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31 Dec 2009
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क्षमा चाहता हूं

क्षमा चाहता हूं, ब्लॉग मित्रों से। काफी लंबे अरसे तक मैं ब्लॉग पर नहीं था, इसका मुझे अफसोस है। इस दौरान मैं आपकी अच्छी रचनाओं और विचारों से वंचित रहा। इधर आपको यह जानकर प्रसन्नता भी होगी कि मैं एक राष्ट्रीय स्तर की एक हिन्दी मासिक पत्रिका का प्रकाशन
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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उल्लुओं का ठाठ

दीपावली आ गई है। पिछले वर्ष भी आई थी। न जाने कितने वर्षों से आ रही है। दीपावली आने का समय होता है तो कई दिनों पहले से ही खुसर-फुसर शुरू हो जाती है। माहौल से लगने लगता है कि दीपावली बस अब निकट ही है। लक्ष्मी के स्वागत के लिए लोग तैयार होने लगते हैं। ह
 
श्रीकांत पाराशर
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केवल रस्म अदायगी न हो

दीपावली पर्व हर वर्ष आता है और चला जाता है परन्तु यह हमारे दिलों पर कितना और कैसा प्रभाव छोड़ पाता है, यह एक विचारणी प्रश्न है। बुराई पर भलाई, असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म एवं अंधकार पर प्रकाश की विजय के इस पर्व के प्रति आम आदमी, जिसे भारत का बहुसंख्
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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... दौड़ जारी है

प्रतिस्पध्र्दा का जमाना है। धीरे-धीरे चलने से काम नहीं चल सकता। धीरे चलने मेें दूसरों से पिछड़ जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है। इसलिए धीरे कौन चलना चाहेगा? बात भी सही है। इसलिए हर कोई जल्दबाजी में है। इतनी जल्दबाजी में, कि सोच भी नहीं पा रहे कि क्या
 
श्रीकांत पाराशर
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संकीर्ण सोच

आदमी भी अद्भुत जीव है। प्रभु ने इतनी विशाल सृष्टि की और एक प्रमुख काम किया कि मनुष्यों में वैचारिक भिन्नता के बीज बो दिए। बस, इसके बाद बाकी काम अपने आप हो गए। अपने चारों ओर देखिए, जो भी विसंगतियां दिखाई देंगी वे सब मनुष्य जाति में वैचारिक भिन्नता के
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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सम्मोहन का सेतु

वीणा के तार यदि ढीले हो जाएं तो उससे कैसे स्वर निकलेंगे, यह कोई भी समझ सकता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य के जीवन को सुन्दर स्वर देने वाले सम्मोहन के तारों को ढीला छोड दिया जाए तो उसके जीवन संगीत की भी वही दशा होनी है जो ढीले तारों वाली वीणा से निकले संग
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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नासमझ लोग

मैंने कभी एक दृष्टांत सुना था या कहीं पढ़ा था, उसी से बात प्रारंभ करना चाहूंगा। अमेरिका का कोई नामी व्यक्ति थालॉरेंस। वह था तो अमेरिकी परन्तु रहा हमेशा अरब देश में। उसे मरुस्थल अच्छे लगते थे। वह अरब के लोगों से इतना घुल मिल गया कि सब कुछ, यानी कि दुख
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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.........जो अपनी औकात है

हिम्मत किसी में है तो रोक के दिखाए मुझे, मैं हूं अकेला नहीं, दोस्तों का साथ है। मारने वाले से बड़ा , बचाने वाला होता सदा , अपने तो ऊपर फिर, ऊपर वाले का हाथ है। हौसला जो रखे ऐसा, उनको न रोके कोई, दिखने में छोटी दिखे, लाखों की यह बात है, पीठ पीछे रोना
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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शाम ही ढल गई

इसकी टोपी उसके सिर, उसकी इसके सिर, ऐसे ही तो करते उनकी, जिंदगी निकल गई। दिन-रात दोस्तों को बेवकूफ बनाते रहे, लक्ष्मी तो आई मगर, नीयत फिसल गई। ऐसे लोगों का भला, आप क्या कीजिएगा, बुध्दि भी आई तो, साइड से निकल गई। दिनभर समझाते रहे, मित्र दिन का महत्व, स
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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कवि सम्मेलन में पढ़ी कविता

गत रविवार को सिध्दार्थ सांस्कृतिक परिषद ने बेंगलूर के आरटी नगर में एक कवि सम्मेलन आयोजित किया था। यह संस्था बिहार से बेंगलूर आकर बसे प्रवासी बिहारियों की है। इस कवि सम्मेलन में मैंने एक कविता पढ़ी कोसी का कहर किसको पता था, कोसी ऐसा कहर ढाएगी, इंसान तो
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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नंगे का डर

राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में एक कहावत काफी प्रचलित है 'नागो जाणै म्हारै सूं डरै, शरमां मरतो घर मं बड़ै'। यहां नागो शब्द का मतलब बदमाश भी होता है तथा नंगे को भी मारवाड़ी भाषा में नागा कहा जाता है। यहां दोनों को समकक्ष बताया गया है। जब नंगा व्यक्ति अथ
 
श्रीकांत पाराशर
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दूसरों की योग्यता को स्वीकारना

सभी लोग एक जैसे नहीं होते। भिन्नताएं होना स्वाभाविक है। भिन्नताएं भी तरह-तरह की हो सकती हैं, अलग-अलग क्षेत्र में हो सकती हैं। एक व्यक्ति दूसरे से भिन्न दिखाई देता है क्योंकि दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं। ऐसा भी नहीं है कि जिन्हें हम तथाकथित
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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कौन छोटा, कौन बड़ा?

