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16 Jun 2010
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बचपन

याद बहुत आती बचपन की।जब करीब पहुँचा पचपन की।।बरगद, पीपल, छोटा पाखर।जहाँ बैठकर सीखा आखर।।संभव न था बिजली मिलना।बहुत सुखद पत्तों का हिलना।।नहीं बेंच था फर्श भी कच्चा।खुशी खुशी पढ़ता था बच्चा।।खेल कूद और रगड़म रगड़ा।प्यारा जो था उसी से झगड़ा।।बोझ नहीं था सर
 
श्यामल सुमन
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प्रियतम होते पास अगर

प्रियतम होते पास अगरमिट जाती है प्यास जिगरढ़ूँढ़ रहा हूँ मैं बर्षों सेप्यार भरी वो खास नजरटूटे दिल की तस्वीरों का देता है आभास अधरगिरकर रोज सम्भल जाएं तोबढ़ता है विश्वास मगरतंत्र कैद है शीतल घर मेंजारी है संत्रास इधरलोगों को छुटकारा दे दोबन्द करो बकवास
 
श्यामल सुमन
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ज़िंदगी

आग लग जाये जहाँ में फिर से फट जाये ज़मीं।मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।आँधी आये या तूफ़ान बर्फ गिरे या फिर चट्टान।उत्तरकाशी भुज लातूर सुनामी और पाकिस्तान।।मौत का ताण्डव रौद्र रूप में फँसी ज़िंदगी अंधकूप में।लाख झमेले आने पर भी बढ़ी ज़िंदगी छाँव धूप
 
श्यामल सुमन
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राष्ट्रवादी

तनिक बतायें नेताजी, राष्ट्रवादियों के गुण खासा।उत्तर सुनकर दंग हुआ और छायी घोर निराशा।।नारा देकर गाँधीवाद का, सत्य-अहिंसा क झुठलाना।एक है ईश्वर ऐसा कहकर, यथासाध्य दंगा करवाना।जाति प्रांत भाषा की खातिर, नये नये झगड़े लगवाना।बात बनाकर अमन-चैन की, शांति-दूत
 
श्यामल सुमन
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सिफर का सफ़र

नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र हैइशारे समझने का अपना हुनर हैसितारों के आगे अलग भी है दुनियानज़र तो उठाओ उसी की कसर हैमुहब्बत की राहों में गिरते, सम्भलतेये जाना कि प्रेमी पे कैसा कहर हैजो मंज़िल पे पहुँचे दिखी और मंज़िल।ये जीवन तो लगता सिफर का सफ़र है।।रहम की
 
श्यामल सुमन
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अस्पताल बीमार

पैरों की तकलीफ से वो चलती बेहाल।किसी ने पीछे से कहा क्या मतवाली चाल।।बी०पी०एल० की बात कम आई०पी०एल० का शोर।रोटी को पैसा नहीं रन से पैसा जोड़।।दवा नहीं कोई मिले डाक्टर हुए फरार।अब बीमार जाए कहाँ अस्पताल बीमार।।भूल गया मैं भूल से बहुत बड़ी है भूल।जो विवेक
 
श्यामल सुमन
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नित नित

पूरे होते उसके सपने लगन हो जिसमे खास।कहीं अधूरे हों सपने तो जीवन लगे उदास।हों पूरे या रहे अधूरे मरे कभी ना सपना,जीवन में नित नित बढ़ते हैं सपनों से विश्वास।।आम-आदमी के जीवन से हुआ आम अब दूर।दाम बढ़े हैं आम के ऐसे आम-लोग मजबूर।सरकारें तो आम-लोग की शासक
 
श्यामल सुमन
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आईना से बहाना क्यूँ है

खुशी से दूर सभी फिर ये ठिकाना क्यूँ है?अमन जो लूटते उसका ही जमाना क्यूँ है?सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहतेरू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?धुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते हीहजारों लोगों को नित गंगा नहाना क्यूँ है?इस कदर खोये हैं अपने में कौन सुनता
 
श्यामल सुमन
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टिप्पणी करना सीख

