Hamzabaan हमज़बान's Image

Hamzabaan हमज़बान

http://hamzabaan.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
09 Jun 2010
कुल प्रविष्टियां
40
पाठक भेजे
1119
पसंद
28
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
27.98
पसंद करें
2
नापसंद करें

लखनऊ का सृजन

रंजना दीन की क़लम से तुम्हारी और मेरी व्यस्तताओं के बीचतुम्हारी और मेरी व्यस्तताओं के बीचन जाने कितने ऐसे पल आयेजब भीड़ में होते हुए भीदिखे सिर्फ तुम हीसुना सिर्फ तुमकोतुम्हारी और मेरी व्यस्तताओं के बीचहमें याद रहा कि लंच टाइम हो गयातुमने खाना खाया होगा
 
शहरोज़
टैग: कविता
पसंद करें
0
नापसंद करें

मसल,मनी,मीडिया,मोदी और मुसलमान

  गुन्जेश की क़लम से नरेन्द्र मोदी से रविवार 29 मार्च को दो बैठकों में 9 घंटे पूछताछ हुई. उनसे मैराथन बातचीत  कर यह पता लगाने का प्रयास किया गया होगा कि 2002 के दंगों, खास तौर से उस घटना, जिसमें गुलबर्ग सोसायटी में रहने वाले सांसद
 
शहरोज़
पसंद करें
-3
नापसंद करें

बस्तर में भगवा जुडूम

नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों और दलितों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने के लिए सरकार ने कमर कस ली है और इसके लिए बजाप्ता सेना की मदद ली जा रही है.इसे ग्रीन हंट नाम दिया गया है.अंग्रेज़ी की एक लेखिका और इधर एक्टिविस्ट के नाते ज़्यादा चर्चित अरुंधती राय की एक
 
शहरोज़
पसंद करें
1
नापसंद करें

एक दंगे को याद करते हुए

इन दिनों भारत का ह्रदय प्रदेश कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में दंगों का मौसम है.लहलहाता हुआ! जब भी ऐसी ख़बरें आती हैं रूह लरज़ जाती है, जिस्म कांपने लगता है.कि  उर्दू के कहानीकार ज़की अनवर का चेहरा सामने आ जाता है, जिन्हें जमशेदपुर के फसाद में उन्हीं
 
शहरोज़
पसंद करें
1
नापसंद करें

इंजिनियर बनाता मदरसा रहमानी

मुझको जाना है अभी ऊंचा हदे परवाज़ से यानी इक़बाल के इस मिसरे को मदरसे के प्रबंधकों ने भी अमली-पैराहन पहनाने की कोशिश तेज़ कर दी है.कल तक जो मदरसे खुद को धार्मिक शिक्षा-दीक्षा तक सीमित रखे हुए थे.उन्होंने अब अपने विद्यार्थियों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की
 
शहरोज़
टैग: मदरसा
पसंद करें
2
नापसंद करें

मुस्लिम औरत:देहलीज़ से सियासत तक

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से सदियों की गुलामी और दमन का शिकार रही भारतीय नारी अब नई चुनौतियों का सामना करने को तैयार है। इसकी एक बानगी अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में बसे अति पिछड़े मेवात ज़िले के गांव नीमखेडा में देखी जा सकती है। यहां की पूरी पंचायत पर महिलाओं
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

पगडंडी वापस नहीं लौटती

 ख़ालिद ए ख़ान की क़लम से पहले की  तरह धुंधली आँखों से बस देखती रहती है गाँव की सीमा से लगती बडी सड़क की ओर  अब   पगडंडी वापस नहीं लौटतीचौपाल में फैला हुआ है मरघट सा सन्नाटा शाम को बैठे रहते है कुछ पुरनिया हुक्के के साथ अपनी
 
शहरोज़
टैग: कविता
Mar 04 2010 12:15 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

देसी तालिबानियों को बिदेसी मदद

विश्व मुकम्मल तौर पर आज दो खेमे में बँट चुका है.तीसरा खेमा है तो ज़रूर, लेकिन उल्लेखनीय नहीं.पहले साम्यवाद और साम्राज्यवाद  ...लेकिन रूस जैसे संघ के विभाजन के बाद लोगों का सारा ध्यान इस्लामी मुल्कों की तरफ गया.आखिर क्या कारण है कि साम्राजवादी
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

स्विस बैंक में बंद रक्तक्रांति

  आवेश की कलम से माओवादी लीडरों  के अरबों  रूपए स्विस बैंक में जमा  पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ के लालबाग तक रक्तक्रांति की बदौलत सामाजिक क्रांति का दावा करनेवाले नक्सली संगठनों का एक नया चेहरा सामने आया है ,
 
