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स्वप्नलोक

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15 May 2010
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बचपन करे कठिन मजदूरी

बचपन करे कठिन मजदूरीहमने करी तरक्की काफीलेकिन अभी अधूरीबचपन करे कठिन मजदूरीनंगे पैर घूमता दिनभरपालीथिन भी उठा उठाकरहों न जरूरत पूरीबचपन करे कठिन मजदूरीरातों में देर तक जागताप्लेटफार्म पर बोल भागता"लो पेठा अंगूरी"बचपन करे कठिन मजदूरीरोज चाय के गिलास
 
विवेक सिंह
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आल्हा ए आईपीएल

आई पी एल तीसरी पारी धूमधाम से हुइ आगाज़ ।आकर्षण कुछ कहा न जाए, मंत्री चले छोड़कर राज ॥खिलाड़ियों की पैंठ लगाकर मोलभाव की हुई शुरुआत ।जिस कम्पनी पै जैसा पैसा लिए खिलाड़ी वैसे साथ ॥पाकिस्तानी नहीं बिक सके पूरा हुआ पैंठ व्यापार । अफ़रीदी यह पचा न पावै खूब मचाई
 
विवेक सिंह
Apr 25 2010 08:37 AM
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गबन की राशि लौटाने को कोषाध्यक्ष के नाम खुला पत्र

आदरणीय कोषाध्यक्ष जी ! आपकी तरक्की पर आपको बहुत-बहुत बधाई । यह अलग बात है कि यह बधाई मेरे हृदय की गहराई से नहीं निकल रही है । हृदय में तो प्रतिशोध की भावना ने उपनिवेश स्थापित कर लिया है ।  लेकिन फिर भी एक सभ्य नागरिक होने के नाते तरक्की पर बधाई
 
विवेक सिंह
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ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के

कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥कुछ ने दुनिया बुरी बताई, रोते रह गए ।कुछ ईश्वर की रचना को, 'अतिसुन्दर' कह गए ॥लेकिन कुछ ने देखा इसको, आँखें फाड़ के ।ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥कुछ की शादी ना हो पायी, कुआँरे
 
विवेक सिंह
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कब तक यह सिलसिला चलेगा

शाम ढले आ बैठा घर में,अतिथि एक अनजाना ।मुस्काया वह बता स्वयं को,मेरा मित्र पुराना ॥बोला, "यूँ क्यों घूर रहे हो,क्या अब तक हो रूठे ?बात-बात पर गाल फुलाते,तुम हो बड़े अनूठे ॥ बड़े दिनों से चाह रहा था,तुमसे मिलने आना ।मौसम अब अनुकूल हो गया,मैंने कल ही
 
विवेक सिंह
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मच्छी में काँटा

गरमी का मौसम है । पारा थर्मामीटर को फाड़कर निकल जाने की फ़िराक में है । डाक्टर लोगों का कहना है कि गरमी से बचकर रहें । कहीं ऐसा न हो कि बाद में दवा खानी पड़े या सुई लगवानी पड़े ।सुई चुभती है । सुई लगने का अपना अलग ही डर होता है । बच्चों को सबसे ज्यादा डर सुई
 
विवेक सिंह
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कोंपल की करुण कहानी

शाखा में छिप सर्दी काटी,लम्बा समय बिताया ।कोंपल ने जब बाहर देखा,उसका मन हरषाया ॥जाड़ा मिला नदारद उसको,बसन्त का मौसम था ।दिन में कुछ गरमाया सा था,रातों को कुछ नम था ॥अवसर यह अनुकूल जान,उसने बाहर आने का ।किया पैक सामान सभी,इस दुनिया में लाने का ॥परमीशन पेढ़
 
विवेक सिंह
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यह सब तो होता रहता है

