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नदिया बहती जाए

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08 Mar 2010
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वेरा, उन सपनो की कथा कहो

8 मार्च, महिला दिवस पर पत्रकार-कवि-प्रकाशक मित्र आलोक श्रीवास्तव ( मुंबई वाले) की स्त्री को केंद्र में रखकर लिखी गईं कविताएं मुझे बहुत पसंद हैं। मैं अपने लेखो में इनका जिक्र भी करती रहती हूं। उनका कविता संग्रह वेरा, उन सपनो की कथा कहो(संवाद प्रकाशन) से
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ब्लागर दोस्तो को मेरी तरफ से होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं---गीताश्री

होलिका के अवसर परडा. कुमार विश्वासआज होलिका के अवसर पर जगे भाग गुलाल के ,जिस ने मृदु-चुम्बन ले डाले हर गोरी के गाल के ........!आज स्वर्ग से इन्द्र-देव ने रँग बिखेरा है इतना,गीता में श्रद्धा जितनी और प्यार तिरंगे से जितना ,इसी रँग को मन में धारे, फाँसी
Feb 26 2010 01:20 PM
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स्नोवा का पत्र, उपन्यास अंश और सैन्नी का स्नेह

दोस्तो, मुझे हाल ही में यह मेल मिला है..पत्र इतना दिलचस्प और आत्मीय है कि पढकर मुझे लगा मैं इसे सार्वजनिक करुं..स्नोवा का अस्तित्व हो या ना हो..उनकी कहानियां तो हैं..वे बोलती हैं...साल भर बोलती रहीं..छपती रहीं..सराही जाती रहीं..मैं साहित्य पेज देखती हूं
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नए साल की शुभकामनाएं

कविता-- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना नए साल की शुभकामनाएं ! खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को नए साल की शुभकामनाएं ! जांते के गीतों को बैलों की चाल को करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को नए साल की शुभकामनाएं ! इस पकती रोटी
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यहां सरकार भी डूब गई...

बिहार की बाढ़ के इन दृश्यों में जो कुछ है, वह हम सब को कहीं गहरे तक हिला देता है. अबकि बिहार की बाढ़ में सब कुछ डूब गया- आदमी, घर, आंगन, पेड़, बगीचे, संवेदना....औऱ सरकार भी.
Dec 29 2009 11:55 AM
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बेचैन बहुत फिरना

इधर कुछ मित्रों ने पूछा, नदी की रवानगी में क्या-क्या शामिल है ? जाहिर है, मेरे पास एक ही उत्तर था- जिंदगी. नदी का होना जिंदगी की तरह ही तो है. आज सुबह से मुनीर नियाजी को पढ़-सुन रही थी. मुनीर नियाजी को पढ़ते-पढ़ते जिंदगी के कुछ और रंग सामने आए. कुछ ज
Dec 29 2009 11:55 AM
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तैरने वाला समाज डूब रहा है

बाढ़ अतिथि नहीं है. यह कभी अचानक नहीं आती. लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है. इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं. इसलिए अब बाढ़ की मारक क्षमता बढ़ चली है. हमारा समाज इससे खेलना जानता
Dec 29 2009 11:55 AM
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पानी बढ़ रहा है

अबकी कोसी अपने पुराने रास्ते पर लौटी है, पूरे सौ साल बाद और बिहार का एक बड़ा हिस्सा डूब रहा है. अपने गांव, घर, चूल्हे, खिडकी-दरवाजों को इंच-इंच डूबते हुए देखना-एक त्रासदी है. पानी अपने एक नये रूप में मिल रहा है- अनेक पीढियों को. लोग पोटलियों में अपना
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We’re in the same boat brother

बिहार का बाढ़ और देश के एक बड़े हिस्से में चुप्पी. मन दहल गया. जाने कैसे पॉल राबसन का ये गीत कल से ही घुमड़ रहा है. We’re in the same boat brother, We’re in the same boat brother, And if you shake one end, You gonna rock the other It’s the same boat
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मेघा छाए आधी रात

मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया बता दे मैं क्या करूँ मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया सब के आंगन दिया जले रे, मोरे आंगन जिया हवा लागे शूल जैसी, ताना मारे चुनरिया कैसे कहूँ मैं मन की बात, बैरन बन गयीं निंदिया, बता दे मैं क्या करूँ मेघा छाए आध
Dec 29 2009 11:55 AM
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आज भी खरे हैं तालाब

जल संरक्षण के क्षेत्र में असाधारण काम करने वाले अनुपम मिश्र की 1993 में छपी किताब 'आज भी खरे हैं तालाब' कम असाधारण नहीं है. जाने कितनी भाषाओं में कितनी-कितनी बार इस किताब के संस्करण छपे और पानी के लिए तरसने वाले समाज को राह दिखाने का काम करते रहे. अन
Dec 29 2009 11:55 AM
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तुमने भी भूल जाने का वादा कहॉ रखा

तस्वीर pdnedu.blogs.com से साभार सागर रखे , जमीं रखी, आसमान रखा, पर वजूद खुद का खुदा ने निहा रखा हम तुम्हारी यादों से बाहर ना आ सके , तुमने भी भूल जाने का वादा कहॉ रखा !! -नामालूम
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नदिया किनारे हे राई आई कंगना

