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अरे बिरादर !!

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14 Jun 2010
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बद्रीनाथ: एक रोमांचक सफर (भाग 3)

जोशीमठ में बुधवार की रात सि‍र्फ चार घंटे सोने के बाद भी तरोताजा महसूस कर रहा था, हालॉंकि‍ दो दिन के भीतर दि‍ल्‍ली से करीब 500 कि.मी. कार चला चुका था, जि‍समें से 300 कि.मी. का पहाड़ी रास्‍ता भी शामि‍ल था। सुबह करीब 6 बजे तीनों गाड़ि‍यॉं बद्रीनाथ के लि‍ए
 
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बद्रीनाथ: एक रोमांचक सफर (भाग 2)

सोनि‍या श्रृषि‍केश से 70 कि.मी. आगे देवप्रयाग तक आ चुकी थी और मैं देवप्रयाग से लगभग 40 कि.मी. आगे श्रीनगर में होटल तलाश रहा था। देवप्रयाग में अलकनंदा नदी और भगीरथी- दोनों का संगम है। यहीं से इनकी धारा मि‍लकर गंगा कहलाती है। देवप्रयाग से श्रीनगर की तरफ
 
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बद्रीनाथ : एक रोमांचक सफर (भाग 1)

हरिद्वार में गंगा के घाट पर बैठा मैं सोच रहा था- कहॉं आज सुबह दि‍ल्‍ली की गर्मी में अपने जरूरी काम को नि‍पटा रहा था और अब कहॉं सारे काम छोड़कर कपड़े और पर्स आदि‍ की रखवाली कर रहा हूँ। शाम हो चली थी।-'फुफा अब आप जाकर ड़ुबकी लगा आओ। सामान मैं देख
 
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उफ् बुढ़ापा हाय जवानी.........

तुम्‍हें नजर नहीं आता, इस सीट के ऊपर क्‍या लि‍खा है!!-इस तीखी आवाज को सुनकर मेट्रो ट्रेन में अचानक सन्‍नाटा छा गया। सभी का ध्‍यान उस बूढे की तरफ गया जो उस गरीब-से नौजवान को दहकती ऑंखों से घूर रहा था। उसके बगल में एक बूढ़ा सरदार बैठा था-हुण् माफ कर दो,
 
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लैंसडाउन....... फि‍र कभी :(

'जि‍तेन, मेरी कार का शीशा फूट गया है, मैं नहीं जा सकूँगा!'वि‍जय ने जैसे दो टूक फैसला सुना दि‍या।मैंने कहा--जाना तो सरबजीत के कार से है, तब तक के लि‍ए तू अपने कार पर कवर चढाकर चल पड़!-नहीं, मेरा मूड ऑफ हो गया है! कल कि‍सी बच्‍चे ने कुत्‍ता भगाने के चक्‍कर
 
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लैंसडाउन! मैं आ रहा हूँ...........

सफर के नाम पर ही मैं रोमांच से भर जाता हूँ! अभी-अभी नीरज जी मुंबई के पास का एक हि‍ल स्‍टेशन 'माथेरान' घूमकर आए हैं। पि‍छली बार मसूरी यात्रा वाली पोस्‍ट पर अनुराग जी ने लैंसडाउन का जि‍क्र कि‍या था। उसके बाद से मैं अपने एकमात्र यायावर दोस्‍त वि‍जय की हामी
 
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टक-टक.............

मोबाइल पर मुझे होल्‍ड पर रखकर वो कि‍सी से कह रही थी-'रख लो बाबा, कोई बात नहीं।'पीछे सब्‍जी-मंडी का शोर मुझे सैलाब-सा लग रहा था- टमाटर तीस-टमाटर तीस-टमाटर तीस-गोभी बीस-प्‍याज बीसधड़ी सौ-धड़ी सौ.......... मैंने चि‍ल्‍लाकर कहा- मेरा बी.पी. लो हो गया है,
 
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शहर के चौक पर टखना सिंह

टखना सिंह ने अपने दोस्‍त करेजा से पूछा-मुझे शहर जाना है हर संडे!करेजा सिंह लगभग हर संडे हास्‍टल से भागकर फि‍ल्‍म देखने शहर जाता था और कभी पकड़ा भी नहीं गया।क्‍या फि‍ल्‍म देखनी है?नहीं!किसी रि‍श्‍तेदार के घर जाना है?नहीं!कि‍सी लड़की से मि‍लना है क्‍या?अरे
 
