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07 May 2010
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गाँव के पास अब हाट नहीं लगते..

गोबर से लिपे हुए आंगन नहीं दिखते..गाँव के पास अब हाट नहीं लगते..न कहीं, पेड़ों पे आम की बौर है.न नदी के पानी का मध्यम सा शोर है.वो चिमटा, वो फूकनी, वो चूल्हा कहाँ है?अब तो बस पेट्रोल और डीजल का धुआं है.डाली पे अब कहीं झूले नहीं टांगते..गाँव के पास अब हाट
 
मीत
May 07 2010 04:26 PM
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आ गगन पर पहुंचा हूँ मैं, घिसने को तारों के कोने..

आज बहुत दिनों बाद आना हुआ. ब्लॉग से कुछ दिनों के लिए नाता ही टूट गया था... पर फिर अचानक एक अंजान दोस्त की मेल आई और खींच लायी मुझे फिर यहीं... एक छोटी सी कल्पना या फिर सच जो भी है? आपकी नज़र है... उम्मीद है पसंद आये... तुम्हारा मीत  टिमटिमा पाते नहीं
 
मीत
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मन के वीरान रास्तो पर, बसी तेरी पदचाप है...

इस गड्तंत्र दिवस पर तू बहुत याद आया, परेड में तेरे कदमों के निशां थे, आवाज थी पर तू नहीं था.. जहाँ भी रहे खुश रहे... love u... तुम गुजर के जा चुके,ना गम की गुजरती रात है...हर तरफ अब ज़िन्दगी में,दर्द का अलाप है...मिट नहीं रहा है अबतक,अनछुआ एहसास है...मन
 
मीत
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साथी घर जाकर मत कहना...

यह कविता १९९४-९५ में मेरे शहीद भाई के मेरठ स्थित आर्मी स्कूल की वार्षिक किताब प्रतिभा में छपी थी... तब उसने मुझे वो किताब भेंट दी थी... यह कविता किसी नीलम जी ने लिखी है...जो उस समय छठी कक्षा में पढ़ती थी... जो में आप सबसे बाँट रहा हूँ..खास कर यह मैंने
 
मीत
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ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...

ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है... घिस रहा बदन, घाव भरता नहीं रिस रहा आँखों से, लहू रुकता नहीं उधड़ने लगे हैं, अब ज़िन्दगी के पैबंद, सीयू इनको तो चुभन होती है... ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है... सांस गरल बन सीने में थम
 
मीत
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तेरी दुनिया के निराले, दस्तूर हैं...

पता  नहीं क्या लिखा है, बस दिल में आया ओर लिख दिया.. अगर कुछ उल्टा-पुल्टा हो कृपया बेझिझक बताइयेगा..जिससे की मैं सुधार सकूँ... स्नेह मीत   तेरी दुनिया के निराले, दस्तूर हैं... ग़मज़दा चेहरों पे ये कैसा, नूर है... खा रहा है गालियाँ, बदन
 
मीत
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प्यार तुम्हारा मोर पंख सा...

पास नहीं हो दूर हो तुम, पर बसे हुए हो नयनों में प्यार तुम्हारा मोर पंख सा, रखा है मन के पन्नों में सदा नहीं अब गूंज रही है, सन्नाटा बोले कर्णों पे पर गीत तुम्हारे सजल सजल, शब्द बने हैं अधरों पे काश कहीं से आ जाते तुम, कसक मिटाते जन्मों की साथ बैठ कर
 
मीत
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मन से निकले मुक्तक...

वैसे तो मुक्तक क्या है, उसकी परिभाषा क्या है.. नहीं जानता... बस लिखने को मन किया तो मन के भावों को ही शब्दों में उडेल दिया... उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आये... गलतियाँ हों तो जानने की इच्छा रखता हूँ, ताकि सुधार सकूँ... 1 ज़िन्दगी की हर रात को स्वर दिय
 
मीत
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रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

 रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है... प्रेम की अलमारी में, कब से इसे बंद किया था,हर नाते की चाप को, मुस्कुरा के सह लिया था,संबंधों की गठरी से, टुकडा-टुकडा कर गिर पड़ा है,रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...तकिया से मन को, कभी सराहने पे
 
मीत
Sep 16 2009 11:34 AM
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झीनी-झीनी बारिश...

