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प्रतीक माहेश्वरी

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02 Jun 2010
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एक दृढ़ फैसला

मोहित एक सर्वगुण और सम्पूर्ण परिवार का लाडला बेटा था | बड़ा भाई डॉक्टर बन गया था और बड़ी बहन भी अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने ससुराल जा चुकी थी | मोहित पिछले ५ सालों से बाहर ही था और अपनी पढ़ाई ख़त्म करके वो वापस घर आया था |मोहित में बदलाव ज़बरदस्त था और
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सिर्फ एक बार !

काफी दिन हो गए कुछ लिखे हुए.. आपसे गुफ्तगू किये हुए.. काफी व्यस्त था नौकरी की खोज में और आखिर में मैं भी बाबू बन ही गया.. आप सभी की दुआ के लिए शुक्रिया..मैं कभी भी सोच कर नहीं लिखता हूँ.. कभी मेरे आस-पास कुछ होता है तो लिखता हूँ.. यूँ कहें कि लिखते-लिखते
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एक महत्त्वपूर्ण संकल्प

ठीक साल भर बाद इसी दिन एक और पोस्ट..पता नहीं इस दिन क्यों लिखना चाहता हूँ पर चाहता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ..पर इस बार कुछ अलग.. बदलाव आवश्यक है और निरंतर है.. एक साल में मैं भी बदला हूँ, दुनिया भी..बिट्स में भी बदलाव आ रहा है.. आशा है अच्छे के लिए ही
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आपत्ति

ऋषि फ़ोन पर बात कर रहा था, अपनी गर्लफ्रेंड, प्रीती से..प्रीती उसे कह रही थी कि वो सुबह जल्दी उठा करे और इसके फायदे और निशाचर होने के नुक्सान बता रही थी..ऋषि पूरे तन्मयता के साथ सुन रहा था.. आधे घंटे तक सुना..उनके इस रिश्ते के बारे में ऋषि की माँ को पता
Mar 02 2010 11:37 PM
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व्यापार बढ़ ही रहा है..लोग बन ही रहे हैं !!

कुछ लिखने कि इच्छा तो नहीं थी पर फिर सोचा अच्छा दिन है.. लिखना चाहिए..लिख इसलिए नहीं रहा हूँ कि आज वैलेनटाइन्स डे है... बस कुछ सोच को शब्दों का रूप देने के लिए लिख रहा हूँ..कुछ लोग एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं.. इस तरह - स्वतंत्र दिवस मुबारक हो.. अर्थात
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ओ साथी रे

अभी लिखने की इच्छा नहीं है.. अभी बेरोजगार हूँ तो ये आलम है.. जब रोज़गार पा जाऊंगा तो पता नहीं कैसे लिखूंगा..खैर इस पोस्ट में केवल एक गाना पोस्ट कर रहा हूँ.. पसंद आये तो बताइयेगा..गाना यहाँ से सुनिए : ओ साथी रे (प्रतीक माहेश्वरी)बोल यहाँ पर देखें : ओ साथी
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जैसे को तैसा..

आज कुछ पढ़ रहा था अंतरजाल पर.. बहुत ही अच्छी कहानी.. कुछ कुछ सच भी.. तो सोचा कि आप सभी के साथ बाटूँ..कहानी कुछ ऐसी थी:एक बुज़ुर्ग अपने बेटे के यहाँ रहने गया, विलायत...बेटे की शादी हो चुकी थी और बेटा भी था, ४ साल का..बुज़ुर्ग पर उम्र काफी हावी हो चुकी थी..
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मुझे नौकरी चाहिए..

कैम्पस पर वापस आ कर घर जैसा लग रहा है.. जहाँ किसी बात की कोई चिंता नहीं है.. जब मन करे सो जाओ.. और जब मन करे, उठो..खाना खाया? कोई पूछने वाला नहीं.. नहाया? कोई पूछने वाला नहीं.. और ना ही पूछने वाली :)यहाँ से दूर रहकर ज़िन्दगी कैसी होती है.. इसका अंदाज़ा तो
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अँधा कौन ?