शहरोज़
Feb 23 2010 04:19 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

रंगों के संग प्रीत

जब दिल और दिमाग के खूबसूरत संयोजन रंगों से बतियाते हैं तो एक ऐसे संसार का सृजन होता जहां चित्र महज़ मनोरंजन का नाम नहीं होता कुछ सोच-विचार की भी मांग करता है.ऐसी दुनिया रचती हैं सूरत की प्रीती मेहता.मैं और कुछ न कहूँगा.एक चित्र ही हज़ारों शब्द कहता है..आप
 
शहरोज़
टैग: कविता
Feb 23 2010 03:45 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

स्खलित होता समाज -- अपने ही हाथों में

गुन्जेश की कवितायें  (1)ज्ञान, शांति, मैत्री हमारे दौर के सबसे प्रतिष्ठित शब्द हैं........इतने प्रतिष्ठित शब्द किये हमें प्रतिष्ठित कर सकते थे!!थे?हाँ, थे!!!!!!!ज्ञान अब --तथ्य है,शांति     --प्रतिबन्धमैत्री   
 
शहरोज़
टैग: कविता
Feb 23 2010 03:44 PM
पसंद करें
6
नापसंद करें

मुंबई की जान हैं ये कामवाली बाइयाँ

ज़रा हटके ज़रा बचके ....ये हैं मुंबई मेरी जान ! .यह गीत अक्सर इस महानगर के सन्दर्भ में लिया जाता है.भाई ! बात ही निराली है. जितना चमकता-दमकता है उतना ही गहरे अन्धकार में भी कुछ ज़िन्दगी यहाँ सिसकती है.गणपर्व के समय यूँ दुखियारों की बात!! लेकिन क्या
 
शहरोज़
पसंद करें
2
नापसंद करें

लन्दन में लड़की

एक अकेली एक शहर में आशियाना ढूंढती है, आबूदाना ढूंढती है!!उसे भी बच्चों की किलकारी और कोयल की कूक भली लगती है.उसके पास ठाठे मारता अल्हड बांकपन है! आम इंसान का दिल है. भले ग़म का हुजूम हो लेकिन खुशियों की लज्ज़तें  उसे भी चाहिए, आखिर क्यों नहीं!
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

रश्मि प्रभा की कविता और उनका संसार

रश्मि प्रभा.! यानी हम जैसे अधिकाँश ब्लागरों  की दीदी.शायद ही कोई होगा जो इनकी काव्य-रश्मियों से अलक्षित रहा हो....प्रभा .यह  की सुमित्रा नंदन पन्त जैसे शिखर-आचार्य कवि ने न केवल आपका नामकरण किया अपितु  "सुन्दर जीवन का क्रम रे,
 
शहरोज़
पसंद करें
4
नापसंद करें

दाढ़ी? तुम आतंकवादी हो सकते हो!!!

बहनो! ड्रेस कोड की तलवार महज़ आप पर ही नहीं लटकती , भाई की नौकरी तक चली जाती है। तुमने दाढ़ी क्यों रखी ? वामपंथी कहे जानेवाले कई कवि , पत्रकार , कथाकार और संपादक साथियों के इस सवाल से मुझे भी कई बार कोफ़्त हुई है। वरिष्ठ सहकर्मियों ने बार-बार सताया है औ
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

देशभक्तों ज़रा इधर भी देखो!

चाँद की फ़िज़ा में खुशबू किसी एक मुसलमान के आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने पर पानी पीपी कर सारे मुसलामानों को आतंकवादी बताने वाले देशभक्तों क्या आपने कभी ऐसे लोगों पर भी नज़र-ऐ-इनायत की है। पाठको, सम्भव है किसी भी खबरिया ने अमरोहा की खुशबू मिर्ज़ा पर
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:49 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अब पत्रकार निशाने पर

अभी हम सब लगातार हुए बम-विस्फोटों की तबाहियों और मासूमों की असामयिक मौत से पूरी तरह उबर भी नहीं पाये थे कि कंधमाल और कर्णाटक में दहशतगर्दों(जिन्हें पुलिस और मीडिया उग्र भीड़ कहती हैजबकि अरविन्द शेष जैसा प्रबुद्ध तबका कुछ और )के तांडव से रूबरू हुए.कंध
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:49 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अब फिर दिल्ली...हाय-हाय मुजाहिदीन!