त्राहि माम् की आवाजों से ।और कालिया की आहों से ॥गूँज गया सब कोना कोना ।गब्बर ने सुन रोना-धोना ॥समझा सब माज़रा सहज ही ।मँगा  कालिया का कागज़ भी ॥उसको साँबा से बुलवाया ।बड़े प्यार से यूँ समझाया ॥"ये सब तो होता रहता है ।कहने दो कोई कहता है ॥अपना काम रखो
 
विवेक सिंह
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उठा दो ठेका

 अभी हाल ही में सम्पन्न हाई-स्कूल की परीक्षाओं में हिन्दी विषय में 'ठेकेदारी प्रथा' पर निबंध लिखने को कहा गया । एक परीक्षार्थी ने निबंध तो लिख लिया किन्तु बाकी प्रश्नों के उत्तर न लिख सका । लिहाज़ा उत्तर-पुस्तिका लेकर भाग निकला । हड़कम्प मच गया । कई
 
विवेक सिंह
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कम परिश्रम से अधिक पुण्य कैसे कमाएं

हम बहुधा लोगों को पाप और पुण्य की चर्चा करते देखते हैं । सच कहें तो इनमें से किसी की कोई सर्वमान्य परिभाषा हमने न सुनी, न पढ़ी । भगवतीचरण वर्मा अपने उपन्यास चित्रलेखा में लिख गए हैं : संसार में पाप  कुछ भी नही है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की
 
विवेक सिंह
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जिन्हें राष्ट्र ने जन्मा वे ही, राष्ट्रपिता कहलाएं

अपना क्या है, तुम कह दो तो, हम तो मान भी जाएं ।पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥देश तरक्की बहुत कर लिया, सर जी ! हमने मानाकिन्तु आज भी सिर पर मानव ढोता है पाखानाअगर न ढोये, शायद बच्चे भूखे ही रह जाएं।पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं
 
विवेक सिंह
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सूरज दादा से रिक्वेस्ट है

मौसम कैसा यह गरमी का,घर से निकल न पायें ।मम्मी के ये नियम कायदे,बिल्कुल हमें न भायें ॥ मन करता है बाहर खेलें, परमीशन जो पायें । गेट खुला मिल जाये तो हम,चुपके बाहर जायें ॥खेलें खूब, दोस्तों के संगमिलकर मौज मनायें ।भूख लगे तो घर आकर बस,आइसक्रीम ही खायें ॥
 
विवेक सिंह
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बेचारे नेता हैं

हुए आमने-सामने, मोदी और थरूर ।लेनदेन में हो गई, कोई चूक जरूर ॥कोई चूक जरूर, उधारी का चक्कर है । डूब न जाए रकम, यही दाता को डर है ॥'मौज़िल' बेचारे नेता हैं कुछ कम ले लो ।कुछ चन्दा करवा दो, बाकी कुछ तुम दे दो ॥आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है .
 
विवेक सिंह
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नक्सलवाद गरीब ?

नक्सलवाद गरीब के, मँहगे सब हथियार !किया प्रबंधन किस तरह, समझ आया यार ?समझ न आया यार, मदद मिल रही कहाँ से ?पीकर लहू शान्त होती हैं किसकी प्यासें ?मौज़िल तुम गृहमंत्री होते तो क्या कर लेते ?वोटबैंक धर ताक, कड़े आदेश न देते ?आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है .
 
विवेक सिंह
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अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता

1759 ईसवी में मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलीगौहर शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल बादशाह बना । कहने को वह मुगल बादशाह था लेकिन पूरी ताकत उसके वज़ीर गाज़ीउद्दीन खान फ़िरोज़जंग तृतीय के हाथों में थी ।वैसे शाह आलम शब्द का अर्थ अखिल
 
विवेक सिंह
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जयति जय पब्लिसिटी माता

जयति जय पब्लिसिटी माताअपनी बैंक खुला दो मैया, मेरा भी खाताऐरे गैरे तुम्हें पा गयेफ़र्श छोड़ अर्श पै छा गयेबन्धु बान्धवी सब भुला गएतोड़ दिया नाताजयति जय पब्लिसिटी माताकाम न जो बनता प्रयास सेअसफलता जाती न पास सेकिन्तु तुम्हारी एक साँस सेगूँगा भी गाताजयति जय
 