बचपन उस अंधे को देखकर यौवन हो गया था...जब अंकुर अपनी माँ के साथ मंदिर से बाहर आता तो उसे देख कर विस्मित हो जाता.. उसे दुःख होता...एक दिन वह अपने दुःख का निवारण करने उस अंधे के पास पहुंचा..पहुंचा और बोला - "बाबा, अँधा होने का आपको कोई गम है?"अँधा बोला -
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स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

दिल में जोश भरे बढ़ रहे हैं हम मतवाले लक्ष्य की ओर.. देखो ज़रा संभल के चलना कोई काटे न यह एकता की डोर.. अपने साथ-साथ इस देश को भी सुन्दर और भव्य बनाना है.. हर बुराई को दूसरों से पहले खुद में से मिटाना है.. जब ज़हन में हर वक़्त रहेगी स्वच्छता की बात..
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गिनती ज़िन्दगी की

बच्चे थे तो टॉफियाँ गिना करते थे, थोड़े बड़े हुए तो दोस्त गिना करते थे, स्कूल पहुंचे तो हाथों पर छड़ियाँ गिना करते थे, कॉलेज आए तो मार्क्स गिना करते थे, थोड़े और बड़े हुए तो गर्ल-फ्रेंड्स गिना करते थे, नौकरी लगी तो तरक्कियां गिना करते थे, शादी हुई तो
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लडकियां बनाम समाज

बस खचाखच भरी थी और लोग जैसे तैसे अपने से ज्यादा अपने जेबों को संभाल रहे थे.. तभी निशा बस में चढ़ी क्योंकि उसे दूसरे बस के जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी.. एक नवयुवक ने नवयुवती को देखा तो झट खड़ा होने को आया.. और कहा - "आप बैठिये, मैं खड़ा हो जाता हूँ |" नि
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कुछ अपने मन की

वो महफ़िल में आये, और दिल-ए-महफ़िल को चुरा ले गए.. आलम ऐसा हुआ इस महफ़िल का, हम पानी को शराब समझकर पी गए... हम निकले थे ज़माने को अपना बनाने.. हम निकले थे ज़माने को अपना बनाने.. पर पूरी कायनात में कोई बेगाना ही ना मिला... इन हसीनों के भंवर में ना पड़ बन्दे
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घूसखोर भगवान

हमारी आदत ही हो गयी है.. जो नेता दिखे - घूसखोर है.. जो पुलिस वाला दिखा - घूसखोर है... जो सरकारी कर्मचारी दिखे - घूसखोर है.. माना की इन सब मामलों में हमारे तुक्के सत-प्रतिशत सही बैठते हैं.. पर कुछ दिनों पहले दुनिया का सबसे बड़ा घूसखोर खोजा मैंने.. हुआ
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जिस दिन वीरों का जलसा निकला है

यह कविता २६/११ के नाम.. केवल लिखने के लिए नहीं.. कुछ करने के लिए भी.. आप भी आज ही से सिर्फ अपने बारे में ही न सोचकर उन लोगों के बारे में भी सोचिये जिनके पास आपकी सोच तक भी पहुँचने के सही मार्ग नहीं है... साक्षरता देश और दुनिया दोनों का उद्धार कर सकता
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धर्म से कमाई या कमाई का धर्म?

बात चल रही थी कि फलाने मंदिर में लोग ६-७ घंटे भगवान के दर्शन [दर्शन क्या.. एक झलक ही समझ लीजिये] के लिए पंक्तियों में खड़े रहते हैं.. फिर ऊपर से खूब चढ़ावा भी होता है.. सुना था मंदिर वो जगह है जहाँ पूरे दिन का थका हुआ आदमी जाता है तो थकान मिट जाती है.
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50-50

पिछले पोस्ट में नीरज त्रिखा ने जो कहा उससे तो बिलकुल सहमत हूँ और हाँ बात सिर्फ कह देने से समाप्त नहीं हो जाती, वरन उस पर अमल होना चाहिए, तभी कही हुई बात लाजवाब हो जाती है अन्यथा बेबात! अब बारी इस पोस्ट की.. कुछ दिनों पहले मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ
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हिन्दी - ठंडा.. पर अंग्रेजी - कूल !!