तुम कुछ भी हो मुसलमान नहीं हो सकते!!! घर पर टीवी नही रखता .ये मुझे दस सालों से हम आम लोगों को बेवकूफ समझता है, साथ ही साथ हमारी भावनाओं और विश्वास के साथ भी समय-समय पर खिलवाड़ करता रहता है.विशेष कर समाचार चैनल। इन्हें सिर्फ़ रहस्य चाहिए, रोमांच और से
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:49 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

आर एस एस बनाम भाजपा की राष्ट्रीयता

खुली बहस की मांग करते सवाल _________________________________________________ लेखक का परिचय : पेशे से पत्रकार।करीब 6 साल तक दैनिक जागरण (पटना) में बतौर संवाददाता रह चुके युवा पत्रकार राकेश पाठक का जन्म मगध अंचल , बिहार के रानीगंज हल्क़े में 01 मार्च 19
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

पानी में डूबा बिहार

अल्प समय में ही साहित्यिक गलियारों में अपना मक़ाम बना चुकी पत्रिका बया के संपादक और कथाकार-मित्र गौरीनाथ अभी -अभी बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों से लौटे हैं.उनकी रुदाद सिर्फ़ मार्मिक ही नहीं बल्कि सियासतदानों की कलई खोल देती है.वो आक्रोश में कहते हैं क
 
शहरोज़
टैग: आपदा
पसंद करें
0
नापसंद करें

पोंडिचेरी के भवानी सिंह चारण की नज़्म

जिस भाव-भंगिमा और तेवर के साथ यह युवा कवि-शायर शायरी कर रहा है.इस उम्र की दीवानगी उसे ज़रूर मंज़िल- मुक़ाम तक ले जायेगी.कुछ उस्ताद बहार-मात्रा की मीनमेख निकाल सकते हैं.लेकिन शुरूआती वक्त है, सो इसे नज़र अंदाज़ किया जाना चाहिए। आज़ादी के उत्सव के वक्त इस
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

झूठ का कमाल ! वाह! भाई वाह!

युवा पत्रकार हैं आशीष कुमार 'अंशु' , जनाब में गज़ब का नज़रिया है.उनके ब्लॉग पर ऐसी खबरें और संघर्ष से आपका साबका होगा , जहाँ धूप, धूप-सी और अन्धकार बिल्कुल घुप!! उनके ब्लॉग से साभार इस ख़बर से आप भी परिचित हों सो मैं रशीद भाई को यहाँ ले आया. - सं. __
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:49 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

विकलांगता का अभिशाप झेलते आदिवासी

अभी जल और जीने की अन्य अत्यन्त मूलभूत चीज़ें भी जिस मुल्क के लोगों को मयस्सर नहीं वहां करोड़ों की लागत से परमाणु बिजली का ओचित्य समझ से परे ही है। और आप जानते हैं। -इस हालिया करार से महज़ ५-७ फीसदी ही बिजली मुहय्या हो पायेगी । -अम्रीका की दो कंपनियों
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

ख़तरे में इस्लाम नहीं

आजकल कुछ ब्लॉग पर मुस्लिम रचनाकारों पर साम्प्रदायिक होने के आरोप -प्रत्यारोप ज़ोर-शोर से पढनेको मिले. दोस्तों-दुश्मनों के गलयारे में भी गाहे-बगाहे समय-समय पर ऐसे इल्जामों का सामना मुस्लिम लेखक-कवि अक्सर करते रहे हैं। मुस्लिम लेखक-कवियों पर एक आरोप ये
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

प्रज्ञा राठौर की कहानी

नए लिखने वाले कथाकारों में मुझे प्रज्ञा ने प्रभावित किया .ये वे लोग हैं जो कहानी के वर्तमान-परिदृश्य से लगभग अनजान हैं।लेकिन इनमें भरपूर संभावनाएं हैं.सोचने-विचारने और कहने का इनका एक अपना अंदाज़ है। प्रज्ञा का आभार कि हमारे आग्रह का उन्होंने मान रखा
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:49 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कविता:अरविन्द व्यास प्यास

क्या कहते हैं अपने बारे में अरविन्द व्यास नाम है, प्यास तख़ल्लुस है । 1979 में M.Tech . किया था भोपाल M.A.C.T से । कल्यान महाराष्ट्र में जन्मा हूँ , मथुरा , राजस्थान से, वांशीक सम्बन्ध हैं , साहित्यकार नहीं हूँ, पर गुरू कबीरा देते हैं , वही लोगो तक प
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:49 AM
पसंद करें
5
नापसंद करें