विवेक सिंह
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शेर का ऑफिस

चींटी रोज सुबह जल्दी ही अपने काम में लग जाती और देर शाम तक कठोर परिश्रम करती । जब जंगल के बॉस शेर ने यह देखा तो सोचा कि जब यह चींटी बिना किसी प्रेरणा के इतना उत्पादन कर रही है तो इसे सहयोग दिया जाय तो उत्पादन निश्चित ही बढ़ जाएगा । अत: उसने तिलचट्टे को
 
विवेक सिंह
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लेदर बॉल, टेनिस बॉल और क्रिकेटर

क्रिकेट और टेनिस के खेल में समानता बस यही है कि दोनों में बॉल की पिटाई होती है । क्रिकेट में बॉलर बॉल के प्रति झूठा प्यार दिखाता है । उसे बहुत अच्छी तरह चमकाता रहता है । लेकिन उसका असली मकसद बल्लेबाज को आउट करना होता है जिसके लिए वह बॉल को अपना हथियार
 
विवेक सिंह
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कर अतिरिक्त प्रयास

कर अतिरिक्त प्रयास ।अंधकार जब आँखों में होबहते अश्रु निगाहों में होंलगे टूटने आस ।कर अतिरिक्त प्रयास ॥लक्ष्य न जब तक हो मुट्ठी मेंमज़ा नहीं तब तक छुट्टी मेंत्याग हास-परिहास ।कर अतिरिक्त प्रयास ॥तुझे सफल ही होना होगाअसफलता को रोना होगामन में रख विश्वास ।कर
 
विवेक सिंह
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दो परमाणु करार

बाबूजी बच्चे जिएं, खुशियाँ मिलें हज़ार ।दो अल्लाह के नाम पर, इक परमाणु करार ॥इक परमाणू करार, बदल दो मेरी किस्मत ।कहीं पड़ौसी लूट ही न ले मेरी अस्मत ॥मौज़िल कहें डिमाण्ड एक यह, और न दूजी ।दो परमाणु करार जिएं बच्चे बाबूजी ॥आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है .
 
विवेक सिंह
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कहहुँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं

चेतावनी : कृपया इस लेख को पढ़ने के बाद एक दिन का नहाना रद्द कर दें । इसे पढ़कर यदि किसी पाठक को उल्टी आने लगे अथवा स्वस्थ्य सम्बन्धी कोई और दिक्कत हो तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा । हर्जे खर्चे के जिम्मेदार आप स्वयं होंगे । विवाद की स्थिति में न्यायालय
 
विवेक सिंह
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एक बार फिर आ गौरैया

एक बार फिर आ गौरैयातेरी बहुत याद आती हैयूँ तो रूठ न जा गौरैयाबचपन की यादों में शामिलतेरे बिन वे यादें बोझिलतेरे दर्शन को बेकल दिलसूरत जरा दिखा गौरैयाएक बार फिर आ गौरैयातेरे पीछे धमाचौकड़ीकतना के नीचे रख लकड़ीएक बार धोखे से पकड़ीअब वह खता भुला गौरैयाएक बार
 
विवेक सिंह
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उदास मत हो ब्लॉगिंग

प्रिय ब्लॉगिंग,आशा है तुम मज़े में होगी । मैं भी मजे में हूँ । अब यह न पूछना कि मैं तुमसे दूर रहकर भी मजे में कैसे रह रहा हूँ जबकि तुम तो मेरे बिना अधूरी अधूरी सी फील करती हो । वैसे अगर तुम ऐसा पूछ भी लो तो भी मेरे ऊपर कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि मुझे
 
विवेक सिंह
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ब्लॉग-शहर में गंगाराम