आज यह लेख पढ़ रहा था.. तो सोचा कि चूँकि मैंने अपने पिछले पोस्ट में अब क्रियाशील होने की बात कही है तो उसे पूरा क्यों ना करुँ भला? सबसे पहले ये बता दूं पिछले पोस्ट में मुझे यह टिप्पणी मिली.. उसका उत्तर दे देता हूँ.. जनाब 1 बात मेरे अन्दर घर कर गयी है..
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बेवकूफ लड़कियां..नींद की कड़कियां

लग रहा है कि बहुत सालों बाद इस ब्लॉग पर कुछ डाल रहा हूँ. वैसे मेरा ही लफ्जों का खेल वाला ब्लॉग तो हमेशा ही अद्यतन होता रहता है.. और कल ही यहाँ पर भी कुछ डाला है.. पर मेरा खुद का ब्लॉग ही सूना पड़ा है.. तो आज इसका रुदन दिल तक पहुंचा और मैं आ गया फिर स
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जय हिन्दी हो !!

तो जनाब हिन्दी दिवस तो निकल गया पर हम वो थोड़े ही ना हैं जो हिन्दी केवल हिन्दी दिवस वाले दिन ही पढ़ते, लिखते या बोलते हैं... अब जब भारतीय फिरंगियों को (जिन्हें हिन्दी आती ही नहीं) रत्ती भर इस बात का गम नहीं है कि अपनी मातृभाषा ही नहीं आती है तो हम भी कम
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YSR - जीवित या मृत ?

 श्रद्धांजलि और नमन पोस्ट का शीर्षक पढ़कर चौंकिए मत..मैं कोई जासूसी भरी पोस्ट नहीं कर रहा हूँ.. क्योंकि जासूसी आती नहीं और कोशिश की थी तो मुंह की खानी पड़ी थी (पूछियेगा मत किस तरह की जासूसी) पिछले हफ्ते बहुत हल्ला हुआ.. हर जगह, हर टीवी चैनल, हर
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हिंगलिश को भूल जाइए

आज एक तकनीकी पोस्ट कर रहा हूँ..वैसे तो बहुत दिन हुए ढंग से ब्लॉगिंग किये हुए पर देर आये दुरुस्त आये..दिमाग में बहुत हलचल मची हुई है और मन कुड़-बुड़ कुड़-बुड़ कर रहा है... तो जनाब अपना धैर्य ठीक उसी तरह बनाए रखिये जैसे हमने राखी का स्वयंवर देखते हुए रखा
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जन्माष्टमी की शुभकामनाएं

जब जनम हुआ इस नटखट का | तब जहां पूरा खिलखिलाया || इसके चंचल बचपन में |पूरा गोकुल भरमाया || मीरा राधा खो गयी |ऐसी प्रीत लगाई || हर बुराई का नाश किया |दुनिया को सीख सिखाई || तुम चंचल, प्यारे, निडर बनो |बस यही गीता का सार || मुबारक हो आपको जन्माष्टमी का
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A Stupid Common Man

तो जनाब सब कैसे हैं ? पता नहीं अब यह ब्लॉग कोई पढ़ेगा भी या नहीं.. बिलकुल ठप्प पड़ा है.. जैसे कोई सरकारी कार्यालय हो.. करें भी क्या ? परीक्षाओं के बाद घर पहुँच गए और फिर वहां इतना आराम फरमाया है साहब जैसे की खरगोश आधे साल काम कर के सोने चला गया हो.. ख
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प्यार, यार, वार !!