सत्तर के दशक में अभिमान बनी थी. मजरुह साहब ने लिखा और एसडी बर्मन ने सुर दिए. नदी फिर-फिर अमर हो गई और नदी के बहाने ये गीत. हे नदिया किनारे हे राई, आई कंगना ऐसे उलझ गए, अनाड़ी सजना नदिया किनारे ... काहे पनघट ऊपर, गई थी चलके अकेली मारे हँस हँस ताना, सार
Dec 29 2009 11:55 AM
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अयप्पा पणिक्कर की एक कविता

नदी किनारे तुम्हे याद है वह दिन जब तुम मुझे अपने गाँव नदी किनारे ले गए थे? कल मैं वहाँ पहुँची थी सपने में एक नाव आई तुम उससे उतर कर आए मैंने पूछाः- दोस्त तुम कहाँ चले गए थे? तुमने बस इतना ही कहाः- जरा टहलने गया था तो फिर अब लौट कैसे आए ? मैंने कहा तु
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इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है, नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है। एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों, इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है। एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी, आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है। एक चादर साँझ ने सारे
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गंगा बहती हो क्यों

रचना: पंडित नरेंद्र शर्मा स्वर: भूपेन हजारिका विस्तार है अपार प्रजा दोनों पार करे हाहाकार निःशब्द सदा ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों नैतिकता नष्ट हुयी, मानवता भ्रष्ट हुयी निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों इतिहास की पुकार करे हुंकार ओ गंगा की धार निर्बल ज
Dec 29 2009 11:55 AM
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जरुरी है गंगा को बचाना

राजेंद्र सिंह हिमालय के शिखर गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी में मिलने वाली गंगा भारतवासियों के लिए धार्मिक एकता, श्रद्धा, सनातन महत्व, आध्यात्मिक और पतितपावनी के रूप में पूज्य है. इसमें दो राय नहीं कि इसके तट पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ
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परवीन शाकिर की एक ग़ज़ल

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक1 हो गये मौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक2 हो गये बादल को क्या ख़बर है कि बारिश की चाह में कितने बलन्द-ओ-बाला शजर ख़ाक हो गये जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गये लहरा रही है बर्फ़ की चादर हट
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नदी से पहली मुलाकात

चन्दा मामा आरे आवऽ पारे आवऽ नदिया किनारे आवऽ दूध भात ले ले आवऽ बबुआ के मुँहवा में गुटुक
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अयोध्या--कुछ कविताएं

वरिष्ठ कवि-पत्रकार सुधीर सक्सेना इन दिनों दिल्ली से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका इंडिया न्यूज(हिंदी) के संपादक हैं। भावुकता उनके स्वभाव में हैं और संवेदना लेखन में। यारों के यार हैं। भा गए तो दुनिया उड़ेल देंगे, त्रस्त हुए तो उदासीनता बरत लेंगे. हर
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स्मिता पाटिल की याद में, एक कविता

दिसंबर, 1986 को स्मिता पाटिल इस दुनिया से चली गईं। उनके सैंकड़ो दीवाने-प्रशंसको में से एक आबूधाबी में रहने वाले अपने मित्र-साहित्यकार कृष्ण बिहारी जी भी हैं। उसी दिन उनकी आह सो जो गान (कविता) उपजा , उसे उतने सालों बाद प्रकाशित करने का आज मौका आया है।
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चकाचौंध में लौ की तलाश

सुमंत भट्टाचार्य कोई पांच साल पहले दीवाली से दो-एक रोज पूर्व मेरी आठ साल की बेटी अक्षरा ने पूरे जोश के साथ फरमाइश रखी कि दीवाली पर पूरे घर (दरअसल फ्लैट) को बिजली की लडिय़ों से सजाएंगे। हामी भरने के बावजूद मैं खुद को बेटी के जोश में शामिल ना पा सका। या
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अभिजीत घोष की कविताएं

मेरे मित्रों की सूची में अभिजीत भी शामिल है। वह पिछले 18 सालों से पत्रकारिता में है। इन दिनों टाइम्स आफ इंडिया से जुड़े हैं। सिनेमा का रसिया है, जानकार है, और भीतर उतरने-डूबने की चाहत रखता है...कभी कविता लिखने का शौक था। अब उपन्यास लिखने की चाहत है।
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हेमंत शर्मा की कविताएं

ये हेमंत हैं, दोस्त, हैं...पत्रकार हैं...ये कवि भी हैं, आपकी तरह पहली बार मुझे भी पता चल रहा है। एक कहानी जरुर लिखी थी, जो हमने अपने ब्लाग नुक्कड़ पर छापी है। कविता पहली बार...इनमें स्मृतियों का करुण विलाप है, जीवन की बेतहाशा भागदौड़ में पीछे छूट गए
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Paul Robeson - Ol' Man River

Ol' man river,Dat ol' man river He mus'know sumpin'But don't say nuthin',He jes'keeps rollin'He keeps on rollin' along.He don' plant taters/tators,He don't plant cotton,An' dem dat plants'emis soon forgotten,But ol'man river,He jes keeps rollin'along.You
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वारी जाउं रे, बलिहारी जाउं रे....

नदी इस बार पहुंची मरु प्रदेश में. सूखी-तपती रेत और वैसी ही रेत उड़ाती हवा. जाने कौन-सी बेचैनी है इस हवा में.... इन्हीं रेत लहरियों में कहीं गूंजती है कोई संगीत लहरी और हवा रुक जाती है. एकदम चुप. जैसे साक्षी भाव से पहर-दो पहर ठहर कर इन संगीत लहरियों क
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