जब गंगाराम पटेल ने बुलाकी नाई के सवाल का संतोषजनक जवाब दे दिया तो बुलाकी नाई के पास उनके साथ ठहरने के सिवाय और कोई चारा न बचा । अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही गंगाराम पटेल और बुलाकी नाई अपनी मंजिल की ओर रवाना हो गये । दिन भर चलते रहने के बाद जब शाम हो गई
 
विवेक सिंह
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मेरे सवालों का जवाब दो

कृपया किन्चित भी चिन्तित न हों, हम आपसे कोई सवाल नहीं पूछेंगे । यदि सवाल पूछ भी लिया तो भी चिन्ता की कोई बात नहीं । आप जवाब दें या न दें यह तो आप का अधिकार है । पोस्ट पढ़कर आप पतली गली से निकल जाएं । किसी को कानोंकान खबर भी न होगी कि आपने इसे पढ़ा है । यदि
 
विवेक सिंह
Mar 05 2010 08:45 AM
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पशोपेश में पड़ा हुआ हूँ

मैं सपनों की बात सुनूँ, या जनमत का सम्मान करूँ ।पशोपेश में पड़ा हुआ हूँ, काम क्या करूँ क्या न करूँ ॥उम्र गुजरती जाती है, पर मंजिल अब तक नहीं मिली ।बाँछें बहुत खिलीं-मुरझायीं, लेकिन मेरी नहीं खिलीं ॥शुभचिन्तक उकसाते हैं, पर आस टूटती जाती है ।जनमत साथ न
 
विवेक सिंह
Mar 04 2010 06:17 AM
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सउदी ! कृपया हेल्प करो ना !

सउदी ! कृपया हेल्प करो ना !पाकिस्तान बड़ा नटखट हैसउदी इसको समझा दो ना !सउदी ! कृपया हेल्प करो ना !करता यह अपनी मनमानी ।कभी हमारी बात न मानी ।मन में इसके बेईमानी ।इसके मन को साफ करो ना !सउदी ! कृपया हेल्प करो ना !गलती पूर्वज किए हमारे ।जो मध्यस्थ नहीं
 
विवेक सिंह
Mar 03 2010 06:21 AM
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होली का त्यौहार निराला

होली का त्यौहार निराला ।जमकर बरसें रंग-गुलाला ॥भूत-प्रेत गलियों में डोलें ।किन्तु आदमी जैसे बोलें ॥पिच-पिचकर चलती पिचकारी ।कर न सके आराम बिचारी ॥कल तक मौसम था जाड़े का ।लौट गया स्वेटर भाड़े का ॥रंगों में सब सराबोर हैं ।लाल रंग पर खूब जोर है ॥पहुँचे भाई
 
विवेक सिंह
Mar 01 2010 02:07 PM
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अन्तू ते सन्तू दी गड्डी

अब खुशियों का ना रहा, कोई पारावार ।अपने घर जब आ गई, नई एस्टिलो कार ॥नई एस्टिलो कार, लगे यह बड़ी सुहानी ।इसके आने की है अपनी अलग कहानी ॥विवेक सिंह यों कहें, हमें भी खुशी भई है ।अन्तू ते सन्तू दी गड्डी नई - नई है ॥आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है .
 
विवेक सिंह
Feb 21 2010 11:20 AM
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कुत्ताहित याचिका

लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला मीडिया एक बार फिर विवादों में घिरता नज़र आ रहा है ।विश्वस्त सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि कुत्तासंघ से मीडिया के खिलाफ न्यायालय में कुत्ताहित याचिका दायर करने का निर्णय लिया है ।मीडिया पर आरोप हैं कि उसने कुत्तों
 
विवेक सिंह
Feb 16 2010 10:04 AM
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दफ़न होते गावं-शहर

