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07 Jun 2010
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जूथिका राय के बहाने गुलाबी-नगर का सुनहरा सफ़र: दूसरा भाग।

अपनी पिछली पोस्‍ट में मैंने जयपुर-यात्रा का ब्‍यौरा दिया था। इसके बाद पंद्रह-बीस दिन बीत गए और जयपुर की यादों का अगला सिलसिला लिख ना सकी। सुबह पत्रकार-वार्ता और जूथिका जी से 'सुर-यात्रा' की अनौपचारिक मुलाक़ात संपन्‍न हुई। और हम होटेल वापस आ गए। मुंबई से
 
radiosakhi
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जूथिका राय के बहाने गुलाबी-नगर का सुनहरा सफर।

पिछले दिनों यूनुस जी को जूथिका रॉय के 91 वें जन्‍मदिन पर आयोजित कार्यक्रम के लिए जयपुर जाना था। प्रस्‍ताव सपरिवार आने का था। मैं उहापोह में थी और अंतिम दिन तक उहापोह में ही रही। पता नहीं, 'जादू' कैसा 'रिस्‍पॉन्‍ड' करेंगे। ख़ैर तय हुआ कि हम सभी
 
mamta singh
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ममता के 'जादू' की पहली सालगिरह

लगता है बस अभी की ही बात है । मैं बोरीवली के एक नर्सिंग-होम में 'इनके' साथ एन.एस.टी. करवाने गई थी । पिछले नौ महीने बेसब्री-बेचैनी-घबराहट-डर-आशंका-रोमांच में बीते थे । और अब इंतज़ार था नौ मार्च का । घर से निकली तो पता नहीं था कि 'जिन्‍हें' नौ मार्च को आना
 
ममता सिंह
टैग: जादू
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'मोहे पिछवरवा चंदन गाछ' और गांव की विकल याद--बतकही की पहली पोस्‍ट

एक दिन मैंने अपने पति महोदय से मीठी-सी शिकायत कर दी, ब्‍लॉग पर सबके लिए जाने कहां-कहां से ढूंढ-ढांढकर दुर्लभ गीत और भजन वग़ैरह-वग़ैरह पेश करते रहते हो, लेकिन मेरे लिए कुछ लोक-रचनाएं और कृष्‍ण भजन संकलित नहीं कर सकते । कहकर मैं तो भूल गई । कई दिन बीते
 
ममता सिंह
Dec 29 2009 11:58 AM
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हैलो हैलो टेस्टिंग टेस्टिंग

मैं हूं आपकी रेडियो-सखी ममता सिंह । और जल्‍द आ रही हूं अपना चिट्ठा -'बतकही' लेकर । ये एक टेस्टिंग पोस्‍ट है । तो आते रहिएगा 'ब‍तकही' के लिए ।
 
ममता सिंह
Dec 29 2009 11:58 AM
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बतकही

 
ममता सिंह
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बतकही

 
ममता सिंह
Dec 29 2009 11:58 AM
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लसोढ़े के अचार, बेर के चूरन और कुल्‍हड़ों वाली शाम

इलाहाबाद गई थी तो प्रतापगढ़ वाले जीजा बोले--'ममता अचार तो नहीं चाहिए । कहो तो ला दें ।' अचार मेरी कमज़ोरी रहा है । जब 'प्रेग्‍नेन्‍ट' थी तो किसी ने वादा किया था कि आपके लिए 'लसोडे़' का अचार भेजेंगे । ये अचार ना आना था ना आया । बहरहाल.....कल के अख़बार
 
ममता सिंह
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डायरी के कुछ पन्‍ने--'मां के जाने के बाद' ।

मां के अवसान को मन जैसे पूरी तरह स्‍वीकार नहीं कर पाया है । कंप्‍यूटर पर उनकी तस्‍वीर देखूं तो अचानक ही 'इनसे' कहने लगती हूं कि मां ऐसा कहती हैं, वो वैसा कहती हैं । 'हैं' से उनके अचानक 'थीं' हो जाने को कैसे स्‍वीकार करूं । इन दिनों जो डायरी लिखी, उसक
 