टिप्पणी पाने के लिए टिप्पणी करना सीख।बिन माँगे कुछ न मिले मिले माँगकर भीख।।पोस्ट जहाँ रचना हुई किया शुरू यह खेल।जहाँ तहाँ हर पोस्ट पर कुछ तो टिप्पणी ठेल।।कहता रचनाकार क्या, क्या इसके आयाम।"नाईस", "उम्दा" कुछ लिखें चल जाता है काम।।आरकुट और मेल से माँगें
 
श्यामल सुमन
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प्यार लगता उधार

कैसे कहते कि मुझको जमाने से प्यार।भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।प्रेम सचमुच जगत में बहुत अनमोल।जिसमें दुनियाँ समायी है आँखें तो खोल।फिर भी दिखता हो नफरत तो जीना बेकार।कैसे कहते कि मुझको जमाने से प्यार।भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।जिन्दगी जंग ऐसा कि
 
श्यामल सुमन
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जिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा--

वो घड़ी हर घड़ी याद आती रहेगम भुलाकर जो खुशियाँ सजाती रहेजिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहाराख बन के भी खुशबू लुटाती रहेकभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहींघण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहेप्यार सागर से यूँ है कि दीवानगीमिल के खुद को ही नदियाँ मिटाती रहेडालियाँ सूनी
 
श्यामल सुमन
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कितना कठिन है यारो

इक दीप को जलाना कितना कठिन है यारोरो करके मुस्कुराना कितना कठिन है यारोजीवन मेरा सँवरता मुश्किल से खेलकर हीखुद को सदा सजाना कितना कठिन है यारोकितनों को गिरा करके महलों का सफर होतागिरने से नित बचाना कितना कठिन है यारोचाहा था दिल से जिसको गर दूर चला जाए
 
श्यामल सुमन
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है शिकार इन्सान

दूर हुआ कर्तव्य से अधिकारों का ज्ञान।बना शिकारी आदमी है शिकार इन्सान।।मतलब की बातें हुईं अब तो छोड़ो साथ।बिना स्वार्थ के आजकल कौन मिलाता हाथ।।बाहर में सुख है कहाँ ओछे कारोबार।अपने अन्दर झाँकिये बहुत सुखद संसार।।चेहरे पर दुख न दिखे चिपकाया मुस्कान।यह नकली
 
श्यामल सुमन
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सोचो तो असर होता

जीने की ललक जबतक साँसों का सफर होताहर पल है आखिरी पल सोचो तो असर होताइक आशियां बनाना कितना कठिन है यारोजलतीं हैं बस्तियाँ फिर मजहब में जहर होताहोती बहुत निराशा अखबार खोलते हीअब हादसों के बाहर क्या कोई शहर होताअपनों के बीच रहकर अपनों से दूर है जोअक्सर उसी
 
श्यामल सुमन
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सुमन के भीतर आग है

हार जीत के बीच में जीवन एक संगीत।मिलन जहाँ मनमीत से हार बने तब जीत।।डोर बढ़े जब प्रीत की बनते हैं तब मीत।वही मीत जब संग हो जीवन बने अजीत।।रोज परिन्दों की तरह सपने भरे उड़ान।यदि सपन जिन्दा रहे लौटेगी मुस्कान।।रौशन सूरज चाँद से सबका घर संसार।पानी भी सबके
 
श्यामल सुमन
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शादी बिनु राधा किशन

अक्सर हो पाता नहीं मन से मन का मेल।प्रायः अपने यूँ दिखे ज्यों पानी में तेल।।निन्दा में संलग्न हैं लोग कई दिन रात।दूजे का बस नाम है कहते अपनी बात।।चमके सोने की तरह अब आँगन में धूप।मजदूरों के तन जले पानी हुआ अनूप।।आगे पीछे गाड़ियाँ शासक की यह शान।आमलोग की
 
श्यामल सुमन
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जनवादी लेखक संघ झारखण्ड का तृतीय राज्य सम्मेलन