वो हर सुबह आते जाते लोगो को बारिश के लिए दुआ करते देख और सुन रहा था... हर तरफ लगभग एक ही जुमला सुनने को मिलता...हे भगवान तू कितना निर्दयी है?? क्या इस साल गर्मी से ही मार देगा... बात सही भी थी कितने ही दिन हुए थे, बारिश थी की आने का नाम ही नहीं ले रही
 
मीत
Sep 11 2009 11:55 AM
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दिल तो खिलौना है

दिल तो खिलौना है,आँखों को रोना है,इस जहाँ में ना था कोई, अपना,ना हम किसी के हैं,ना किसी का होना है...एक दोस्त बनाया था,हँसना उसने सिखाया था,भूल गए थे वो तो है इंसान,हमने तो उसे,भगवान के साथ बैठाया था...रोंद के भावों को चल दिया वो,बात आज ऐसी कह गया
 
मीत
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मैंने वो सपना सहेज रखा है...

उनींदी स्याह रातों में...रिश्तों की उलझी डोर से,जिसे तुमने बुना था,वो सपना...मैंने सहेज रखा है...हाँ वही सपना...!!जो तुम्हें जान से प्यारा था..वही सपना...जो तुम्हारे मन का सहारा था...पलकों की चादर फैंक,आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...जब रोकता हूँ इसकोतो
 
मीत
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शिरडी की यात्रा

१२ से १६ अगस्त की छुट्टियाँ थी, बहुत दिनों से सोच रहा था की शिरडी के साईं बाबा की समाधी-दर्शन के लिए जाऊं. सो बस चला गया. बहुत अच्छा लगा जाकर लेकिन अभी भी वो पवित्र स्थान बहुत से लोगो के लिए नया है. वहां मैंने कुछ तसवीरें भी ली, फिर सोचा क्यों न अपनी
 
मीत
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GOVERNMENT AUTHORIZED HOSPITALS IN INDIA FOR TREATMENT OF SWINE FLU

With the first swine flu death being recorded in INDIA yesterday, it will be all important to keep a ready recknor at hand। More so we need to be aware of the correct symptoms and the right place for treatment। So in case we have someone who is seen to
 
मीत
Aug 11 2009 11:37 AM
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मैं हूँ लड़की...

तुम में और मुझमें क्या है अलग? क्या है अंतर? क्यों मिलता है मुझी को गम और तुमको जश्न? मेरी ही आँखों में है प्यास और तुम्हारी आँखें क्यों रहती हैं तृप्त? हमारी तो जननी भी एक है... फिर क्यों है? उसकी नज़रों में भी खोट? क्या वो यह अंतर बताएगी? नहीं! वो
 
मीत
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मुलाकात...

तुम तो कहतीं थी, मेरे द्वार खुले हैं हरपल तुम्हारे लिए! पर वहाँ एक ताला था। मैं सीढियों पर बैठा, करता रहा तुम्हारा इंतज़ार १ घंटा दो घंटे विवश!! आखिर मैंने खिड़की से झाँका... सुखा गुलाब का फूल, एक किताब और मोर पंख.... फिर हवा का एक तेज़ झोंखा आया और..
 
मीत
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पापा...

जब माँ बचपन में, डांट देती थी.. तुम्ही तो दुलारते थे, पापा... जब भागते-भागते में, खा जाता था ठोकर, तुम ही तो सँभालते थे, पापा... जीवन का हर सुंदर क्षण, तुम्हारा ही तो, कर्जदार है! पापा... पर पापा...? आज जब तुमको, मेरी जरुरत... तो.. में लाचार हूँ पापा
 
मीत
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ओ.. गौरेया... ओ.. गौरेया...

