Aalok Shrivastav's Image
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
08 Mar 2010
कुल प्रविष्टियां
12
पाठक भेजे
356
पसंद
9
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
29.67
पसंद करें
0
नापसंद करें

'जग जीत' ने का हुनर

बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है।बात, 1 दिसंबर 2009 की है। जगजीत जी यूएस में थे, वहीं से फ़ुनियाया - 'आलोक, कश्मीर पर नज़्म लिखो। 9 दिसंबर को वहां शो है, गानी है।' मैंने कहा - 'मगर में तो कभी कश्मीर गया नहीं।
 
aalok shrivastav
Feb 16 2010 12:54 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

शाहों के शाह आबरू

वीं शताब्दी के शाइरों में एक आबरू भी रौशन हुए। ख़ासे तहज़ीब-पसंद और मिलनसार शायर। आबरू को पढ़ते हुए या कहिए कि आबरू के बारे में पढ़ते हुए दो नाम बराबर सामने आते हैं। पहला- ख़ाने आरज़ू, जिन्हें आबरू अपना कलाम दिखाया करते थे। बावजूद इसके कि ख़ुद आबरू क
 
aalok shrivastav
पसंद करें
0
नापसंद करें

उर्दू के आदि-कवि वली दक्कनी

वली का शुमार उर्दू-कविता की राह तैयार करने वाले शायरों में होता है। उर्दू शायरी की वो राह जो बाद में शाहराह बनी। वली के पहले ख़ुसरो, रहीम और रसखान जैसे भारतीय-कवियों का ज़्यादातर कलाम या तो फ़ारसी में मिलता है या हिंदी में। लेकिन वली ने एक अलग रंग इख
 
aalok shrivastav
Dec 29 2009 11:59 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

शुरुआत ब्लॉग की...

वादे के मुताबिक़ अमीर ख़ुसरो के बाद वली पर लिखा जाना था मगर मेरे अग्रज-कवि भाई अशोक चक्रधर आदतन अपना हर काम पूरी शिद्दत से करते हैं, फिर चाहे वो इंटरनेट पर हिंदी का बोलबाला देखने का जुनून हो, जयजयवंती की साहित्यिक मासिक गोष्ठियां हों या फिर अपने किसी
 
aalok shrivastav
Dec 29 2009 11:59 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अपनी शिनाख़्त

हर वक़्त फ़िज़ाओं में महसूस करोगे तुम, मैं प्यार की ख़ुशबू हूं, महकूंगा ज़मानों तक प्यार लुटाना कोई आसान काम नहीं। कलेजा चिर जाता है. अपने दुखों को तकिए के नीचे रख कर सुखों का ख़्वाब दिखाने वाले कितने हैं ? और उन कितनों को याद करने वाले आज कितने हैं?
 
aalok shrivastav
Dec 29 2009 11:59 AM
पसंद करें
2
नापसंद करें

सिलसिला ग़ज़ल का...

और इस तरह एक ग़ज़ल का सिलसिला, और पूरा हुआ... यार, सुना है अंबर ने सिर फोड़ लिया दीवारों से, आख़िर तुमने क्या कह डाला, सूरज, चांद, सितारों से. लफ़्ज़ों की लच्छेबाज़ी पर हमको कब विश्वास रहा, लेकिन आप कहां समझे थे, दिल की बात इशारों से. मन में पीड़ा, आ
 
aalok shrivastav
टैग: शायरी
पसंद करें
0
नापसंद करें

दफ़ीना जो हाथ लगा...

कभी-कभी कुछ शे'र दफ़ीने की तरह हाथ लगते हैं. चमकते हैं, झिलमिलाते हैं. लेकिन उनकी क़ीमत का एहसास नहीं जागता. ऐसे ही तीन शे'र महीनों से ज़हन में गड़े पड़े थे. 30 सितम्बर को जबलपुर में जब ये शे'र, कवि भाई प्रदीप चौबे को सुनाए तो उन्होंने कान ऊमेठ कर कह
 
aalok shrivastav
पसंद करें
4
नापसंद करें

अपने सपने का एक हिस्सा...

आज आपसे अपने सपने का एक हिस्सा बांट रहा हूं।
 
aalok shrivastav
पसंद करें
1
नापसंद करें

आरज़ू की आरज़ू में...

आबरू के बाद बारी आरज़ू की थी, या कहूं कि आरज़ू की आरज़ू में था। ज़हन तैयार था और क़लम बेताब। लेकिन इस वक्फ़े में आरज़ू से जुड़े कुछ तथ्य जुटाने में देर लगी। सो उसके लिए मुआफ़ करें। सिराजुद्दीन अली खां उर्फ़ उर्दू के मशहूर शायर आरज़ू। शेख सिराजुद्दीन
 
aalok shrivastav
पसंद करें
1
नापसंद करें

एक ज़रूरी काम

मंदी के दौर में अगर वाक़ई कुछ ज़्यादा है, तो वो है काम। कमबख़्त इतना काम है कि इस काम के चक्कर में सारे काम ठप्प पड़े हैं। ब्लॉग को ही लीजिए। कितना ज़रूरी काम है ब्लॉग लिखना। मगर रोज़-रोज़ कहां लिख पाते हैं ? बहरहाल, आज अशोक चक्रधर जी की सभा में ब्लॉ
 
aalok shrivastav
पसंद करें
1
नापसंद करें

ग़ालिब की एक ज़मीन

मंज़िलें बेगानी हो सकती हैं, और रास्ता मुश्किल। लेकिन दिल में हौसला हो, जुनूं की इंतेहा हो तो फ़ासिले ख़ुद सिमटने लगते हैं। ज़मीन, बड़े अब्बा ग़ालिब ने अता की थी और लफ़्ज़ विरासत में मिले थे, सो कहीं जाकर ये ग़ज़ल हुई थी। कोई पंद्रह बरस पहले। आज आपसे
 
aalok shrivastav
टैग: शायरी
पसंद करें
0
नापसंद करें

मुहब्बत

दह्सत्गर्दों का मज़हब मैं नहीं जानता। ख़ून-ख़राबे का लहजा भी मुझे नहीं पता। और रही बात सियासतदानों की तो उनके लिए जिगर साहब फ़र्मा ही गए हैं- ''उनका जो फ़र्ज़ है वो एहले-सियासत जानें, मेरा पैग़ाम मुहब्बत है, जहां तक पहुंचे।'' जो हममें तुममें हुई मुहब
 
aalok shrivastav