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कलर्ड बनाम ब्‍लैक एण्‍ड वाइट

'थोड़ा और सटकर खड़े हो जाइए!''थोड़ा और.......'कैमरे का फ्लैश अब तक शांत था।'भाई साब् बस थोड़ा-सा और। अपना सि‍र भाभी जी की तरफ झुकाइए, भाभी जी आप भी।'अब भी फ्लैश नहीं चमका।'अब मुस्‍कुराइए, एक इंच और, हॉ.......'पर अब भी फ्लैश नहीं चमका।मैं खीज गया, कहा-'ये
 
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‘बीप-बीप’ के बीच इमोशनल अत्याचार !!

साल में ऐसे मौके कम ही होते हैं जब आपको टीवी देखने का अवसर कुछ ज्यादा ही प्राप्त होता है। अभी मेरा दौर ऐसा ही चल रहा है। कुछ-कुछ खाली भी हू या यूँ कहि‍ए कुछ खाली महसूस करने के लि‍ए टीवी देखने लगा हूँ। लंबे सफर की थकान तब थोड़ी-बहुत उतर ही जाती है जब आधी
 
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न मि‍ले सुर मेरा तुम्हारा.........

ऐसा लगने लगा है जैसे हमारे आज के सुपर स्टार मंच और घर के ऑंगन का फर्क भूलते जा रहे हैं। ‘मि‍ले सुर मेरा तुम्हारा’ का नया संस्क‍रण आ गया है। हैरानी होती है कि‍ इस गीत के आधुनि‍क संस्करण में आम आदमी की मौजूदगी नदारत है। और तो और, आमि‍र खान या सलमान खान
 
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प्रि‍ये! तुम्हारे लि‍ए.......

सच कहूँ तो फुर्सत मि‍ली नहीं कि‍ याद तुम्हें कर पाऊँ पर जो कुछ भी कर रहा हूँ ये सब तुम्हा रे लि‍ए है। मैंने कभी नहीं कहा था तुम्हारे लि‍ए तोड़ लाऊँगा चॉंद-तारे। सच तो ये है कि‍ तुम तक पहुँचने के लि‍ए अपने हाथों से मुझे बनानी पड़ रही है सड़क .........
 
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जाल के उस पार.......

आज की मनहूस सुबह ने मुझे जि‍स पीड़ा और ग्‍लानि‍ से भर दि‍या कि‍ शायद ईश्‍वर भी मुझे माफ न करे। मेरे फ्लैट की खि‍ड़की के साथ करीब आठ फुट लंबा और दो फि‍ट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। इसी खि‍ड़की के ऊपर ए.सी. टंगा हुआ है। ‍आज सुबह छ: बजे उठ कर खि‍ड़की के पास
 
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Sep 22 2009 10:15 AM
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गौर से देखा तो घूम जाओगे!!

सोते हुए को तो उठाया जा सकता है मगर कोई जानबूझकर सोने का अभि‍नय करे तो उसे उठाना कठि‍न है। पत्‍थर भी अपनी जगह बदलता रहता है। वह प्रकृति‍ की शक्‍ति‍ से संचालि‍त होता है। कभी भूकंप उसकी जगह बदलती है, कभी हवा तो कभी पानी। अचल कुछ भी नहीं है, सब चलायमान है।
 
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Sep 09 2009 01:05 PM
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इचक दाना- इचक दाना, दाने ऊपर दाना- 1

इस तस्‍वीर में सात घोड़े हैं? क्‍या आपकी नजर उन्‍हें देख पा रही है ? इस जंगल में पॉंच हि‍रण हैं, क्‍या आप उन सभी को ढूँढ सकते हैं ?(इन दि‍नों मेरे दोस्‍त मुझे रोचक मेल भेज रहे हैं। यह मैं आपलोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ।)
 
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Sep 08 2009 01:36 PM
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चि‍रंजीलाल !!

मेरे दोस्त ने अपने ऑफि‍स में साफ-सफाई और पानी वगैरह देने के लि‍ए एक दुबला-पतला लड़का रखा था। उसका नाम चि‍रंजीलाल था। एक दि‍न जब मै वहीं बैठा था तो उसे बुलाकर मेरे मि‍त्र ने उसे इशारे से समझाया कि‍ साब् को पानी पि‍लाओ। उसे इस ऑफि‍स में आए हुए ये दूसरा ही
 
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याद जो तेरी आई बहना !!