ओ.. गौरेया... ओ.. गौरेया... पीपल पे रहने आयीं तुम.... मेरे मन को भाई तुम.... ओ.. गौरेया... ओ.. गौरेया... सांझ ढले तुम आती, माँ सुनाये ज्यों लोरी, तुम भी ममत्व गीत हो गाती, आँगन के पीपल का कोटर, तुमने आन सजाया है, क्षण-क्षण विहंस कलाव कर, हर दिन तुमने
 
मीत
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उस पार मुझे तुम ले जाना!

घट बहता यूँ, ज्यों तृष हो, ना जानू, कौन हश्र होगा, चिंतित है कैसे हो तरण, अब कौन किनार ठहर होगा, जीवन-तरणी की तुम्हीं प्रिये, पुलकित पतवार बन जाना मैं नश्वर, अंधक नहरम हूँ, उस पार मुझे तुम ले जाना! हैं चहुँओर भंवर गहरे, हर वक्त सधे मुझ पर पहरे, ना बे
 
मीत
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मेरे दिल को दर्द से प्यार है...

खुशियाँ तो बेवफा हैं, छोड़ चली जाती हैं, फूलों का क्या भरोसा, काँटों पर मुझे ऐतबार है, शायद तभी, मेरे दिल को दर्द से प्यार है... छाया में वो बात कहाँ साया भी खो जाता है, धूप की तपिश से ही तो, मन भी चमकदार है, शायद तभी, मेरे दिल को दर्द से प्यार है...
 
मीत
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सरहद पे वो मौत से जूझता है...

सरहद पे वो मौत से जूझता है, उसकी मुहब्बत का दुप्पटा, उसकी यादों के आंसू पोंछता है, माँ की आँखों में बिछड़ने का दर्द अब भी ताजा है. टूटने को तैयार, एक एक वादा है... पिता रोज उसके गर्व में, सीना ठोकता है... सरहद पे वो मौत से जूझता है... © 2008-09 सर्वा
 
मीत
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मैं पंख लगा उड़ जाऊंगा...

कहता है मुझसे, मैं ना फिर आऊंगा... तू... जीले पल... पल... रो के, हंस के मैं पंख लगा उड़ जाऊंगा... यों जागा सा जो सोता है, इसलिए तू मुझको खोता है? पलभर में ही मिट जाता है, यहाँ जो मुझसे टकराता है भला कौन मुझे है बाँध सका, मैं तेरे हाथ ना आऊंगा... तू...
 
मीत
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कल रात फलक का चाँद फुटपाथ पर था...

देर तक वो मुझसे बात करता रहा... पोंछने को बार बार पसीना, अपनी हथेलियों को चेहरे पे मलता रहा, पसीने से उसका भी बदन, तरबतर था... हाँ! कल रात फलक का चाँद फुटपाथ पर था... बोला यार... "यहाँ तो हवा बहुत गरम है, तुम्हारे बिछोने में अग्नि की तपन है, किस तरह
 
मीत
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देखो रात की सवारी आ रही...

देखो रात की सवारी आ रही... मीठे गीत गुनगुना रही, देखो रात की सवारी आ रही... सांझ के रथ पर हो सवार, चाँद-तारों से कर श्रृंगार... आकाश का बना आँचल, सूर्य को उसमे छिपा रही... देखो रात की सवारी आ रही... अन्धकार से केश लहराएँ, मुख पे चांदनी सजाये... लग रह
 
मीत
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सोचा जी लूँ जरा-जरा सी...