हड़प्पा मोहनजोदड़ो के बारे में हमने पढ़ा है । आपने भी पढ़ा होगा । वहाँ खुदाई में पूरी की पूरी सभ्यता मिली है । यह पूरी सभ्यता कैसे मिट्टी में दब गयी ? हम नहीं जानते । शायद इसे दबने में बहुत लम्बा समय लगा होगा । किन्तु आजकल अनुभव हो रहा है कि हमारी आधुनिक
 
विवेक सिंह
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कर्ण की घोषणा

मैं कर्ण बल्द श्री अधिरथ, एतत् द्वारा घोषणा करता हूँ कि मेरी और दुर्योधन की मित्रता आज से समाप्त समझी जाय । मेरी तबियत अब कुछ ठीक नहीं रहती लिहाजा मैं महासचिव पद से इस्तीफ़ा देता हूँ और अंग का राज्य भी वापस करता हूँ । मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरे और
 
विवेक सिंह
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कहना होगा टर्र

यह कहानी उस कुएं की है जो काफी  पुराना था । कुएं में पानी की कोई कमी न थी । जितना पानी खींचा जाता उतना ही धरती उसमें भर देती । कुएं में मेंढक भी काफी संख्या में थे । कुछ मेंढक कभी कभार बाल्टी में बैठकर कुएं के बाहर की दुनिया देख लेते थे । बाकी टीवी
 
विवेक सिंह
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तब मैं कहाँ था ?

कभी-कभी कुछ ऐसी बातें हो जाती हैं जो तत्काल शायद तुच्छ लगें लेकिन उन्हें हम जीवन भर भुला नहीं पाते । यह बातें यदि गावं की हों तो कहना ही क्या ।  रह रहकर वे हमारे मस्तिष्क-पटल पर उभरती हैं और  यादों को ताजा कर जाती हैं । हमें गुदगुदाती रहती हैं
 
विवेक सिंह
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शीत तुझे जाना ही होगा

शीत तुझे जाना ही होगाआज समय की यही माँग हैबसंत को लाना ही होगाशीत तुझे जाना ही होगाखुश होकर जा या कि रूठकरचाहे रो ले फूट फूटकरसाथ रहेगा किन्तु छूटकरविरह गीत गाना ही होगाशीत तुझे जाना ही होगाकुहरा, पाला, सर्द हवाएंजुकाम, खाँसी, और दवाएंकितना ही चीखे
 
विवेक सिंह
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गलत वक्त क्यों बात कही

समझ न पाता चालबाजियाँसन्तू है कितना भोलालगी धूप भी जब ठण्डी सीतो सूरज से यूँ बोंला“सूरज दादा बात आपकीअच्छी नहीं मुझे लगतीआप आजकल गायब मिलतेजब दुनिया सोकर जगतीगरमी में कंधे रगड़ातेचाहे लाख कोई झिड़केदेर शाम को सोने जातेऔर जाग जाते तड़केसर्दी में क्यों दूर
 
विवेक सिंह
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ऐसे नेता और कहाँ

                                          
 
विवेक सिंह
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किसी से तो अच्छा हूँ

आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है .
 
विवेक सिंह
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पर सेकण्ड क्रान्ति

साल बीत गया । जब धरती के विनाश की भविष्यवाणियाँ की जा रही हों तो साल की क्या औकात ? वह भी तब जब पुराने के बद्ले नया हाथोंहाथ मिल रहा हो ।प्रागैतिहासिक काल से लेकर अब तक आदमी ने बहुत तरक्की कर ली है । तरक्की के इस सफ़र में बहुत सी खोजें हुईं जो मील का
 
विवेक सिंह
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इकत्तीस साल - दो सौ पोस्ट

आज हमारा हैप्पी बड्डे है । पूरे ३१ साल के हो गये आज । जीवन यात्रा में जन्मदिन का महत्व एक मील के पत्थर जैसा है । मील के पत्थर तो अब रहे नहीं । हमने तो जबसे होश संभाला है किलोमीटर के पत्थर ही देखे हैं । पहले होते होंगे मील के पत्थर । तो सिद्ध हुआ कि ज
 
विवेक सिंह