सलीम खान का नारी-विमर्श

सिक्के का  एक पहलू  बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका
 
शहरोज़
पसंद करें
3
नापसंद करें

आदमी को खा गयी औरत

ज़िन्दगी में आ गयी औरत आदमी को खा गयी औरत कौन है माँ-बाप.. भूले सब इस तरह से छा गयी औरत आदमी कमज़ोर है कितना हां पता यह पा गयी औरत चाह कर वो छूट न पाया आ गयी फिर ना गयी औरत रूप की ताकत समझती है. बस यहीं उलझा गयी औरत एक दिन जादू उतरता है बन गयी अब माँ
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान

माँ जैसा सुंदर और महत्वपूर्ण शब्द आज तक न हुआ. किसी फिल्म का संवाद मेरे पास माँ है! सब कुछ कह जाता है.यूँ तो इस विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है और लिखा जाता रहेगा.लेकिन कवि कुलवंत सिंह की ये छंदबद्ध रचना अपनी बनावट और शिल्प में ध्यान अवश्य खींचती है.उन्
 
शहरोज़
पसंद करें
5
नापसंद करें

खून से लिखा हुआ भी बे-असर होता है अब

आजकल सलीम खान नामक सज्जन से ढेरों लोग नाराज़ हैं!! भाई अविनाश ने तो महल्ला से ही उन्हें खारिज कर दिया! लेकिन उनका दर्द क्या है। एक शे'र ज़ेहन में उतर ता है: तुमको मालूम नहीं है दिल को दुखाने वाले यह जो मज़लूम हैं आहों में असर रखते हैं ! उनकी एक मेल मिल
 
शहरोज़
टैग: बहस
पसंद करें
6
नापसंद करें

'लव जिहाद' कट्टर दिमाग की उपज

काफी दिनों से मैं अंतरजाल से दूर रहा . इन दिनों पुरानी मेल्स देख रहा हूँ । यहाँ मुझे बिहार अंजुमन नामक एक ग्रुप की मेल मिल गई . पेशे से पत्रकार और सशक्त हिन्दी कवि संजय कुंदन की इस रपट को आप लोगों के सामने लाना ज़रूरी इसलिए कि क्या ऐसा भी मुमकिन है !
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

ज़िन्दगी मौत न बन जाय संभालो यारो

शहर की बोलती इबारत _______________ फ़िल्म जागो के बहाने मध्य- बिहार माओवादियों की हिंसक वारदातों के कारण हमेशा चर्चा में रहता है . शेरशाह सूरी मार्ग,जिसे अब एन.एच-2 कहा जाता है पर स्थित है मध्य -बिहार का प्राचीन शहर शेरघाटी .वैदिक काल में भी इसका ज़िक
 
शहरोज़
पसंद करें
1
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें

जागो-2

जागो-2
 
शहरोज़
टैग: film
पसंद करें
0
नापसंद करें

जागो-3

जागो-3
 
शहरोज़
टैग: film
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
1
नापसंद करें

गुन्जेश के मार्फ़त छाले की कथा.......

बीसवीं सदी की कहानियों का कई खंडों में संचयन करने के कारण चर्चित हुए, महेश दर्पण बहुत ही सुघड़ कथाकार भी हैं.गुन्जेश की कहानी पढ़ते हुए मुझे अनायास ही उनकी याद आ गयी.उनके कथा-तत्त्व भी कुछ इसी तरह के होते हैं.बिलकुल जाने हुए.लेकिन क्या ये कहानी भी हो
 
शहरोज़
पसंद करें
0
नापसंद करें

कविता को लेकर फिरदौस भूल जाना चाहता है सुधांशु को.......

कविता का नया प्रेमी : सुधांशु फ़िरदौस ________________________________________________ कभी आपने कैलाश वाजपई की कविताओं को पढ़ा है.रहीम, खुसरो , जायसी और नानक के दोहों के साथ उतरे-डूबे हैं.यदि ऐसी पृष्ठ भूमि में मुक्तिबोध और निराला के दिग्दर्शन हो जाएँ
 
शहरोज़
पसंद करें
1
नापसंद करें

ख़बर का असर

भड़ास! नाम का एक ब्लॉग है और काफ़ी चर्चित भी.जिस किसी ने ये नाम रक्खा है कितना मौजूं है.दरअसल हम सब यहाँ अपनी-अपनी भड़ास ही तो निकालते हैं.जब कोई मंच न रह गया हो और अधिकाँश पत्र-पत्रिकाएं और चैनलों की रहबरी बाज़ार करे तो ये गूगेल महाराज की कृपा से ब्लॉग
 
शहरोज़