कि‍तने सावन बीते,कुछ याद नहीं, मि‍ला नहीं अबतक,अवसाद यही!बरबस ऑंखे भर आई है, बहना जो तू याद आई है! ठीक है कि जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहि‍ए! पर जीने के लि‍ए उनमें रि‍श्तों की कड़ी होनी चाहि‍ए।.........ये कड़ी तू थी बहना!जब तू नन्हीं थी, न्यारी थीगोद
 
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रूटीन!!

पड़ोसी का स्‍कूटर सुबह की नींद में खलल डाल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे सपने में कि‍सी को कि‍क लगाते हुए सुन रहा हूँ और स्‍कूटर स्‍टार्ट न होने से एक बेचैनी-सी हो रही है। उस पड़ोसी को न मैं जानता हूँ और न उसके स्‍कूटर से मेरा कोई वास्‍ता है, पर पता नहीं
 
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Aug 01 2009 09:32 PM
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कैसेट !!

एक दि‍न मैं अलमारी साफ कर रहा था। एक कोने में हैलमेट का एक डि‍ब्बा पड़ा था। जब मैंने उसे खोलकर देखा तो समझ नहीं आया कि‍ इसे फेंक दूँ या यूँ ही रहने दूँ। उसमें 1990-97 में रीलीज फि‍ल्मों के हि‍ट कैसेट्स थे। ये वो जमाना था जब स्कूल-कॉलेज के दि‍नों में
 
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Jul 18 2009 07:40 PM
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‘ब्‍लॉग-साहि‍त्‍य’ पर शोध की संभावना !!

ज्ञानदत्‍त जी ने ब्‍लॉग पर लि‍खे जाने वाले साहि‍त्‍य के लि‍ए 'साइबेरि‍त्‍य' नाम दि‍या है। मैं ब्‍लॉग में लि‍खी जाने वाले साहि‍त्‍य के लि‍ए ‘ब्‍लॉगि‍त्‍य’ शब्‍द सुझाना चाहूँगा। वैसे साधारण शब्‍दों में ‘ब्‍लॉग-साहि‍त्‍य’ कहने पर भी वह अपने अर्थ को सही
 
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बूँदो को कहीं देखा है !!

बेरंग पत्तों पर सरसराती बूँदों को देखे एक अरसा हुआ! मुरझाए चेहरों के पीछे मन तक है तरसा हुआ! अभी एक कार रूकी है रेड लाइट पर कि‍ यकायक चल पड़ा है वाइपर! भीखू की हथेली पर पड़ी है चार बूँदें मचलकर अपनी बहन को दि‍खा रहा है, जो अभी छल्ले का करतब दि‍खाके स
 
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Jul 10 2009 05:46 PM
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ताकतवर-कमजोर और सही-गलत का युग्म क्‍या एक दूसरे के वि‍रोधी हैं?

जिंदगी के अनुभव के दौरान कई सवाल पैदा होते हैं। एक ऐसा ही सवाल जेहन में आता है- ताकतवर-कमजोर और सही-गलत का युग्म क्या एक दूसरे के वि‍रोधी हैं? जब मैं सही-गलत की बात सोचता हूँ तब डार्विन की बात याद आती है- वही जीवि‍त रह पाता है जो ताकतवर है। इसका मतलब
 
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जाऍं तो जाऍं कहॉं........

ऐसा लगने लगा है मनुष्य ने जहॉं-जहॉं पॉंव रखा है, वहॉं-वहॉ की प्रकृति‍ नष्ट हुई है। शि‍मला जाने का मन नहीं करता, न नैनीताल, अब हम प्रकृति के अनछुए प्रदेशों की तलाश में पहाड़ों को रौंद रहे हैं। वहॉं का पर्यावरण पर्याप्त दूषि‍त हो चुका है, हम अपने शहर स
 
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मसूरी: पास का सुहाना ढोल........

बारह साल पहले छात्र-जीवन की कंजूसी के तहत पहाड़ी यात्रा के सफर पर जब मैं चला था, तब इस दौरान बस-यात्रा और कई जगह मीलों पैदल चलने की मजबूरी ने मसूरी यात्रा को नागवार बना दि‍या था। तभी मैंने तय कि‍या था कि‍ अब बस की बेबस-यात्रा की बजाए कार से आऊँगा, बश
 
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ऊँट बैठा इस करवट....

