबंधन जैसे बंधनों कि हो तो सिर्फ़ इतना ही कहूंगा कि ये ऐसे बंधन हैं जो मुक्ति का एहसास दिलाते हैं। पढ़िये इस विद्रोही मन और बंधन के समागम से उपजी इस कविता को जिसे जन्म देने के क्रम में मनोगत प्रसव-पीड़ा
 
रविकांत पाण्डेय
Aug 05 2009 03:31 PM
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ख्वाब हैं मेरे कि जी उठते हैं ईसा की तरह

इसबार का सूर्य-ग्रहण जो कई मायने में अनूठा था, आया और गया। बारिश कई जगह बाधक बन गया इस अद्भुत खगोलीय घटना का अवलोकन करने में। अब संयोग देखिये कि मेरा कंप्यूटर भी ग्रहण का शिकार हो गया और अभी तक है। शायद एक -दो दिन और लगे उबरने में। अभी-अभी एक गज़ल को
 
रविकांत पाण्डेय
Jul 23 2009 02:27 PM
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यह सावन शोक नसावन है....

वर्षा के आने के साथ ही प्रकृति एक नये उल्लास से भर जाती है। वैसे तो महाकवि कालिदास " आषाढस्य प्रथम दिवसे " को वर्षा ऋतु का आरंभ मानते हैं पर ज्यादातर कवियों ने सावन को चुना है। कवि का संवेदनशील मन वर्षा देवी के आकर्षण से अछूता नहीं रह पाता। भारतेंदु
 
रविकांत पाण्डेय
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वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से

ये आप सब का स्नेह है जो मुझे निरंतर लिखने की प्रेरणा देता है। पिछले दिनों गुरूपूर्णिमा पर गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी को दो शेर समर्पित किया था। आज उस पूरी गज़ल के साथ हाज़िर हूं। और हां, एक बात और, कुछ लोगों को उत्सुकता है मेरे बारे में जानने की पर मैं
 
रविकांत पाण्डेय
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एक जागरण कविता

जब तक गज़ल पूरी होती है आइये आपको शुद्ध हिंदी में एक कविता सुनाता हूं। छंद वही है जो जयशंकर प्रसाद के " हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती" या रावणकृत "शिव-ताण्डव स्तोत्र " में है। तो लीजिए पेश है एक जागरण-कविता। डटी रहे बिना झुके, कहां गई जवा
 
रविकांत पाण्डेय
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लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं... जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से

गुरूपूर्णिमा के बारे में कुछ भी लिखना सिर्फ़ अपनी अज्ञानता प्रकट करना होगा क्योंकि लिखने बैठे तो फ़िर इतनी बातें हैं जो कभी समाप्त न हो। एक अनगढ़ पत्थर को तराश कर सुंदर मूर्त्ति में बदले की कला गुरूजन में निहित होती है। ऐसे में सिवाय कृतज्ञता के भाव के
 
रविकांत पाण्डेय
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वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

वैसे तो मैं कोई ढंग का शायर नहीं हूं , वो तो हृदय की संवेदना है जो शब्दों में उतर आती है और फ़िर गुरूजन उसे कहने लायक बना देते हैं। पढ़िये एक गज़ल जो आज ही मुकम्मल हुई है गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से। रफ़्तार के इस दौर में भूले हैं वफ़ा लोग सोचो ज
 
रविकांत पाण्डेय
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मेरा देश है महान

इधर बीच कुछ व्यस्तता है। तब तक के लिये कुछ हल्का-फ़ुल्का पेश है- नहीं कोकिला के बैन नहीं हिरणी के नैन जो चुराये चित्त-चैन वो तुम्हारी है मुस्कान कठिन महाकाल से पीड़ाओं के भूचाल से बचाए हर जाल से बस एक भगवान देखो दुनिया है गोल रखो सबका ही मोल बोलो मीठे-
 
रविकांत पाण्डेय
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जगमग दीपों के उत्सव-सा उस दिन से है जीवन सारा

कंटक-पथ से मुझे उठाकर तुमने गले लगाया जब से चंदन की भीनी खुश्बू से भींग गया है तन-मन सारा याद-सरस्वती का आना तो उर में अपने-आप हुआ था नयनों में थीं गंगा, यमुना मिलन-मंत्र का जाप हुआ था मन प्रयाग बन बैठा पावन संधि-काल की उस बेला में लगा डूबकी संगम में
 
रविकांत पाण्डेय
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नींद न टूटे जब राजा की आहों से, कोलाहल से व्याकुल होकर जनता तब महलों में आग लगाती है

चित्र गूगल से साभार) गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार एक गज़ल पेश है। पढ़ें और बतायें- इक तो टूटा छप्पर तिस पर मौसम भी बरसाती है प्यास बुझानेवाली बदली अब तो दिल दहलाती है याद तुम्हारी चिड़िया जैसी दिल मेरा है नीड़ हुआ सारा दिन गायब रहती पर शाम
 
रविकांत पाण्डेय
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मैं पूजा की थाली, का एक फूल हूं...

फोटो गूगल से साभार) श्वास की हर ऋचा है, समर्पित तुम्हे अब कहां शेष रहती, कोई साधना रूप -जल से नहाकर, नयन तृप्त हैं हो गई आज पूरी, हर इक कामना याद दीपक बनी जब, डंसा रात ने विष से मुक्ति दिलाई, सुमधुर बात ने छू दिया तुमने और, मैं सोना हुआ कि मान मेरा ब
 
रविकांत पाण्डेय
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राधा और कृष्ण के प्रश्नोत्तर में छिपी प्रेम की एक अनूठी दास्तान

जब-जब प्रेम की बात चलती है कुछ नाम जेहन में अनायास आ जाते हैं। जैसे लैला-मजनूं, शीरी-फ़रहाद, ढोला-मारू आदि। यह भी सच है कि प्रेम की ऐसी भी मिशालें रही हैं जो अपेक्षाकृत कम चर्चित रही हैं-जैसे ऊषा और अनिरुद्ध का प्यार। ऊषा, वाणासुर की लड़की थी और अनिरुद
 
रविकांत पाण्डेय
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हौले हौले जहर कोई जिस्‍म में घुलता रहा...

सुनिये एक और गज़ल। गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद के बिना इसे पूरा करना संभव नहीं था। मुश्किलों से राह की हंस कर गले मिलता रहा मैं कि था बस इक मुसाफ़िर उम्र-भर चलता रहा सत्‍य के उपदेश का व्‍यापार करते जो रहे झूठ उनके साये में ही फूलता फलता रहा दुख म
 
रविकांत पाण्डेय
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हर इक युग में यही सुकरात का अंजाम होता है...

गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से यह गज़ल कहने लायक हो पाई है। पिछले दिनों गुरूजी ने एक आक्रोश भरा पोस्ट लिखा था और बताया था कि वे मंदिर क्यों नहीं जाते । उनको समर्पित एक शेर भी शामिल है इस गज़ल में। तो पढ़िये और आशीर्वाद दीजिये- सुना है के मुहब
 
रविकांत पाण्डेय