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03 Jan 2010
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लस्सी के बहाने-१

अबे इतनी सर्दी में लस्सी पिलाकर मारने का इरादा है क्या? मैने ग़ाज़ियाबाद के पुराने बस स्टैण्ड से गुजरते हुए चिल्ला कर कहा। दुकान पर बैठे दुकानदार ने हल्की की मुस्कान फेंकी और मुझे इशारा करके अपने पास बुलाया। सड़क पार करने के दौरान देखा कि दो चार लोग मेरी
 
अरविंद चतुर्वेदी
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परिणाम सामने है अब सर धुना जा रहा है

आठ दिसम्बर की सुबह से ही टी.वी. पर नज़रें गड़ा दी थी। एक उत्सुकता थी नाश्ता बेस्वाद लग रहा था और कमोबेश स्थिति सभी की ऐसी ही थी। कुछ सुकून भी मिला चलो भूत,सेक्स और सनसनी से दूर टी.आर.पी. वाले प्रोग्राम में एक आम आदमी के हित वाला प्रोग्राम भी शामिल है
 
अरविंद चतुर्वेदी
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मै खुद मर गया हूं या मुझे मारा गया है

सड़क उस पार खड़े सिपाही पर नज़र गयी और मै आँटो से उतर कर उसकी ओर चल दिया। दिमाग़ में खुनन्स भरी हुयी थी परेशान था ज़्यादा सोचा भी नही बस सफ़ेद वर्दी धारी से जाकर कहा कि वो आ़‌टो वाला चलने से मना कर रहा है। चश्में के पीछे से झांकती अनुभवी आँखों ने मेर
 
अरविंद चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:59 AM
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कागद लेखी या आँखन देखी

दिनों से सिलसिला हफ्तो में बदल गया पता ही नही चला। धीरे-धीरे खुराक बनने लगी और आज दो महीने गुजर गए हैं। रोज़ रात को फिल्म देखने की आदत हो गई हैं। कल रात भी क्या गुजरी है एक फिल्म के साथ। "धर्म" ये फिल्म का नाम है.....गंगा का घाट और उगते सूर्य के साथ
 
अरविंद चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:59 AM
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नैनो का सपना

रतन टाटा उड़ते हवा में हैं। ऍफ़- 16 फाएटर प्लेन खुद ही उडाने की काबलियत रखते हैं। अब इन्होने आम आदमी को भी उड़ने का ख्वाब दिखाया हैं। ख्वाब दिखाना कोई बुरी बात नही हैं। आख़िर इसी पर तो सभी की दुकानदारी टिकी है। सौदागरों की तो अब बात ही क्या ? सभी अपनी
 
अरविंद चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:59 AM
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काश बंदूक होती....

मुझे झगडा करना चाहिऐ था। दो-चार गाली भी देने की जो तमन्ना थी,वो भी दब के रह गई। मुझे याद हैं उस दिन मैं ऑफिस से घर वापस जा रहा था। साथ में भैया भी थे। ये उस दिन का सुखद संयोग ही था। आजकल संयोग भी बड़ी मुश्किल से होते हैं। नही.........होते नही बनाए जात
 
अरविंद चतुर्वेदी
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देखो दर्द का डिस्को

लो आज नया साल भी आ गया। इस शुभ मौक़े पर सबसे सुकून फ़ोन को मिली है। मोबाइल फ़ोन ने राहत की साँस ली है, इधर दो तीन दिनों से काफी बिजी था। बेचारा अपने दर्द का इजहार भी नही कर सकता था। दर्द किसे और किस किस को हुआ ये जानने की फुरसत किसी को नही मुझे भी नह
 
अरविंद चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:59 AM
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हम भारत के लोग

हम आम आदमी है। हमारे हाथों में अधिकार है।हम सरकार चुन सकते हैं। वोट दे सकते हैं। इसके बाद हम कुछ नही कर सकते। पांच साल चुप-चाप खामोश देखते देखते बीत जाते हैं। मजदूर मजबूर हो जाता हैं। आम जन भारी भरकम ताम झाम के बीच झुझता हुआ आजाद भारत को तलाश करता है
 
अरविंद चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:59 AM
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बाबा भारती का विश्वास मैने तोड़ा है

अब मै चौराहे पर भीख मांगने वालों का करूँ क्या? बुरा देखने पर बुरा ही दिखता है। अच्छाई भी दब के रह जाती है। एक बार काफी साल पहले मै अपनी दोस्त के साथ आटो से आ रहा था, एक लड़की फूल बेचने आयी। गुलाब के फूल का गुच्छा दस रू का दे रही थी। हम अपनी बातों में
 
अरविंद चतुर्वेदी
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दादा का जाना

सचिन सत्रह हज़ारी बन गऐ। भारत मैच हार गया। साथ ही दुख भरी ख़बर ये कि सचिन के दीवाने और मीडिया के पितामह प्रभाष जोशी जी नही रहे। मै रात मैच के दौरान कह रहा था कि देखना कल सुबह का जनसत्ता। प्रभाष लिटिल मास्टर के बारे में क्या कुछ लिखते हैं। मैच देखने क
 
अरविंद चतुर्वेदी