क्योंकि ज़िन्दगी है कम मेरी बाकि... तो सोचा जी लूँ इसे जरा-जरा सी... थोड़ी धूप, थोड़ी धुंध और थोड़ी बरसात के लिए और थोड़ी हौले-हौले से गुजरती... अपनी साथी रात के लिए जो हो गया सवेरा, तो रात भी ढल जायेगी... नयी सुबह ना जाने? क्या पैगाम लेकर आयेगी... कहीं
 
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पलकों से टपके, टूटे से ख्वाब ढूंढता हूँ...

हर सुबह बिस्तर की सिलवटों में... पलकों से टपके, टूटे से ख्वाब ढूंढता हूँ... हांथों से खो गए हैं, कुछ रिश्तों के सिरे थे... उलझा कब से इनमे, बेहिसाब ढूंढता हूँ... ना पा सका हूँ, खुद को, अब उम्र कटती जाती, कल से ही हर कहीं पे, मैं आज ढूंढता हूँ... होते
 
मीत
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छिन रहा है मतदाताओं का हक़...

लोकसभा चुनाव आनेवाले हैं और इसके लिए सभी राजनितिक दलों ने अपने अपने सब्जबाग मतदाताओं को दिखाने शुरू कर दिए हैं... वैसे तो आप भी सोचते होंगे की दोगले और भृष्ट नेताओं के खिलाफ कुछ ऐसी वोटिंग हो जो उनके खिलाफ जाये... क्यों मजा आ जायेगा ना ?लेकिन हमारे न
 
मीत
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फर्ज

सागर मंथन में एक बार कभी विषपान किया था शिव तुमने, जीवन मंथन में रोजाना ही गरल पिया है मानव ने हम भी भंग की खा बूटी सच से आंख चुरा सकते थे पीकर एक बार ही विष का प्याला फर्ज से मुक्ति पा सकते थे! कैद से इस निर्गुण शरीर की, आत्मा को अपनी छुडा सकते थे,
 
मीत
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सपने तो वही हैं, जो रातों को सोने नहीं देते...

टूट कर ये हर पल, मेरी जान लेते रहे... हमको भी प्यार था इनसे, ढेरों सपने हम भी संजोते रहे... कभी सोते, कभी जागते, कभी ज़िन्दगी के संग भागते, ख्वाब के मोती नींद में पिरोते रहे... पर टूट कर ये हर पल, मेरी जान लेते रहे... रात की अंगनाई में हम, इन्हें पूर
 
मीत
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मौत तू एक कविता है...

मौत तू एक कविता है... मुझसे एक कविता का वादा है, मिलेगी मुझको! डूबती नजरों में जब दर्द को नींद आने लगे... जर्द सा चेहरा लिए जब चाँद, उफक तक पहुंचे... दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब... ना अँधेरा, ना उजाला हो... ना आधी रात ना दिन... जिस्म जब ख
 
मीत
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एक खालीपन...

ये मेरे भाई का दो साल पहले republic day के दिन परेड में शामिल होने का फोटो है....इस साल उसकी जगह कोई और था...क्योंकि वो तो चला गया...सोचा आपसे बाँट लूँ... २ दिन में हर उस जगह गया जहाँ वो और में स्कूल के बाद पूरे दिन घूमा करते थे, एक ही सायकल पर दोनों
 
मीत
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बदल गया केलेंडर...

नव वर्ष का हुआ आगमन... बदली हुयी है दुनिया... छाई खुशियों की लहर, पर अपनी ज़िन्दगी में इसका कोई असर, आया नहीं नज़र... बस बदल गया है तो बस... दीवार और मेज पर सजा, पुराना केलेंडर... __________________________________ सभी को मेरी तरफ़ से नववर्ष की हार्दि
 
मीत
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चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द, एक नंगा बच्चा लेटा है...

तुम रेशम के आंचल में हो, वो बिन ढांके ही लेटा है, चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द, एक नंगा बच्चा सोता है... मैं देख रहा हूँ, तुमको भी! मैं देख रहा हूँ, उसको भी! तुम स्वस्थ, सुसज्जित, सुंदर हो, वो माटी पुता- पुता सा है... चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द, एक
 
मीत