हर मंगलवार वह दि‍ल्ली में ऊँट ढ़ूँढ़ता था, बड़ी मुश्कि‍ल से उसे एक ऊँटवाले के स्थायी नि‍वास का पता चला, और वह वहॉं नि‍यमि‍त रूप से हर मंगलवार को पहुँचने लगा। उसके पास दो ऊँट और एक रौबीला घोड़ा था। कि‍सी वयोवृद्ध पंडि‍त ने उसे सुझाया था कि‍ ऊँट को हर
 
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हाई-टेक होती जिंदगी में रि‍-टेक की गुंजाइश

एक ही व्‍यक्‍ति‍ अलग-अलग जीवन-स्‍ि‍थति‍यों में जीता है, अलग-अलग उम्र को जीता है और अपने फलसफे बनाता है.... या नहीं भी बनाता....। लेकि‍न फि‍तरत यही होती है कि‍ व्‍यक्‍ति‍ अपनी ही मूरत को बनाता है, सँवारता है, फि‍र उसे तोड़कर चल देता है। हमारा शहर फैलत
 
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चलो बुलावा आया है......

धर्म के बहाने यात्रा या यात्रा के बहाने धर्म का नि‍बाह हो जाना अच्छा लगता है। अगर धार्मिक स्थल पर भीड़ अपेक्षा के बि‍ल्कुल वि‍परीत हो, तो इसका भी अपना आनंद है। मैं बात कर रहा हूँ, वैष्णों देवी (जम्मू) की यात्रा की। कल शाम ही लौटा हूँ, शरीर पूरी तरह थ
 
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आपने बि‍याह कि‍या है या वि‍वाह !!

बेरोजगारी को आवारगी से जोड़कर देखा जाता है, इसलि‍ए कई मॉं-बाप अपने बच्चे को गॉव के पोखर के पास नीम तले ताश खेलते देख चिंति‍त होते रहते हैं। बूढ़ी काकी लड़के की अम्मा को सजेशन देती है बेलगाम बैल को खूँटी से बॉधकर रखना है तो उसकी शादी करा दो। शहर में ल
 
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Apr 14 2009 05:03 PM
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राह से गुजरते हुए.......

अजनबी हो जाने का खौफ बदनाम हो जाने से ज्यादा खौफनाक है। अकेले हो जाने का खौफ भीड़ में खो जाने से ज्यादा खौफनाक है। कि‍सी रास्ते् का न होना राह भटक जाने से ज्यादा खौफनाक है। तनाव में जीना असमय मर जाने से ज्या‍दा खौफनाक है। इनसे कहीं ज्यादा खौफनाक है-
 
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Apr 03 2009 01:40 PM
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घि‍से हुए जूतों की दास्‍तान !!

मेरे चमड़े पर कई झुर्रियाँ पड़ गई हैं, कमर भी झुक गई है। मेरे फीते की धज्‍जि‍यॉं भी उड़ गई हैं। मेरी आत्‍मा (सॉल) लगभग घिस चुकी है, उसके परखच्‍चे बस उड़ने ही वाले हैं। अपनी उम्र से ज्‍यादा मैं जी चुका हूँ। सन् 2004 की होली में मैंने मालि‍क के पैरों क
 
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‘’डॉन्‍ट बी संतुष्‍ट, थोड़ा और वि‍श करो’’

चीजें हासि‍ल होने के बाद धीरे-धीरे उसका सम्‍मोहन टूटने लगता है, दुनि‍या जि‍स तेजी से बदल रही है, स्‍वाद और जरू‍रतें जि‍स तेजी से बदल रही है, उसकी गति‍ का अंदाजा लगाना आसान नहीं है। 1984-85 में हॉस्‍टल के प्रार्चाय के पास टी.वी रि‍मोट देखा था जो दस मी
 
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Jan 12 2009 08:30 AM
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याद आती रही......

सर्दियों में कुहासे की चादर ओढ़े सुबह की धूप जैसे रेशम-सी नरम होती है, कि‍रणों के रेशे-रेशे में गरमाहट की जैसे एक आहट होती है, वैसे ही इस गॉंव की याद मन में एक कसक के साथ मौजूद रही। जब भी मैं अकेला हुआ, मुझे महसूस होता रहा कि‍ कुछ छूट रहा है........
 