कौ न छोटा और कौन बड़ा? यह तय करना आसान नहीं है और आसान हो भी कैसे? इसमें झंझट यह होता है, इसका निर्णय कौन करे कि छोटा कौन है, बड़ा कौन है? पहली बात तो यह है कि इस निर्णय का अधिकार हमें दूसरों को देना होगा। सामान्यत: लोग दूसरों को अधिकार ही नहीं देते
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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मर रही हैं संवेदनाएं

बहुत से लोग अपने वृध्द माता-पिता, दादा-दादी को पुराने फर्नीचर की तरह समझने लगे हैं। दिल्ली की एक घटना से अपनी बात शुरु करता हूं। एक बूढ़ी मां को दिल्ली के एक गुरुद्वारे में इसलिए शरण लेनी पड़ी क्योंकि उस बूढ़ी मां को उसके अपने बेटे ने जंगल में छोड़ दिया।
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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मेरा नया ब्लॉग है यह

साथियों, यह मेरा नया ब्लॉग है। वैसे इस ब्लॉग दुनिया में मैं ज्यादा पुराना नहीं हूं। कुछ समय पूर्व ही मैंने आपके बीच 'दक्षिण भारत' शीर्षक से प्रवेश किया है। 'दक्षिण भारत राष्ट्रमत' नामक बारह पृष्ठीय हिन्दी अखबार बेंगलूर से पिछले तीन वर्षों से हम निकाल
 
श्रीकांत पाराशर
Dec 29 2009 11:56 AM
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नेकी कर, कुएं में डाल

साधु संतों ने एक मार्के की बात कही है कि "नेकी कर, कुएं में डाल'। यानी कि किसी का कोई उपकार करो तो करके भूल जाओ। किसी की भलाई करके उसे भूल जाने में ही भलाई है क्योंकि उपकार करने के बाद याद रखने का मतलब है कि आपके मन में उसके बदले कुछ प्राप्त करने की
 
श्रीकांत पाराशर
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मतलब निकल गया तो....

किसी सिनेमा के गीत की ये पंक्तियां देखें- "मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, यूं जा रहे हैं, जैसे हमें जानते नहीं।' यह तो अब याद नहीं है कि यह किस फिल्म के गीत की पंक्ति है परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि गीतकार ने यथार्थ को इतनी सहजता से शब्दों में पिरो
 
श्रीकांत पाराशर
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ऐसी भी क्या आशा?

व्यक्ति को आशावादी तो होना ही चाहिए क्योंकि निराशाओं में डूबा व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता। उसकी तो हर गतिविधि थम जाती है, जीवन भी ठहर सा जाता है क्योंकि हर पल, हर क्षण, हर क्रिया में उसे निराशा दिखाई देती है। निराशाओं से घिरा ऐसा मानव पुतला न स्वयं स
 
श्रीकांत पाराशर
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बनावटी चेहरे

यहां हर कोई बनावटी चेहरे लिए घूम रहा है। सबके चेहरों पर मुखौटे हैं। व्यक्ति बाहर से दिखता है, वैसा अंदर है नहीं। जैसा वह अंदर है, बाहर वैसा दिखना नहीं चाहता। चेहरों की मानो मंडी लगी हुई है। चेहरों के इस बाजार में आदमी खोजना मुश्किल है। आजकल बस आकृतिय
 
श्रीकांत पाराशर
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नकारात्मक मन

नकारात्मक मन। यानी, नेगेटिव माइन्ड। हम नकारात्मक मन लिए घूमते रहते हैं। यह नहीं समझ पाते कि यह नेगेटिव माइन्ड हमें बहुत सी परेशानियों में डालने वाला है। जो हमारा हितैषी होता है, उसे हम दुश्मन समझे बैठे होते हैं क्योंकि हमारा माइंड नेगेटिव सोचता है, उ
 
श्रीकांत पाराशर
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आप अगर जुड़ना चाहें

बेंगलूर से 'भारतीय ओपिनियन' नामक हिन्दी पत्रिका प्रकाशित होने जा रही है। इस पत्रिका के लिए हम ऐसी सामग्री आमंत्रित करते हैं - 1. आपके शहर या कस्बे में कोई ऐतिहासिक, पौराणिक महत्व की इमारत हो जिसके बारे में देशभर के लोग जानें तो उन्हें अच्छा लगे। 2. क
 
श्रीकांत पाराशर
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टर्निंग पॉइंट

हमारे जेहन में एक बार भी गहराई तक यह बात बैठ जाए कि ईश्वर ने हमें जो यह अमूल्य जीवन दिया है उसको भरपूर आनन्द के साथ जीना चाहिए तथा यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि इस धरती पर हम अमर हो गए हैं, तो शायद हमारी सोच में अनूठा बदलाव आ सकता है और जीवन की धारा बदल
 
श्रीकांत पाराशर
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पत्रकार मित्रों से निवेदन

अपने पत्रकार मित्रों से एक खास सहयोग की अपेक्षा करता हूं। मैं चाहता हूं कि आप हमारे लिए कोई ऐसा अनुभवी पत्रकार साथी ढूंढकर दें जिसे राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में काम का अनुभव हो, जो यह जानता हो कि कैसी सामग्री ऐसी पत्रिका में होनी चाहिए, जिसे संपादन का
 
श्रीकांत पाराशर