पिछले दस दिनों से इसी राज्य सम्मेलन में खुद की व्यस्तता के कारण इन्टरनेट की दुनिया से प्रायः कट सा गया था। जनवादी लेखक संघ (जलेस) झारखण्ड का तृतीय राज्य सम्मेलन १९ - २१ मार्च को जमशेदपुर में सम्पन्न हुआ। केन्द्रीय पर्यवेक्षक के रूप में जलेस के केन्द्रीय
 
श्यामल सुमन
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बस माँगे अधिकार

कैसे कैसे लोग से भरा हुआ संसार।बोध नहीं कर्त्तव्य का बस माँगे अधिकार।।कहने को आतुर सभी पर सुनता है कौन।जो कहने के योग्य है हो जाते क्यों मौन।।आँखों से बातें हुईं बहुत सुखद संयोग।मिलते कम संयोग यह जीवन का दुर्योग।।मैं अचरज से देखता बाते कई नवीन।मूरख
 
श्यामल सुमन
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बकवास

शासन के जो भी प्रकार हैं, लोकतंत्र है खास।जनहित की बातों को लेकिन कहते हैं बकवास।पैर के नीचे की जमीन भी खिसकायी जाती है,ऐसी चालाकी भाषण में बढ़ जाती है प्यास।।जनता का शासन है फिर भी जनता ही लाचार।वीआईपी कारण दहशत का, सुन दिल्ली सरकार।चौखट पर बाजार खड़ा
 
श्यामल सुमन
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Mar 05 2010 07:18 AM
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फगुनाहट

देखो फिर से वसंती हवा आ गयी। तान कोयल की कानों में यूँ छा गयी। कामिनी मिल खोजेंगे रंगीनियाँ।। इस कदर डूबी क्यों बाहरी रंग में। रंग फागुन का गहरा पिया संग मे। हो छटा फागुनी और घटा जुल्फ की, है मिलन की तड़प मेरे अंग अंग में। दामिनी कुछ कर देंगे नादानियाँ।।
 
श्यामल सुमन
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Feb 28 2010 06:22 AM
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होलियाए दोहे

होली तो अब सामने खेलेंगे सब रंग।मँहगाई ऐसी बढ़ी फीका हुआ उमंग।।पैसा निकले हाथ से ज्यों मुट्ठी से रेत।रंग दिखे ना आस की सूखे हैं सब खेत।।एक रंग आतंक का दूजा भ्रष्टाचार।सभी सुरक्षा संग ले चलती है सरकार।।मौसम और इन्सान का बदला खूब स्वभाव।है वसंत पतझड़ भरा
 
श्यामल सुमन
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Feb 26 2010 07:58 PM
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माँ

मेरे गीतों में तू मेरे ख्वाबों में तू,इक हकीकत भी हो और किताबों में तू।तू ही तू है मेरी जिन्दगी।क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।तू न होती तो फिर मेरी दुनिया कहाँ?तेरे होने से मैंने ये देखा जहाँ।कष्ट लाखों सहे तुमने मेरे लिए,और सिखाया कला जी सकूँ मैं
 
श्यामल सुमन
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Feb 23 2010 05:57 AM
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खून से मँहगा लगता पानी

जब आँखों से रिसता पानीकुछ न कुछ तब कहता पानीप्रियतम दूर अगर हो जाएतब आँखों से बहता पानीपानी पानी होने पर भीकम लोगों में रहता पानीकभी कीमती मोती बनकरटपके बूंद लरजता पानीतीन भाग पानी पर देखो न पीने को मिलता पानीचीर के धरती के सीने कोकितना रोज निकलता
 
श्यामल सुमन
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Feb 15 2010 07:00 PM
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वासंती दोहे

क्या वसंत का मोल है जब न प्रियतम पास?कोयल की हर कूक में पिया मिलन की आस।।अमराई के संग में पीले सरसों फूल।किसके सर बिन्दी लगे किसके माथे धूल।।रस कानों में घोलती मीठी कोयल-तान।उस मिठास के दर्द से प्रायः सब अन्जान।।पतझड़ ने आकर कहा आये द्वार वसंत।नव-जीवन
 