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Jan 10 2009 07:10 AM
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पापा!

पि‍छले दस दि‍नों में मैंने जिंदगी का एक नया चेहरा देखा। काफी समय से सोच रहा था कि‍ मैं अपने पि‍ता के बारे में कुछ लि‍खूँ, मगर मालूम नहीं था कि‍ ये अवसर इस रूप में सामने आएगा। मैं उन बदनसीब बेटों में से एक हूँ जि‍न्‍हें अपने पि‍ता के साथ रहने का अवसर
 
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मारे गए संकोच में !!

त्‍योहारों पर उपहार/मि‍ठाई बॉंटने की परंपरा है, लेकि‍न मेरे शोध-नि‍र्देशक इस अवसर पर भी उपहार देने के लि‍ए मना करते हैं। पर यदि‍ काफी समय बाद जाओ और मौसम भी त्‍योहारों का हो तो सर के पास खाली हाथ जाना अजीब लगता है। तो एक बार त्‍योहार के अवसर पर मैं म
 
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प्‍ले-स्‍कूल का प्‍ले !!

हम अपने बच्‍चे को बड़ी आस से प्‍ले-स्‍कूल भेजते हैं कि‍ वहाँ वे शहरी परि‍वेश और तरह-तरह की गति‍वि‍धि‍यों से परि‍चि‍त होंगें। हमारे मन में ये भावना होती है कि‍ घर के भीतर घरेलू चर्चा-कुचर्चा से बच्‍चों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। लेकि‍न क्‍या प्‍ले-स्‍कूल
 
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शुक्र है, उनके हाथ में पि‍स्‍तौल नहीं था!!

सर्दि‍यों की रात थी, मैं करीब आठ बजे अपनी मोटर-साईकि‍ल से शक्‍ति‍नगर चौक से गुजर रहा था। मुझे एक जरूरी फोन करना था और मेरे पास मोबाइल नहीं था इसलि‍ए मैं एक टेलीफोन-बूथ के सामने रूका। हैलमेट उतार ही रहा था कि‍ संभ्रांत घरों के कुछ लड़के आसपास से दौड़त
 
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डब्‍बा पर्व और जेब में पटाखा !!

इस बार उत्‍तर प्रदेश, हरि‍याणा के चावल के खेतों से कीट-पतंगों की एक प्रजाति‍ दि‍वाली मनाने दि‍ल्‍ली आई थी और लगभग दो-तीन हफ्ते से दि‍ल्‍ली में डेरा डाले हुए थी। शाम को स्‍ट्रीट लाइट के नीचे से नि‍कलना दूभर हो जाता था, क्‍योंकि‍ ये ऑंख-मुँह,सर्ट में च
 
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सावधान !! यहॉं जेबरा क्रौसिंग नहीं होता !!

दृश्‍य 1 गाड़ी सडक पर अपनी रफ्तार से दौड़ी जा रही है, आगे मार्केट की भीड़ है। वहॉं कहीं भी जेबरा क्रौसिंग नहीं है, इसलि‍ए माना जाए कि‍ हर जगह जेबरा-क्रौसिंग है। एक संभ्रांत-सी दि‍खनेवाली महि‍ला अचानक कार के आगे आ जाती है, अचानक ब्रेक लेना पड़ता है, व
 
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और रोटी तो नहीं चाहि‍ए ?

इंसान के पास दो चीजें ऐसी है जि‍से अच्‍छे खुराक की सख्‍त जरूरत होती है- पेट और दि‍माग। आदि‍म युग का इति‍हास बताता है कि‍ वह पेट की आग ही थी, जि‍से बुझाने के लि‍ए तरह-तरह से दि‍माग लगाए गए। अब आदि‍म युग तो समाप्‍त हो चुका है,आज लोग दि‍माग लगाने में ज्
 
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प्‍लेटोनि‍क प्रेम ही असल प्रेम है, बाकी सड़कछाप !!

एक प्रसंग है- नायक अपनी प्रेमि‍का से पूछता है- क्‍या तुम मुझसे नफरत करती हो? नायि‍का कहती है- इतना प्रेम नहीं करती कि‍ तुमसे नफरत करुँ! यानी सच्‍चे दि‍ल से नफरत करनेवाला दरअसल उस चीज़ से कहीं भीतर तक जुड़ा होता है या आहत होता है पि‍छली पोस्‍ट में श्
 
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