पिछले एक पोस्ट में मैंने बिट्स में भारतीय संस्कृति को बचाए रखने पर यहाँ के छात्रों की तल्लीनता पर प्रकाश डाला था पर आज अफ़सोस कि एक अँधेरा सा छा रहा है उस पोस्ट पर, इस संस्कृति पर और हमारी काबिलियत पर | आज हमारे फाईनल एक्ज़ाम ख़त्म हुए हैं और तभी फुर्स
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बेईमान तूफ़ान

बिखरते पत्तों का चेहरे पर लगना, ठंडी हवा का ज़ुल्फों को चूमना, खुशबू मिट्टी की तन में उतरना और हमारा सड़कों पर बेफिक्री से भीगना.... आज मौसम बड़ा बेईमान है , आया यहाँ कोई तूफ़ान है ... ढलता सूरज नहीं, यह तो बादल का आंचल है, यह सन्नाटा सुनसान नहीं, बस आ
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ओ माझी रे - विडियो

यहाँ आज इन्टरनेट स्पीड इतनी अच्छी आ रही है की पहला विडियो अपलोड करने में कामयाब हुआ हूँ .. यह मेरे द्वारा गाया गया गाना है जो कि द बॉंग कनेक्शन फ़िल्म से है और गाने का नाम : ओ माझी रे है | मूलतः शान ने इसे गाया है | आशा करता हूँ की यह आपको पसंद आएगा
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हाँ माँ तुम ही हो

यह छोटी सी कृति मेरी माँ के जन्मदिन पर लिख रहा हूँ... बस अपने भावों को कुछ शब्द देने की कोशिश कर रहा हूँ... बहुत मुश्किल है उस अन्दर छुपे अनंत भाव को शब्दों में बदलना... बस एक कोशिश है... सूरज की गर्मी और भव्यता हो तुम आसमान की नीलाई और विशालता हो तु
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जंग का मैदान, मन है शैतान

हाँ मुझे पता है इस बार काफी देर हुई है कोई पोस्ट करने में | मैं आलसी नहीं हूँ पर क्या करुँ बीच में हमारा तकनीकी महोत्सव, अपोजी आ गया और सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि कोई विषय ही नहीं मिल रहा था | पर आज अंततः मेरी और मेरे प्रिय दोस्तों की एक ना छूटने वाल
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आज मेरा दिन है

मैं बस चला जा रहा था... बस चला जा रहा था और सोच रहा था कि एक साल और चला गया... हाँ पूरा एक साल ...रात के १२ पार हो चुके थे और मैं ऑल नाईट कैंटीन से वापस आ रहा था... अकेला ... आज पता नहीं क्यों लगा की लंबे रास्ते से जाना चाहिए... मैं ख़ुद से बातें करन
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इमोशनल अत्याचार नहीं....प्यार...

शायद इस पोस्ट को कुछ दिन पहले ही आ जाना चाहिए था...अब इसका विषय ही कुछ ऐसा है... नहीं नहीं, मैं गलत हूँ... इस पोस्ट का विषय ऐसा है जो हर मौसम, हर परिस्थिति और हर जगह पर चर्चा का विषय है.. और चूँकि मैं अपने बड़े भाई की शादी में व्यस्त था, इसलिए वो विश
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संस्कृति ? या सिर्फ़ मजाक ?

अभी अभी ऑडी हो कर आ रहा हूँ... बस यूँ ही चल पड़ा था... देखने कि कैसी तैयारियां चल रही हैं ... कल संस्थापक दिवस पर होने वाले वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम की... अब साहब यूँ समझ लीजिये की कुछ छुपे हुए कलाकार [कलाकार ?? जाने भी दो ...] अपने आपको किसी तरह उस
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जय हो माल - जय हो !!!

आइये जनाब आज आप लोगों को बिट्स के महलों की बात बताएं : जिस तरह राजाओं का राजा होता है महाराजा उसी तरह बिट्स में भवनों का राजा है : पंडित मदन मोहन मालवीय भवन [ओह्ह आपको नहीं पता ये कौन सा भवन है ?? ये है माल भवन] | यहाँ पर हम प्यार से (सही में प्यार स
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Hungry Kya ??

सोया था मैं टुन्न [अरे साहब खाना खा कर (क्या सोच रहे हैं आप ??)] हो कर, खोने को किसी की यादों में... पर कमबख्त कुछ समाचार ने, लगा दी है आग यादों में... क्या खोने में सोये थे, और किस उलझन में खो गए हैं... कोई तो कुछ उपाय बताओ, अजीब मुसीबत में फंस गए ह