श्यामल सुमन
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Feb 14 2010 06:37 PM
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दर्द बताना नहीं अच्छा

हर बार अपना दर्द बताना नहीं अच्छाऔर जख्म हैं ऐसे कि छुपाना नहीं अच्छातुमसे मिलूँ तो सौंप दूँ अपना सरापा दिललफ्जों में हरएक बात बताना नहीं अच्छावो चुप रहा तो मैंने भी खामोशी ओढ़ लीमहफिल में गज़ल गाना सुनाना नहीं अच्छाइक दिल की सदा पे फना हो जाता है ये
 
श्यामल सुमन
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Feb 14 2010 06:33 PM
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सच की लड़ाई

सवालों से लड़कर सँवरता गया हूँ।विवादों से हँटकर उभरता गया हूँ।जो खुशबू सुमन की बनाया है खुद को,जहाँ तक पहुँच है छिड़कता गया हूँ।।यूँ दुनिया से लड़ना कठिन काम यारो।है खुद को बदलना हरएक शाम यारो।मेरी जो भी फितरत ये दुनिया भी वैसी,हो कोशिश कभी न हों बदनाम
 
श्यामल सुमन
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सृजन हमेशा करना है

इक न इक दिन मरना हैहर पल फिर क्यों डरना हैअर्थ निकलता तब जीवन का सृजन हमेशा करना हैसुख तो सबको प्यारे लगतेदुख में नहीं बिखरना हैचहुँ ओर नदियों सी बाधाहमको पार उतरना हैगलती का मानव कठपुतलानित नित हमें सुधरना हैक्षणिक चमक हो भले झूठ मेंसच से नहीं मुकरना
 
श्यामल सुमन
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अभिसार जिन्दगी है

संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी हैकाँटों सेज कहकर स्वीकार जिन्दगी हैमिलता सुकूँ हवा से जो तन पे हो पसीनाभूखे की जैसे रोटी अभिसार जिन्दगी हैइन्सानियत की कीमत ईमान की भी कीमतहालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी हैक्या माँगने से हिस्से का धूप भी मिलेगाहक छीनकर
 
श्यामल सुमन
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खुशबू

इक नयी खुशबू कहाँ से पास मेरे आ गयीसोच की धारा बदलकर जिन्दगी में छा गयीरोज मिलते जो हजारों लोग कितने याद हैंआँख से उतरा हृदय में प्रीत मुझको भा गयीफिर मेरी मुस्कान लौटे था यकीं ऐसा कहाँस्निग्ध सी मुस्कान जैसे भ्रम के गम को खा गयीकुछ न कुछ तो शेष रहतीं
 
श्यामल सुमन
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किनारा लगाते रहे

मैं भी हँसता रहा वो हँसाते रहेदिल की आपस में दूरी बढ़ाते रहेन तो पीने को पानी न आँखों में हैइसलिए आँसुओं से नहाते रहेजब जरूरत पड़ी साथ मुझको लियावक्त बदला किनारा लगाते रहेहाथ मिलते रहे, बेरूखी आँख मेंवो मशीनों सा बस मुस्कुराते रहेजिसने लूटा चमन, बागबां
 
श्यामल सुमन
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लेकिन प्यास अधूरी है

कुछ परिस्थतियाँ ऐसी बन गयीं हैं जो नये साल में कुछ नहीं लिख पाया। हो सकता है ये हालात और कुछ दिन रहे। भाई अविनाश वाचस्पति और भाई जाकिर अली रजनीश जी ने अपने अपने टिप्पणियों में कुछ नया नहीं लिखने का संकेत भी दिया। कई फोन भी आये। बस आज उन्हीं शिकायतों को
 
श्यामल सुमन
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नूतन आस जगाने दो

नये साल का स्वागत करके, नूतन आस जगाने दो।कल क्या होगा, कौन जानता, मन की प्यास बुझाने दो।। क्या खोया, क्या पाया कल तक, अनुभव के संग ज्ञान यही।इसी ज्ञान से कल हो रौशन, यह विश्वास बढ़ाने दो।। जो न सोचा, हो जाता है, नहीं हारते वीर कभी।सच्ची कोशिश, प्रतिफल
 