ममता सिंह
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डायरी के कुछ पन्‍ने-'मां का विदा हो जाना'

पिछले कुछ महीनों में मन जैसे भर-सा गया है । मां की बीमारी और फिर उनके अवसान के दिनों में मैंने जो डायरी लिखी उसके कुछ पन्‍ने यहां छाप रही हूं । पिछले पन्‍ने पर मैंने मां की बेबसी, बीमारी और उनके व्‍यक्तित्‍व के कुछ पहलुओं को उजागर किया था । अब आगे...
 
ममता सिंह
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डायरी के कुछ पन्‍ने : 'मां की बीमारी'

पिछले कुछ महीनों में मन जैसे भर-सा गया है । मां की बीमारी और फिर उनके अवसान के दिनों में मैंने जो डायरी लिखी उसके कुछ पन्‍ने यहां छाप रही हूं--ममता मुझे लगता है कि उम्र के एक पड़ाव पर आकर हर कोई एकाकी हो जाता है । किसी बुज़ुर्ग को अगर क़रीब से देखें
 
ममता सिंह
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उत्‍सव का मौसम या शोर का मौसम

इन दिनों नवरात्र चल रहे हैं और कहीं पर दुर्गा-पूजा का उत्‍साह है तो कहीं पर गरबा की धूम । ऐसे में मुंबई का  नज़ारा ही कुछ और होता है । हालांकि आजकल मुंबई की तर्ज़ पर छोटे-शहरों में भी गरबा और डांडिया का आयोजन होने लगा है । लेकिन नवरात्र के दिनों में
 
ममता सिंह
टैग: अनुभव
Sep 24 2009 07:15 AM
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आज बोधिसत्‍व और आभा की 'भानी' का जन्‍मदिन है

आज 'भानी' का जन्‍मदिन है । आप सोच रहे होंगे कि ये 'भानी' कौन है । दरअसल भानी हमारे मित्रों बोधिसत्‍व और आभा की प्‍यारी सी बेटी और हमारी फ्रैन्‍ड है । जी हां भानी हमारी फ्रैन्‍ड हैं । इत्‍ती-सी फ्रैन्‍ड । ये जो तस्‍वीर है ये तब की है जब पिछली बार भानी
 
ममता सिंह
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वो जमुना का पानी, वो इलाहाबाद की यादें ।

बात उस समय की है, जब मैं अपने मायके इलाहाबाद पहली बार अपने पतिदेव को लेकर गई । यूं तो इलाहाबाद का चप्‍पा-चप्‍पा मेरा घूमा हुआ है, बल्कि यूं कहें कि इलाहाबाद का चप्‍पा-चप्‍पा मेरी रग-रग में....मेरी सांसों में बसा है । लेकिन इनके साथ इलाहाबाद घूमने का
 
ममता सिंह
Feb 01 2009 10:59 AM
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पत्‍थरों के शहर में एक मासूम-सी ख़्वाहिश

रविवार की शाम घर पर रहें तो बहुत उबाऊ और उदास-सा लगता है । रविवार की शाम घर से बाहर जायें तो ट्रैफिक और भीड़भाड़ तंग करती है । सारा मुंबई शहर अपने 'वीक-एंड' को रंगीन बनाने के लिए हड़बड़ा-सा भागता दिखता है । सोमवार से शुक्रवार तक दफ्तर की भागदौड़ और '
 
ममता सिंह
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अभी अलविदा ना कहो दोस्‍तो--महेंद्र कपूर से रेडियोसखी की वो बतकही ।

टेलीविजन के चैनल बदलते हुए जैसे ही खबर सुनी के महेंद्र कपूर नहीं रहे, हाथ एक बारगी थम गया । आंखें परदे पर ठिठक गयीं । खबर मिली कि वो चौहत्‍तर बरस के थे  । उन्‍हें सन 1968 में फिल्‍म उपकार के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार
 
ममता सिंह