श्यामल सुमन
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इनायत हो जाए

मैं डूब सकूँ इन आँखों में जो तेरी इजाजत हो जाए इक डर भी दिल के कोने में कुछ तुमको शिकायत हो जाए जुल्फों की छाँव घनेरी हो जहाँ बैठ तपिश पे गीत लिखूँ साँसों की गिनती हो सरगम समझो कि इबादत हो जाए तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर है प्यार तुम्हारी आँखों में पहच
 
श्यामल सुमन
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हमसफर के लिए

मिले थे राह में अचानक कुछ पहर के लिए बसा लिया है तुझे दिल में उम्र भर के लिए बेचैन निगाहों से नजरें जहाँ मिलीं देखा कि इक तड़प है हमसफर के लिए अनजान ही मिले थे, दिल का पता मिला बन जाऊँ खत मैं खुद ही इक असर के लिए बस तीरगी थी अबतक रौशन हुआ जहाँ क्यों
 
श्यामल सुमन
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मन-मीत

मन को मीत मिला न मन-सा। भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।। कहने को होते कुछ अपना। लेकिन सच अपनापन सपना। समझौता लाखों कर लें पर, रहता जीवन में अनबन-सा। ‍मन को मीत मिला न मन-सा। भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।। अनजाने में प्यार किसी से। क्या जीवन-व्यवहार उसी से? इ
 
श्यामल सुमन
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इन्तजार है

कहना कठिन हुआ कि मुझे तुमसे प्यार है न कहा, नहीं खबर ही मगर इन्तजार है शाखों से लिपटी बेल को देखा जो ख्वाब में क्या ख्वाब पूरे होंगे ये दिल बेकरार है हालात दिल का समझा आँखों में डूबकर दुनिया समझ न पायी क्या अख्तियार है? टकराना पर्वतों से या इश्क हो क
 
श्यामल सुमन
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वही बात कहो

वो कहे रात अगर दिन को नहीं रात कहो लबों पे आ के जो रूक जाये वही बात कहो हैं राज दिल में कई कहना जिसे मुश्किल है छलक पड़े जो ये आँखों से तो सौगात कहो वफा किया ही नहीं वो, बसाया दिल में जिसे बचा है प्यार अगर दिल में तो जज्बात कहो खो करके चाँदनी में क्य
 
श्यामल सुमन
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इश्क चढ़ता गया

उम्र बढ़ती गयी इश्क चढ़ता गया ख्वाब सजते रहे दिन गुजरता गया उम्र छोटी बहुत जिस्म से प्यार की इश्क आँखों से आकर निखरता गया उलझनों में उलझने की फितरत नहीं प्यार उलझन में फँसकर सँवरता गया चाँदनी रात में कुमुदिनी सो गयी चाँद का जो चमन था उजड़ता गया बात ई
 
श्यामल सुमन
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वक्त नहीं मेरे पास

सभी आधुनिक सुख पाने को हरदम करे प्रयास। इस कारण से रिश्ते खोये आपस का विश्वास। भैया जी ऽऽऽऽऽऽऽ क्योंकि वक्त नहीं मेरे पास।। उनसे बात नहीं होती थी जो बसते परदेश में। क्या मिठास अपनापन भी था चिट्ठी के संदेश में? अब तो बातें हर पल सम्भव, क्या वैसा एहसास
 
श्यामल सुमन
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अनुभूति

कभी जिन्दगी ने मचलना सिखाया मिली ठोकरें तो सम्भलना सिखाया सम्भलकर के जीना कठिन जिन्दगी में उलझ भी गए तो निकलना सिखाया महफिल है रंगों की जहाँ जिन्दगी है गिरगिट के जैसे बदलना सिखाया सबकी खुशी में खुशी जिन्दगी की खुद की खुशी में बहलना सिखाया बहुत दूर मि
 
श्यामल सुमन